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View Full Version : छोटी मगर शानदार कहानिया....



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Sameerchand
01-12-2011, 09:05 PM
दोस्तों इस सूत्र में मैं आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ प्रश्तुत करूँगा. जो काफी शिक्षाप्रद भी हैं. तो देर न करते हुए शुरू करते हैं आज की कहानी.....

आप सब के विचार यहाँ आमंत्रित हैं और अगर आप भी योगदान करना चाहे तो आपका स्वागत हैं......

Sameerchand
01-12-2011, 09:06 PM
मैं तुझे तो कल देख लूंगा।



सूफी संत जुनैद के बारे में एक कथा है.


एक बार संत को एक व्यक्ति ने खूब अपशब्द कहे और उनका अपमान किया. संत ने उस व्यक्ति से कहा कि मैं कल वापस आकर तुम्हें अपना जवाब दूंगा.


अगले दिन वापस जाकर उस व्यक्ति से कहा कि अब तो तुम्हें जवाब देने की जरूरत ही नहीं है.


उस व्यक्ति को बेहद आश्चर्य हुआ. उस व्यक्ति ने संत से कहा कि जिस तरीके से मैंने आपका अपमान किया और आपको अपशब्द कहे, तो घोर शांतिप्रिय व्यक्ति भी उत्तेजित हो जाता और जवाब देता. आप तो सचमुच विलक्षण, महान हैं.


संत ने कहा – मेरे गुरु ने मुझे सिखाया है कि यदि आप त्वरित जवाब देते हैं तो वह आपके अवचेतन मस्तिष्क से निकली हुई बात होती है. इसलिए कुछ समय गुजर जाने दो. चिंतन मनन हो जाने दो. कड़वाहट खुद ही घुल जाएगी. तुम्हारे दिमाग की गरमी यूँ ही ठंडी हो जाएगी. आपके आँखों के सामने का अँधेरा जल्द ही छंट जाएगा. चौबीस घंटे गुजर जाने दो फिर जवाब दो.


क्या आपने कभी सोचा है कि कोई व्यक्ति पूरे 24 घंटों के लिए गुस्सा रह सकता है? 24 घंटे क्या, जरा अपने आप को 24 मिनट का ही समय देकर देखें. गुस्सा क्षणिक ही होता है, और बहुत संभव है कि आपका गुस्सा, हो सकता है 24 सेकण्ड भी न ठहरता हो

Sameerchand
01-12-2011, 09:07 PM
कौन बड़ा?



एक बार एक आश्रम के दो शिष्य आपस में झगड़ने लगे – मैं बड़ा, मैं बड़ा.

झगड़ा बढ़ता गया तो फैसले के लिए वे गुरु के पास पहुँचे.

गुरु ने बताया कि बड़ा वो जो दूसरे को बड़ा समझे.

अब दोनों नए सिरे से झगड़ने लगे – तू बड़ा, तू बड़ा!

Sameerchand
01-12-2011, 09:12 PM
सुरक्षा का उपाय



एक बार नसरूद्दीन ने एक लड़के से उसके लिए कुँऐं से पानी खींचने का अनुरोध किया। जैसे ही वह लड़का कुँए से पानी खींचने को झुका, नसरूद्दीन ने उसके सिर में जोर से थप्पड़ मारा और कहा, "ध्यान रहे। मेरे लिए पानी खींचते समय घड़ा न टूटे।"

वहाँ से गुजरते हुए एक राहगीर ने यह सब देखा तो उसने नसरूद्दीन से कहा - "जब उस लड़के ने कोई गल्ती ही नहीं की तो तुमने उसे क्यों मारा?"

नसरूद्दीन ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया - "यदि मैं यह चेतावनी घड़े के फूटने के बाद देता तो उसका कोई फायदा नहीं होता।"

kajal pandey
01-12-2011, 09:16 PM
बहुत ही अच्छा विषय चुना है आपने ,,,आपको बधाई ,,,,,,,,,,

Sameerchand
01-12-2011, 09:16 PM
एक मिनट की भी देरी किसलिए?



एक बार एक जंगल में जबरदस्त आग लग गई और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलकर खाक हो गया. जंगल में एक गुरु का आश्रम था. जब जंगल की आग शांत हुई तो उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और उन्हें आज्ञा दी कि जंगल को फिर से हरा भरा करने के लिए देवदार का वृक्षारोपण किया जाए.


एक शक्की किस्म के चेलने ने शंका जाहिर ही - मगर गुरूदेव, देवदार तो पनपने में बरसों ले लेते हैं.


यदि ऐसा है तब तो हमें बिना देरी किए तुरंत ही यह काम शुरू कर देना चाहिए - गुरू ने कहा.

Sameerchand
01-12-2011, 09:18 PM
बहुत ही अच्छा विषय चुना है आपने ,,,आपको बधाई ,,,,,,,,,,

धन्यवाद नियामिका जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

nitin9935
01-12-2011, 09:55 PM
बहुत अच्छे समीर भाई
एक अच्छा विषय

Sameerchand
01-12-2011, 09:56 PM
बहुत अच्छे समीर भाई
एक अच्छा विषय

धन्यवाद नितिन भाई, आपका बहुत बहुत आभार जो अपने विचार यहाँ प्रकट किये. आशा करता हूँ आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

King_khan
01-12-2011, 11:58 PM
समीर भाई जी
एक सुन्दर सूत्र के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं |

Sameerchand
02-12-2011, 01:20 AM
समीर भाई जी
एक सुन्दर सूत्र के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं |

धन्यवाद खान भाई जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
02-12-2011, 01:38 AM
अपने भीतर के प्रकाश को देखो


एक गुरूजी लंबे समय से अचेतावस्था में थे। एक दिन अचानक उन्हें होश आया तो उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को अपने नजदीक बैठे हुए पाया।

उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा - "तुम इतने समय तक मेरे बिस्तर के नजदीक ही बैठे रहे और मुझे अकेला नहीं छोड़ा?"

शिष्य ने रुंधे हुए गले से कहा - "गुरूदेव मैं ऐसा कर ही नहीं सकता कि आपको अकेला छोड़ दूं।"

गुरूजी - "ऐसा क्यों?"

"क्योंकि आप ही मेरे जीवन के प्रकाशपुंज हैं।"

गुरूजी ने उदास से स्वर में कहा - "क्या मैंने तुम्हें इतना चकाचौंध कर दिया है कि तुम अपने भीतर के प्रकाश को नहीं देख पा रहे हो?"

Sameerchand
02-12-2011, 01:44 AM
शेर और लोमड़ी


एक लोमड़ी, जंगल के राजा शेर के अधीनस्थ एक नौकर के रूप में कार्य करने को सहमत हो गयी। कुछ समय तक तो दोनों अपने स्वभाव और सामर्थ्य के अनुसार भलीभांति कार्य करते रहे। लोमड़ी शिकार बताती और शेर हमला करके शिकार को दबोच लेता। परंतु लोमड़ी को जल्द ही यह ईर्ष्या होने लगी कि शेर शिकार का ज्यादा हिस्सा स्वयं चट कर जाता है और उसे बचाखुचा हिस्सा ही मिलता है। वह सोचने लगी कि आखिर वह किस मायने में शेर से कम है। और उसने यह घोषणा कर दी कि भविष्य में वह अकेले ही शिकार करेगी। अगले ही दिन जब वह एक भेड़शाला में से भेड़ के बच्चे को दबोचने ही वाली थी कि अचानक शिकारी और उसके पालतू कुत्ते आ गए और उसे अपना शिकार बना लिया।

"जीवन में अपना स्थान नियत करो और यह स्थान ही आपकी रक्षा करेगा।"

Sameerchand
02-12-2011, 01:49 AM
तुम्हारा फर्नीचर कहाँ है?


पिछली शताब्दी की बात है। एक अमेरिकी पर्यटक सुप्रसिद्ध पुलिस कर्मचारी रब्बी हॉफेज़ चैम से मिलने गया।

उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि रब्बी सिर्फ एक कमरे में रहते थे और वह भी किताबों से भरा हुआ था। उसमें फर्नीचर के नाम पर सिर्फ एक मेज और कुर्सी थी।

"तुम्हारा फर्नीचर कहाँ हैं रब्बी?" - पर्यटक ने पूछा ।

"और तुम्हारा कहाँ हैं?" - रब्बी ने कहा ।

"मेरा फर्नीचर ! लेकिन मैं तो यहाँ एक पर्यटक हूँ और यहाँ से गुजर ही रहा था।"

"और मैं भी" -- -- -- रब्बी ने भोलेपन से कहा ।

--

Sameerchand
02-12-2011, 01:54 AM
आदमी और शेर


एक बार एक शेर और एक आदमी साथ-साथ यात्रा कर रहे थे। उनके मध्य यह बहस होने लगी कि कौन ज्यादा ताकतवर और श्रेष्ठ है। उनके मध्य नोक-झोंक तीखी हुई ही थी कि वे चट्टान पर उकेरी गयी एक मूर्ति के पास से गुजरे जिसमें एक आदमी को शेर का गला दबाते हुए दर्शाया गया था।

"वो देखो। हमारी श्रेष्ठता को साबित करने के लिए क्या तुम्हें और किसी प्रमाण की आवश्यकता है?" - आदमी ने गर्व से कहा।

शेर ने उत्तर दिया - "ये कहानी कहने का तुम्हारा नजरिया है। यदि हम लोग शिल्पकार होते तो शेर के एक पंजे के नीचे बीस आदमी दबे होते।"

"इतिहास सिर्फ विजेताओं द्वारा ही लिखा जाता है।"

nitin9935
02-12-2011, 10:52 AM
आदमी और शेर


एक बार एक शेर और एक आदमी साथ-साथ यात्रा कर रहे थे। उनके मध्य यह बहस होने लगी कि कौन ज्यादा ताकतवर और श्रेष्ठ है। उनके मध्य नोक-झोंक तीखी हुई ही थी कि वे चट्टान पर उकेरी गयी एक मूर्ति के पास से गुजरे जिसमें एक आदमी को शेर का गला दबाते हुए दर्शाया गया था।

"वो देखो। हमारी श्रेष्ठता को साबित करने के लिए क्या तुम्हें और किसी प्रमाण की आवश्यकता है?" - आदमी ने गर्व से कहा।

शेर ने उत्तर दिया - "ये कहानी कहने का तुम्हारा नजरिया है। यदि हम लोग शिल्पकार होते तो शेर के एक पंजे के नीचे बीस आदमी दबे होते।"

"इतिहास सिर्फ विजेताओं द्वारा ही लिखा जाता है।"

बिलकुल सत्य वचन है

swami ji
02-12-2011, 11:01 AM
नए सूत्र की शुभ कमंये दोस्त ,,,,

sushilnkt
02-12-2011, 02:41 PM
आप ने बहुत ही सुन्दर शब्दों ज्ञान की बात कही हे

ऐसी बाते जो दिल में उतर जाती हे ... जिनका
जीवन पर बहुत अच्छा प्रभाव छोड़ जाती हे

Sameerchand
02-12-2011, 02:46 PM
बिलकुल सत्य वचन है


नए सूत्र की शुभ कमंये दोस्त ,,,,


आप ने बहुत ही सुन्दर शब्दों ज्ञान की बात कही हे

ऐसी बाते जो दिल में उतर जाती हे ... जिनका
जीवन पर बहुत अच्छा प्रभाव छोड़ जाती हे

धन्यवाद नितिन भाई, स्वामी जी, और सुशिल जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
02-12-2011, 11:14 PM
अपनी आँखें खुली रखो

दार्जिलिंग में कुछ बुजुर्ग मित्रों का एक समूह था जो आपस में समाचारों के आदान-प्रदान और एक साथ चाय पीने के लिये मिलते रहते थे। उनका एक अन्य शौक चाय की महँगी किस्मों की खोज और उनके विभिन्न मिश्रणों द्वारा नए स्वादों की खोज करना था।

मित्रों के मनोरंजन हेतु जब समूह के सबसे उम्रदराज़ बुजुर्ग की बारी आयी तो उसने समारोहपूर्वक एक सोने के महंगे डिब्बे में से चाय की पत्तियाँ निकालते हुए चाय तैयार की। सभी लोगों को चाय का स्वाद बेहद पसंद आया और वे इस मिश्रण को जानने के लिए उत्सुक हो उठे। बुजुर्ग ने मुस्कराते हुए कहा - "मित्रों, जिस चाय को आप बेहद पसंद कर रहे हैं उसे तो मेरे खेतों पर काम करने वाले किसान पीते हैं।"

"जीवन की बेहतरीन चीजें न तो महंगी हैं और न ही उन्हें खोजना कठिन है।"

Sameerchand
02-12-2011, 11:18 PM
मत बदलो

वर्षों तक मैं मानसिक रोगी रहा - चिंताग्रस्त, अवसादग्रस्त और स्वार्थी। हर कोई मुझे अपना स्वभाव बदलने को कहता ।

मैं उन्हें नाराज करता, पर उनसे सहमत भी था। मैं अपने आपको बदलना चाहता था लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बावजूद मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाया।

मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती थी जब दूसरों की तरह मेरे सबसे नजदीकी मित्र भी मुझसे बदलने को कहते। मैं ऊर्जारहित और बंधा-बंधा सा महसूस करता ।

एक दिन उसने कहा - "अपने आप को मत बदलो। तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।"

ये शब्द मेरे कानों को मधुर संगीत की तरह लगे - "मत बदलो, मत बदलो, मत बदलो ............. तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।"

मैंने राहत महसूस की। मैं जीवंत हो उठा और अचानक मैंने पाया कि मैं बदल गया हूँ। अब मैं समझ गया हूँ कि वास्तव में, मैं तब तक नहीं बदला था जब तक कि मैंने ऐसे व्यक्ति को नहीं खोज लिया जो मुझसे हर हाल में प्रेम करता हो।

Sameerchand
02-12-2011, 11:23 PM
राजा से तो बेहतर वृक्ष है

एक लड़का आम के वृक्ष पर पत्थर मारकर आम तोड़ने का प्रयास कर रहा था। गलती से एक पत्थर अपने लक्ष्य से भटककर वहां से गुजर रहे राजा को लगा। राजा के सैनिकों ने दौड़कर उस लड़के को पकड़ लिया और उसे राजा के समक्ष प्रस्तुत किया ।

राजा ने कहा -"इसके लिए तुम सजा के भागीदार हो। ............ताकि फिर कभी कोई राजा के ऊपर पत्थर फेंकने की हिम्मत न करे, अन्यथा ऐसे तो शासन चलाना मुश्किल हो जाएगा।"

लड़के ने विनयपूर्वक उत्तर दिया - "हे वीर एवं न्यायप्रिय राजन, जब मैंने आम के वृक्ष पर पत्थर मारा तो मुझे उपहार स्वरूप मीठे रसीले फल खाने को मिले और जब आपको पत्थर लगा तो आप मुझे दंड दे रहे हैं....आप से भला तो वृक्ष है।"

राजा का सिर शर्म से झुक गया।

Sameerchand
02-12-2011, 11:28 PM
कोट के भीतर डायनामाइट

मुल्ला नसरुद्दीन खुशी-खुशी कुछ बुदबुदा रहा था। उसके मित्र ने इस खुशी का राज पूछा।

मुल्ला नसरुद्दीन बोला - "वो बेवकूफ अहमद जब भी मुझसे मिलता है, मेरी पीठ पर हाथ मारता है। आज मैंने अपने कोट के भीतर डायनामाइट की छड़ छुपा ली है। इस बार जब वो मेरी पीठ पर हाथ मारेगा तो उसका हाथ ही उड़ जाएगा।"

"भले ही मुझे हानि पहुंचे, मैं उसे क्षति पहुंचाकर बदला लूंगा।"

manishdeo
03-12-2011, 10:09 PM
बहुत ही शानदार कहानिया है सिर्फ एक शब्द में कहें तो लाजवाब

lotus1782
04-12-2011, 12:56 PM
बुहत ही बड्या प्रस्तुति है !

Sameerchand
04-12-2011, 06:31 PM
बहुत ही शानदार कहानिया है सिर्फ एक शब्द में कहें तो लाजवाब


बुहत ही बड्या प्रस्तुति है !

धन्यवाद मनीषदेव और लोटस जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपलोगों को ये कहानियां अच्छी लगी बहुत अच्छा लगा जानकर.

Sameerchand
04-12-2011, 06:42 PM
मृगतृष्णा


जब महात्मा बुद्ध ने राजा प्रसेनजित की राजधानी में प्रवेश किया तो वे स्वयं उनकी आगवानी के लिए आये। वे महात्मा बुद्ध के पिता के मित्र थे एवं उन्होंने बुद्ध के संन्यास लेने के बारे में सुना था।

अतः उन्होंने बुद्ध को अपना भिक्षुक जीवन त्यागकर महल के ऐशोआराम के जीवन में लौटने के लिए मनाने का प्रयास किया। वे ऐसा अपनी मित्रता की खातिर कर रहे थे।

बुद्ध ने प्रसेनजित की आँखों में देखा और कहा, "सच बताओ। क्या समस्त आमोद-प्रमोद के बावजूद आपके साम्राज्य ने आपको एक भी दिन का सुख प्रदान किया है?"

प्रसेनजित चुप हो गए और उन्होंने अपनी नजरें झुका लीं।

"दुःख के किसी कारण के न होने से बड़ा सुख और कोई नहीं है;
और अपने में संतुष्ट रहने से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है।"

Sameerchand
04-12-2011, 06:43 PM
नदी का पानी बिकाऊ

गुरू जी के प्रवचन में एक गूढ़ वाक्य शामिल था।

कटु मुस्कराहट के साथ वे बोले, "नदी के तट पर बैठकर नदी का पानी बेचना ही मेरा कार्य है"।

और मैं पानी खरीदने में इतना व्यस्त था कि मैं नदी को देख ही नहीं पाया।

"हम जीवन की समस्याओं और आपाधापी के कारण प्रायः सत्य को नहीं पहचान पाते।"

Sameerchand
04-12-2011, 06:52 PM
प्रार्थना

वे प्रतिवर्ष पिकनिक पर सपरिवार जोशोखरोश से जाते थे और अपनी धर्मपरायण चाची को बुलाना नहीं भूलते थे. मगर इस वर्ष वे हड़बड़ी में भूल गए.

आखिरी मिनटों में किसी ने याद दिलाया. चाची को जब निमंत्रण भेजा गया तो उन्होंने कहा – “अब तो बहुत देर हो चुकी. मैंने तो आँधी-तूफ़ान और बरसात के लिए प्रार्थना भी कर ली है.”

Sameerchand
04-12-2011, 06:55 PM
बुद्धिमानी

मुल्ला नसरूद्दीन शादी की दावत में निमंत्रित थे. पिछली दफ़ा जब वे ऐसे ही समारोह में निमंत्रित थे तो किसी ने उनका जूता चुरा लिया था. इसलिए इस बार मुल्ला ने जूता दरवाजे पर छोड़ने के बजाए अपनी कोट की जेब में ठूंस लिए.

“आपकी जेब में रखी किताब कौन सी है” – मेजबान ने मुल्ला से पूछा.

“लगता है यह मेरे जूतों के पीछे पड़ा है” मुल्ला ने सोचा और कहा – “वैसे तो लोग मेरी बुद्धिमानी का लोहा मानते हैं.” और फिर चिल्लाया – “मेरी जेब में रखी इस भारी भरकम चीज का मुख्य विषय भी यही है - बुद्धिमानी.”

“अरे वाह!, आपने इसे कहाँ से खरीदा – ‘बुक-वार्म’ से या ‘क्रॉसवर्ड’ से?”

“मोची से”

Subhash Chand Sharma
04-12-2011, 07:14 PM
समीर भाई जी
एक सुन्दर सूत्र के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं |

Sameerchand
04-12-2011, 07:43 PM
समीर भाई जी
एक सुन्दर सूत्र के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं |

धन्यवाद सुभाष जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
05-12-2011, 06:56 AM
नए सूत्र की शुभकामना मित्र ...............................बहुत खूब बढ़िया बहुत ही अच्छा विषय चुना है आपने

धन्यवाद दीप दीप जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Kamal Ji
06-12-2011, 12:30 PM
समीर भाई जी
एक सुन्दर सूत्र के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं. मैं अपनी ओर से भी कुछ प्रस्तुत कर रहा हूँ .
दयालु पाठकगन कृपया इसे भी स्वीकारें.

Kamal Ji
06-12-2011, 12:30 PM
आचार्य विनोबा भावे की मां सहृदय और दयालु थीं। वह शुरू से ही विनोबा जी को अच्छी शिक्षा व संस्कार देने में जुटी थीं। विनोबा जी भी बचपन में अन्य बच्चों की तरह ही शरारती थे। एक दिन विनोबा जी की पड़ोसिन को किसी जरूरी काम से बाहर जाना पड़ा। उस पड़ोसिन का भी एक छोटा बच्चा था। वह बच्चे को उस स्थान पर नहीं ले जा सकती थी। इसलिए उसके सामने समस्या आ खड़ी हुई कि बच्चे को कहां पर छोड़े ?

जब यह बात विनोबा जी की मां को मालूम हुई तो उन्होंने बच्चे को अपने यहां छोड़ने के लिए कहा। पड़ोसिन को विनोबा जी की मां के सरल हृदय , ममता व प्रेम पर पूरा विश्वास था। इसलिए वह बच्चे को उनके पास छोड़कर चली गई। बच्चा विनोबाजी के साथ खेलने में मस्त हो गया। एक मां का समान स्नेह और सद्भाव दोनों बच्चों पर बराबर रहा। जब खाने का समय हुआ और मां भोजन पकाकर दोनों बालकों को देने लगी तो विनोबाजी को अपनी मां के स्वभाव में कुछ अंतर नजर आया । उन्होंने देखा कि मां उन्हें सूखी रोटियां दे रही हैं जबकि पड़ोसी बालक को घी से चुपड़कर रोटियां अपने हाथों से खिला रही हैं।

यह देखकर वह मां से बोले , ' तुम मेरी मां हो लेकिन तुम मुझे तो सूखी रोटियां दे रही हो और इसे घी की रोटियां दे रही हो। आखिर ऐसा भेदभाव क्यों ?'

विनोबा जी की बात सुनकर मां बोलीं , ' बेटा , घर में इतना घी नहीं कि दोनों को दे सकूं। तू तो मेरा बालक है। पर यह तो भगवान का बच्चा है। अतिथि को भगवान कहते हैं। इसलिए भगवान के बच्चे में और अपने बच्चे में कुछ तो अंतर होना ही चाहिए। हमें कष्ट सहकर भी अतिथि को सुख देना चाहिए। '

मां की भावना विनोबा जी समझ गए और इस प्रकार बचपन से ही उनके व्यक्तित्व में श्रेष्ठ संस्कारों और सद्विचारों का समावेश हो गया।

Kamal Ji
06-12-2011, 12:32 PM
मेरे द्वारा यहाँ जो भी कहानियाँ दी जा रही हैं वह सब नेट से ही ली गयी हैं.

Kamal Ji
06-12-2011, 12:35 PM
यह देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ . राजेंद्र प्रसाद की युवावस्था की घटना है। उन दिनों उनके घर कई रिश्तेदार आए हुए थे। उनके कई बच्चे थे। सारे बच्चे घर में खूब धमाचौकड़ी मचाते थे। एक दिन उन लोगों ने राजेंद्र बाबू की एक किताब के कुछ पन्ने फाड़ दिए। राजेंद्र बाबू परेशान हो गए। वह जानते थे कि यह उन्हीं में से किसी बच्चे की करतूत है लेकिन यह पता कैसे चले कि किसने पन्ने फाड़े हैं।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजेंद्र प्रसाद को एक युक्ति सूझी।उन्होंने उन बच्चों को बुलाकर कहा , ' जिस बच्चे ने इस पुस्तक के जितने ज्यादा पन्ने फाड़े हैं , उसको उतने ज्यादा पैसे मिलेंगे। ' यह युक्ति काम कर गई। बच्चों ने खुशी - खुशी बता दिया कि किसने कितने पन्ने फाड़े हैं। राजेंद्र बाबू खुश हो गए कि बिना सख्ती बरते ही सचाई सामने आ गई। पैसे देने के बाद राजेंद्र बाबू ने उन बच्चों को समझाया , ' देखो बच्चों तुम्हें पैसे मिल गए। लेकिन तुम्हारा यह काम बिल्कुल ठीक नहीं। किसी किताब के पन्ने फाड़ना बहुत गलत बात है। किताबों से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। उन्हें नुकसान पहुंचाकर हम अपना ही नुकसान करते हैं। आगे से ऐसा कभी मत करना। '

राजेंद्र बाबू की बातों का बच्चों पर गहरा असर पड़ा। सभी बच्चों ने उन्हें वचन दिया कि वे आगे से कभी ऐसा नहीं करेंगे। राजेंद्र बाबू ने बाद में भी लोगों को समझाने , उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए ऐसी ही युक्तियों का सहारा लिया और वह अपने मकसद में कामयाब भी रहे।

Kamal Ji
06-12-2011, 12:36 PM
आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इंग्लैंड गए। वहां उनकी मुलाकात ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से हुई। चर्चिल और नेहरू एक दूसरे से गर्मजोशी से मिले। वे बड़ी देर तक बातें करते रहे। सुखद माहौल में पुरानी यादें ताजा हुईं। चर्चिल ने नेहरू से उनके वर्तमान अनुभवों और भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा। फिर अचानक वह चुप हो गए और थोड़ी देर बाद उन्होंने सकुचाते हुए पूछा , ' अच्छा , आपसे एक बात पूछना चाहता हूं। आप हमारी जेल में अनेक वर्ष रहे। हमारे अधिकारियों ने आपके साथ कई बार अभद्र व्यवहार भी किया। आपको कई तरह से कष्ट पहुंचाया। इस वजह से तो आपके मन में हम लोगों के प्रति जरूर नफरत होगी। '

नेहरू जी ने मुस्कराते हुए कहा , ' बात यह नहीं है कि मैं आपकी जेलों में कितने वर्ष रहा या आप लोगों ने हमारे साथ कैसा व्यवहार किया। हमारी आजादी की लड़ाई का नेतृत्व महात्मा गांधी जैसे महान नेता ने किया। उन्होंने हमें दो बुनियादी बातें बताईं। एक यह कि किसी से मत डरो और किसी से घृणा मत करो। हम सब उनकी बातों को मन से स्वीकार करके ही आजादी की लड़ाई में शामिल हुए। हम जब आपके खिलाफ लड़ रहे थे तो हम आपसे बिल्कुल नहीं डर रहे थे। और अब जबकि हम आजाद हो चुके हैं , हम आपसे नफरत भी नहीं करते। वैसे भी हमारी लड़ाई किसी राष्ट्र विशेष या समुदाय विशेष के प्रति नहीं थी। हम तो आपकी साम्राज्यवादी नीतियों से लड़ रहे थे। अब जबकि भारत आजाद हो चुका है , हम अपने बुनियादी मूल्यों और सिद्धांतों के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। ' उनकी बात सुनकर चर्चिल उनका मुंह ताकते रह गए। नेहरू जी अपनी बातों से हमेशा दुनिया के बड़े से बड़े राजनेताओं को निरुत्तर कर देते थे। अपनी बात को स्पष्टता और दृढ़ता से रखना उनका स्वाभाविक गुण था।

Kamal Ji
06-12-2011, 12:37 PM
भगवान विष्णु के सामने भीड़ लगी थी। अपने आसन पर विराजमान प्रभु सभी प्राणियों को त्रैलोक्य की संपदा बांट रहे थे। उन्होंने संकल्प किया था कि आज किसी को खाली हाथ न जाने देंगे। धन - धान्य , संतान , वैभव - विलास , यश , वह सब कुछ खुले हाथों से दे रहे थे। बैकुंठ का कोष खाली होते देख लक्ष्मी से रहा नहीं गया और वह दौड़कर विष्णु का हाथ थामकर बोलीं , ' हे प्रभु। यह आप क्या कर रहे हैं। यदि आप मुक्त भाव से यों ही संपदा लुटाते रहे तो बैकुंठ में कुछ भी नहीं बचेगा। ऐसे में तो हमारा सुख - चैन सब छिन जाएगा। '

लक्ष्मी की बात पर विष्णु मंद - मंद मुस्कराने लगे और बोले , ' देवी , इसके लिए चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। धन - संपदा लुटाने से हमारा सुख पहले की तरह ही बना रहेगा। '

लक्ष्मी हैरानी से बोलीं , ' कैसे प्रभु ? सब कुछ तो आपने लुटा दिया। '

विष्णु बोले , ' हां , सब कुछ लुटाने पर भी एक अमूल्य निधि ऐसी है जो हमारे पास सुरक्षित है और उसे यहां उपस्थित नर , किन्नर , गंधर्व , विद्याधर एवं असुर में से किसी ने भी नहीं मांगा है। वह निधि ऐसी है कि उससे धन - संपदा स्वयं खड़ी हो जाती है और यदि वह नहीं है तो धन - संपदा , वैभव का कोई मोल नहीं रह जाता।

लक्ष्मी फिर बोलीं , ' प्रभु , पहेलियां न बुझाइए। बताइए वह है क्या ?'

विष्णु बोले , ' वह निधि है - शांति। शांति के बिना धन - संपदा , वैभव - विलास का कोई अर्थ नहीं है। '

विष्णु की बात सुनकर लक्ष्मी संतुष्ट हो गईं और बोलीं , ' हां प्रभु , आप सही कह रहे हैं। अब मैं निश्चिंत हूं। '

Kamal Ji
06-12-2011, 12:39 PM
स्वामी रामतीर्थ जापान से अमेरिका जा रहे थे। सागर की लहरों को चीरता हुआ उनका जहाज सैन फ्रांसिसको के एक बंदरगाह पर आ लगा। सब यात्री उतर गए। जहाज के डेक पर स्वामी जी टहल रहे थे। उन्हें देखकर लगता था कि जैसे वे जहाज से उतरना ही नहीं चाहते हों। एक अमेरिकी सज्जन यह सब देख रहे थे। उन्होंने स्वामी जी से पूछा , ' आपका सामान कहां है ? आप उतरते क्यों नहीं हैं ?'

स्वामी जी बोले , ' जो कुछ मेरे शरीर पर है , उसके सिवा मेरे पास दूसरा कोई सामान नहीं है। '

वह सज्जन उन्हें आश्चर्य से देख रहे थे और स्वामी जी मंद - मंद मुस्करा रहे थे। तभी उस अमेरिकी सज्जन ने अगला प्रश्न किया , ' आपके रुपये - पैसे कहां हैं ?'

स्वामी जी का जवाब था , ' मैं अपने पास कुछ नहीं रखता। समस्त जड़ - चेतन में मेरी आत्मा का रमण है। मैं अपने आत्मीय लोगों के प्रेमामृत से जीवित रहता हूं। भूख लगने पर कोई रोटी का टुकड़ा दे देता है, तो प्यास लगने पर पानी पिला देता है। समस्त विश्व मेरा है। इस विश्व को संचालित करने वाला सत्य ही मेरा प्राण - देवता है। कभी पेड़ के नीचे रात कटती है, तो कभी आसमान के तारे गिनते - गिनते आंखें लग जाती हैं। '

' पर यहां अमेरिका में आपका परिचित कौन है ?' स्वामी जी से अमेरिकी महानुभाव का यह तीसरा प्रश्न था।

स्वामी जी मुस्कराते हुए बोले , ' आप ! भाई , अमेरिका में तो केवल मैं एक ही व्यक्ति को जानता हूं। चाहे आप परिचित कह लें या मित्र अथवा साथी के नाम से पुकार लें और वह व्यक्ति आप हैं। '

यह कहकर स्वामी रामतीर्थ ने उनके कंधे पर हाथ रख दिया। वे सज्जन उनके स्पर्श से धन्य हो गए। स्वामी जी उनके साथ जहाज से उतर पड़े। वे अमेरिकी सज्जन इस मुलाकात को भूल नहीं पाए। वे जहां भी गए स्वामी जी की बात करते रहे। स्वामी जी के बारे में उनका कहना था , ' उनकी उपस्थिति मात्र से हमें नवजीवन मिला। '

Sameerchand
07-12-2011, 11:33 AM
समीर भाई जी
एक सुन्दर सूत्र के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं. मैं अपनी ओर से भी कुछ प्रस्तुत कर रहा हूँ .
दयालु पाठकगन कृपया इसे भी स्वीकारें.

धन्यवाद कमल जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपके द्वारा प्रश्तुत कहानिया भी काफी प्रेरणादायक हैं. कृपया आगे भी इस सूत्र में इस तरह की कहानिया डालने की कोशिश कीजियेगा. हम सदस्यों को आपकी कहानियो का काफ इन्तजार रहेगा.

Sameerchand
07-12-2011, 11:36 AM
सबसे बड़ा सबक

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में चीन से एक दूत आया. वह चाणक्य के साथ ‘राजनीति के दर्शन’ पर विचार-विमर्श करना चाहता था. चीनी राजदूत राजशाही ठाठबाठ वाला अक्खड़ किस्म का था. उसने चाणक्य से बातचीत के लिए समय मांगा. चाणक्य ने उसे अपने घर रात को आने का निमंत्रण दिया.

उचित समय पर चीनी राजदूत चाणक्य के घर पहुँचा. उसने देखा कि चाणक्य एक छोटे से दीपक के सामने बैठकर कुछ लिख रहे हैं. उसे आश्चर्य हुआ कि चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार का बड़ा ओहदेदार मंत्री इतने छोटे से दिए का प्रयोग कर रहा है.

चीनी राजदूत को आया देख चाणक्य खड़े हुए और आदर सत्कार के साथ उनका स्वागत किया. और इससे पहले कि बातचीत प्रारंभ हो, चाणक्य ने वह छोटा सा दीपक बुझा दिया और एक बड़ा दीपक जलाया. बातचीत समाप्त होने के बाद चाणक्य ने बड़े दीपक को बुझाया और फिर से छोटे दीपक को जला लिया.

चीनी राजदूत को चाणक्य का यह कार्य बिलकुल ही समझ में नहीं आया. चलते-चलते उसने पूछ ही लिया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया.

चाणक्य ने कहा – जब आप मेरे घर पर आए तो उस वक्त मैं अपना स्वयं का निजी कार्य कर रहा था, तो उस वक्त मैं अपना स्वयं का दीपक प्रयोग में ले रहा था. जब हमने राजकाज की बातें प्रारंभ की तब मैं राजकीय कार्य कर रहा था तो मैंने राज्य का दीपक जलाया. जैसे ही हमारी राजकीय बातचीत समाप्त हुई, मैंने फिर से स्वयं का दीपक जला लिया.

चाणक्य ने आगे कहा - मैं कभी ‘राज्य का मंत्री’ होता हूँ, तो कभी राज्य का ‘आम आदमी’. मुझे दोनों के बीच अंतर मालूम है.

Sameerchand
07-12-2011, 11:48 AM
बुरे इरादे छुपाए नहीं छुपते

एक बार की बात है. एक गरीब बुढ़िया एक गांव से दूसरे गांव पैदल जा रही थी. उसके सिर पर एक भारी बोझ था. वह बेचारी हर थोड़ी दूर पर थक कर बैठ जाती और सुस्ताती. इतने में एक घुड़सवार पास से गुजरा. बुढ़िया ने उस घुड़सवार से कहा कि क्या वो अपने घोड़े पर उसका बोझा ले जा सकता है. घुड़सवार ने मना कर दिया और कहा – बोझा तो मैं भले ही घोड़े पर रख लूं, मगर तुम तो बड़ी धीमी रफ्तार में चल रही हो. मुझे तो देर हो जाएगी.

थोड़ी दूर आगे जाने के बाद घुड़सवार के मन में आया कि शायद बुढ़िया के बोझे में कुछ मालमत्ता हो. वो बुढ़िया की सहायता करने के नाम पर बोझा घोड़े पर रख लेगा और सरपट वहाँ से भाग लेगा. ऐसा सोचकर वह वापस बुढ़िया के पास आया और बुढ़िया से कहा कि वो उसकी सहायता कर प्रसन्न होगा.

अबकी बुढ़िया ने मना कर दिया. घुड़सवार गुस्से से लाल-पीला हो गया. उसने बुढ़िया से कहा, अभी तो थोड़ी देर पहले तुमने मुझसे बोझा ढोने के लिए अनुनय विनय किया था! और अभी थोड़ी देर में ये क्या हो गया कि तुमने अपना इरादा बदल दिया?

‘उसी बात ने मेरा इरादा बदला जिसने तुम्हारा इरादा बदल दिया.’ बुढ़िया ने एक जानी पहचानी मुस्कुराहट उसकी ओर फेंकी और आगे बढ़ चली.

Sameerchand
07-12-2011, 11:49 AM
मेरा दिल तो पहले से ही वहाँ पर है

एक बुजुर्ग हिमालय पर्वतों की तीर्थयात्रा पर था. कड़ाके की ठंड थी और बारिश भी शुरू हो गई थी.

धर्मशाला के एक कर्मचारी ने पूछा “बाबा, मौसम खराब है. ऐसे में आप कैसे जाओगे?”

बुजुर्ग ने प्रसन्नता से कहा – “मेरा दिल तो वहाँ पहले से ही है. बाकी के लिए तो कोई समस्या ही नहीं है.”

Sameerchand
07-12-2011, 11:52 AM
गगरी आधी भरी या खाली

एक बुजुर्ग ग्रामीण के पास एक बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली घोड़ा था. वह उससे बहुत प्यार करता था. उस घोड़े को खरीदने के कई आकर्षक प्रस्ताव उसके पास आए, मगर उसने उसे नहीं बेचा.

एक रात उसका घोड़ा अस्तबल से गायब हो गया. गांव वालों में से किसी ने कहा “अच्छा होता कि तुम इसे किसी को बेच देते. कई तो बड़ी कीमत दे रहे थे. बड़ा नुकसान हो गया.”

परंतु उस बुजुर्ग ने यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “आप सब बकवास कर रहे हैं. मेरे लिए तो मेरा घोड़ा बस अस्तबल में नहीं है. ईश्वर इच्छा में जो होगा आगे देखा जाएगा.”

कुछ दिन बाद उसका घोड़ा अस्तबल में वापस आ गया. वो अपने साथ कई जंगली घोड़े व घोड़ियाँ ले आया था.

ग्रामीणों ने उसे बधाईयाँ दी और कहा कि उसका तो भाग्य चमक गया है.

परंतु उस बुजुर्ग ने फिर से यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “बकवास! मेरे लिए तो बस आज मेरा घोड़ा वापस आया है. कल क्या होगा किसने देखा है.”

अगले दिन उस बुजुर्ग का बेटा एक जंगली घोड़े की सवारी करते गिर पड़ा और उसकी टाँग टूट गई. लोगों ने बुजुर्ग से सहानुभूति दर्शाई और कहा कि इससे तो बेहतर होता कि घोड़ा वापस ही नहीं आता. न वो वापस आता और न ही ये दुर्घटना घटती.

बुजुर्ग ने कहा – “किसी को इसका निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है. मेरे पुत्र के साथ एक हादसा हुआ है, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है, बस”

कुछ दिनों के बाद राजा के सिपाही गांव आए, और गांव के तमाम जवान आदमियों को अपने साथ लेकर चले गए. राजा को पड़ोसी देश में युद्ध करना था, और इसलिए नए सिपाहियों की भरती जरूरी थी. उस बुजुर्ग का बेटा चूंकि घायल था और युद्ध में किसी काम का नहीं था, अतः उसे नहीं ले जाया गया.

गांव के बचे बुजुर्गों ने उस बुजुर्ग से कहा – “हमने तो हमारे पुत्रों को खो दिया. दुश्मन तो ताकतवर है. युद्ध में हार निश्चित है. तुम भाग्यशाली हो, कम से कम तुम्हारा पुत्र तुम्हारे साथ तो है.”

उस बुजुर्ग ने कहा – “अभिशाप या आशीर्वाद के बीच बस आपकी निगाह का फ़र्क होता है. इसीलिए किसी भी चीज को वैसी निगाहों से न देखें. निस्पृह भाव से यदि चीजों को होने देंगे तो दुनिया खूबसूरत लगेगी.”

sushilnkt
07-12-2011, 01:05 PM
सबसे बड़ा सबक

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में चीन से एक दूत आया. वह चाणक्य के साथ ‘राजनीति के दर्शन’ पर विचार-विमर्श करना चाहता था. चीनी राजदूत राजशाही ठाठबाठ वाला अक्खड़ किस्म का था. उसने चाणक्य से बातचीत के लिए समय मांगा. चाणक्य ने उसे अपने घर रात को आने का निमंत्रण दिया.

उचित समय पर चीनी राजदूत चाणक्य के घर पहुँचा. उसने देखा कि चाणक्य एक छोटे से दीपक के सामने बैठकर कुछ लिख रहे हैं. उसे आश्चर्य हुआ कि चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार का बड़ा ओहदेदार मंत्री इतने छोटे से दिए का प्रयोग कर रहा है.

चीनी राजदूत को आया देख चाणक्य खड़े हुए और आदर सत्कार के साथ उनका स्वागत किया. और इससे पहले कि बातचीत प्रारंभ हो, चाणक्य ने वह छोटा सा दीपक बुझा दिया और एक बड़ा दीपक जलाया. बातचीत समाप्त होने के बाद चाणक्य ने बड़े दीपक को बुझाया और फिर से छोटे दीपक को जला लिया.

चीनी राजदूत को चाणक्य का यह कार्य बिलकुल ही समझ में नहीं आया. चलते-चलते उसने पूछ ही लिया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया.

चाणक्य ने कहा – जब आप मेरे घर पर आए तो उस वक्त मैं अपना स्वयं का निजी कार्य कर रहा था, तो उस वक्त मैं अपना स्वयं का दीपक प्रयोग में ले रहा था. जब हमने राजकाज की बातें प्रारंभ की तब मैं राजकीय कार्य कर रहा था तो मैंने राज्य का दीपक जलाया. जैसे ही हमारी राजकीय बातचीत समाप्त हुई, मैंने फिर से स्वयं का दीपक जला लिया.

चाणक्य ने आगे कहा - मैं कभी ‘राज्य का मंत्री’ होता हूँ, तो कभी राज्य का ‘आम आदमी’. मुझे दोनों के बीच अंतर मालूम है.




बहुत ही सुन्दर ......... बात कही आपने

दिल में घर कर गयी ..

Sameerchand
07-12-2011, 01:33 PM
बहुत ही सुन्दर ......... बात कही आपने

दिल में घर कर गयी ..


धन्यवाद सुशिल जी, बिलकुल सही बात कही आपने. आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

ben ten
07-12-2011, 01:57 PM
भाई आप के सूत्र के लिए बस इतना ही कहूँगा कि 'छोटी छोटी मगर मोटी बातें'

nitin9935
07-12-2011, 02:24 PM
थुम्बा में रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर वैज्ञानिक एक दिन में लगभग 12 से 18 घंटे के लिए काम करते थे. इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिकों कि संख्या सत्तर के लगभग थी . सभी वैज्ञानिक वास्तव में काम के दबाव और अपने मालिक की मांग के कारण निराश थे, लेकिन हर कोई उससे वफादार था और नौकरी छोड़ने के बारे में नहीं सोचता था .
एक दिन, एक वैज्ञानिक अपने बॉस के पास आया था और उनसे कहा - सर, मैं अपने बच्चों को वादा किया है कि मैं उन्हें हमारी बस्ती में चल रही प्रदर्शनी दिखाने के लिए ले जाऊँगा . तो मैं 5 30 बजे कार्यालय छोड़ना चाहता हूँ .

उनका बॉस ने कहा - ठीक है, तुम्हे आज जल्दी कार्यालय छोड़ने के लिए अनुमति दी जाती है.

वैज्ञानिक ने काम शुरू कर दिया. उसने दोपहर के भोजन के बाद भी अपना काम जारी रखा. हमेशा की तरह वह इस हद तक अपने काम में मशगूल था कि जब उसने अपनी घड़ी में देखा कि समय रात्रि 8.30 बज चुके थे . अचानकउसे अपना वह वादा जो उसने अपने बच्चों को किया था याद आया . उसने अपने मालिक के लिए देखा, वह वहाँ नहीं था. उसे सुबह ही बताया था, उसने सब कुछ बंद कर दिया और घर के लिए चल दिया.

अपने भीतर गहराई में, वह अपने बच्चों को निराश करने के लिए दोषी महसूस कर रहा था.

वह घर पहुंच गया. बच्चे वहाँ नहीं थे पत्नी अकेली हॉल में बैठी थी और पत्रिकाओं को पढ़ने में मशगूल थी . स्थिति विस्फोटक थी , उसे लगा कोई भी बात करने पर वह उस पर फट पड़ेगी . उसकी पत्नी ने उससे पूछा - क्या आप के लिए कॉफीलाऊं या मैं सीधे रात्रिभोज की व्यवस्था करू अगर आप भूखे है आपकी पसंद का भोजन बना है.

आदमी ने कहा - अगर तुम भी पियो तो मैं भी कॉफी लूँगा , लेकिन बच्चे कहां हैं ?? पत्नी ने कहा - आपको नहीं पता है आपका प्रबंधक 5 15 बजे आया और प्रदर्शनी के लिए बच्चों को ले गया.

असल में हुआ क्या था

मालिक ने उसे दी गई अनुमति के अनुसार उसे 5,00 बजे उसे गंभीरता से काम करते देखा और सोचा कि यह व्यक्ति काम को नहीं छोड़ सकता है , लेकिन उसने अपने बच्चों से वादा किया है कि वो उन्हें प्रदर्शनी के लिए लें जाएगा . तो वह उन्हें प्रदर्शनी के लिए लेकर गया.

मालिक ने हर बार यही नहीं किया था पर जो एक बार किया उससे उस वैज्ञानिक कि प्रतिबद्धता हमेशा के लिए स्थापित हो गयी
यही कारण है कि थुम्बा में सभी वैज्ञानिकों ने उनके मालिक के तहत काम जारी रखा जबकि तनाव जबरदस्त था.


क्या आप अनुमान लगा सकते हैं वो मेनेजर कौन था



जी हाँ वो हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम थे

SS SHARMA
07-12-2011, 02:32 PM
बहुत ही शानदार सूत्र शुरू किया है , इसके लिए बहुत बहुत बधाई , जारी रखे

deshpremi
07-12-2011, 03:20 PM
अगर सभी मालिक और कर्मचारी ऐसे हो जाएँ तो हमारा देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाये


थुम्बा में रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर वैज्ञानिक एक दिन में लगभग 12 से 18 घंटे के लिए काम करते थे. इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिकों कि संख्या सत्तर के लगभग थी . सभी वैज्ञानिक वास्तव में काम के दबाव और अपने मालिक की मांग के कारण निराश थे, लेकिन हर कोई उससे वफादार था और नौकरी छोड़ने के बारे में नहीं सोचता था .
एक दिन, एक वैज्ञानिक अपने बॉस के पास आया था और उनसे कहा - सर, मैं अपने बच्चों को वादा किया है कि मैं उन्हें हमारी बस्ती में चल रही प्रदर्शनी दिखाने के लिए ले जाऊँगा . तो मैं 5 30 बजे कार्यालय छोड़ना चाहता हूँ .

उनका बॉस ने कहा - ठीक है, तुम्हे आज जल्दी कार्यालय छोड़ने के लिए अनुमति दी जाती है.

वैज्ञानिक ने काम शुरू कर दिया. उसने दोपहर के भोजन के बाद भी अपना काम जारी रखा. हमेशा की तरह वह इस हद तक अपने काम में मशगूल था कि जब उसने अपनी घड़ी में देखा कि समय रात्रि 8.30 बज चुके थे . अचानकउसे अपना वह वादा जो उसने अपने बच्चों को किया था याद आया . उसने अपने मालिक के लिए देखा, वह वहाँ नहीं था. उसे सुबह ही बताया था, उसने सब कुछ बंद कर दिया और घर के लिए चल दिया.

अपने भीतर गहराई में, वह अपने बच्चों को निराश करने के लिए दोषी महसूस कर रहा था.

वह घर पहुंच गया. बच्चे वहाँ नहीं थे पत्नी अकेली हॉल में बैठी थी और पत्रिकाओं को पढ़ने में मशगूल थी . स्थिति विस्फोटक थी , उसे लगा कोई भी बात करने पर वह उस पर फट पड़ेगी . उसकी पत्नी ने उससे पूछा - क्या आप के लिए कॉफीलाऊं या मैं सीधे रात्रिभोज की व्यवस्था करू अगर आप भूखे है आपकी पसंद का भोजन बना है.

आदमी ने कहा - अगर तुम भी पियो तो मैं भी कॉफी लूँगा , लेकिन बच्चे कहां हैं ?? पत्नी ने कहा - आपको नहीं पता है आपका प्रबंधक 5 15 बजे आया और प्रदर्शनी के लिए बच्चों को ले गया.

असल में हुआ क्या था

मालिक ने उसे दी गई अनुमति के अनुसार उसे 5,00 बजे उसे गंभीरता से काम करते देखा और सोचा कि यह व्यक्ति काम को नहीं छोड़ सकता है , लेकिन उसने अपने बच्चों से वादा किया है कि वो उन्हें प्रदर्शनी के लिए लें जाएगा . तो वह उन्हें प्रदर्शनी के लिए लेकर गया.

मालिक ने हर बार यही नहीं किया था पर जो एक बार किया उससे उस वैज्ञानिक कि प्रतिबद्धता हमेशा के लिए स्थापित हो गयी
यही कारण है कि थुम्बा में सभी वैज्ञानिकों ने उनके मालिक के तहत काम जारी रखा जबकि तनाव जबरदस्त था.


क्या आप अनुमान लगा सकते हैं वो मेनेजर कौन था



जी हाँ वो हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम थे

Sameerchand
07-12-2011, 07:08 PM
भाई आप के सूत्र के लिए बस इतना ही कहूँगा कि 'छोटी छोटी मगर मोटी बातें'


बहुत ही शानदार सूत्र शुरू किया है , इसके लिए बहुत बहुत बधाई , जारी रखे

धन्यवाद बेन तेन और शर्मा जी, बिलकुल सही बात कही आपने. आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
07-12-2011, 07:10 PM
थुम्बा में रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर वैज्ञानिक एक दिन में लगभग 12 से 18 घंटे के लिए काम करते थे. इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिकों कि संख्या सत्तर के लगभग थी . सभी वैज्ञानिक वास्तव में काम के दबाव और अपने मालिक की मांग के कारण निराश थे, लेकिन हर कोई उससे वफादार था और नौकरी छोड़ने के बारे में नहीं सोचता था .
एक दिन, एक वैज्ञानिक अपने बॉस के पास आया था और उनसे कहा - सर, मैं अपने बच्चों को वादा किया है कि मैं उन्हें हमारी बस्ती में चल रही प्रदर्शनी दिखाने के लिए ले जाऊँगा . तो मैं 5 30 बजे कार्यालय छोड़ना चाहता हूँ .

उनका बॉस ने कहा - ठीक है, तुम्हे आज जल्दी कार्यालय छोड़ने के लिए अनुमति दी जाती है.

वैज्ञानिक ने काम शुरू कर दिया. उसने दोपहर के भोजन के बाद भी अपना काम जारी रखा. हमेशा की तरह वह इस हद तक अपने काम में मशगूल था कि जब उसने अपनी घड़ी में देखा कि समय रात्रि 8.30 बज चुके थे . अचानकउसे अपना वह वादा जो उसने अपने बच्चों को किया था याद आया . उसने अपने मालिक के लिए देखा, वह वहाँ नहीं था. उसे सुबह ही बताया था, उसने सब कुछ बंद कर दिया और घर के लिए चल दिया.

अपने भीतर गहराई में, वह अपने बच्चों को निराश करने के लिए दोषी महसूस कर रहा था.

वह घर पहुंच गया. बच्चे वहाँ नहीं थे पत्नी अकेली हॉल में बैठी थी और पत्रिकाओं को पढ़ने में मशगूल थी . स्थिति विस्फोटक थी , उसे लगा कोई भी बात करने पर वह उस पर फट पड़ेगी . उसकी पत्नी ने उससे पूछा - क्या आप के लिए कॉफीलाऊं या मैं सीधे रात्रिभोज की व्यवस्था करू अगर आप भूखे है आपकी पसंद का भोजन बना है.

आदमी ने कहा - अगर तुम भी पियो तो मैं भी कॉफी लूँगा , लेकिन बच्चे कहां हैं ?? पत्नी ने कहा - आपको नहीं पता है आपका प्रबंधक 5 15 बजे आया और प्रदर्शनी के लिए बच्चों को ले गया.

असल में हुआ क्या था

मालिक ने उसे दी गई अनुमति के अनुसार उसे 5,00 बजे उसे गंभीरता से काम करते देखा और सोचा कि यह व्यक्ति काम को नहीं छोड़ सकता है , लेकिन उसने अपने बच्चों से वादा किया है कि वो उन्हें प्रदर्शनी के लिए लें जाएगा . तो वह उन्हें प्रदर्शनी के लिए लेकर गया.

मालिक ने हर बार यही नहीं किया था पर जो एक बार किया उससे उस वैज्ञानिक कि प्रतिबद्धता हमेशा के लिए स्थापित हो गयी
यही कारण है कि थुम्बा में सभी वैज्ञानिकों ने उनके मालिक के तहत काम जारी रखा जबकि तनाव जबरदस्त था.


क्या आप अनुमान लगा सकते हैं वो मेनेजर कौन था



जी हाँ वो हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम थे

धन्यवाद नितिन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपके द्वारा प्रश्तुत कहानी काफी प्रेरणादायक हैं. कृपया आगे भी इस सूत्र में इस तरह की कहानिया डालने की कोशिश कीजियेगा. हम सदस्यों को आपकी कहानियो का काफ इन्तजार रहेगा.

Sameerchand
07-12-2011, 07:12 PM
अगर सभी मालिक और कर्मचारी ऐसे हो जाएँ तो हमारा देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाये

धन्यवाद देशप्रेमी जी, बिलकुल सही बात कही आपने. आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

fullmoon
07-12-2011, 08:04 PM
समीर जी,
इस ज्ञानवर्धक सूत्र के लिए रेपो स्वीकार करें.

nitin9935
07-12-2011, 09:09 PM
धन्यवाद नितिन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपके द्वारा प्रश्तुत कहानी काफी प्रेरणादायक हैं. कृपया आगे भी इस सूत्र में इस तरह की कहानिया डालने की कोशिश कीजियेगा. हम सदस्यों को आपकी कहानियो का काफ इन्तजार रहेगा.

मित्र मेरे पास जो भी कहानिया होगी मैं जरूर शेयर करूँगा

बधाई आपको कि इस सार्थक सूत्र का निर्माण किया जो सभी को प्रेरणा दे रहा है

nitin9935
07-12-2011, 10:28 PM
एक प्रसिद्द वक्ता ने अपनी सेमीनार में जब बोलना शुरू किया तो उसने अपने हाथ में एक हजार रूपये का नोट लिया

उस हाल में जहाँ लगभग २०० लोग बैठे थे उसने पूछा " ये नोट कौन लेना चाहेगा ?"

लोगों ने हाथ उठाने सुरु कर दिए थे

फिर उस वक्ता ने कहा " मैं ये नोट आप में से किसी एक को दूंगा पर पहले मुझे ये करने दे "
ये कहकर उसने नोट को मरोडना शुरू किया और उसको बुरी तरह से मरोड़ कर पूछा

"अब ये नोट किसे चाहिए", लोगों ने फिर हाथ उठा दिया

"ठीक है" उसने जवाब दिया "अब क्या कहेंगे "
ककर उसने नोट को नीचे गिराकर जुटे से बुरी तरह कुचल डाला . अब उसने नोट को जो कि बुरी तरह से तुडा-मुदा था और गन्दा भी हो चूका था उठाया और फिर पूछा कि कौन इस लेना चाहेगा

फिर लोगो ने हाथ उठा दिया

अब वो वक्ता बोला
"आज हम सब लोगों ने इस नोट से एक बहुत जरूरी सबक सीखा है
आप सभी इस नोट को चाहते हो बावजूद इसके कि मैंने इसके साथ क्या किया
क्योंकि इसकी कीमत अब भी १००० रूपये ही है "
"हमारी जिंदगी में कई बार परिस्थितियों और अपने निर्णयों कि वजह से हम गिरा हुआ , कुचला हुआ और गन्दा महसूस करते हैं . यहाँ तक कि हमारी जिंदगी बेकार है पर बावजूद इसके कि क्या हुआ है और क्या होगा हम कभी भी अपनी महत्ता नहीं खोते हैं"



आप खास है, इस बात को कभी मत भूलिए. और कभी भी अपने बीते हुए बुरे कल को आने वाले अच्छे कल पर हावी मत होने दीजिए

nitin9935
07-12-2011, 10:48 PM
अच्छा सेल्समैन
एक लड़के को सेल्समेन के इंटरव्यू में इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उसे अंग्रेजी नहीं आती थी। लड़के को अपने आप पर पूरा भरोसा था । उसने मैनेजर से कहा कि आपको अंग्रेजी से क्या मतलब ? यदि मैं अंग्रेजी वालों से ज्यादा बिक्री न करके दिखा दूं तो मुझे तनख्वाह मत दीजिएगा।
मैनेजर को उस लड़के बात जम गई। उसे नौकरी पर रख लिया गया।
फिर क्या था, अगले दिन से ही दुकान की बिक्री पहले से ज्यादा बढ़ गई। एक ही सप्ताह के अंदर लड़के ने तीन गुना ज्यादा माल बेचकर दिखाया।
स्टोर के मालिक को जब पता चला कि एक नए सेल्समेन की वजह से बिक्री इतनी ज्यादा बढ़ गई है तो वह खुद को रोक न सका । फौरन उस लड़के से मिलने के लिए स्टोर पर पहुंचा। लड़का उस वक्त एक ग्राहक को मछली पकड़ने का कांटा बेच रहा था। मालिक थोड़ी दूर पर खड़ा होकर देखने लगा।
लड़के ने कांटा बेच दिया। ग्राहक ने कीमत पूछी। लड़के ने कहा - 800 रु. । यह कहकर लड़के ने ग्राहक के जूतों की ओर देखा और बोला - सर, इतने मंहगे जूते पहनकर मछली पकड़ने जाएंगे क्या ? खराब हो जाएंगे। एक काम कीजिए, एक जोड़ी सस्ते जूते और ले लीजिए।
ग्राहक ने जूते भी खरीद लिए। अब लड़का बोला - तालाब किनारे धूप में बैठना पड़ेगा। एक टोपी भी ले लीजिए। ग्राहक ने टोपी भी खरीद ली। अब लड़का बोला - मछली पकड़ने में पता नहीं कितना समय लगेगा। कुछ खाने पीने का सामान भी साथ ले जाएंगे तो बेहतर होगा। ग्राहक ने बिस्किट, नमकीन, पानी की बोतलें भी खरीद लीं।
अब लड़का बोला - मछली पकड़ लेंगे तो घर कैसे लाएंगे। एक बॉस्केट भी खरीद लीजिए। ग्राहक ने वह भी खरीद ली। कुल 2500 रु. का सामान लेकर ग्राहक चलता बना।
मालिक यह नजारा देखकर बहुत खुश हुआ । उसने लड़के को बुलाया और कहा - तुम तो कमाल के आदमी हो यार ! जो आदमी केवल मछली पकड़ने का कांटा खरीदने आया था उसे इतना सारा सामान बेच दिया ?
लड़का बोला - कांटा खरीदने ? अरे वह आदमी तो केयर फ्री सेनिटरी पैक खरीदने आया था । मैंने उससे कहा अब चार दिन तू घर में बैठा बैठा क्या करेगा । जा के मछली पकड़ ......

Sameerchand
07-12-2011, 10:51 PM
समीर जी,
इस ज्ञानवर्धक सूत्र के लिए रेपो स्वीकार करें.

धन्यवाद फुल्ल्मून जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

धन्यवाद.

Sameerchand
07-12-2011, 10:53 PM
मित्र मेरे पास जो भी कहानिया होगी मैं जरूर शेयर करूँगा

बधाई आपको कि इस सार्थक सूत्र का निर्माण किया जो सभी को प्रेरणा दे रहा है

धन्यवाद मित्र नितिन जी, आप जैसे सुलझे और अच्छे मित्र से मुझे यही आशा थी.

आप सब के प्रोत्साहन से ही मैं कुछ कर पाता हूँ मित्र.

Sameerchand
07-12-2011, 10:57 PM
अच्छा सेल्समैन
एक लड़के को सेल्समेन के इंटरव्यू में इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उसे अंग्रेजी नहीं आती थी। लड़के को अपने आप पर पूरा भरोसा था । उसने मैनेजर से कहा कि आपको अंग्रेजी से क्या मतलब ? यदि मैं अंग्रेजी वालों से ज्यादा बिक्री न करके दिखा दूं तो मुझे तनख्वाह मत दीजिएगा।
मैनेजर को उस लड़के बात जम गई। उसे नौकरी पर रख लिया गया।
फिर क्या था, अगले दिन से ही दुकान की बिक्री पहले से ज्यादा बढ़ गई। एक ही सप्ताह के अंदर लड़के ने तीन गुना ज्यादा माल बेचकर दिखाया।
स्टोर के मालिक को जब पता चला कि एक नए सेल्समेन की वजह से बिक्री इतनी ज्यादा बढ़ गई है तो वह खुद को रोक न सका । फौरन उस लड़के से मिलने के लिए स्टोर पर पहुंचा। लड़का उस वक्त एक ग्राहक को मछली पकड़ने का कांटा बेच रहा था। मालिक थोड़ी दूर पर खड़ा होकर देखने लगा।
लड़के ने कांटा बेच दिया। ग्राहक ने कीमत पूछी। लड़के ने कहा - 800 रु. । यह कहकर लड़के ने ग्राहक के जूतों की ओर देखा और बोला - सर, इतने मंहगे जूते पहनकर मछली पकड़ने जाएंगे क्या ? खराब हो जाएंगे। एक काम कीजिए, एक जोड़ी सस्ते जूते और ले लीजिए।
ग्राहक ने जूते भी खरीद लिए। अब लड़का बोला - तालाब किनारे धूप में बैठना पड़ेगा। एक टोपी भी ले लीजिए। ग्राहक ने टोपी भी खरीद ली। अब लड़का बोला - मछली पकड़ने में पता नहीं कितना समय लगेगा। कुछ खाने पीने का सामान भी साथ ले जाएंगे तो बेहतर होगा। ग्राहक ने बिस्किट, नमकीन, पानी की बोतलें भी खरीद लीं।
अब लड़का बोला - मछली पकड़ लेंगे तो घर कैसे लाएंगे। एक बॉस्केट भी खरीद लीजिए। ग्राहक ने वह भी खरीद ली। कुल 2500 रु. का सामान लेकर ग्राहक चलता बना।
मालिक यह नजारा देखकर बहुत खुश हुआ । उसने लड़के को बुलाया और कहा - तुम तो कमाल के आदमी हो यार ! जो आदमी केवल मछली पकड़ने का कांटा खरीदने आया था उसे इतना सारा सामान बेच दिया ?
लड़का बोला - कांटा खरीदने ? अरे वह आदमी तो केयर फ्री सेनिटरी पैक खरीदने आया था । मैंने उससे कहा अब चार दिन तू घर में बैठा बैठा क्या करेगा । जा के मछली पकड़ ......

बहुत खूब नितिन भाई, गज़ब मार्केटिंग स्किल हैं इस बन्दे के पास. बहुत कुछ सिखाने वाली कहानी हैं.

nitin9935
07-12-2011, 11:09 PM
बहुत खूब नितिन भाई, गज़ब मार्केटिंग स्किल हैं इस बन्दे के पास. बहुत कुछ सिखाने वाली कहानी हैं.धन्यवाद भाई जाँ कर अच्छा लगा कि आपको कहानी पसंद आई

Ranveer
08-12-2011, 12:47 PM
समीर जी और अन्य सभी सहयोग करने वाले सदस्यों का धन्यवाद |
इस सूत्र में बहुत अच्छी और प्रेरक कहानियां प्रस्तुत की गयीं हैं |

Sameerchand
08-12-2011, 01:43 PM
समीर जी और अन्य सभी सहयोग करने वाले सदस्यों का धन्यवाद |
इस सूत्र में बहुत अच्छी और प्रेरक कहानियां प्रस्तुत की गयीं हैं |

धन्यवाद रणवीर जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

धन्यवाद.

Sameerchand
08-12-2011, 10:23 PM
शिकार

एक दिन सुल्तान ने नसरुद्दीन को अपने साथ भालू के शिकार पर चलने को कहा। नसरुद्दीन जाना नहीं चाहता था पर सुल्तान को खुश करने के लिए वह साथ में जाने को तैयार हो गया।

शिकार पर गया दल जब शाम को लौटा तो सभी लोग उनसे यह जानने को उत्सुक थे कि शिकार कैसा रहा और उन्होंने नसरुद्दीन से इसके बारे में पूछा।

नसरुद्दीन बोला - "बेहतरीन" !

लोगों ने फिर उत्सुकतावश पूछा - "तुमने कितने भालू मारे?"

"एक भी नहीं "- नसरुद्दीन बोला।

"तो तुमने कितने भालुओं का पीछा किया?"- उन्होंने पूछा।

"एक भी नहीं " - नसरुद्दीन फिर बोला।

"तो तुम्हें कितने भालू दिखायी दिए?"- उन्होंने पूछा।

"एक भी नहीं "- नसरुद्दीन बोला।

तो फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि शिकार बेहतरीन रहा? - एक व्यक्ति ने कहा।

नसरुद्दीन ने मुस्कराते हुए कहा।- "महोदय! यह जान लीजिये, कि जब आप भालू जैसे खतरनाक जानवर के शिकार पर हों तो सबसे अच्छी बात यही है कि उससे आपका सामना ही न हो। "

Sameerchand
08-12-2011, 10:26 PM
संघर्ष की महत्ता

एक व्यक्ति को तितली का एक कोकून मिला, जिसमें से तितली बाहर आने के लिए प्रयत्न कर रही थी. कोकून में एक छोटा सा छेद बन गया था जिसमें से बाहर निकलने को तितली आतुर तो थी, मगर वह छेद बहुत छोटा था और तितली का उस छेद में से बाहर निकलने का संघर्ष जारी था.

उस व्यक्ति से यह देखा नहीं गया और वह जल्दी से कैंची ले आया और उसने कोकून को एक तरफ से काट कर छेद बड़ा कर दिया. तितली आसानी से बाहर तो आ गई, मगर वह अभी पूरी तरह विकसित नहीं थी. उसका शरीर मोटा और भद्दा था तथा पंखों में जान नहीं थी. दरअसल प्रकृति उसे कोकून के भीतर से निकलने के लिए संघर्ष करने की प्रक्रिया के दौरान उसके पंखों को मजबूती देने, उसकी शारीरिक शक्ति को बनाने व उसके शरीर को सही आकार देने का कार्य भी करती है. जिससे जब तितली स्वयं संघर्ष कर, अपना समय लेकर कोकून से बाहर आती है तो वह आसानी से उड़ सकती है. प्रकृति की राह में मनुष्य रोड़ा बन कर आ गया था, भले ही उसकी नीयत तितली की सहायता करने की रही हो. नतीजतन तितली कभी उड़ ही नहीं पाई और जल्द ही काल कवलित हो गई.

संघर्ष जरूरी है हमारे बेहतर जीवन के लिए.

Sameerchand
08-12-2011, 10:30 PM
शायद ऊपर कोई रास्ता निकल आए

कुछ बच्चों ने तय किया कि मुल्ला नसरूद्दीन को परेशान करने के लिए जब मुल्ला कहीं चप्पल निकाले तो उसे छुपा दिया जाए.

उन्होंने एक उपाय निकाला. जब मुल्ला पास से गुजर रहा था तो मुल्ला को सुनाने के लिए एक बच्चे ने दूसरे से जोर से कहा – “सामने वाले पेड़ पर कोई भी नहीं चढ़ सकता, और मुल्ला तो कभी भी नहीं.”

मुल्ला ठिठका, पेड़ को देखा जो कि बेहद छोटा और शाखादार था. “कोई भी चढ़ सकता है इस पर – तुम भी. देखो मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि कैसे.” ऐसा कह कर उसने अपनी चप्पलें निकाली और उन्हें अपनी कमरबंद में खोंसा और पेड़ पर चढ़ने लगा.

“मुल्ला,” बच्चे चिल्लाए क्योंकि उनका प्लान फेल हो रहा था – “ऊपर पेड़ में तुम्हारे चप्पलों का क्या काम?”

“इमर्जेंसी के लिए हमेशा तैयार रहो,” मुल्ला ने मुस्कुराते हुए बात पूरी की – “क्या पता ऊपर कोई रास्ता मिल ही जाए”

Sameerchand
08-12-2011, 10:42 PM
किसान और गेहूँ के दाने


एक प्राचीन दृष्टान्त है. तब ईश्वर मनुष्यों के साथ धरती पर निवास करते थे. एक दिन एक वृद्ध किसान ने ईश्वर से कहा – आप ईश्वर हैं, ब्रह्माण्ड को आपने बनाया है, मगर आप किसान नहीं हैं और आपको खेती किसानी नहीं आती, इसलिए दुनिया में समस्याएँ हैं.

ईश्वर ने पूछा – “तो मुझे क्या करना चाहिए?”

किसान ने कहा - “मुझे एक वर्ष के लिए अपनी शक्तियाँ मुझे दे दो. मैं जो चाहूंगा वो हो. तब आप देखेंगे कि दुनिया से समस्याएँ, गरीबी भुखमरी सब समाप्त हो जाएंगी.”

ईश्वर ने किसान को अपनी शक्ति दे दी. किसान ने चहुँओर सर्वोत्तम कर दिया. मौसम पूरे समय खुशगवार रहने लगा. न आँधी न तूफ़ान. किसान जब चाहता बारिश हो तब बारिश होती, जब वो चाहता कि धूप निकले तब धूप निकलती. सबकुछ एकदम परिपूर्ण हो गया था. चहुँओर फ़सलें भी लहलहा रही थीं.

जब फसलों को काटने की बारी आई तब किसान ने देखा कि फसलों में दाने ही नहीं हैं. किसान चकराया और दौड़ा दौड़ा भगवान के पास गया. उसने तो सबकुछ सर्वोत्तम ही किया था. और यह क्या हो गया था. उसने भगवान को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

भगवान ने स्पष्ट किया – चूंकि सबकुछ सही था, कोई संधर्ष नहीं था, कोई जिजीविषा नहीं थी – तुमने सबकुछ सर्वोत्तम कर दिया था तो फसलें नपुंसक हो गईं. उनकी उर्वरा शक्ति खत्म हो गई. जीवन जीने के लिए संघर्ष अनिवार्य है. ये आत्मा को झकझोरते हैं और उन्हें जीवंत, पुंसत्व से भरपूर बनाते हैं.

यह दृष्टांत अमूल्य है. जब आप सदा सर्वदा खुश रहेंगे, प्रसन्न बने रहेंगे तो प्रसन्नता, खुशी अपना अर्थ गंवा देगी. यह तो ऐसा ही होगा जैसे कोई सफेद कागज पर सफेद स्याही से लिख रहा हो. कोई इसे कभी देख-पढ़ नहीं पाएगा.

खुशी को महसूस करने के लिए जीवन में दुःख जरूरी है. बेहद जरूरी.

mantu007
08-12-2011, 10:45 PM
बहुत ही अच्छी कहानियां हैं मित्र ........मेरे तरफ से ये रेपो रख लो ......+++++++++

Teach Guru
08-12-2011, 10:45 PM
काफी ज्ञानवर्धक और लाजवाब कहानियां है............

Sameerchand
08-12-2011, 10:49 PM
बहुत ही अच्छी कहानियां हैं मित्र ........मेरे तरफ से ये रेपो रख लो ......+++++++++


काफी ज्ञानवर्धक और लाजवाब कहानियां है............

धन्यवाद मंटू और टीच गुरु जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

मंटू जी आपके रेपो +++++++ के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

nitin9935
08-12-2011, 10:57 PM
कांच कि बरनी (बड़ा बर्तन ) और दो कप चाय
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे
आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल
टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने
की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ...
आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे
- धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर
से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ
... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना
शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर
हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ
.. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से
चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित
थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –


इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....

टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र
, स्वास्थ्य और शौक हैं ,

छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और

रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की
गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं
भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे
पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने
बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ ,
घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस
गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है
... बाकी सब तो रेत है ..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह
नहीं बताया
कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही
रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन
अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

Sameerchand
09-12-2011, 06:03 PM
कांच कि बरनी (बड़ा बर्तन ) और दो कप चाय


दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ... आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –

इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो .... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं , छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है .. अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ... ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है ... बाकी सब तो रेत है .. छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ... इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

धन्यवाद नितिन भाई आपका, इतनी अच्छी कहानी के लिए............

Sameerchand
09-12-2011, 06:06 PM
धार्मिकता और अंधभक्ति

आप धार्मिक हैं या अंधभक्त? व्यक्ति को धार्मिक तो होना चाहिए, मगर अंधभक्त नहीं.

आर्मी के एक कमांडिंग ऑफ़ीसर की यह कहानी है –

कमांडिंग ऑफ़ीसर ने अपने नए-नए रंगरूटों से पूछा कि रायफल के कुंदे में अखरोट की लकड़ी का उपयोग क्यों किया जाता है.

“क्योंकि इसमें ज्यादा प्रतिरोध क्षमता होती है” एक ने कहा.

“गलत”

“इसमें लचक ज्यादा होती है” दूसरे ने कहा.

“गलत”

“शायद इसमें दूसरी लकड़ियों की अपेक्षा ज्यादा चमक होती है” तीसरे ने अंदाजा लगाया.

“बेवकूफी की बातें मत करो.” कमांडर गुर्राया – “अखरोट की लकड़ी का प्रयोग इस लिए किया जाता है क्योंकि यह नियम-पुस्तिका में लिखा है.”

Sameerchand
09-12-2011, 06:11 PM
वृद्ध रहित भूमि

एक बार एक देश में यह निर्णय लिया गया कि वृद्ध किसी काम के नहीं होते, अकसर बीमार रहते हैं, और वे अपनी उम्र जी चुके होते हैं अतः उन्हें मृत्यु दे दी जानी चाहिए। देश का राजा भी जवान था तो उसने यह आदेश देने में देरी नहीं की कि पचास वर्ष से ऊपर के उम्र के लोगों को खत्म कर दिया जाए।

और इस तरह से सभी अनुभवी, बुद्धिमान बड़े बूढ़ों से वह देश खाली हो गया. उनमें एक जवान व्यक्ति था जो अपने पिता से बेहद प्रेम करता था। उसने अपने पिता को अपने घर के एक अंधेरे कोने में छुपा लिया और उसे बचा लिया।

कुछ साल के बाद उस देश में भीषण अकाल पड़ा और जनता दाने दाने को मोहताज हो गई। बर्फ के पिघलने का समय आ गया था, परंतु देश में बुआई के लिए एक दाना भी नहीं था. सभी परेशान थे। अपने बच्चे की परेशानी देख कर उस वृद्ध ने, जिसे बचा लिया गया था, अपने बच्चे से कहा कि वो सड़क के किनारे किनारे दोनों तरफ जहाँ तक बन पड़े हल चला ले।

उस युवक ने बहुतों को इस काम के लिए कहा, परंतु किसी ने सुना, किसी ने नहीं. उसने स्वयं जितना बन पड़ा, सड़क के दोनों ओर हल चला दिए। थोड़े ही दिनों में बर्फ पिघली और सड़क के किनारे किनारे जहाँ जहाँ हल चलाया गया था, अनाज के पौधे उग आए।

लोगों में यह बात चर्चा का विषय बन गई, बात राजा तक पहुँची. राजा ने उस युवक को बुलाया और पूछा कि ये आइडिया उसे आखिर आया कहाँ से? युवक ने सच्ची बात बता दी।

राजा ने उस वृद्ध को तलब किया कि उसे यह कैसे विचार आया कि सड़क के किनारे हल चलाने से अनाज के पौधे उग आएंगे। उस वृद्ध ने जवाब दिया कि जब लोग अपने खेतों से अनाज घर को ले जाते हैं तो बहुत सारे बीच सड़कों के किनारे गिर जाते हैं. उन्हीं का अंकुरण हुआ है।

राजा प्रभावित हुआ और उसे अपने किए पर पछतावा हुआ. राजा ने अब आदेश जारी किया कि आगे से वृद्धों को ससम्मान देश में पनाह दी जाती रहेगी।

कहावत है –

वृद्धस्य वचनम् ग्राह्यं आपात्काले ह्युपस्थिते।

जिसका अर्थ है – विपदा के समय बुजुर्गों का कहा मानना चाहिए.

Sameerchand
09-12-2011, 06:15 PM
क्या मेरा वेतन बढ़ेगा?

प्रेरक सम्मेलन (मोटिवेशन सेमिनार) से लौटकर उत्साहित प्रबंधक ने अपने एक कामगार को अपने ऑफ़िस में बुलाया और कहा – “आज के बाद से अपने काम को तुम स्वयं प्लान करोगे और नियंत्रित करोगे. इससे तुम्हारी उत्पादकता बढ़ेगी.”

“इससे क्या मेरे वेतन में बढ़ोत्तरी होगी?” कामगार ने पूछा.

“नहीं नहीं, -” प्रबंधक आगे बोला – “पैसा कहीं भी प्रेरणा देने का कारक नहीं बनता और वेतन में बढ़ोत्तरी से तुम्हें कोई संतुष्टि नहीं मिलेगी.”

“ठीक है, तो जब मेरी उत्पादकता बढ़ जाएगी तब मेरा वेतन बढ़ेगा?”

“देखो, -” प्रबंधक ने समझाया “जाहिर है कि तुम मोटिवेशन थ्योरी को नहीं समझते. इस किताब को ले जाओ और इसे अच्छी तरह से पढ़ो. इसमें सब कुछ विस्तार में समझाया गया है कि किस चीज से तुममें प्रेरक तत्व जागेंगे.”

वह आदमी बुझे मन से किताब ले कर जाने लगा. जाते जाते उसने पूछा - “यदि मैं इस किताब को अच्छी तरह से पूरा पढ़ लूं तब तो मेरा वेतन बढ़ेगा?”

Sameerchand
09-12-2011, 06:18 PM
कल्पतरू

एक बार एक आदमी घूमते-घामते स्वर्ग पहुँच गया. स्वर्ग में सुंदर नजारे देखते हुए वह बहुत देर तक घूमता रहा और अंत में थक हार कर एक वृक्ष के नीचे सो गया.

स्वर्ग में जिस वृक्ष के नीचे सोया था, वह कल्पतरू था. कल्पतरू की छांह के नीचे बैठ कर जो भी व्यक्ति जैसी कल्पना करता है, वह साकार हो जाता है.

कुछ देर बाद जब उस आदमी की आँख खुली तो उसकी थकान तो जाती रही थी, मगर उसे भूख लग आई थी. उसने सोचा कि काश यहाँ छप्पन भोग से भरी थाली खाने को मिल जाती तो आनंद आ जाता.

चूंकि वह कल्पतरू के नीचे था, तो उसकी छप्पन भोग से भरी थाली उसके कल्पना करते ही प्रकट हो गई. चूंकि उसे भूख लगी थी तो उसने झटपट उस भोजन को खा लिया. भोजन के बाद उसे प्यास लगी. उसने सोचा कि काश कितना ही अच्छा होता कि इतने शानदार भोजन के बाद एक बोतल बीयर पीने को मिल जाती. उसका यह सोचना था कि बीयर की बोतल नामालूम कहाँ से प्रकट हो गई.

उसने बीयर की बोतल खोली और गटागट पीने लगा. भूख और प्यास थोड़ी शांत हुई तो उसका दिमाग दौड़ा. यह क्या हो रहा है उसने सोचा. क्या मैं सपना देख रहा हूँ? खाना और बीयर हवा में से कैसे प्रकट हो गए? लगता है कि इस पेड़ में भूत पिशाच हैं जो मुझसे कोई खेल खेल रहे हैं. उसने सोचा.

उसका इतना सोचना था कि कल्पतरू ने उसकी यह कल्पना भी साकार कर दी. हवा में से भूत पिशाच प्रकट हो गए जो उसके साथ डरावने खेल खेलने लगे. वह आदमी डर कर सोचने लगा ये भूत प्रेत तो अब मुझे मार ही डालेंगे. मेरी मृत्यु निश्चित है.

आप समझ सकते हैं कि कल्पतरू के नीचे उसकी इस कल्पना का क्या हश्र हुआ होगा.

दरअसल हमारा दिमाग ही कल्पतरू के माफ़िक है. आप जो सोचते हैं वही होता है. सारी चीजें दो बार सृजित होती हैं. एक बार आपके दिमाग में और फिर दूसरी बार भौतिक संसार में. आज नहीं तो कल, जो आपने सोचा है, वह होकर रहेगा. बहुत बार आपकी कल्पना और चीजों के होने में इतना समय हो जाता है कि आप भूल जाते हैं कि कभी आपने इसके लिए ख्वाब भी देखे होंगे. आप अपने लिए स्वर्ग भी रचते हैं और आप अपने लिए नर्क भी रचते हैं. यदि आप स्वर्ग की सोचेंगे तो आपको स्वर्ग मिलेगा. छप्पन भोग की सोचेंगे तो छप्पन भोग मिलेगा. भूत पिशाच की सोचेंगे तो भूत पिशाच मिलेंगे.

और जब आप समझ जाते हैं कि आप अपने लिए स्वयं स्वर्ग या नर्क बुन सकते हैं तो फिर आप इस तरह की अपनी दुनिया को बनाना छोड़ सकते हैं. स्वर्ग या नर्क बनाने की जरूरत फिर किसी को नहीं होती. आप इन झंझटों से निवृत्त हो सकते हैं. मस्तिष्क की यह निवृत्ति ही मेडिटेशन (ध्यान योग) है.

nitin9935
09-12-2011, 08:14 PM
धन्यवाद नितिन भाई आपका, इतनी अच्छी कहानी के लिए............आपका स्वागत है समीर भाई

Badtameez
09-12-2011, 11:22 PM
कल्पतरूएक बार एक आदमी घूमते-घामते स्वर्ग पहुँच गया. स्वर्ग में सुंदर नजारे देखते हुए वह बहुत देर तक घूमता रहा और अंत में थक हार कर एक वृक्ष के नीचे सो गया. स्वर्ग में जिस वृक्ष के नीचे सोया था, वह कल्पतरू था. कल्पतरू की छांह के नीचे बैठ कर जो भी व्यक्ति जैसी कल्पना करता है, वह साकार हो जाता है. कुछ देर बाद जब उस आदमी की आँख खुली तो उसकी थकान तो जाती रही थी, मगर उसे भूख लग आई थी. उसने सोचा कि काश यहाँ छप्पन भोग से भरी थाली खाने को मिल जाती तो आनंद आ जाता. चूंकि वह कल्पतरू के नीचे था, तो उसकी छप्पन भोग से भरी थाली उसके कल्पना करते ही प्रकट हो गई. चूंकि उसे भूख लगी थी तो उसने झटपट उस भोजन को खा लिया. भोजन के बाद उसे प्यास लगी. उसने सोचा कि काश कितना ही अच्छा होता कि इतने शानदार भोजन के बाद एक बोतल बीयर पीने को मिल जाती. उसका यह सोचना था कि बीयर की बोतल नामालूम कहाँ से प्रकट हो गई. उसने बीयर की बोतल खोली और गटागट पीने लगा. भूख और प्यास थोड़ी शांत हुई तो उसका दिमाग दौड़ा. यह क्या हो रहा है उसने सोचा. क्या मैं सपना देख रहा हूँ? खाना और बीयर हवा में से कैसे प्रकट हो गए? लगता है कि इस पेड़ में भूत पिशाच हैं जो मुझसे कोई खेल खेल रहे हैं. उसने सोचा. उसका इतना सोचना था कि कल्पतरू ने उसकी यह कल्पना भी साकार कर दी. हवा में से भूत पिशाच प्रकट हो गए जो उसके साथ डरावने खेल खेलने लगे. वह आदमी डर कर सोचने लगा ये भूत प्रेत तो अब मुझे मार ही डालेंगे. मेरी मृत्यु निश्चित है. आप समझ सकते हैं कि कल्पतरू के नीचे उसकी इस कल्पना का क्या हश्र हुआ होगा. दरअसल हमारा दिमाग ही कल्पतरू के माफ़िक है. आप जो सोचते हैं वही होता है. सारी चीजें दो बार सृजित होती हैं. एक बार आपके दिमाग में और फिर दूसरी बार भौतिक संसार में. आज नहीं तो कल, जो आपने सोचा है, वह होकर रहेगा. बहुत बार आपकी कल्पना और चीजों के होने में इतना समय हो जाता है कि आप भूल जाते हैं कि कभी आपने इसके लिए ख्वाब भी देखे होंगे. आप अपने लिए स्वर्ग भी रचते हैं और आप अपने लिए नर्क भी रचते हैं. यदि आप स्वर्ग की सोचेंगे तो आपको स्वर्ग मिलेगा. छप्पन भोग की सोचेंगे तो छप्पन भोग मिलेगा. भूत पिशाच की सोचेंगे तो भूत पिशाच मिलेंगे. और जब आप समझ जाते हैं कि आप अपने लिए स्वयं स्वर्ग या नर्क बुन सकते हैं तो फिर आप इस तरह की अपनी दुनिया को बनाना छोड़ सकते हैं. स्वर्ग या नर्क बनाने की जरूरत फिर किसी को नहीं होती. आप इन झंझटों से निवृत्त हो सकते हैं. मस्तिष्क की यह निवृत्ति ही मेडिटेशन (ध्यान योग) है. आपके इस सूत्र में बहुत ज्ञान छिपा हुआ है।रेपो++++++स्वीकार ं।

Sameerchand
11-12-2011, 11:54 PM
आपके इस सूत्र में बहुत ज्ञान छिपा हुआ है।रेपो++++++स्वीकार ं।

धन्यवाद सुरेश सौरभ गुरु जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

आपके रेप++++++ के लिए धन्यवाद........

Sameerchand
11-12-2011, 11:59 PM
महज सम्मान के लिए

एक पत्रकार ने एक छोटे शहर के कई व्यक्तियों से शहर के मेयर के बारे में पूछा।

"वह झूठा और धोखेबाज है" - एक व्यापारी ने कहा।

"वह घमंडी गधा है" - एक व्यापारी ने कहा।

"मैंने अपने जीवन में उसे कभी वोट नहीं दिया" - डॉक्टर ने कहा।

"उससे ज्यादा भ्रष्ट नेता मैंने आज तक नहीं देखा" - एक नाई ने कहा।

अंततः जब वह पत्रकार उस मेयर से मिला तो उसने उससे पूछा कि वह कितना वेतन प्राप्त करता है?

"अजी मैं वेतन के लिए कार्य नहीं करता"- मेयर ने कहा।

"तब आप यह कार्य क्यों करते हैं?"

"महज सम्मान के लिए।" मेयर ने उत्तर दिया।

Sameerchand
12-12-2011, 12:05 AM
तो समस्या क्या है?


नसरूद्दीन एक दुकान पर गया जहाँ तमाम तरह के औजार और स्पेयरपार्ट्स मिलते थे.
“क्या आपके पास कीलें हैं?”
“हाँ”

“और चमड़ा, बढ़िया क्वालिटी का चमड़ा”
“हाँ है”

“और जूते बांधने का फीता”
“हाँ”

“और रंग”
“वह भी है”

“तो फिर तुम जूते क्यों नहीं बनाते?”

Sameerchand
12-12-2011, 12:09 AM
मृगतृष्णा

जब महात्मा बुद्ध ने राजा प्रसेनजित की राजधानी में प्रवेश किया तो वे स्वयं उनकी आगवानी के लिए आये। वे महात्मा बुद्ध के पिता के मित्र थे एवं उन्होंने बुद्ध के संन्यास लेने के बारे में सुना था।

अतः उन्होंने बुद्ध को अपना भिक्षुक जीवन त्यागकर महल के ऐशोआराम के जीवन में लौटने के लिए मनाने का प्रयास किया। वे ऐसा अपनी मित्रता की खातिर कर रहे थे।

बुद्ध ने प्रसेनजित की आँखों में देखा और कहा, "सच बताओ। क्या समस्त आमोद-प्रमोद के बावजूद आपके साम्राज्य ने आपको एक भी दिन का सुख प्रदान किया है?"

प्रसेनजित चुप हो गए और उन्होंने अपनी नजरें झुका लीं।

"दुःख के किसी कारण के न होने से बड़ा सुख और कोई नहीं है;
और अपने में संतुष्ट रहने से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है।"

Sameerchand
12-12-2011, 12:15 AM
ईश दर्शन का सबसे सरल तरीका

एक विद्यार्थी ने पूछा – “सर, क्या हम भगवान को देख सकते हैं? हमें इसके लिए (भगवान के दर्शन) क्या करना होगा?”

ईश्वर के दर्शन व्यक्ति के अपने कार्यों से संभव होता है. प्राचीन काल में इसे तपस्या कहा जाता था. बालक ध्रुव ने यह अपनी पूरी विनयता और विनम्रता से हासिल किया. जब ईश्वर उनकी प्रार्थना से प्रकट नहीं हुए तब भी उन्होंने विश्वास और विनम्रता नहीं छोड़ी और अंततः ईश्वर को उन्हें दर्शन देना ही पड़ा.

विद्वान परंतु अहंकारी राजा रावण ने भी भगवान शिव के दर्शन हेतु तपस्या की. वे सफल नहीं हुए. उनकी तपस्या में विनम्रता नहीं थी, बल्कि घमंड भरा था. क्रोध से उन्होंने भगवान से पूछा कि उनकी तपस्या में क्या कमी थी.

और, जब भगवान शिव ने रावण को दर्शन नहीं दिए तो अंततः उसने अपने सिर को एक-एक कर काट कर बलिदान देना प्रारंभ कर दिया. इसे देख भगवान शिव भी पिघल गए और प्रकट हो गए.

कर्नाटक में मैंगलोर और मणिपाल के पास एक छोटा सा शहर है उडिपि (जहाँ कुछ समय के लिए आदि शंकराचार्य ने निवास किया था और जहाँ से दुनिया को डोसा बनाने की कला मिली). वहाँ पर कनकदास नामक एक प्रसिद्ध मंदिर है. कहानी यह है कि प्राचीन काल में कनकदास नामक एक शूद्र वहाँ रहता था जिसे कृष्ण मंदिर में जाने की अनुमति नहीं थी. वह नित्य ही मंदिर के पीछे जाकर जाली से कृष्ण भगवान की मूर्ति का दर्शन पीछे से करता था.

एक दिन भगवान की मूर्ति 180 अंश के कोण में घूम गई और अपने भक्त को उसने दर्शन दे दिया! आज भी वह मूर्ति मंदिर में इसी रूप में विद्यमान है! कनकदास की भक्ति और समर्पण से उसे ईश्वर दर्शन हुआ.

सवाल यह है कि इस घोर कलियुग में आखिर क्या किया जाए कि ईश्वर का आशीर्वाद मिले? क्या कोई तरीका है जिससे भगवान के दर्शन हों? इन प्रश्नों के अपने हिसाब से हर एक के कई उत्तर हो सकते हैं परंतु एक बेहद आसान, मितव्ययी, सुनिश्चित तरीका यह है (क्या इसे आधुनिक कलियुग में फैशनेबुल विधियों में से एक नहीं माना जाना चाहिए?) कि आप अपने माता-पिता व बुजुर्गों का खयाल रखें. आपके अभिभावक ईश्वर के जीवित स्वरूप हैं और उनका ध्यान रखना ही ईश्वर दर्शन का आसान और सुनिश्चित तरीका है.

Sameerchand
13-12-2011, 12:11 AM
नदी का पानी बिकाऊ

गुरू जी के प्रवचन में एक गूढ़ वाक्य शामिल था।

कटु मुस्कराहट के साथ वे बोले, "नदी के तट पर बैठकर नदी का पानी बेचना ही मेरा कार्य है"।

और मैं पानी खरीदने में इतना व्यस्त था कि मैं नदी को देख ही नहीं पाया।

"हम जीवन की समस्याओं और आपाधापी के कारण प्रायः सत्य को नहीं पहचान पाते।"

Sameerchand
13-12-2011, 12:13 AM
छुट्टन के तीन किलो

छुट्टन पटसन तौल-2 कर ढेरी बना रहा था. उधर से एक बौद्ध गुजरा. उसने छुट्टन से पूछा “तुम जिंदगी भर पटसन तौलते रहोगे – तुम्हें मालूम है, बुद्ध कौन था?”

छुट्टन ने बताया – “नहीं, पर यह खूब पता है कि पटसन का यह गुच्छा तीन किलो का है.”

Badtameez
13-12-2011, 12:22 AM
बहुत अच्छा विचार प्रस्तुत किया गया है।

Sameerchand
13-12-2011, 11:32 AM
बहुत अच्छा विचार प्रस्तुत किया गया है।

धन्यवाद सुरेश सौरभ जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

sushilnkt
13-12-2011, 11:48 AM
नदी का पानी बिकाऊ

गुरू जी के प्रवचन में एक गूढ़ वाक्य शामिल था।

कटु मुस्कराहट के साथ वे बोले, "नदी के तट पर बैठकर नदी का पानी बेचना ही मेरा कार्य है"।

और मैं पानी खरीदने में इतना व्यस्त था कि मैं नदी को देख ही नहीं पाया।

"हम जीवन की समस्याओं और आपाधापी के कारण प्रायः सत्य को नहीं पहचान पाते।"


आप जो भी कहानी सुना रहे हे
उनका सार जीवन से निकलता हे

Badtameez
13-12-2011, 11:49 AM
धन्यवाद सुरेश सौरभ जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.बिल्कुल मित्र जी अवश्य आता रहूँगा। बहुत अच्छा सूत्र है।रेपो+++

Sameerchand
13-12-2011, 12:20 PM
आप जो भी कहानी सुना रहे हे
उनका सार जीवन से निकलता हे

धन्यवाद सुशिल भाई जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आप बिलकुल सही बोल रहे हैं सुशिल भाई......

आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
13-12-2011, 12:20 PM
बिल्कुल मित्र जी अवश्य आता रहूँगा। बहुत अच्छा सूत्र है।रेपो+++

धन्यवाद मित्र..............

sushilnkt
13-12-2011, 12:23 PM
धन्यवाद सुशिल भाई जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आप बिलकुल सही बोल रहे हैं सुशिल भाई......

आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

भाई हम तो विचार ही रखते हे
आप जो जीवन में आने वाले अमूल्य विचार दे
रहे हे उनके लिए तो ये विचार कम हे

Sameerchand
13-12-2011, 12:27 PM
भाई हम तो विचार ही रखते हे
आप जो जीवन में आने वाले अमूल्य विचार दे
रहे हे उनके लिए तो ये विचार कम हे

धन्यवाद सुशिल भाई जी, जिंदगी में प्रोत्साहन कुछ अच्छा कर दिखने के लिए बहुत मायने रखती हैं और अपनों के द्वारा दिया गया प्रोत्साहन तो बहुत महत्वपूर्ण होता हैं......और वो कार्य आप सब कर रहे हैं.....

और क्या बोलू ...धन्यवाद कह कर आपकी महता को कम नहीं करना चाहता.......

Ruchi Bhabhi
13-12-2011, 12:35 PM
कहानिया अच्छी है मित्र, जारी रखें जी

ben ten
13-12-2011, 12:36 PM
सुशील जी और समीर जी दोनों ने बहुत अच्छी बातें कहीं है।

Sameerchand
13-12-2011, 12:37 PM
कहानिया अच्छी है मित्र, जारी रखें जी

धन्यवाद छमक छलो जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
13-12-2011, 12:38 PM
सुशील जी और समीर जी दोनों ने बहुत अच्छी बातें कहीं है।

धन्यवाद बेन टेन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Ruchi Bhabhi
13-12-2011, 12:38 PM
धन्यवाद छमक छलो जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

जी जरूर से , मुझे आपकी कहानिया बेहद अच्छी लगी

ben ten
13-12-2011, 12:40 PM
बिल्कुल मित्र

Sameerchand
13-12-2011, 12:43 PM
जी जरूर से , मुझे आपकी कहानिया बेहद अच्छी लगी


बिल्कुल मित्र

धन्यवाद मित्रों, आप सभी से मुझे यही आशा थी.........

kavita25
13-12-2011, 01:02 PM
सूत्र के लिए बधाई समीर जी ,शेष कहानिया पढ़ने के बाद ..............

Sameerchand
13-12-2011, 01:05 PM
सूत्र के लिए बधाई समीर जी ,शेष कहानिया पढ़ने के बाद ..............


धन्यवाद कविता जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

आगे आपका इन्तजार रहेगा, न केवल मुझे बल्कि इस सूत्र को भी, आपके विचारों का.......

Lovely.indian
14-12-2011, 09:29 AM
काँच की बरनी और दो कप चाय


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।



दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये , धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प् ?? ोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो.... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं , छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी ह ? ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक- अप करवाओ.. टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है.... बाकी सब तो रेत है.. छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे... अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप" क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

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(not my creation - taken from net)

Badtameez
14-12-2011, 09:42 AM
काँच की बरनी और दो कप चाय


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।



दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये , धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प् ?? ोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो.... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं , छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी ह ? ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक- अप करवाओ.. टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है.... बाकी सब तो रेत है.. छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे... अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप" क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

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(not my creation - taken from net)वाह लवली जी वाह !कितनी अच्छी बात है।

nitin9935
14-12-2011, 04:10 PM
[FONT=Arial][SIZE=4][COLOR="#B22222"]काँच की बरनी और दो कप चाय....................................


भाई ये कहानी तो मैं पहले ही पोस्ट कर चूका हूँ

भाई एक बार पढ़ तो लेते

Sameerchand
15-12-2011, 10:18 AM
काँच की बरनी और दो कप चाय


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।
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प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

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(not my creation - taken from net)


वाह लवली जी वाह !कितनी अच्छी बात है।


भाई ये कहानी तो मैं पहले ही पोस्ट कर चूका हूँ

भाई एक बार पढ़ तो लेते

धन्यवाद लवली जी, सुरेश जी और नितिन जी जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

Lovely.indian
15-12-2011, 10:25 AM
वाह लवली जी वाह !कितनी अच्छी बात है।

शुक्रिया मित्र

Chandrshekhar
15-12-2011, 10:29 AM
सुरक्षा का उपाय



एक बार नसरूद्दीन ने एक लड़के से उसके लिए कुँऐं से पानी खींचने का अनुरोध किया। जैसे ही वह लड़का कुँए से पानी खींचने को झुका, नसरूद्दीन ने उसके सिर में जोर से थप्पड़ मारा और कहा, "ध्यान रहे। मेरे लिए पानी खींचते समय घड़ा न टूटे।"

वहाँ से गुजरते हुए एक राहगीर ने यह सब देखा तो उसने नसरूद्दीन से कहा - "जब उस लड़के ने कोई गल्ती ही नहीं की तो तुमने उसे क्यों मारा?"

नसरूद्दीन ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया - "यदि मैं यह चेतावनी घड़े के फूटने के बाद देता तो उसका कोई फायदा नहीं होता।"



बहुत अच्छा, जब चीज खराब हो जाये तब नियम क्या बताना, नियम सावधानी पहले मालूम होने से गलती से बचा जा सकता है ,॥

समीर भाई को उत्तम ज्ञानवर्धक सूत्र के लिये धन्यवाद ...रेपो बाकी रहा , कल मिलेगा

Sameerchand
15-12-2011, 10:33 AM
बहुत अच्छा, जब चीज खराब हो जाये तब नियम क्या बताना, नियम सावधानी पहले मालूम होने से गलती से बचा जा सकता है ,॥

समीर भाई को उत्तम ज्ञानवर्धक सूत्र के लिये धन्यवाद ...रेपो बाकी रहा , कल मिलेगा

धन्यवाद मित्र, आपने बिलकुल सही कहा मित्र. आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.........

कोई बात नहीं मित्र, आपने कहा तो मुझे आपका रेपो मिल ही गया.....

Badtameez
15-12-2011, 10:40 AM
भाई ये कहानी तो मैं पहले ही पोस्ट कर चूका हूँ भाई एक बार पढ़ तो लेतेनितिन जी! आपने ये कहानी पोस्ट पहले ही किया था मैं पढ नहीं पया।क्षमा करें।

kavita25
15-12-2011, 11:16 AM
समीर जी ज्ञानवर्धक कहानियाँ है आपकी ,मेरी तरफ से ++++++एक तुच्छ सी भेट

sushilnkt
15-12-2011, 11:17 AM
समीर जी ज्ञानवर्धक कहानियाँ है आपकी ,मेरी तरफ से ++++++एक तुच्छ सी भेट


बहुत ही सुन्दर लघु बात आप के
निचे भी लिखी हे
नारी .. बहुत ही सुन्दर

kavita25
15-12-2011, 11:24 AM
बहुत ही सुन्दर लघु बात आप के
निचे भी लिखी हे
नारी .. बहुत ही सुन्दर

सुशील जी कृपया खाली स्थान ना छोड़े ,पूरी बात लिखे

sushilnkt
15-12-2011, 11:25 AM
सुशील जी कृपया खाली स्थान ना छोड़े ,पूरी बात लिखे


नारी वो है "जो सावित्री बनके मौत को भी हरा सकती है ओर लक्ष्मीबाई बनके दुश्मनों से लोहा भी ले सकती है "
दादी ये बात बोली हे ///
अब समाज गयी ना ..
कभी दिमाक भी लगा लिया करो

Sameerchand
15-12-2011, 11:35 AM
समीर जी ज्ञानवर्धक कहानियाँ है आपकी ,मेरी तरफ से ++++++एक तुच्छ सी भेट

धन्यवाद मित्र कविता जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आपके विचारों का मैं काफी दिनों से प्रतीक्षा कर रहा था.

आपके कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपका तुच्छ भेंट काफी कीमती हैं मेरे लिए....धन्यवाद आपको एक बार फिर से.........

kavita25
15-12-2011, 12:06 PM
धन्यवाद मित्र कविता जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आपके विचारों का मैं काफी दिनों से प्रतीक्षा कर रहा था.

आपके कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपका तुच्छ भेंट काफी कीमती हैं मेरे लिए....धन्यवाद आपको एक बार फिर से.........

मित्र इतने अच्छे सूत्र का निर्माण करके बधाई के पर्त्त आप है

Lovely.indian
15-12-2011, 12:21 PM
बहुत ही सुन्दर लघु बात आप के
निचे भी लिखी हे
नारी .. बहुत ही सुन्दर

नारी का एक रूप और भी होता है मेरे भाई :((

ben ten
16-12-2011, 05:53 PM
भाई समीर जी! मैं भी आपके सूत्र में कुछ योगदान दे रहा हूँ, त्रुटि हो तो कृपया क्षमा करें।

एकाग्रचित्त बनें

एक आदमी को किसी ने सुझाव दिया कि दूर से पानी लाते हो, क्यों नहीं अपने घर के पास एक कुआं खोद लेते? हमेशा के लिए पानी की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। सलाह मानकर उस आदमी ने कुआं खोदना शुरू किया। लेकिन सात-आठ फीट खोदने के बाद उसे पानी तो क्या, गीली मिट्टी का भी चिह्न नहीं मिला। उसने वह जगह छोड़कर दूसरी जगह खुदाई शुरू की। लेकिन दस फीट खोदने के बाद भी उसमें पानी नहीं निकला। उसने तीसरी जगह कुआं खोदा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। इस क्रम में उसने आठ-दस फीट के दस कुएं खोद डाले, पानी नहीं मिला। वह निराश होकर उस आदमी के पास गया, जिसने कुआं खोदने की सलाह दी थी।
उसे बताया कि मैंने दस कुएं खोद डाले, पानी एक में भी नहीं निकला। उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं चलकरउस स्थान पर आया, जहां उसने दस गड्ढे खोद रखे थे। उनकी गहराई देखकर वह समझ गया। बोला, 'दस कुआं खोदने की बजाए एक कुएं में ही तुम अपना सारा परिश्रम और पुरूषार्थ लगाते तो पानी कबका मिल गया होता। तुम सब गड्ढों को बंद कर दो, केवल एक को गहरा करते जाओ, पानी निकल आएगा।'
कहने का मतलब यही कि आज की स्थिति यही है। आदमी हर काम फटाफट करना चाहता है। किसी के पास धैर्य नहीं है। इसी तरह पचासों योजनाएं एक साथ चलाता है और पूरी एक भी नहींहो पाती।

Badtameez
16-12-2011, 07:40 PM
भाई समीर जी! मैं भी आपके सूत्र में कुछ योगदान दे रहा हूँ, त्रुटि हो तो कृपया क्षमा करें।

एकाग्रचित्त बनें

एक आदमी को किसी ने सुझाव दिया कि दूर से पानी लाते हो, क्यों नहीं अपने घर के पास एक कुआं खोद लेते? हमेशा के लिए पानी की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। सलाह मानकर उस आदमी ने कुआं खोदना शुरू किया। लेकिन सात-आठ फीट खोदने के बाद उसे पानी तो क्या, गीली मिट्टी का भी चिह्न नहीं मिला। उसने वह जगह छोड़कर दूसरी जगह खुदाई शुरू की। लेकिन दस फीट खोदने के बाद भी उसमें पानी नहीं निकला। उसने तीसरी जगह कुआं खोदा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। इस क्रम में उसने आठ-दस फीट के दस कुएं खोद डाले, पानी नहीं मिला। वह निराश होकर उस आदमी के पास गया, जिसने कुआं खोदने की सलाह दी थी।
उसे बताया कि मैंने दस कुएं खोद डाले, पानी एक में भी नहीं निकला। उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं चलकरउस स्थान पर आया, जहां उसने दस गड्ढे खोद रखे थे। उनकी गहराई देखकर वह समझ गया। बोला, 'दस कुआं खोदने की बजाए एक कुएं में ही तुम अपना सारा परिश्रम और पुरूषार्थ लगाते तो पानी कबका मिल गया होता। तुम सब गड्ढों को बंद कर दो, केवल एक को गहरा करते जाओ, पानी निकल आएगा।'
कहने का मतलब यही कि आज की स्थिति यही है। आदमी हर काम फटाफट करना चाहता है। किसी के पास धैर्य नहीं है। इसी तरह पचासों योजनाएं एक साथ चलाता है और पूरी एक भी नहींहो पाती।

बहुत ज्ञानदायी कहानी है । सत्य है बेन जी कि यदि एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के समस्त मेहनत लगा दिया जाय तभी सफलता मिलती है।

Sameerchand
16-12-2011, 09:36 PM
भाई समीर जी! मैं भी आपके सूत्र में कुछ योगदान दे रहा हूँ, त्रुटि हो तो कृपया क्षमा करें।

एकाग्रचित्त बनें

एक आदमी को किसी ने सुझाव दिया कि दूर से पानी लाते हो, क्यों नहीं अपने घर के पास एक कुआं खोद लेते? हमेशा के लिए पानी की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। सलाह मानकर उस आदमी ने कुआं खोदना शुरू किया। लेकिन सात-आठ फीट खोदने के बाद उसे पानी तो क्या, गीली मिट्टी का भी चिह्न नहीं मिला। उसने वह जगह छोड़कर दूसरी जगह खुदाई शुरू की। लेकिन दस फीट खोदने के बाद भी उसमें पानी नहीं निकला। उसने तीसरी जगह कुआं खोदा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। इस क्रम में उसने आठ-दस फीट के दस कुएं खोद डाले, पानी नहीं मिला। वह निराश होकर उस आदमी के पास गया, जिसने कुआं खोदने की सलाह दी थी।
उसे बताया कि मैंने दस कुएं खोद डाले, पानी एक में भी नहीं निकला। उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं चलकरउस स्थान पर आया, जहां उसने दस गड्ढे खोद रखे थे। उनकी गहराई देखकर वह समझ गया। बोला, 'दस कुआं खोदने की बजाए एक कुएं में ही तुम अपना सारा परिश्रम और पुरूषार्थ लगाते तो पानी कबका मिल गया होता। तुम सब गड्ढों को बंद कर दो, केवल एक को गहरा करते जाओ, पानी निकल आएगा।'
कहने का मतलब यही कि आज की स्थिति यही है। आदमी हर काम फटाफट करना चाहता है। किसी के पास धैर्य नहीं है। इसी तरह पचासों योजनाएं एक साथ चलाता है और पूरी एक भी नहींहो पाती।

धन्यवाद बेन टेन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपके द्वारा प्रश्तुत कहानी काफी प्रेरणादायक हैं. कृपया आगे भी इस सूत्र में इस तरह की कहानिया डालने की कोशिश कीजियेगा. हम सदस्यों को आपकी कहानियो का काफ इन्तजार रहेगा.

Sameerchand
16-12-2011, 09:39 PM
बहुत ज्ञानदायी कहानी है । सत्य है बेन जी कि यदि एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के समस्त मेहनत लगा दिया जाय तभी सफलता मिलती है।

धन्यवाद मित्र सुरेश सौरभ जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

आपके कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Raman46
16-12-2011, 10:50 PM
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं |

Sameerchand
16-12-2011, 11:03 PM
अत्यंत प्रेरणादायक कहानियाँ हैं |

धन्यवाद मित्र रमण जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

आपके कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

ben ten
16-12-2011, 11:24 PM
धन्यवाद बेन टेन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

आपके द्वारा प्रश्तुत कहानी काफी प्रेरणादायक हैं. कृपया आगे भी इस सूत्र में इस तरह की कहानिया डालने की कोशिश कीजियेगा. हम सदस्यों को आपकी कहानियो का काफ इन्तजार रहेगा.

समीर गुरुजी! क्यों आप मुझ नाचीज़ की प्रशंसा कर लज्जित कर रहे हैं!!
ज्ञान के अथाह सागर में यदि हम छोटी सी बूँद के रूप में भी काम आ सकें तो खुशी होगी।

Badtameez
17-12-2011, 06:04 AM
धन्यवाद मित्र सुरेश सौरभ जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

आपके कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

धन्यवाद समीर जी। आप भले ही हमारे सूत्र पर न आयें मैं आपके सूत्र पर अवश्य आऊँगा।

Raja44
18-12-2011, 03:48 AM
भाई समीर जी! मैं भी आपके सूत्र में कुछ योगदान दे रहा हूँ, त्रुटि हो तो कृपया क्षमा करें।

एकाग्रचित्त बनें

एक आदमी को किसी ने सुझाव दिया कि दूर से पानी लाते हो, क्यों नहीं अपने घर के पास एक कुआं खोद लेते? हमेशा के लिए पानी की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। सलाह मानकर उस आदमी ने कुआं खोदना शुरू किया। लेकिन सात-आठ फीट खोदने के बाद उसे पानी तो क्या, गीली मिट्टी का भी चिह्न नहीं मिला। उसने वह जगह छोड़कर दूसरी जगह खुदाई शुरू की। लेकिन दस फीट खोदने के बाद भी उसमें पानी नहीं निकला। उसने तीसरी जगह कुआं खोदा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। इस क्रम में उसने आठ-दस फीट के दस कुएं खोद डाले, पानी नहीं मिला। वह निराश होकर उस आदमी के पास गया, जिसने कुआं खोदने की सलाह दी थी।
उसे बताया कि मैंने दस कुएं खोद डाले, पानी एक में भी नहीं निकला। उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं चलकरउस स्थान पर आया, जहां उसने दस गड्ढे खोद रखे थे। उनकी गहराई देखकर वह समझ गया। बोला, 'दस कुआं खोदने की बजाए एक कुएं में ही तुम अपना सारा परिश्रम और पुरूषार्थ लगाते तो पानी कबका मिल गया होता। तुम सब गड्ढों को बंद कर दो, केवल एक को गहरा करते जाओ, पानी निकल आएगा।'
कहने का मतलब यही कि आज की स्थिति यही है। आदमी हर काम फटाफट करना चाहता है। किसी के पास धैर्य नहीं है। इसी तरह पचासों योजनाएं एक साथ चलाता है और पूरी एक भी नहींहो पाती।

अच्छी प्रेरणादायक कहानी है

ben ten
19-12-2011, 12:41 AM
पथ का निर्माण:-

जंगल में चराई के बाद किसी बछड़े को गाँव की गौशाला तकलौटना था. नन्हा बछड़ा था तो अबोध ही, वह चट्टानों, मिट्टी के टीलों, और ढलानोंपर से उछलता-कूदता हुआ अपने गंतव्य तक पहुँचने में सफल हो गया.
अगले दिन एक कुत्ते ने भी गाँव तक पहुँचने के लिए उसीरास्ते का इस्तेमाल किया. उसके अगले दिन एक भेड़ उस रास्ते पर चल पड़ी. एक भेड़ के पीछे अनेक भेड़ चल पडीं. भेड़ जो ठहरीं!
उस रास्ते पर चलाफिरी के निशान देखकर लोगों ने भी उसका इस्तेमाल शुरू कर दिया. ऊंची-नीची पथरीली जमीन पर आते-जाते समय वे पथकी दुरूहता को कोसते रहते – पथ था ही ऐसा! लेकिन किसी ने भी सरल-सुगम पथ की खोज के लिए प्रयास नहीं किये.
समय बीतने के साथ वह पगडंडीउस गाँव तक पहुँचने का मुख्य मार्ग बन गयी जिसपर बेचारे पशु बमुश्किल गाड़ीखींचते रहते. उस कठिन पथ के स्थान पर कोई सुगम पथ होता तो लोगों को यात्रा में न केवल समय की बचत होती वरन वे सुरक्षित भी रहते.
कालांतर में वह गाँव एक नगरबन गया और पथ राजमार्ग बन गया. उस पथ की समस्याओं पर चर्चा करते रहने के अतिरिक किसी ने कभी कुछ नहीं किया.
बूढ़ा जंगल यह सब बहुत लंबेसमय से देख रहा था. वह बरबस मुस्कुराता और यह सोचता रहता कि मनुष्य हमेशा ही सामने खुले पड़े विकल्प को मजबूती से जकड़ लेते हैं औरयह विचार नहीं करते कि कहींकुछ उससे बेहतर भी किया जा सकता है.

साभार- इंटरनेट

ben ten
19-12-2011, 12:47 AM
ईश्वर की खोज :-
मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में,
ना तीरथ में ना मूरत में ना एकांत निवास में,
ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलाश में ,
ना मैं जप में ना मैं तप में ना व्रत उपवास में ,
ना मैं किरिया करम में रहता नाही जोग सन्यास में ,
नहिं प्राण में नहिं पिंड में ना ब्रह्माण्ड आकाश में ,
नहिं प्रकृति पहाड़ गुफा में नहिं स्वासों की साँस में ,
खोजी होए तुरत मिल जाए एक पल की तलाश में,
कहत कबीर सुनो भाई साधू मैं तो हूँ विश्वास में !

साभार- इंटरनेट

ben ten
19-12-2011, 12:50 AM
मुल्ला नसरुद्दीन के गुरु की मज़ार :-
मुल्ला नसरुद्दीन इबादत की नई विधियों की तलाश में निकला. अपने गधे पर जीन कसकर वह भारत, चीन, मंगोलिया गया और बहुत से ज्ञानियों और गुरुओं से मिला पर उसे कुछ भी नहीं जंचा.
उसे किसी ने नेपाल में रहने वाले एक संत के बारे में बताया. वह नेपाल की ओर चल पड़ा. पहाड़ी रास्तों पर नसरुद्दीन का गधा थकान से मर गया. नसरुद्दीन ने उसे वहीं दफ़न कर दिया और उसके दुःख में रोने लगा. कोई व्यक्ति उसके पास आया और उससे बोला – “मुझे लगता है कि आप यहाँ किसी संत की खोज में आये थे. शायद यही उनकी कब्र है और आप उनकी मृत्यु का शोक मना रहे हैं.”
“नहीं, यहाँ तो मैंने अपने गधे को दफ़न किया है जो थकान के कारण मर गया” – मुल्ला ने कहा.
“मैं नहीं मानता. मरे हुए गधे के लिए कोई नहीं रोता. इस स्थान में ज़रूर कोई चमत्कार है जिसे तुम अपने तक ही रखना चाहते हो!”
नसरुद्दीन ने उसे बार-बार समझाने की कोशिश की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. वह आदमी पास ही गाँव तक गया और लोगों को दिवंगत संत की कब्र के बारे में बताया कि वहां लोगों के रोग ठीक हो जाते हैं. देखते-ही-देखते वहां मजमा लग गया.
संत की चमत्कारी कब्र की खबर पूरे नेपाल में फ़ैल गयी और दूर-दूर से लोग वहां आने लगे. एक धनिक को लगा कि वहां आकर उसकी मनोकामना पूर्ण हो गयी है इसलिए उसने वहां एक शानदार मज़ार बनवा दी जहाँ नसरुद्दीन ने अपने ‘गुरु’ को दफ़न किया था.
यह सब होता देखकर नसरुद्दीन ने वहां से चल देने में ही अपनी भलाई समझी. इस सबसे वह एक बात तो बखूबी समझ गया कि जब लोग किसी झूठ पर यकीन करना चाहते हैं तब दुनिया की कोई ताकत उनका भ्रम नहीं तोड़ सकती.

साभार- इंटरनेट

ben ten
19-12-2011, 12:56 AM
ईश्वर के हाथ :-
गुरु और शिष्य रेगिस्तान से गुज़र रहे थे. गुरु यात्रा में हर क्षण शिष्य में आस्था जागृत करने के लिए ज्ञान देते रहे थे.
“अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर दो” – गुरु ने कहा – “हम सभी ईश्वर की संतान हैं और वह अपने बच्चों को कभी नहीं त्यागते”.
रात में उन्होंने रेगिस्तान में एक स्थान पर अपना डेरा जमाया. गुरु ने शिष्य से कहा कि वह घोड़े को निकट ही एक चट्टान से बाँध दे.
शिष्य घोड़े को लेकर चट्टान तक गया. उसे दिन में गुरु द्वारा दिया गया कोई उपदेश याद आ गया. उसने सोचा – “गुरु संभवतः मेरी परीक्षा ले रहे हैं. आस्था कहती है कि ईश्वर इस घोड़े का ध्यान रखेंगे”.
और उसने घोड़े को चट्टान से नहीं बाँधा.
सुबह उसने देखा कि घोड़ा दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रहा था.
उसने गुरु से जाकर कहा – “आपको ईश्वर के बारे में कुछ नहीं पता! कल ही आपने बताया था कि हमें सब कुछ ईश्वर के हांथों सौंप देना चाहिए इसीलिए मैंने घोड़े की रक्षा का भर ईश्वर पर डाल दिया लेकिन घोड़ा भाग गया!”
“ईश्वर तो वाकई चाहता था किघोड़ा हमारे पास सुरक्षित रहे” गुरु ने कहा – “लेकिन जिस समय उसने तुम्हारे हांथों घोड़े को बांधना चाहा तब तुमने अपने हांथों को ईश्वर को नहीं सौंपा और घोड़े को खुला छोड़ दिया.

साभार- इंटरनेट

badboy123455
19-12-2011, 01:02 AM
ईश्वर के हाथ :-
गुरु और शिष्य रेगिस्तान से गुज़र रहे थे. गुरु यात्रा में हर क्षण शिष्य में आस्था जागृत करने के लिए ज्ञान देते रहे थे.
“अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर दो” – गुरु ने कहा – “हम सभी ईश्वर की संतान हैं और वह अपने बच्चों को कभी नहीं त्यागते”.
रात में उन्होंने रेगिस्तान में एक स्थान पर अपना डेरा जमाया. गुरु ने शिष्य से कहा कि वह घोड़े को निकट ही एक चट्टान से बाँध दे.
शिष्य घोड़े को लेकर चट्टान तक गया. उसे दिन में गुरु द्वारा दिया गया कोई उपदेश याद आ गया. उसने सोचा – “गुरु संभवतः मेरी परीक्षा ले रहे हैं. आस्था कहती है कि ईश्वर इस घोड़े का ध्यान रखेंगे”.
और उसने घोड़े को चट्टान से नहीं बाँधा.
सुबह उसने देखा कि घोड़ा दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रहा था.
उसने गुरु से जाकर कहा – “आपको ईश्वर के बारे में कुछ नहीं पता! कल ही आपने बताया था कि हमें सब कुछ ईश्वर के हांथों सौंप देना चाहिए इसीलिए मैंने घोड़े की रक्षा का भर ईश्वर पर डाल दिया लेकिन घोड़ा भाग गया!”
“ईश्वर तो वाकई चाहता था किघोड़ा हमारे पास सुरक्षित रहे” गुरु ने कहा – “लेकिन जिस समय उसने तुम्हारे हांथों घोड़े को बांधना चाहा तब तुमने अपने हांथों को ईश्वर को नहीं सौंपा और घोड़े को खुला छोड़ दिया.

साभार- इंटरनेट

बेन जी इस शानदार प्रस्तुति हेतु रेपो स्वीकार करे..................
वाकई अच्छी लगी

ben ten
19-12-2011, 01:08 AM
धन्यवाद भाई जी। भाई जी वैसे एक बात तो कहनी पङेगी कि आप हो तो बहुत तेज!!

Sameerchand
19-12-2011, 01:16 AM
ईश्वर के हाथ :-
गुरु और शिष्य रेगिस्तान से गुज़र रहे थे. गुरु यात्रा में हर क्षण शिष्य में आस्था जागृत करने के लिए ज्ञान देते रहे थे.
“अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर दो” – गुरु ने कहा – “हम सभी ईश्वर की संतान हैं और वह अपने बच्चों को कभी नहीं त्यागते”.
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“ईश्वर तो वाकई चाहता था किघोड़ा हमारे पास सुरक्षित रहे” गुरु ने कहा – “लेकिन जिस समय उसने तुम्हारे हांथों घोड़े को बांधना चाहा तब तुमने अपने हांथों को ईश्वर को नहीं सौंपा और घोड़े को खुला छोड़ दिया.

साभार- इंटरनेट

धन्यवाद बेन टेन जी आपका, इतनी अच्छी कहानी के लिए............

आगे आपका इन्तजार रहेगा, न केवल मुझे बल्कि इस सूत्र को भी, आपके कहानियों और विचारों का.......

Sameerchand
19-12-2011, 01:18 AM
सीमित शब्द

एक बार एक गुरुकुल के कुछ छात्र लाओ त्जू की इस सूक्ति पर विचार-विमर्श कर रहे थे -

"जिन्हें मालूम है, वे कहते नहीं,
जो कहते हैं उन्हें मालूम नहीं."


इस सूक्ति का सटीक अर्थ जब उनमें से कोई नहीं बता पाया तो वे इसका अर्थ जानने अपने गुरू के पास पहुँचे.


गुरु ने पूछा - "तुममें से कितने लोग गुलाब की खुशबू के बारे में जानते हो"


सभी शिष्यों ने सहमति में सर हिलाया.


यदि तुम सबको यह मालूम है तो मुझे इसे शब्दों में समझाओ.


सबके सब चुप थे क्योंकि वे इसे शब्दों में कह नहीं सकते थे...!!

Sameerchand
19-12-2011, 01:23 AM
नकल ही करनी है तो बाघ की करो, लोमड़ी की नहीं।

अरब के शेख सादी की एक दंतकथा इस प्रकार है -

जंगल से गुजरते हुए एक आदमी ने ऐसी लोमड़ी को देखा जिसके पैर टूट चुके थे और वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी। उसने सोचा कि आखिर वह अपना गुजारा कैसे करेगी। तभी उसने देखा कि एक बाघ अपने मुँह में शिकार को दबाये हुए वहाँ आया। पेटभर खाने के बाद वह बचाखुचा शिकार लोमड़ी के लिए छोड़कर चला गया।

अगले दिन भी ईश्वर ने बाघ को लोमड़ी के लिए भोजन के साथ वहाँ भेज दिया। वह आदमी ईश्वर की महानता के बारे में सोचकर आश्चर्यचकित हो गया और उसने यह निर्णय लिया कि वह बिना कुछ एक कोने में पड़ा रहेगा और ईश्वर उसका भरण-पोषण करेंगे।

अगले एक माह तक वह ऐसा ही करता रहा और जब वह मृत्युशय्या पर पहुंच गया तब उसे एक आवाज़ सुनायी दी - "मेरे बच्चे! तुम गलत राह पर हो। सत्य को पहचानो। नकल ही करनी है तो बाघ की करो, लोमड़ी की नहीं।"

Sameerchand
19-12-2011, 01:33 AM
"हिम्मत मत हारो"


एक दिन एक किसान का गधा कुएँ में गिर गया ।वह गधा घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं। अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि गधा काफी बूढा हो चूका था,अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था;और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही गधे कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है ,वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा । और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।

सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे। तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह गधा एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था। वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एस सीढी ऊपर चढ़ आता । जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह गधा कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया।

ध्यान रखे, आपके जीवन में भी तुम पर बहुत तरह कि मिट्टी फेंकी जायेगी ,बहुत तरह कि गंदगी आप पर गिरेगी। जैसे कि ,आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा ,कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण तुम्हे बेकार में ही भला बुरा कहेगा । कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे। ऐसे में आपको हतोत्साहित होकर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हिल-हिल कर हर तरह कि गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख लेकर,उसे सीढ़ी बनाकर,बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

ben ten
19-12-2011, 01:48 AM
"हिम्मत मत हारो"


एक दिन एक किसान का गधा कुएँ में गिर गया ।वह गधा घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा...

ध्यान रखे, आपके जीवन में भी तुम पर बहुत तरह कि मिट्टी फेंकी जायेगी ,बहुत तरह कि गंदगी आप पर गिरेगी। जैसे कि ,आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा ,कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण तुम्हे बेकार में ही भला बुरा कहेगा । कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे। ऐसे में आपको हतोत्साहित होकर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हिल-हिल कर हर तरह कि गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख लेकर,उसे सीढ़ी बनाकर,बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

समीर गुरुजी आपके द्वारा प्रस्तुत लघु कथा वाकई प्रेरणादायक है।
आपको मेरी ओर से सम्मान++

Sameerchand
19-12-2011, 01:50 AM
चिड़िया ने दिया क़ीमती सबक़

किसान ने एक दिन छोटी-सी चिड़िया पकड़ ली। वह इतनी छोटी थी कि किसान की एक मुट्ठी में दो चिड़ियां समा सकती थीं। किसान कहने लगा कि वह उसे पकाकर खा जाएगा। चिड़िया बोली, ‘कृपा करके मुझे छोड़ दो। वैसे भी मैं इतनी छोटी हूं कि तुम्हारे एक कौर के बराबर भी नहीं होऊंगी।’

किसान ने जवाब दिया, ‘लेकिन तुम्हारा मांस बहुत स्वादिष्ट होता है। और हां, मैंने कहावत सुनी है कि कुछ नहीं से कुछ भी होना बेहतर है।’ उसकी बात सुनकर चिड़िया बोली, ‘अगर मैं तुम्हें ऐसा मोती देने का वादा करूं, जो शुतुरमुर्ग के अंडे से भी बड़ा हो, तो क्या तुम मुझे आज़ाद कर दोगे?’ उसकी बात सुनकर किसान बहुत ख़ुश हो गया और तत्काल उसने मुट्ठी खोलकर उसे उड़ा दिया।

चिड़िया आज़ाद होते ही कुछ दूर पर एक पेड़ की थोड़ी ऊंची डाल पर जा बैठी, जहां तक किसान का हाथ नहीं पहुंच पाता था। किसान ने उसे बैठा देखकर बड़ी बेसब्री से कहा, ‘जाओ, जल्दी जाओ, मेरे लिए वह मोती लेकर आओ।’ चिड़िया हंसकर बोली, ‘वह मोती तो मुझसे भी बड़ा है, मैं उसे कैसे ला सकती हूं?’ किसान ने ग़ुस्से और खीझ से कहा, ‘तुम्हें लाना ही पड़ेगा, तुमने वादा किया है।’

चिड़िया वहीं बैठी रही। उसने जवाब दिया, ‘मैंने तुमसे कोई वादा नहीं किया था। मैंने सिर्फ़ यही कहा था कि अगर मैं ऐसा वादा करूं, तो क्या तुम मुझे छोड़ दोगे। और इतना सुनते ही तुम लालच में अंधे हो गए थे। ’ उसकी बात सुनकर किसान हाथ मलने लगा। चिड़िया बोली, ‘लेकिन दुखी मत हो, मैंने आज तुम्हें वह पाठ पढ़ाया है, जो ऐसे हर मोतियों से ज्यादा क़ीमती है। हमेशा कुछ भी करने से पहले सोच-विचार करो।’

Sameerchand
19-12-2011, 01:54 AM
समीर गुरुजी आपके द्वारा प्रस्तुत लघु कथा वाकई प्रेरणादायक है।
आपको मेरी ओर से सम्मान++

धन्यवाद बेन टेन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही मेरा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा

badboy123455
19-12-2011, 11:14 AM
समीर जी इस शानदार सूत्र की रचना करने हेतु रेपो स्वीकारे
सारी कहानिया अच्छी हे
छोटी हे इसलिए पढ़ भी प् रहे हे

badboy123455
19-12-2011, 11:15 AM
धन्यवाद भाई जी। भाई जी वैसे एक बात तो कहनी पङेगी कि आप हो तो बहुत तेज!!

तेज केसे मित्र..........................

prakash85
19-12-2011, 12:19 PM
Kahaniya bahut hi sundar & gyanvardhak hain aage bhi post karein

Badtameez
19-12-2011, 12:42 PM
बहुत सुन्दर ज्ञान मिलता है यहाँ।

ben ten
19-12-2011, 01:55 PM
तेज केसे मित्र..........................

तेज ऐसे भाई जी कि जैसे ही मैंने कहानी पोस्ट की कुछ ही समय बाद आपकी प्रतिक्रिया भी मिली, अतिशीघ्र।

ben ten
19-12-2011, 02:04 PM
अपना अपना स्वभाव:-

एक बार एक भला आदमी नदी किनारे बैठा था। तभी उसने देखा एक बिच्छू पानी में गिरगया है। भले आदमी ने जल्दी से बिच्छू को हाथ में उठा लिया। बिच्छू ने उस भले आदमीको डंक मार दिया। बेचारे भलेआदमी का हाथ काँपा और बिच्छूपानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबनेसे बचाने के लिए दुबारा उठा लिया। बिच्छू ने दुबारा उस भले आदमी को डंक मार दिया। भले आदमी का हाथ दुबारा काँपा और बिच्छू पानी में गिर गया।
भले आदमी ने बिच्छू को डूबनेसे बचाने के लिए एक बार फिर उठा लिया। वहाँ एक लड़का उस आदमी का बार-बार बिच्छू को पानी से निकालना और बार-बार बिच्छू का डंक मारना देख रहाथा। उसने आदमी से कहा, "आपको यह बिच्छू बार-बार डंक मार रहा है फिर भी आप उसे डूबने से क्यों बचाना चाहते हैं?"
भले आदमी ने कहा, "बात यह है बेटा कि बिच्छू का स्वभाव हैडंक मारना और मेरा स्वभाव हैबचाना। जब बिच्छू एक कीड़ा होते हुए भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं मनुष्य होकर अपना स्वभाव क्यों छोड़ूँ?"

मनुष्य को कभी भी अपना अच्छास्वभाव नहीं भूलना चाहिए।

साभार- इंटरनेट

ben ten
19-12-2011, 02:10 PM
आत्मविश्वास है विजय:-


घटना है वर्ष 1960 की। स्थानथा यूरोप का भव्य ऐतिहासिक नगर तथा इटली की राजधानी रोम। सारे विश्व की निगाहें 25 अगस्त से 11 सितंबर तक होने वाले ओलंपिक खेलों पर टिकी हुई थीं। इन्हीं ओलंपिक खेलों में एक बीस वर्षीय अश्वेत बालिका भी भाग ले रही थी। वह इतनी तेज़ दौड़ी, इतनी तेज़ दौड़ी कि 1960 के ओलंपिक मुक़ाबलों में तीन स्वर्ण पदक जीत कर दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बन गई।
रोम ओलंपिक में लोग 83 देशोंके 5346 खिलाड़ियों में इस बीस वर्षीय बालिका का असाधारण पराक्रम देखने के लिए इसलिए उत्सुक नहीं थे किविल्मा रुडोल्फ नामक यह बालिका अश्वेत थी अपितु यह वह बालिका थी जिसे चार वर्ष की आयु में डबल निमोनिया और काला बुखार होने से पोलियो हो गया और फलस्वरूप उसे पैरों में ब्रेस पहननी पड़ी। विल्मा रुडोल्फ़ ग्यारह वर्ष की उम्र तक चल-फिर भी नहीं सकती थी लेकिन उसने एक सपना पाल रखा था कि उसे दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बनना है। उस सपने को यथार्थ में परिवर्तित होता देखने वे लिए ही इतने उत्सुक थे पूरी दुनिया वे लोग और खेल-प्रेमी।
डॉक्टर के मना करने के बावजूद विल्मा रुडोल्फ़ ने अपने पैरों की ब्रेस उतार फेंकी और स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर अभ्यास में जुट गई। अपने सपने को मन में प्रगाढ़ किए हुए वह निरंतर अभ्यास करती रही। उसने अपने आत्मविश्वास को इतना ऊँचा कर लिया कि असंभव-सी बात पूरी कर दिखलाई। एक साथ तीन स्वर्ण पदक हासिल कर दिखाए। सच यदि व्यक्ति में पूर्ण आत्मविश्वास है तो शारीरिक विकलांगता भी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती।

साभार- इंटरनेट

ben ten
19-12-2011, 02:14 PM
उपयोगिता:-

एक राजा था। उसने आज्ञा दी कि संसार में इस बात की खोज की जाय कि कौन से जीव-जंतु निरुपयोगी हैं। बहुत दिनों तक खोज बीन करने के बाद उसे जानकारी मिली कि संसार में दो जीव जंगली मक्खी और मकड़ीबिल्कुल बेकार हैं। राजा ने सोचा, क्यों न जंगली मक्खियों और मकड़ियों को ख़त्म कर दिया जाए।
इसी बीच उस राजा पर एक अन्य शक्तिशाली राजा ने आक्रमण कर दिया, जिसमें राजा हार गया और जान बचाने के लिए राजपाट छोड़ कर जंगल में चलागया। शत्रु के सैनिक उसका पीछा करने लगे। काफ़ी दौड़-भाग के बाद राजा ने अपनी जान बचाई और थक कर एक पेड़ के नीचे सो गया। तभी एक जंगली मक्खी ने उसकी नाक पर डंक मारा जिससे राजा की नींदखुल गई। उसे ख़याल आया कि खुले में ऐसे सोना सुरक्षित नहीं और वह एक गुफ़ा में जा छिपा। राजा के गुफ़ा में जाने के बाद मकड़ियों ने गुफ़ा के द्वार पर जाला बुन दिया।
शत्रु के सैनिक उसे ढूँढ ही रहे थे। जब वे गुफ़ा के पास पहुँचे तो द्वार पर घना जालादेख कर आपस में कहने लगे,"अरे! चलो आगे। इस गुफ़ा में वह आया होता तो द्वार पर बना यह जाला क्या नष्ट न हो जाता।"
गुफ़ा में छिपा बैठा राजा येबातें सुन रहा था। शत्रु के सैनिक आगे निकल गए। उस समय राजा की समझ में यह बात आई किसंसार में कोई भी प्राणी या चीज़ बेकार नहीं। अगर जंगली मक्खी और मकड़ी न होतीं तो उसकी जान न बच पाती। इस संसार में कोई भी चीज़ या प्राणी बेकार नहीं। हर एक कीकहीं न कहीं उपयोगिता है।

साभार- इंटरनेट

Sameerchand
20-12-2011, 12:17 AM
समीर जी इस शानदार सूत्र की रचना करने हेतु रेपो स्वीकारे
सारी कहानिया अच्छी हे
छोटी हे इसलिए पढ़ भी प् रहे हे

धन्यवाद मित्र बैडबॉय जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

जी मित्र, आपने बिलकुल सही कहा, छोटी कहानियां होने की वजह से पढने में आसानी होती होगी....धन्यवाद..

Sameerchand
20-12-2011, 12:20 AM
Kahaniya bahut hi sundar & gyanvardhak hain aage bhi post karein


बहुत सुन्दर ज्ञान मिलता है यहाँ।

धन्यवाद प्रकाश जी और सुरेश जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
20-12-2011, 12:22 AM
मित्र बेन टेन जी, आपकी कहानियां सचमुच में काफी प्रेरणादायक हैं...

आपकी कहानियों का हम सबको बेसब्री से इन्तजार रहेगा...धन्यवाद..

sultania
20-12-2011, 12:29 AM
मानव जीवन ओर मूल्यो पे आधारित कहानी के लिये धन्यवाद

Sameerchand
20-12-2011, 12:50 AM
मानव जीवन ओर मूल्यो पे आधारित कहानी के लिये धन्यवाद

धन्यवाद सुल्तानिया जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Badtameez
20-12-2011, 11:22 AM
अय्छा लग रहा है कहानियां पढ कर।

ben ten
20-12-2011, 02:23 PM
सभी मित्रों का सूत्र पर आने और अपने विचार रखने के लिए शुक्रिया।

ben ten
20-12-2011, 11:25 PM
कानून का पालन :-

नागपुर की घटना है। कृष्ण माधव घटाटे गुरु जी मा. स. गोलवरकर को कार में कहीं ले जा रहे थे। कार पटवर्धन मैदान के निकट चौराहे के पास पहुँची। यह चौराहा काफ़ी छोटा है।
उस समय चौराहे पर यातायात पुलिस नहीं थी। इसलिए कृष्ण माधव घटाटे ने चौराहे का चक्कर न लगाते हुए कार को दायीं ओर मोड़ना चाहा। इस परगुरु जी एकदम नाराज़ हो उठे ओर कृष्ण माधव घटाटे को पुन: चौराहे का चक्कर लगा कर ही कार दायीं ओर घुमाने को विवश किया।
उन्होंने कहा, "कानून का पालन न करना भीरुता है।" पुलिस की अनुपस्थिति में कानून तोड़ना कोई साहस की बात नहीं है। हमें कोई देख रहा है अथवा नहीं इसकी चिंतान करते हुए, हमें व्यक्तिगत अथवा सामाजिक क़ानूनों का पालन करना ही चाहिए, फिर इसमें हमें कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े।

साभार- इंटरनेट

मित्रों इस प्रसंग पर मैं अपने विचार रख रहा हूँ-
आज आम तौर पर यह देखने में आता है कि हमें (कहना चाहूँगा युवाओं को) जब कभी भी मौका मिलता है, हम यातायात नियमों की धज्जियाँ उङाने में कोई कसर नहीं छोङते हैं। यह समस्या मुख्य रूप से छोटे शहरों में दृष्टिगोचर होती है, जहाँ यातायात कर्मी 'चायपान' में व्यस्त रहते हैं। मैं आप सब से यह कहना चाहता हूँ कि यातायात नियमों की अवहेलना कर अपनी जान के साथ साथ दूसरे लोगों की जान जोखिम में डालने का हमें बिल्कुल भी अधिकार नहीं हैं। आप सभी से निवेदन है हमेशा यातायात नियमों का पालन करें और अपने मित्र-संबंधियों को भी इस हेतु प्रेरित करें, साथ ही यह भी आग्रह है केवल यातायात नियमों का ही नहीं अपितु कानून द्वारा निर्धारित सभी नियमों का पालन करने की कोशिश करें।
धन्यवाद

badboy123455
20-12-2011, 11:28 PM
क्या बात हे बेन जी इस सूत्र में तो छा गए...................

Sameerchand
20-12-2011, 11:34 PM
अय्छा लग रहा है कहानियां पढ कर।


सभी मित्रों का सूत्र पर आने और अपने विचार रखने के लिए शुक्रिया।

धन्यवाद सुरेश जी और बेन टेन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
20-12-2011, 11:38 PM
कानून का पालन :-

नागपुर की घटना है। कृष्ण माधव घटाटे गुरु जी मा. स. गोलवरकर को कार में कहीं ले जा रहे थे। कार पटवर्धन मैदान के निकट चौराहे के पास पहुँची। यह चौराहा काफ़ी छोटा है।
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आप सभी से निवेदन है हमेशा यातायात नियमों का पालन करें और अपने मित्र-संबंधियों को भी इस हेतु प्रेरित करें, साथ ही यह भी आग्रह है केवल यातायात नियमों का ही नहीं अपितु कानून द्वारा निर्धारित सभी नियमों का पालन करने की कोशिश करें।
धन्यवाद

मित्र बेन टेन जी, आपके द्वारा प्रस्तुत कहानियां पढ़कर मजा आ गया....आपकी कहानियां सचमुच में काफी प्रेरणादायक हैं...

आपकी कहानियों का आगे भी हम सबको बेसब्री से इन्तजार रहेगा...धन्यवाद..

Sameerchand
20-12-2011, 11:40 PM
क्या बात हे बेन जी इस सूत्र में तो छा गए...................

मित्र बैडबॉय जी, आप बिलकुल सही बोल रहे हैं...इनके द्वारा प्रस्तुत कहानियां सचमुच में काफी प्रेरणादायक हैं....

Chandrshekhar
20-12-2011, 11:41 PM
समीर जी को अच्छे सूत्र की अगुआई साथ ही साथ बेन टेन भाई को अच्छी पोस्ट के लिये बधाई

ben ten
21-12-2011, 07:22 AM
आप सभी भाइयों का धन्यवाद।

Badtameez
21-12-2011, 11:47 PM
सुन्दर ढंग से सूत्र आगे बढ रहा है। मित्रों को बधाई!

ben ten
22-12-2011, 12:10 AM
सुरेश भाई जी! आज ही आपके द्वारा रचित एक भोजपुरी गीत पढ़ा, जिसमें एक बालक भगवान-मूर्ति के समक्ष इस संसार में व्याप्त बुराइयों के लिए शिकायत करता है। पढ़कर मन को अच्छा लगा और पुराने गीत 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान' की याद आ गई। आपके अंदर के रचनाकार को सलाम। उस सूत्र में किसी कारण से आपको सम्मान (रेप्यूटेशन) नहीं दे पाया था, यहाँ स्वीकार करिए।

Badtameez
22-12-2011, 12:19 AM
सुरेश भाई जी! आज ही आपके द्वारा रचित एक भोजपुरी गीत पढ़ा, जिसमें एक बालक भगवान-मूर्ति के समक्ष इस संसार में व्याप्त बुराइयों के लिए शिकायत करता है। पढ़कर मन को अच्छा लगा और पुराने गीत 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान' की याद आ गई। आपके अंदर के रचनाकार को सलाम। उस सूत्र में किसी कारण से आपको सम्मान (रेप्यूटेशन) नहीं दे पाया था, यहाँ स्वीकार करिए।बेन टेन जी कसम से आपके हर एक प्रविष्टि में एक जान होती है।आपको नमन करता हूँ।मेरे उत्साहवर्द्धन के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद! और उस गीत को पढने के लिए आपका आभार!रेपो++

ben ten
22-12-2011, 12:25 AM
ख़ानख़ाना की विनम्रता :-

अब्दुर्रहीम खानखाना हिंदी काव्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। उनके दोहे आज भी लोगों के कंठ में जीवित हैं। ऐसा कौन हिंदी-प्रेमी होगा जिसे उनके दस-पाँच दोहे याद न हों। उनके कितने ही दोहे तो लोकोक्तियों की तरह प्रयोग में लाएँ जाते हैं।
खानखाना अकबर के दरबार के सबसे बड़े दरबारी थे और तत्कालीन कोई भी अमीर या उभरा पद-मर्यादा या वैभव में उनसे टक्कर न ले सकता था। किंतु वे बड़े उदार हृदयव्यक्ति थे। स्वयं अच्छे कवि थे और कवियों का सम्मान ही नहीं, उनकी मुक्तहस्त से सहायता करते थे। इतने वैभवशाली, शक्तिमान और विद्वान तथा सुकवि होते हुए भी उनमें सज्जन सुलभ विनम्रता भी थी।
उनकी दानशीलता और विनम्रता से प्रभावित होकर गंग कवि नेएक बार उनसे यह दोहा कहा -
'सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँचौं कियौं, त्यों-त्यों नीचे नैन।।'
खानखाना ने बड़ी सरलता से दोहे में ही उतर दिया -
'देनहार कोउ और है, देत रहत दिन-रैन।
लोग भरम हम पै करें, तासों नीचे नैन।।'
रहीम के समान ऊँचे व्यक्ति ही यह उतर दे सकते हैं।

साभार- इंटरनेट
मित्रों इस प्रसंग पर विचार करें तो अपने जीवन में उतारने योग्य जो बात दिखलाई पड़ती है, वो ये है कि हमें अपने जीवनकाल में विनम्रता का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए भले ही हम सफलता के सर्वोच्च पायदान पर ही क्यों न हों।
यदि संक्षेप में कहा जाए तो भाई सुरेश जी का हस्ताक्षर- 'विनम्रता महानता का प्रतीक है।' ही इस प्रसंग का तत्व है।

Badtameez
22-12-2011, 12:38 AM
ख़ानख़ाना की विनम्रता :-

अब्दुर्रहीम खानखाना हिंदी काव्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। उनके दोहे आज भी लोगों के कंठ में जीवित हैं। ऐसा कौन हिंदी-प्रेमी होगा जिसे उनके दस-पाँच दोहे याद न हों। उनके कितने ही दोहे तो लोकोक्तियों की तरह प्रयोग में लाएँ जाते हैं।
खानखाना अकबर के दरबार के सबसे बड़े दरबारी थे और तत्कालीन कोई भी अमीर या उभरा पद-मर्यादा या वैभव में उनसे टक्कर न ले सकता था। किंतु वे बड़े उदार हृदयव्यक्ति थे। स्वयं अच्छे कवि थे और कवियों का सम्मान ही नहीं, उनकी मुक्तहस्त से सहायता करते थे। इतने वैभवशाली, शक्तिमान और विद्वान तथा सुकवि होते हुए भी उनमें सज्जन सुलभ विनम्रता भी थी।
उनकी दानशीलता और विनम्रता से प्रभावित होकर गंग कवि नेएक बार उनसे यह दोहा कहा -
'सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँचौं कियौं, त्यों-त्यों नीचे नैन।।'
खानखाना ने बड़ी सरलता से दोहे में ही उतर दिया -
'देनहार कोउ और है, देत रहत दिन-रैन।
लोग भरम हम पै करें, तासों नीचे नैन।।'
रहीम के समान ऊँचे व्यक्ति ही यह उतर दे सकते हैं।

साभार- इंटरनेट
मित्रों इस प्रसंग पर विचार करें तो अपने जीवन में उतारने योग्य जो बात दिखलाई पड़ती है, वो ये है कि हमें अपने जीवनकाल में विनम्रता का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए भले ही हम सफलता के सर्वोच्च पायदान पर ही क्यों न हों।
यदि संक्षेप में कहा जाए तो भाई सुरेश जी का हस्ताक्षर- 'विनम्रता महानता का प्रतीक है।' ही इस प्रसंग का तत्व है।

बेन जी!
आपने कविवर रहीम जी का उदाहरण देकर आपने मेरे मन की बात छीन ली।

ben ten
22-12-2011, 11:38 PM
दोस्तों आज की हमारी कहानी एक कहानी न होकर एक ऐसी घटना को बयां करता किस्सा है जो मानव मस्तिष्क को कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देता है। यहाँ यदि मैं लेखक का नाम न लिखूँ तो निश्चित ही बेईमानी होगी, दीपिका जोशी जी ने यह वाकया शब्दों में पिरोया है।

दादी की मीठी चिज्जी :-


एक दिन मुंबई के लोकल ट्रेन में सफ़र कर रही थी। दोपहर का समय था इसलिए ज़्यादा भीड़ नहीं थी, सो बैठने के लिए जगह भी मिल गई। सामने वाले बेंच पर एक बहुत ही बुड्ढी औरत बैठी थी। सारा बदन झुर्रियों से भरा, बिना दाँत का मुँह भी गोल-गोल, सफ़ेद बालों का सुपारी जितना जूड़ा, और हाथ में एक थैला था जिसमें चिप्स, नमकीन, कुछ मिठाइयों के पैकेट। शायद अपने नाती-पोतों के लिए ये सब चीज़ें ले जा रही हैं दादी जी... सोचकर ये बात बड़ी मज़ेदार लगी।
एक दो स्टेशन जाने के बाद वो दादी उठी, हाथ-पैर थरथर काँप रहे थे, बैठे हुए लोगों का कंधा और जो भी सहारा मिले, पकड़-पकड़कर आगे बढ़ने लगी।मैं हैरान तब हुई जब वह बुढ्ढी औरत अपनी धीमी गहराती आवाज़ में कहने लगी, ''चिप्स, मिठाई ले लो, अपने बच्चों को खुश करो।''
जब तक मेरे कान पर वो शब्द पड़े, दादी काफ़ी आगे निकल चुकी थी। वहाँ भी उसका चिप्सले लो. . मिठाई ले लो. . .चल ही रहा था। मेरे मन में आया कि एक कोई चीज़ इससे ख़रीदनी चाहिए। लेकिन मुझे अगले स्टेशन पर उतरना था और वह औरत मुझसे काफ़ी दूर निकल गईथी। समय बहुत कम था, शायद उतनी देर में कोई चीज़ लेना और पैसे चुकता करना संभव नहीं था। फिर यह भी लगा कि 'क्या करना अपना बोझ बढ़ा कर,पहले ही मेरा थैला समान से ठसा-ठस भरा हुआ है, और मैं चुप बैठी स्टेशन की राह देखने लगी। जहाँ मैं बैठी थी वहाँ से दूर दिखाई दिया कि एक आभिजात्य घराने की सी लगती महिला ने काफ़ी समान उससे ख़रीद कर उस दादी को जीवन-यापन के इस कठिन कार्य में मदद कर दी। वह देखकर मुझे अच्छा तो लगा, पर खुद को कोसती रही कि अगर मैंने भी दो प्यार भरे बोल बोल के उसकी दुखभरी ज़िंदगी में कुछ तो खुशी दी होती तो शायद मैं उस खुशी को ज़िंदगी भर अपने दिल में सँजो कर रख सकती।
आज भी मुझे उस दादी से मिलने की बड़ी ख्वाहिश है। उसके पास से चिज्जी ले कर अपने बेटे को 'दादी की चिज्जी' कहकर खिलाना चाहती हूँ क्योंकि बातों ही बातों में मैंने उसे दादी के बारे में काफ़ी बताया था (शायद यह सोचकर कि जो ग़लती मैंने की, मेरा बेटा आगे ज़िंदगी में नकरें)। यदि आपको भी ऐसी दादी कहीं नज़र आए तो इधर-उधर कुछ भी सोचे बिना मदद का हाथ आगे बढ़ाएँगे ना? उसे जरूरत है हमारे दो मीठे बोलों की, मदद के हाथों की, शायद सहानुभूति उस जैसी खुद्दार को पसंद ना भी आए। मैंने ग़लती की है, आप न करिए!!

इंटरनेट से उद्धृत!

मित्रों अब इस प्रसंग पर विचार करने की बारी आती है, कि हमने इससे क्या सीखा? इस प्रसंग में ऐसी कौनसी शिक्षा है जिसे हमें अपने जीवन में लागू करना चाहिए? जैसा कि मित्रों मैंने पहले कहा है, यह घटना हमें कुछ सोचने के लिए विवश करती है, कि क्या इन वृद्धजनोँ की संतान इस लायक भी नहीं है कि बुढापे में उनका सहारा बन सके? क्या हम लोग, जिनका उस वृद्धा दादी (सभी वृद्धजनोँ) से कोई नाता नहीं है, केवल और केवल सहानुभूति जताकर अपना कर्त्तव्य पूरा समझें? कल जब हम लोगों की भी यही अवस्था होगी तो क्या हम भी अपने लिए ऐसा ही जीवन चाहेंगे?
मित्रों यदि संवेदनशीलता से सोचा जाए तो इन प्रश्नों के उत्तर में ही आज के प्रसंग का तत्व भी छिपा है।

aman009
22-12-2011, 11:44 PM
अच्छी कहानी है समीर भाई की / धन्यवाद कहना चाहूँगा उन्हें

Sameerchand
23-12-2011, 12:43 AM
समीर जी को अच्छे सूत्र की अगुआई साथ ही साथ बेन टेन भाई को अच्छी पोस्ट के लिये बधाई


सुन्दर ढंग से सूत्र आगे बढ रहा है। मित्रों को बधाई!

धन्यवाद चाँद जी और सुरेश जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
23-12-2011, 12:44 AM
अच्छी कहानी है समीर भाई की / धन्यवाद कहना चाहूँगा उन्हें

धन्यवाद मित्र अमन जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
23-12-2011, 01:05 AM
वास्तविकता – प्रश्न एक उत्तर अनेक


वास्तविकता का बोध मस्तिष्क के स्तर और व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है. कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं –

1 व्यास ने चार्वाक से पूछा – चार्वाक! क्या कभी तुमने यह अनुभव किया है कि तुम कहाँ से आए हो, कहाँ तुम्हें जाना है और इस जीवन का उद्देश्य क्या है?

चार्वाक का उत्तर था – मैं अपने चाचा जी के घर से आया हूँ, और बाजार जा रहा हूँ. मेरा उद्देश्य है अच्छी सी ताजी मछली खरीदना.


2 यही प्रश्न नारायण ने सुरेश से पूछा. सुरेश का उत्तर था:

मैं अपने अभिभावकों से इस जगत् में आया हूँ. भाग्य जहाँ ले जाएगा, वहाँ मुझे जाना है. जो मुझे मिला है उससे अधिक इस संसार को अर्पित करूं यह मेरे जीवन का उद्देश्य है.

3 और जब यही बात गोविंदप्पा ने शंकर से पूछा तो शंकर जा जवाब था – मैं संपूर्णता से आया हूँ और संपूर्णता में ही वापस लौटना है. और जीवन की इस यात्रा में पग-दर-पग संपूर्णता को महसूस करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है.

4 बुद्ध के प्रश्न पर महाकश्शप का प्रत्युत्तर था – मैं शून्य से आया हूँ, शून्य में मुझे जाना है और मेरे जीवन का उद्देश्य भी शून्य ही है.

अष्टावक्र ने जनक से जब यही प्रश्न पूछा तो जनक ने जवाब दिया – मैं न तो आया हूँ, न कहीं जाऊंगा. और न ही कोई उद्देश्य है.

6 कृष्ण मुस्कुराए, और कुछ नहीं पूछे. भीष्म मुस्कुराए और कोई जवाब नहीं दिए.
सत्य के बोध के लिए हर एक का दृष्टकोण अलग होता है.

Sameerchand
23-12-2011, 01:09 AM
जीवन को किसने समझा

“पथ क्या है?”

“दैनंदिनी जीवन ही पथ है.”

“क्या इसे समझा जा सकता है?”

“यदि आप इसे समझने की जितनी कोशिश करेंगे, तो आप इससे उतना ही दूर जाते जाएंगे.”

shakti36
23-12-2011, 01:11 AM
वास्तविकता – प्रश्न एक उत्तर अनेक


वास्तविकता का बोध मस्तिष्क के स्तर और व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है. कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं –

1 व्यास ने चार्वाक से पूछा – चार्वाक! क्या कभी तुमने यह अनुभव किया है कि तुम कहाँ से आए हो, कहाँ तुम्हें जाना है और इस जीवन का उद्देश्य क्या है?

चार्वाक का उत्तर था – मैं अपने चाचा जी के घर से आया हूँ, और बाजार जा रहा हूँ. मेरा उद्देश्य है अच्छी सी ताजी मछली खरीदना.


2 यही प्रश्न नारायण ने सुरेश से पूछा. सुरेश का उत्तर था:

मैं अपने अभिभावकों से इस जगत् में आया हूँ. भाग्य जहाँ ले जाएगा, वहाँ मुझे जाना है. जो मुझे मिला है उससे अधिक इस संसार को अर्पित करूं यह मेरे जीवन का उद्देश्य है.

3 और जब यही बात गोविंदप्पा ने शंकर से पूछा तो शंकर जा जवाब था – मैं संपूर्णता से आया हूँ और संपूर्णता में ही वापस लौटना है. और जीवन की इस यात्रा में पग-दर-पग संपूर्णता को महसूस करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है.

4 बुद्ध के प्रश्न पर महाकश्शप का प्रत्युत्तर था – मैं शून्य से आया हूँ, शून्य में मुझे जाना है और मेरे जीवन का उद्देश्य भी शून्य ही है.

अष्टावक्र ने जनक से जब यही प्रश्न पूछा तो जनक ने जवाब दिया – मैं न तो आया हूँ, न कहीं जाऊंगा. और न ही कोई उद्देश्य है.

6 कृष्ण मुस्कुराए, और कुछ नहीं पूछे. भीष्म मुस्कुराए और कोई जवाब नहीं दिए.
सत्य के बोध के लिए हर एक का दृष्टकोण अलग होता है.[.

समीर भाई आप ने मेरा दिल जीत लिया भाई / भगवान आप के रास्ते के हर काँटें हरण करें यही कामना करता हूँ मित्र

Sameerchand
23-12-2011, 04:49 AM
ऐसी कितनी चीजें हैं जिनके बिना मेरा जीवन आराम से कट रहा है

सुकरात का ऐसा मानना था कि बुद्धिमान लोग सहज रूप से मितव्ययी जीवन व्यतीत करते हैं।

यद्यपि वे स्वयं जूते नहीं खरीदते थे पर प्रायः बाजार में जाकर दुकानों में सजाकर रखे गए जूते व अन्य चीजों को देखना पसंद करते थे।

जब उनके एक मित्र ने इसका कारण पूछा तो वे बोले - "मैं वहां जाना इसलिये पसंद करता हूं ताकि मैं यह जान सकूं कि ऐसी कितनी चीजें हैं जिनके बिना मेरा जीवन आराम से कट रहा है। "

Sameerchand
23-12-2011, 04:55 AM
शेर और डॉल्फिन

समुद्र के तट पर चहलकदमी करते हुए शेर ने एक डॉल्फिन को लहरों के साथ अठखेलियाँ करते हुए देखा। उसने डॉल्फिन से कहा कि वे दोनों अच्छे मित्र बन सकते हैं।

"मैं जंगल का राजा हूँ और सागर पर तुम्हारा निर्विवाद राज है। यदि संभव हो तो हम दोनों एक अच्छा मित्रतापूर्ण गठजोड़ कर सकते हैं।"

डॉल्फिन ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उनकी मित्रता होने के कुछ ही दिनों बाद शेर की भिडंत जंगली भैंसे से हो गयी। उसने डॉल्फिन को मदद के लिए पुकारा। डॉल्फिन भी शेर की मदद करना चाहती थी परंतु वह चाहकर भी समुद्र के बाहर नहीं जा सकती थी। शेर ने डॉल्फिन को धोखेबाज करार दिया।

डॉल्फिन ने कहा - "मुझे दोष मत दो। प्रकृति को दोष दो। भले ही मैं समुद्र में कितनी भी ताकतवर हूँ, पर मेरी प्रकृति मुझे समुद्र के बाहर जाने से रोकती है।"

"ऐसे मित्र का चुनाव करना चाहिए जो न सिर्फ आपकी मदद करने का इच्छुक हो

बल्कि ऐसा करने में सक्षम भी हो।"

Sameerchand
23-12-2011, 04:57 AM
समीर भाई आप ने मेरा दिल जीत लिया भाई / भगवान आप के रास्ते के हर काँटें हरण करें यही कामना करता हूँ मित्र

धन्यवाद शक्ति जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

groopji
23-12-2011, 06:26 PM
राजा से तो बेहतर वृक्ष है

एक लड़का आम के वृक्ष पर पत्थर मारकर आम तोड़ने का प्रयास कर रहा था। गलती से एक पत्थर अपने लक्ष्य से भटककर वहां से गुजर रहे राजा को लगा। राजा के सैनिकों ने दौड़कर उस लड़के को पकड़ लिया और उसे राजा के समक्ष प्रस्तुत किया ।

राजा ने कहा -"इसके लिए तुम सजा के भागीदार हो। ............ताकि फिर कभी कोई राजा के ऊपर पत्थर फेंकने की हिम्मत न करे, अन्यथा ऐसे तो शासन चलाना मुश्किल हो जाएगा।"

लड़के ने विनयपूर्वक उत्तर दिया - "हे वीर एवं न्यायप्रिय राजन, जब मैंने आम के वृक्ष पर पत्थर मारा तो मुझे उपहार स्वरूप मीठे रसीले फल खाने को मिले और जब आपको पत्थर लगा तो आप मुझे दंड दे रहे हैं....आप से भला तो वृक्ष है।"

राजा का सिर शर्म से झुक गया।


मैंने अभी यहाँ तक ही सूत्र को पढ़ा पर मन आनंदमय हो उठा आपको ++

nitin9935
23-12-2011, 06:43 PM
शेर और डॉल्फिन

समुद्र के तट पर चहलकदमी करते हुए शेर ने एक डॉल्फिन को लहरों के साथ अठखेलियाँ करते हुए देखा। उसने डॉल्फिन से कहा कि वे दोनों अच्छे मित्र बन सकते हैं।

"मैं जंगल का राजा हूँ और सागर पर तुम्हारा निर्विवाद राज है। यदि संभव हो तो हम दोनों एक अच्छा मित्रतापूर्ण गठजोड़ कर सकते हैं।"

डॉल्फिन ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उनकी मित्रता होने के कुछ ही दिनों बाद शेर की भिडंत जंगली भैंसे से हो गयी। उसने डॉल्फिन को मदद के लिए पुकारा। डॉल्फिन भी शेर की मदद करना चाहती थी परंतु वह चाहकर भी समुद्र के बाहर नहीं जा सकती थी। शेर ने डॉल्फिन को धोखेबाज करार दिया।

डॉल्फिन ने कहा - "मुझे दोष मत दो। प्रकृति को दोष दो। भले ही मैं समुद्र में कितनी भी ताकतवर हूँ, पर मेरी प्रकृति मुझे समुद्र के बाहर जाने से रोकती है।"

"ऐसे मित्र का चुनाव करना चाहिए जो न सिर्फ आपकी मदद करने का इच्छुक हो

बल्कि ऐसा करने में सक्षम भी हो।"

बहुत सुन्दर समीर भाई क्या बात कही है

Badtameez
23-12-2011, 08:25 PM
बहुत ही सुन्दर। जीवन में उतारने योग्य बात।

Triple-S HARYANVI
23-12-2011, 08:38 PM
बहुत ही सुन्दर। जीवन में उतारने योग्य बात। :)

ben ten
23-12-2011, 10:49 PM
दीपों की बातें
--
एक बार की बात है, दीपावली की शाम थी, मैं दिये सजा ही रहा था कि एक ओर से दीपों के बात करने की आवाज़ सुनाई दी।
मैंने ध्यान लगा कर सुना। चार दीपक आपस में बात कर रहे थे। कुछ अपनी सुना रहे थे कुछ दूसरों की सुन रहे थे। पहला दीपक बोला, 'मैं हमेशा बड़ा बनना चाहता था, सुंदर, आकर्षक और चिकना घड़ा बनना चाहता था पर क्या करूँ ज़रा-सा दिया बन गया।'
दूसरा दीपक बोला, 'मैं भी अच्छी भव्य मूर्ति बन कर किसी अमीर के घर जाना चाहता था। उनके सुंदर, सुसज्जित आलीशान घर की शोभा बढ़ाना चाहता था। पर क्या करूँ मुझे कुम्हार ने छोटा-सा दिया बना दिया।'
तीसरा दीपक बोला, 'मुझे बचपन से ही पैसों से बहुत प्यार है काश मैं गुल्लक बनता तो हर समय पैसों में रहता।'
चौथा दीपक चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था। अपनी बारी आने पर मुस्करा कर अत्यंत विनम्र स्वर में कहने लगा, 'एक राज़ की बात मैं आपको बताता हूँ, कुछ उद्देश्य रख कर आगे पूर्ण मेहनत से उसे हासिल करने के लिए प्रयास करना सही है लेकिन यदि हम असफल हुए तो भाग्य को कोसने में कहीं भी समझदारी नहीं हैं। यदि हम एक जगह असफल हो भी जाते हैं तो और द्वार खुलेंगे। जीवन में अवसरों की कमी नहीं हैं, एक गया तो आगे अनेक मिलेंगे। अब यही सोचो, दीपों का पर्व - दिवाली आ रहा है, हमें सब लोगखरीद लेंगे, हमें पूजा घर में जगह मिलेगी, कितने घरों की हम शोभा बढ़ाएँगे।'

इंटरनेट से उद्धृत!

दोस्तों! पुराने लोग कहकर गए हैं कि अच्छी सीख जहाँ से भी सीखने को मिले उसे तत्काल और बेझिझक आत्मसात कर लेना चाहिए। इस प्रसंग में हमें चौथे दीपक की बात से जीवन की अनमोल शिक्षा मिलती है। यदि कथा के सार की बात करें तो-
'दोस्तों! जहाँ भी रहो, जैसे भी रहो, हर हाल में खुश रहो, द्वेष मिटाओ, चौथे दीपक की ही तरह जीवन को सकारात्मक चश्मे से देखो। खुद जलकर भी दूसरों में प्रकाश फैलाओ, नाचो गाओ, और खुशी-खुशी जिंदगी जीयो।'

ben ten
23-12-2011, 10:56 PM
समीर भाई जी आपने अत्यंत उत्कृष्ट कथा प्रस्तुत की है। भाई आपने सूत्र की तरफ पुनः ध्यान दिया, आपका धन्यवाद और हाँ मेरी ओर से सम्मान (रेप्यूटेशन), आपको बाद में।

Sameerchand
24-12-2011, 02:41 AM
मैंने अभी यहाँ तक ही सूत्र को पढ़ा पर मन आनंदमय हो उठा आपको ++


बहुत सुन्दर समीर भाई क्या बात कही है


बहुत ही सुन्दर। जीवन में उतारने योग्य बात।


बहुत ही सुन्दर। जीवन में उतारने योग्य बात। :)

धन्यवाद मित्र ग्रुप जी, नितिन जी, सुरेश जी और सीसवाल जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

मित्र ग्रुप जी, आपका रेपो मेरे लिए अत्यंत सम्मान की बात हैं, इसके लिए आपको बहुत ही आभार......

Sameerchand
24-12-2011, 02:44 AM
समीर भाई जी आपने अत्यंत उत्कृष्ट कथा प्रस्तुत की है। भाई आपने सूत्र की तरफ पुनः ध्यान दिया, आपका धन्यवाद और हाँ मेरी ओर से सम्मान (रेप्यूटेशन), आपको बाद में।

मित्र बेन टेन जी, आपने इस सूत्र में अपने द्वारा कहानिया प्रस्तुत कर इस सूत्र में चार चाँद लगा दिए हैं.. आपकी उत्तम कहानियों की प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद......

draculla
24-12-2011, 07:13 AM
शेर और डॉल्फिन

समुद्र के तट पर चहलकदमी करते हुए शेर ने एक डॉल्फिन को लहरों के साथ अठखेलियाँ करते हुए देखा। उसने डॉल्फिन से कहा कि वे दोनों अच्छे मित्र बन सकते हैं।

"मैं जंगल का राजा हूँ और सागर पर तुम्हारा निर्विवाद राज है। यदि संभव हो तो हम दोनों एक अच्छा मित्रतापूर्ण गठजोड़ कर सकते हैं।"

डॉल्फिन ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उनकी मित्रता होने के कुछ ही दिनों बाद शेर की भिडंत जंगली भैंसे से हो गयी। उसने डॉल्फिन को मदद के लिए पुकारा। डॉल्फिन भी शेर की मदद करना चाहती थी परंतु वह चाहकर भी समुद्र के बाहर नहीं जा सकती थी। शेर ने डॉल्फिन को धोखेबाज करार दिया।

डॉल्फिन ने कहा - "मुझे दोष मत दो। प्रकृति को दोष दो। भले ही मैं समुद्र में कितनी भी ताकतवर हूँ, पर मेरी प्रकृति मुझे समुद्र के बाहर जाने से रोकती है।"

"ऐसे मित्र का चुनाव करना चाहिए जो न सिर्फ आपकी मदद करने का इच्छुक हो

बल्कि ऐसा करने में सक्षम भी हो।"

मैंने इस सूत्र के कुछ पेज पढ़े है लेकिन यह बोध कथा मुझे अच्छी लगी.
समीर भी इस कथा संग्रह के लिए धन्यवाद

Sameerchand
24-12-2011, 02:42 PM
मैंने इस सूत्र के कुछ पेज पढ़े है लेकिन यह बोध कथा मुझे अच्छी लगी.
समीर भी इस कथा संग्रह के लिए धन्यवाद

धन्यवाद मित्र द्रैकुल्ला भाई जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

ben ten
25-12-2011, 10:02 AM
निजी बदलाव
-

बात बहुत पुरानी है, यह एक कहानी है, कहीं से सुनी आज आपको सुनाता हूँ।
एक राजा था। वह अपनी बेटी से बेइंतहा प्यार करता था, उसकी हर इच्छा पूरी करता था। लेकिन बेटी को कभी महल के बाहर नहीं जाने देता था। बेटी महल के बाहर की दुनिया से अपरिचित थी।
एक दिन बेटी ने शहर देखने की इच्छा जताई। राजा के मना करने पर बेटी रूठ गई। राजा चिंता में पड़ गए। फूल-सी बेटी, कभी पैदल ज़्यादा चली नहीं। महल की नर्म चटाइयों पर रहने वाले कोमल पैर पथरीली सड़कों पर कैसे चलेंगे? उस समय न तो आज जैसी कोई पक्की सड़क थी, न ही जूतों का जनम हुआ था। क्या किया जाए?
सोच-विचार के बाद राजा ने मंत्रियों को आदेश दिया की पूरी शहर की गलियों पर चमड़ेकी चादर बिछा दी जाए, ताकि राजकुमारी को चलने में तकलीफ़ न हो।
तभी एक दरबारी ने सुझाव दिया कि सारे शहर में चमड़ा बिछाने के बजाय क्यों न राजकुमारी के पैरों में चमड़ा पहना दिया जाए। इससे राजकुमारी के पैर भी सुरक्षित रहेंगे और काम भी आसान हो जाएगा। बात बड़ी सरलऔर तर्कपूर्ण है। 'दुनिया भर को अपने अनुकूल करने से बेहतर व आसान है निजी बदलाव।'

इंटरनेट से आभार सहित!

दोस्तों अक्सर देखने में आता हैं, यदि कहीं किसी मुद्दे मेरी सोच मेरे परिवारजनोँ या मित्रों से भिन्न होती है तो मैं अपनी सोच में आंशिक परिवर्तन की बजाय यह चाहता हूँ कि वे लोग मुझ से सहमत हों। कई बार ऐसी स्थिति मंच पर भी देखने को मिली होगी। इस प्रसंग के अनुसार ऐसी स्थिति में हमें यह चाहिए, कि हम दूसरों को खुद के अनुसार बदलने की जगह उनके अनुसार खुद को बदल लें, लेकिन इसका मतलब कदापि यह नहीं है कि हम अन्याय के साथ भी समझौता कर लें।

Badtameez
25-12-2011, 10:24 AM
निजी बदलाव
-

बात बहुत पुरानी है, यह एक कहानी है, कहीं से सुनी आज आपको सुनाता हूँ।
एक राजा था। वह अपनी बेटी से बेइंतहा प्यार करता था, उसकी हर इच्छा पूरी करता था। लेकिन बेटी को कभी महल के बाहर नहीं जाने देता था। बेटी महल के बाहर की दुनिया से अपरिचित थी।
एक दिन बेटी ने शहर देखने की इच्छा जताई। राजा के मना करने पर बेटी रूठ गई। राजा चिंता में पड़ गए। फूल-सी बेटी, कभी पैदल ज़्यादा चली नहीं। महल की नर्म चटाइयों पर रहने वाले कोमल पैर पथरीली सड़कों पर कैसे चलेंगे? उस समय न तो आज जैसी कोई पक्की सड़क थी, न ही जूतों का जनम हुआ था। क्या किया जाए?
सोच-विचार के बाद राजा ने मंत्रियों को आदेश दिया की पूरी शहर की गलियों पर चमड़ेकी चादर बिछा दी जाए, ताकि राजकुमारी को चलने में तकलीफ़ न हो।
तभी एक दरबारी ने सुझाव दिया कि सारे शहर में चमड़ा बिछाने के बजाय क्यों न राजकुमारी के पैरों में चमड़ा पहना दिया जाए। इससे राजकुमारी के पैर भी सुरक्षित रहेंगे और काम भी आसान हो जाएगा। बात बड़ी सरलऔर तर्कपूर्ण है। 'दुनिया भर को अपने अनुकूल करने से बेहतर व आसान है निजी बदलाव।'

इंटरनेट से आभार सहित!

दोस्तों अक्सर देखने में आता हैं, यदि कहीं किसी मुद्दे मेरी सोच मेरे परिवारजनोँ या मित्रों से भिन्न होती है तो मैं अपनी सोच में आंशिक परिवर्तन की बजाय यह चाहता हूँ कि वे लोग मुझ से सहमत हों। कई बार ऐसी स्थिति मंच पर भी देखने को मिली होगी। इस प्रसंग के अनुसार ऐसी स्थिति में हमें यह चाहिए, कि हम दूसरों को खुद के अनुसार बदलने की जगह उनके अनुसार खुद को बदल लें, लेकिन इसका मतलब कदापि यह नहीं है कि हम अन्याय के साथ भी समझौता कर लें।

अन्त में आपने बहुत सही बात कही है बेन भाई।

Badtameez
25-12-2011, 10:42 AM
चलिए एक कहानी मैं भी सुनाता हूँ।इसमें पता चलेगा कि जरूरत से अधिक अपव्य नहीं करना चाहिए।
'अपव्यय करना ठीक नहीं'
.
एक बार एक मारवाङी सेठ महात्मा गाँधी जी से मिलने आयें। वह मारवाङी वेशभूषा में थे और सिर पर बङी सी पगङी बांधे हुए थे।
गांधी जी से बातचीत के दौरान ही वे पूछ बैठें- '' देश भर में लोग आप ही के नाम पर गाँधी टोपी पहनते हैं, किन्तु आप नहीं पहनते, ऐसा क्यों? ''
गांधी जी बोले- '' आप ठीक कहते हैं, तनिक अपनी पगङी उतार कर तो देखिए,इतने लम्बे कपङे में से कम से कम 20 टोपियां बन सकती हैं। अब बीस टोपियों का कपङा यदि अकेले आप ही पहन लेंगे तो 19 लोगों को तो बिना टोपी के ही रहना होगा न। उन 19 लोगों में मैं भी एक हूँ।''
अपव्यय अन्य व्यक्तियों को उनके हिस्से से वंचित कर देती है मित्रों।

ben ten
25-12-2011, 12:25 PM
चलिए एक कहानी मैं भी सुनाता हूँ।इसमें पता चलेगा कि जरूरत से अधिक अपव्य नहीं करना चाहिए।
'अपव्यय करना ठीक नहीं'
.
एक बार एक मारवाङी सेठ महात्मा गाँधी जी से मिलने आयें। वह मारवाङी वेशभूषा में थे और सिर पर बङी सी पगङी बांधे हुए थे।
गांधी जी से बातचीत के दौरान ही वे पूछ बैठें- '' देश भर में लोग आप ही के नाम पर गाँधी टोपी पहनते हैं, किन्तु आप नहीं पहनते, ऐसा क्यों? ''
गांधी जी बोले- '' आप ठीक कहते हैं, तनिक अपनी पगङी उतार कर तो देखिए,इतने लम्बे कपङे में से कम से कम 20 टोपियां बन सकती हैं। अब बीस टोपियों का कपङा यदि अकेले आप ही पहन लेंगे तो 19 लोगों को तो बिना टोपी के ही रहना होगा न। उन 19 लोगों में मैं भी एक हूँ।''
अपव्यय अन्य व्यक्तियों को उनके हिस्से से वंचित कर देती है मित्रों।

सुरेश भाई जी निश्चित ही आपने कम शब्दों का उपयोग करते हुए बड़ी बात सामने रखी है।

Badtameez
25-12-2011, 12:33 PM
सुरेश भाई जी निश्चित ही आपने कम शब्दों का उपयोग करते हुए बड़ी बात सामने रखी है।

बहुत-बहुत धन्यवाद बेन जी। आपका भी कार्य सराहनीय है।

Sameerchand
25-12-2011, 01:44 PM
निजी बदलाव
-

बात बहुत पुरानी है, यह एक कहानी है, कहीं से सुनी आज आपको सुनाता हूँ।
एक राजा था। वह अपनी बेटी से बेइंतहा प्यार करता था, उसकी हर इच्छा पूरी करता था। लेकिन बेटी को कभी महल के बाहर नहीं जाने देता था। बेटी महल के बाहर की दुनिया से अपरिचित थी।
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इससे राजकुमारी के पैर भी सुरक्षित रहेंगे और काम भी आसान हो जाएगा। बात बड़ी सरलऔर तर्कपूर्ण है। 'दुनिया भर को अपने अनुकूल करने से बेहतर व आसान है निजी बदलाव।'

इंटरनेट से आभार सहित!

दोस्तों अक्सर देखने में आता हैं, यदि कहीं किसी मुद्दे मेरी सोच मेरे परिवारजनोँ या मित्रों से भिन्न होती है तो मैं अपनी सोच में आंशिक परिवर्तन की बजाय यह चाहता हूँ कि वे लोग मुझ से सहमत हों। कई बार ऐसी स्थिति मंच पर भी देखने को मिली होगी। इस प्रसंग के अनुसार ऐसी स्थिति में हमें यह चाहिए, कि हम दूसरों को खुद के अनुसार बदलने की जगह उनके अनुसार खुद को बदल लें, लेकिन इसका मतलब कदापि यह नहीं है कि हम अन्याय के साथ भी समझौता कर लें।


चलिए एक कहानी मैं भी सुनाता हूँ।इसमें पता चलेगा कि जरूरत से अधिक अपव्य नहीं करना चाहिए।
'अपव्यय करना ठीक नहीं'
.
एक बार एक मारवाङी सेठ महात्मा गाँधी जी से मिलने आयें। वह मारवाङी वेशभूषा में थे और सिर पर बङी सी पगङी बांधे हुए थे।
गांधी जी से बातचीत के दौरान ही वे पूछ बैठें- '' देश भर में लोग आप ही के नाम पर गाँधी टोपी पहनते हैं, किन्तु आप नहीं पहनते, ऐसा क्यों? ''
गांधी जी बोले- '' आप ठीक कहते हैं, तनिक अपनी पगङी उतार कर तो देखिए,इतने लम्बे कपङे में से कम से कम 20 टोपियां बन सकती हैं। अब बीस टोपियों का कपङा यदि अकेले आप ही पहन लेंगे तो 19 लोगों को तो बिना टोपी के ही रहना होगा न। उन 19 लोगों में मैं भी एक हूँ।''
अपव्यय अन्य व्यक्तियों को उनके हिस्से से वंचित कर देती है मित्रों।

धन्यवाद बेन टेन जी और सुरेश जी आपका, इतनी अच्छी कहानी के लिए............

Sameerchand
25-12-2011, 01:49 PM
मैं कैसे बताऊँ...

नसरूद्दीन एक बार एक किचन गार्डन में दीवार फांद कर घुस गया और अपने साथ लाए बोरे में आराम से जी भर कर जो भी मिला सब फल सब्जी तोड़ कर भरने लगा.

इतने में माली ने उसे देखा और दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया –

“ये तुम क्या कर रहे हो?”

“मैं चक्रवात में फंसकर उड़ गया था और यहाँ टपक पड़ा”

“और ये सब्जियाँ किसने तोड़ीं?”

“तूफ़ान में उड़ने से बचने के लिए मैंने इन सब्जियों को पकड़ लिया था तो ये टूट गईं.”

“अच्छा, तो वो बोरे में भरी सब्जियाँ क्या हैं?”

“मैं भी तो यही सोच रहा था जब तुमने मेरा ध्यान अभी खींचा.”

Badtameez
25-12-2011, 01:51 PM
धन्यवाद बेन टेन जी और सुरेश जी आपका, इतनी अच्छी कहानी के लिए............

आपको भी धन्यवाद समीर जी।

Badtameez
25-12-2011, 01:53 PM
मैं कैसे बताऊँ...

नसरूद्दीन एक बार एक किचन गार्डन में दीवार फांद कर घुस गया और अपने साथ लाए बोरे में आराम से जी भर कर जो भी मिला सब फल सब्जी तोड़ कर भरने लगा.

इतने में माली ने उसे देखा और दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया –

“ये तुम क्या कर रहे हो?”

“मैं चक्रवात में फंसकर उड़ गया था और यहाँ टपक पड़ा”

“और ये सब्जियाँ किसने तोड़ीं?”

“तूफ़ान में उड़ने से बचने के लिए मैंने इन सब्जियों को पकड़ लिया था तो ये टूट गईं.”

“अच्छा, तो वो बोरे में भरी सब्जियाँ क्या हैं?”

“मैं भी तो यही सोच रहा था जब तुमने मेरा ध्यान अभी खींचा.”

हा हा हा .................

Sameerchand
25-12-2011, 01:59 PM
मित्र बनाओ और तबाह करो

सिविल वॉर के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति लिंकन दक्षिणी इलाके में रहने वाले व्यक्तियों को शत्रु कहने के बजाए गुमराह व्यक्ति कहकर संबोधित किया करते थे।

एक बुजुर्ग एवं उग्र देशभक्ति महिला ने लिंकन को यह कहते हुए फटकार लगायी कि वे अपने शत्रु को तबाह करने के बजाए उनके प्रति नरम रवैया अपना रहे हैं।

लिंकन ने उस महिला को उत्तर दिया - "ऐसा आप कैसे कह सकती हैं मैंडम! क्या मैं अपने शत्रुओं को उस समय तबाह नहीं करता, जब मैं उन्हें अपना मित्र बना लेता हूँ।"

Sameerchand
25-12-2011, 02:04 PM
मुझ पर भरोसा है या गधे पर?

एक बार एक किसान मुल्ला के पास आया और उसका गधा दोपहर के लिए उधार मांगा ताकि वो अपने खेत पर कुछ सामान ढो सके.

मुल्ला ने जवाब दिया - “मेरे मित्र, मैं हमेशा तुम्हें खेतों में काम करते देखता हूँ, और खुश होता हूं. तुम फसलें पैदा करते हो और हम सब उसका उपयोग करते हैं, यह वास्तविक समाज सेवा है. मेरा दिल भी तुम्हारी सहायता करने को सदैव तत्पर रहता है. मैं हमेशा ख्वाब देखा करता था कि मेरा गधा तुम्हारे खेतों में उगाए गए फसलों को प्रेम पूर्वक ढो रहा है. आज तुम मुझसे गधा उधार मांग रहे हो यह मेरे लिए बेहद खुशी की बात है. मगर क्या करूं, मेरा गधा आज मेरे पास नहीं है. मैंने आज अपना गधा किसी और को उधार दे रखा है.”

“ओ मुल्ला, कोई बात नहीं. मैं कोई अन्य व्यवस्था कर लूंगा. और मुझे तुम्हारे इन दयालु शब्दों और मेरे प्रति आपकी भावना से मुझे बेहद प्रसन्नता हुई. आपको बहुत बहुत धन्यवाद” किसान ने कहा और वापस जाने लगा.

इस बीच घर के पिछवाड़े से मुल्ला के गधे के रेंकने की आवाज आई. किसान रुक गया. उसने मुल्ला की ओर प्रश्नवाचक नजरों से देखा और कहा – “मुल्ला तुम तो कहते थे कि तुमने गधा किसी और को दे दिया है, पर वो तो पीछे बंधा हुआ है.”

“अजीब आदमी हो तुम भी! तुम्हें मेरी बात पर यकीन होना चाहिए कि गधे के रेंकने पर?” मुल्ला ने किसान से पूछा!

Sameerchand
25-12-2011, 02:08 PM
काना सांभर

एक काना सांभर समुद्र के किनारे घास चर रहा था। अपने आपको किसी संभावित हमले से बचाने के लिए वह अपनी नज़र हमेशा ज़मीन की ओर रखता था जबकि अपनी कानी आँख समुद्र की ओर रखता था क्योंकि उसे समुद्र की ओर से किसी हमले की आशंका नहीं थी।

एक दिन कुछ नाविक उस ओर आए। जब उन्होंने सांभर को चरते हुए देखा तो आराम से उस पर निशाना साधकर अपना शिकार बना लिया।

अंतिम आंहें भरते हुए सांभर बोला - "मैं भी कितना अभागा हूँ। मैंने अपना सारा ध्यान ज़मीन की ओर लगा रखा था जबकि समुद्र की ओर से मैं आश्वस्त था। पर अंत में शत्रु ने उसी ओर से हमला किया।"

"खतरा प्रायः उसी ओर से दस्तक देता है

जिस ओर से आपने अपेक्षा न की हो।"

Badtameez
25-12-2011, 02:11 PM
काना सांभर

एक काना सांभर समुद्र के किनारे घास चर रहा था। अपने आपको किसी संभावित हमले से बचाने के लिए वह अपनी नज़र हमेशा ज़मीन की ओर रखता था जबकि अपनी कानी आँख समुद्र की ओर रखता था क्योंकि उसे समुद्र की ओर से किसी हमले की आशंका नहीं थी।

एक दिन कुछ नाविक उस ओर आए। जब उन्होंने सांभर को चरते हुए देखा तो आराम से उस पर निशाना साधकर अपना शिकार बना लिया।

अंतिम आंहें भरते हुए सांभर बोला - "मैं भी कितना अभागा हूँ। मैंने अपना सारा ध्यान ज़मीन की ओर लगा रखा था जबकि समुद्र की ओर से मैं आश्वस्त था। पर अंत में शत्रु ने उसी ओर से हमला किया।"

"खतरा प्रायः उसी ओर से दस्तक देता है

जिस ओर से आपने अपेक्षा न की हो।"

सही बात बिल्कुल सही।

Sameerchand
25-12-2011, 02:18 PM
सही बात बिल्कुल सही।

सौरभ जी, आपने बिलकुल सही बात बोली....जिधर से हम आश्वस्त रहते हैं, खतरा हमेशा वही से दस्तक देता हैं.....

Badtameez
25-12-2011, 02:27 PM
सौरभ जी, आपने बिलकुल सही बात बोली....जिधर से हम आश्वस्त रहते हैं, खतरा हमेशा वही से दस्तक देता हैं.....

जी हां, और खतरा कहीं से भी आ सकता है ये भी बात है समीर जी,किन्तु हर समय खतरे की आशंका मन में नहीं रखना चाहिए।अन्यथा व्यक्ति मनोरोगी हो जाता है।

nitin9935
25-12-2011, 08:43 PM
एक बुजुर्ग व्यक्ति काफी दूर से लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर लादे चला आ रहा था। वह बुरी तरह थक चुका था। जब उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने अपने बोझ को जमीन पर फेंक दिया और मृत्यु को इस दर्द से निजात दिलाने के लिए पुकारा।

अगले ही पल मृत्यु उसके समक्ष आ खड़ी हुयी और पूछने लगी कि वह क्या चाहता है?

बुजुर्ग व्यक्ति बोला - "मुझ पर सिर्फ इतनी कृपा करें कि यह लकड़ी का गट्ठर फिर से मेरे सिर पर रखने में सहायता कर दें।"

"जीवन अत्यंत प्रिय होता है। हताशा में मृत्यु को पुकारना तो आसान है

परंतु वास्तव में मृत्यु का वरण करना बहुत कठिन।"

nitin9935
25-12-2011, 08:46 PM
एक बार जंगल के सभी जानवरों में यह बहस छिड़ गयी कि कौन सा जानवर सबसे ज्यादा बच्चे पैदा कर सकता है। जब विवाद शांत नहीं हुआ तो वे इसके निपटारे के लिए शेरनी के पास गए।

उन्होंने शेरनी से पूछा - "और तुम्हारे कितने बच्चे हैं?"

शेरनी ने तत्परतापूर्वक उत्तर दिया - "सिर्फ एक। लेकिन वह जंगल का राजा है।"

"परिमाण से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है गुणवत्ता"(quality is more important than quantity)

nitin9935
25-12-2011, 08:52 PM
दो दोस्त कहीं जा रहे थे. रास्ते में उनमें किसी बात पर झगड़ा हो गया. गर्मागर्मी में एक ने दूसरे को चांटा जड़ दिया. जिसने चांटा खाया, उसने दुःखी होकर रेत पर लिखा – “आज मेरे प्रिय मित्र ने मुझे दुःखी किया.”

वापसी में भी वे साथ थे. बीच रास्ते में नदी पड़ती थी. दोनों ने स्वच्छ बहती नदी में स्नान करने का मन बनाया. अचानक वह मित्र जिसने चांटा खाया था, भँवर में फंस कर डूबने लगा. उसके उसी मित्र ने जिसने चांटा मारा था, उसे बचाया.

जिसने चांटा खाया था, उसने खुश होकर एक चट्टान पर लिखा – “आज मेरे प्रिय मित्र ने मेरा जीवन बचाया.”

जब कोई आपको दुःखी करे, तो उसे रेत पर लिखें ताकि क्षमा करने वाली हवाएँ उसे मिटा दें. परंतु जब कोई आपके लिए अच्छा काम करे, तो उसे पत्थर पर लिखें ताकि वो आपकी स्मृतियों में सदैव बना रहे.

nitin9935
25-12-2011, 08:54 PM
एक नौजवान एक आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने गया। लेकिन उसे आश्रम के अनुशासन बहुत कठिन लगे। आश्रम में नियमों का पालन अनिवार्य था। जल्द ही वह निराशा में डूब गया और उसने नदी में डूबकर आत्महत्या करने का इरादा कर लिया।

जब वह नदी में डूबने जा रहा था, तब उसने मार्ग में पत्थरों पर पड़े गोल निशानों को देखा। दरअसल नदी से पानी भरकर लौटते समय महिलायें जिस जगह पानी भरे घड़े रखा करती थीं, वहां के पत्थरों पर गोल निशान बन गए थे।

उस नौजवान को नियमित अभ्यास और दृढ़ इच्छा शक्ति का महत्त्व समझ में आ गया। नियमित आदतें ही हमारा चरित्र बन जाती हैं।

"दृढ़ इच्छा शक्ति और नियमित अभ्यास ही जीवन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।'

nitin9935
25-12-2011, 09:01 PM
उत्कृष्टता को साझा करना


एक किसान को हमेशा राज्य स्तरीय मेले में सर्वश्रेष्ठ मक्का उत्पादन के लिए पुरस्कार मिलता था। उसकी यह आदत थी कि वह अपने आसपास के किसानों को मक्के के सबसे अच्छे बीज बांट देता था।

जब उससे इसका कारण पूछा गया तो उसने कहा - "यह मेरे ही हित की बात है। हवा अपने साथ पराग कणों को उड़ा कर लाती है। यदि मेरे आसपास के किसान घटिया दर्जे के बीज का प्रयोग करेंगे तो इससे मेरी फसल को भी नुक्सान पहुँचेगा। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि वे बेहतरीन गुणवत्ता के बीजों का प्रयोग करें।"

जो कुछ भी आप दूसरों को देते हैं, अंततः वही आपको वापस मिलता है।

अतः यह आपके ही स्वार्थ की बात है कि आप स्वार्थरहित बनें।

ben ten
25-12-2011, 09:39 PM
नितिन भाई आपने लघु कथाओं के माध्यम से जीवन की कई वास्तविकताओं से रूबरू करवाया है आपको सम्मान (रेप्यूटेशन)

nitin9935
25-12-2011, 09:46 PM
नितिन भाई आपने लघु कथाओं के माध्यम से जीवन की कई वास्तविकताओं से रूबरू करवाया है आपको सम्मान (रेप्यूटेशन)

मित्र आप मेरी प्रस्तुत कथाओं के मर्म को समझे यही मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है

ben ten
25-12-2011, 10:19 PM
पगडंडी
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चौड़े रास्ते ने पास चलती पगडंडी से कहा -
"अरी पगडंडी, मेरे रहते मुझे तुम्हारा अस्तित्व अनावश्यक-सा जान पड़ता है। व्यर्थ ही तुम मेरे आगे-पीछे, जाल-सा बिछाए चलती हो!"
पगडंडी ने भोलेपन से कहा,"नहीं जानती, तुम्हारे रहते लोग मुझ पर क्यों चलते हैं। एक के बाद एक दूसरा चला। और फिर, तीसरा, इस तरह मेरा जन्म ही अनायास और अकारण हुआ है!"
रास्ते ने दर्प के साथ कहा,"मुझे तो लोगों ने बड़े यत्न से बनाया है, मैं अनेक शहरों-गावों को जोड़ता चला जाता हूँ!"
पगडंडी आश्चर्य से सुन रही थी। "सच?" उसने कहा, "मैं तो बहुत छोटी हूँ!"
तभी एक विशाल वाहन, घरघराकर रास्ते पर रुक गया। सामने पड़ी छोटी पुलिया के एक तरफ़ बोर्ड लगा था, "बड़े वाहन सावधान! पुलिया कमज़ोर है।"
वाहन, एक भरी हुई यात्री-गाड़ी थी, जो पुलिया पर से नहीं जा सकती थी। पूरी गाड़ी खाली करवाई गई। लोग पगडंडी पर चल पड़े। पगडंडी, पुलिया वाले सूखे नाले से जाकर, फिर उसी रास्ते से मिलती थी। उस पार, फिर यात्रियों को बैठाकर गाड़ी चल दी।
रास्ते ने एक गहरा नि:श्वास छोड़ा! "री, पगडंडी! आज मैं समझा छोटी से छोटी वस्तु, वक्त आने पर मूल्यवान बन जाती है।"

इंटरनेट से आभार सहित!

निश्चित रूप से दोस्तों जो काम एक छोटी सी सुई करती है, वो एक बड़ी, धारवाली, चमचमाती तलवार से नहीं किया जा सकता। कहने का तात्पर्य है संसार की हर एक वस्तु और जीव का इस संसार को गतिमान बनाए रखने में योगदान है, हम यह फैसला नहीं कर सकते की कौन ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

Badtameez
25-12-2011, 11:03 PM
एक बुजुर्ग व्यक्ति काफी दूर से लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर लादे चला आ रहा था। वह बुरी तरह थक चुका था। जब उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने अपने बोझ को जमीन पर फेंक दिया और मृत्यु को इस दर्द से निजात दिलाने के लिए पुकारा।

अगले ही पल मृत्यु उसके समक्ष आ खड़ी हुयी और पूछने लगी कि वह क्या चाहता है?

बुजुर्ग व्यक्ति बोला - "मुझ पर सिर्फ इतनी कृपा करें कि यह लकड़ी का गट्ठर फिर से मेरे सिर पर रखने में सहायता कर दें।"

"जीवन अत्यंत प्रिय होता है। हताशा में मृत्यु को पुकारना तो आसान है

परंतु वास्तव में मृत्यु का वरण करना बहुत कठिन।"

हां नितिन भाई सही बात हैं ।मरने को सब कहता है लेकिन मरता नहीं , डरता है।

Sameerchand
26-12-2011, 03:39 PM
नितिन भाई और मित्र बेन टेन जी, आपकी द्वारा प्रश्तुत कहानिया सचमुच में काफी प्रेरणादायक हैं. हर किसी के जीवन में उतरने लायक हैं.

धन्यवाद, ऐसी कहानिया हम सब के सामने प्रश्तुत करने के लिए................

Sameerchand
26-12-2011, 03:45 PM
समर्पण और खुशहाली

एक बार एक राजा ज्ञान प्राप्ति के लिए एक प्रसिद्ध मठ पर गया. मठ में गुरु के अलावा बाकी सभी राजा को देख कर अति उत्साहित थे.

राजा ने मठाधीश से अपने आने का मंतव्य बताया और कहा – गुरूदेव, मैं आपके ज्ञान व प्रसिद्ध मठ से बेहद प्रभावित हूँ, और मैं अपने राज्य में अपने शासन से खुशहाली लाना चाहता हूँ. कृपया कुछ दिशा दर्शन करें.

गुरुदेव ने कहा –अच्छी बात है, मगर खुशहाली शासन व नियंत्रण से नहीं आती है, बल्कि सभी के अपने कार्यों के प्रति समर्पण से प्राप्त होती है.

"अपने कार्य के प्रति समर्पण का भाव पैदा करें, खुशहाली, प्रगति स्वयमेव प्राप्त होगी"

Sameerchand
26-12-2011, 03:48 PM
विजिटिंग कार्ड

चीनी के मैजी साम्राज्य काल में कैचू नामक चीनी ज़ैन विद्या के एक गुरू हुआ करते थे। वे क्योटो के एक किले में रहते थे। एक दिन क्योटो प्रांत के गर्वनर पहली बार उनसे मिलने आये।

उन्होंने गुरूजी के शिष्य को अपना विज़िटंग कार्ड दिया जो शिष्य ने गुरूजी के समक्ष प्रस्तुत किया, जिस पर लिखा था “किटागाकी, गवर्नर ऑफ क्योटो”

कार्ड को पढ़कर गुरूजी बोले - “मझे ऐसे किसी आदमी से नहीं मिलना। उससे कहो कि यहां से चला जाये।”

इसके बाद शिष्य ने अफसोस जताते हुये वह विजिटिंग कार्ड गवर्नर को वापस कर दिया।

गर्वनर ने बात समझते हुए कहा - “दरअसल मुझसे ही गलती हो गयी है।”यह कहकर उन्होंने “गवर्नर ऑफ क्योटो” शब्द काट दिये और पुनः वह कार्ड देते हुए कहा - “एक बार गुरूजी से फिर पूछ लो।”

जब गुरूजी ने पुनः वह कार्ड देखा तो तत्परता से बोले - “अच्छा! किटागाकी आया है। उसे तुरंत बुलाओ, मैं उससे मिलना चाहता हूँ।

Raman46
26-12-2011, 03:50 PM
कहानी बेसक छोटी है पर है बड़ी काम की चीज / ज्ञान से लबालब /

Sameerchand
26-12-2011, 03:53 PM
सबसे महत्त्वपूर्ण काम, व्यक्ति एवं समय

एक शिष्य ने अपने गुरूजी से पूछा - "सबसे महत्तपूर्ण काम क्या है? सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कौन है तथा हमारे जीवन का सबसे बेहतरीन समय कौनसा है?

गुरूजी ने उत्तर दिया - "इस समय तुम्हारे पास जो काम है, वही सबसे महत्त्वपूर्ण है। वह व्यक्ति जिसके साथ तुम काम कर रहे हो (या जिसके लिये तुम काम कर रहे हो, जैसे - अध्यापक के लिये छात्र, चिकित्सक के लिये मरीज......) सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है तथा यह समय (वर्तमान) ही सबसे महत्वपूर्ण समय है। इसे व्यर्थ न जाने दो।"

ben ten
26-12-2011, 05:20 PM
सबसे महत्त्वपूर्ण काम, व्यक्ति एवं समय एक शिष्य ने अपने गुरूजी से पूछा - "सबसे महत्तपूर्ण काम क्या है? सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कौन है तथा हमारे जीवन का सबसे बेहतरीन समय कौनसा है? गुरूजी ने उत्तर दिया - "इस समय तुम्हारे पास जो काम है, वही सबसे महत्त्वपूर्ण है। वह व्यक्ति जिसके साथ तुम काम कर रहे हो (या जिसके लिये तुम काम कर रहे हो, जैसे - अध्यापक के लिये छात्र, चिकित्सक के लिये मरीज......) सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है तथा यह समय (वर्तमान) ही सबसे महत्वपूर्ण समय है। इसे व्यर्थ न जाने दो।" समीर भाई क्या बात कही है, आज के समय में हम लोग सबसे अधिक समय को व्यर्थ करते हैं। इस कथा से और भी अमूल्य जानकारी मिलती है।

Sameerchand
26-12-2011, 07:10 PM
कहानी बेसक छोटी है पर है बड़ी काम की चीज / ज्ञान से लबालब /

धन्यवाद मित्र रमण जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
26-12-2011, 07:11 PM
समीर भाई क्या बात कही है, आज के समय में हम लोग सबसे अधिक समय को व्यर्थ करते हैं। इस कथा से और भी अमूल्य जानकारी मिलती है।

धन्यवाद मित्र बेन टेन जी, आपने बिलकुल सही कहा मित्र...........

Chandrshekhar
26-12-2011, 07:15 PM
कहानियो डालते रहो मित्रो इस तरह की कहानिया इस अंतर्जाल के महाजाल मैं भी कुछ सोचने पे मजबूर कर देती है, प्रस्तुत करने के लिए मित्रो का हार्दिक आभार, धन्यवाद

nitin9935
26-12-2011, 07:29 PM
हां नितिन भाई सही बात हैं ।मरने को सब कहता है लेकिन मरता नहीं , डरता है।
सौरभ भाई आप कथा का मर्म समझे जान कर अत्यंत हर्ष हुआ

नितिन भाई और मित्र बेन टेन जी, आपकी द्वारा प्रश्तुत कहानिया सचमुच में काफी प्रेरणादायक हैं. हर किसी के जीवन में उतरने लायक हैं.

धन्यवाद, ऐसी कहानिया हम सब के सामने प्रश्तुत करने के लिए................
आपका स्वागत है समीर भाई

कहानी बेसक छोटी है पर है बड़ी काम की चीज / ज्ञान से लबालब /
रमण जी उत्साह वर्धन के लिए आपका स्वागत है

कहानियो डालते रहो मित्रो इस तरह की कहानिया इस अंतर्जाल के महाजाल मैं भी कुछ सोचने पे मजबूर कर देती है, प्रस्तुत करने के लिए मित्रो का हार्दिक आभार, धन्यवाद
आपका स्वागत चंद्रशेखर जी

ben ten
26-12-2011, 11:07 PM
नियम सबके लिए है
-
बात सन 1885 की है। पूना के न्यू इंग्लिश हाईस्कूल में समारोह हो रहा था। प्रमुख द्वार पर एक स्वयंसेवक नियुक्त था, जिसे यह कर्तव्य-भार दिया गया था कि आनेवाले अतिथियों के निमंत्रण पत्र देखकर उन्हें सभा-स्थल पर यथास्थान बिठा दे। इस समारोह के मुख्य अतिथि थे मुख्य न्यायाधीश महादेव गोविंद रानडे। जैसे ही वह विद्यालय के द्वार पर पहुँचे, वैसे ही स्वयं सेवक ने उन्हें अंदर जाने से शालीनतापूर्वक रोक दिया और निमंत्रण-पत्र की माँग की।
"बेटे! मेरे पास तो निमंत्रण-पत्र नहीं हैं," रानडे ने कहा।
"क्षमा करें, तब आप अंदर प्रवेश न कर सकेंगे," स्वयंसेवक का नम्रतापूर्ण उत्तर था।
द्वार पर रानडे को देखकर स्वागत समिति के कई सदस्य आ गए और उन्हें अंदर मंच की ओर ले जाने का प्रयास करने लगे।पर स्वयंसेवक ने आगे बढ़कर कहा, "श्रीमान! मेरे कार्य में यदि स्वागत-समिति के सदस्य ही रोड़ा अटकाएँगे तो फिर मैं अपना कर्तव्य कैसे निभा सकूँगा? कोई भी अतिथि हो उसके पास निमंत्रण-पत्र होना ही चाहिए। भेद-भाव की नीति मुझसे नहीं बरती जाएगी।"
यह स्वयंसेवक आगे चलकर गोपाल कृष्ण गोखले के नाम से प्रसिद्ध हुआ और देश की बड़ी सेवा की।

इंटरनेट से आभार सहित!

मित्रों यह एक बहुत ही आम बात है, लेकिन है बड़ी महत्त्व की। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे अवसर आते हैं जब हम ऊँची सिफारिश के दम पर आम जन की सुविधा के लिए स्थापित नियमों का बड़ी शान से उल्लंघन करते हैं, मसलन कल को यदि ट्रैफ़िक हवलदार नियम तोड़ने के लिए मेरा चालान काटता है, तो मैं तुरंत बेशर्मी से जान पहचान के किसी अधिकारी को फोन लगाता हूँ। जबकि दोस्तों ऐसा नहीं होना चाहिए, घटना के तीनों पात्रों को इस प्रसंग से सबक लेना चाहिए, सबसे पहले तो मुझे यातायात नियम तोड़ने ही नहीं चाहिए, यदि गलती से ऐसा हो जाए तो सजा भी स्वीकारनी चाहिए। 2 अधिकारी को अपने ऊँचे पद का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, यदि मैं उसका घनिष्ठ भी क्यों न होऊं। 3 सिपाही को कथा के स्वयंसेवक की तरह नियमों के प्रति समर्पित होना चाहिए।
दोस्तों देश/ दुनिया की तस्वीर बदलने के लिए सर्वप्रथम हमें खुद को बदलना होगा।

Sameerchand
27-12-2011, 05:34 PM
नियम सबके लिए है
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बात सन 1885 की है। पूना के न्यू इंग्लिश हाईस्कूल में समारोह हो रहा था। प्रमुख द्वार पर एक स्वयंसेवक नियुक्त था, जिसे यह कर्तव्य-भार दिया गया था कि आनेवाले अतिथियों के निमंत्रण पत्र देखकर उन्हें सभा-स्थल पर यथास्थान बिठा दे। इस समारोह के मुख्य अतिथि थे मुख्य न्यायाधीश महादेव गोविंद रानडे। जैसे ही वह विद्यालय के द्वार पर पहुँचे, वैसे ही स्वयं सेवक ने उन्हें अंदर जाने से शालीनतापूर्वक रोक दिया और निमंत्रण-पत्र की माँग की।
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यह स्वयंसेवक आगे चलकर गोपाल कृष्ण गोखले के नाम से प्रसिद्ध हुआ और देश की बड़ी सेवा की।

इंटरनेट से आभार सहित!

मित्रों यह एक बहुत ही आम बात है, लेकिन है बड़ी महत्त्व की। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे अवसर आते हैं जब हम ऊँची सिफारिश के दम पर आम जन की सुविधा के लिए स्थापित नियमों का बड़ी शान से उल्लंघन करते हैं, मसलन कल को यदि ट्रैफ़िक हवलदार नियम तोड़ने के लिए मेरा चालान काटता है, तो मैं तुरंत बेशर्मी से जान पहचान के किसी अधिकारी को फोन लगाता हूँ। जबकि दोस्तों ऐसा नहीं होना चाहिए, घटना के तीनों पात्रों को इस प्रसंग से सबक लेना चाहिए, सबसे पहले तो मुझे यातायात नियम तोड़ने ही नहीं चाहिए, यदि गलती से ऐसा हो जाए तो सजा भी स्वीकारनी चाहिए। 2 अधिकारी को अपने ऊँचे पद का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, यदि मैं उसका घनिष्ठ भी क्यों न होऊं। 3 सिपाही को कथा के स्वयंसेवक की तरह नियमों के प्रति समर्पित होना चाहिए।
दोस्तों देश/ दुनिया की तस्वीर बदलने के लिए सर्वप्रथम हमें खुद को बदलना होगा।

काफी अच्छी और सीख देने वाली कहानी हैं मित्र बेन टेन जी...

आगे आपकी और भी कहानियों का इन्तजार रहेगा.......धन्यवाद....

Sameerchand
27-12-2011, 05:39 PM
मिट्टी का या सोने का?

कालिदास से एक बार राजा ने पूछा – कालिदास, ईश्वर ने आपको बुद्धि तो भरपूर दी है, मगर रूप-रंग देने में भी यदि ऐसी ही उदारता वे बरतते तो बात ही कुछ और होती.

कालिदास ने राजा के व्यंग्यात्मक लहजे को पहचान लिया. कालिदास ने कुछ नहीं कहा, परंतु सेवक को पानी से भरे एक जैसे दो पात्र लाने को कहा – एक सोने का एक मिट्टी का.

दोनों पात्र लाए गए. गर्मियों के दिन थे. कालिदास ने राजा से पूछा – राजन्! क्या आप बता सकते हैं कि इनमें से किस पात्र का पानी पीने के लिए उत्तम है?

राजा ने छूटते ही उत्तर दिया – यह तो सीधी सी बात है, मिट्टी का. और फिर तुरंत उन्हें अहसास हुआ कि कालिदास क्या कहना चाहते हैं!

"बाह्य रूपरंग सरसरी तौर पर लुभावना लग सकता है, मगर असली सुंदरता तो आंतरिक होती है. मिट्टी का घड़ा आपकी (वास्तविक) प्यास बुझा सकता है, सोने का घड़ा नहीं!"

Sameerchand
27-12-2011, 05:42 PM
शहर के दरवाजे और जुबान पर ताले

एक समय एक राजा राज्य करता था जिसकी बुद्धिमत्ता, चातुर्य और राज्य कौशल चतुर्दिक प्रसिद्धि के शिखर पर था. राज्य धन्य-धान्य से परिपूर्ण था और चहुँओर खुशहाली का साम्राज्य था.

राजा का वजीर एक बार राज्य भ्रमण पर निकला. यात्रा से वापस आकर उन्होंने राजा से कहा – राजन्! आपकी प्रसिद्धि चतुर्दिक है, दुनिया के तमाम अन्य राजा महाराजा आपकी बुद्धिमत्ता और राज्य कौशलता का लोहा मानते हैं, और चहुँओर लोग आपकी तारीफ करते हैं. राज्य भी धन्यधान्य से परिपूर्ण और खुशहाल है. मगर फिर भी कुछ लोग मुझे ऐसे मिले जो आपकी बुराई करते हैं, आपके बारे में फूहड़ चुटकुले सुनाते हैं और आपके बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णयों की खिल्ली उड़ाते हैं. ऐसा कैसे है राजन्?

राजा ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया – राज्य की तमाम जनता को मालूम है कि राजा उनके लिए क्या करता है. रहा सवाल जबान का, तो मैं राज्य के बाहरी रास्तों पर बने हुए दरवाजों को तो बंद कर उन पर ताले लगवा सकता हूँ, मगर मनुष्य की जुबान पर नहीं. और उनकी ये जुबानें मुझे सदैव उत्तम कार्य करते रहने को प्रेरित करती रहती हैं कि शायद कभी उनकी जुबान बदल जाएँ.

Sameerchand
27-12-2011, 05:46 PM
लीला
एक गुरू जी अपने शिष्यों को हिंदू मान्यताओं को समझाते हुये बोले - "सारा जगत प्रभु की लीला है, यानि यह संसार एक खेल है और यह ब्रहांड खेलकूद का मैदान है। आध्यात्म का लक्ष्य जीवन को एक खेल बनाना है। "

एक शुद्धतावादी पर्यटक को उनकी बातें निरर्थक लगीं। वह बोला - " तो क्या कर्म का कोई महत्त्व नहीं है ?"

गुरू जी उत्तर दिया - "जरूर है। लेकिन कोई कार्य तब आध्यात्मिक हो जाता है जब इसे खेल की तरह किया जाये। "

Sameerchand
27-12-2011, 05:50 PM
नमक की सही कीमत

एक बार एक सुल्तान अपने लाव-लश्कर के साथ यात्रा पर था. यात्रा लंबी, कई दिनों की थी, और एक बार बीच पड़ाव में रसोई का नमक खत्म हो गया.

रसोइये ने सुल्तान से फरियाद की कि उसके भंडार का नमक खत्म हो गया है. सुल्तान ने तुरंत अपने अपने एक सिपाही को बुलाया और पास के गांव के किराना दुकान से शीघ्र ही नमक लेकर आने को कहा. साथ ही सुल्तान ने सिपाही को रुपए देते हुए कहा कि नमक की वाजिब कीमत देकर ही लाना.

सिपाही की प्रश्न-वाचक निगाहों को सुल्तान ताड़ गया. सुल्तान ने स्पष्ट किया – “तुम सुल्तान के सिपाही, चाहो तो सुल्तान के नाम पर मुफ़्त नमक ला सकते हो या फिर पैसा तो तुम्हारी जेब का नहीं, राजकोष का है ऐसा सोचकर अनाप-शनाप भाव से नमक ला सकते हो. मगर दोनों ही परिस्थिति में तुम गलत कार्य करोगे.

जरा जरा सी बातें ही हमें बहुत कुछ सिखाती हैं. बूंद-बूंद से घट भरता है. आज तुम नमक की तुच्छ सी कीमत सही-सही अदा नहीं करोगे तो भविष्य में बड़े बड़े सौदे में सही कीमत कैसे लगाओगे? इसीलिए जाओ और सही कीमत देकर ही नमक लाओ.”

ben ten
27-12-2011, 11:23 PM
शहर के दरवाजे और जुबान पर ताले

एक समय एक राजा राज्य करता था जिसकी बुद्धिमत्ता, चातुर्य और राज्य कौशल चतुर्दिक प्रसिद्धि के शिखर पर था. राज्य धन्य-धान्य से परिपूर्ण था और चहुँओर खुशहाली का साम्राज्य था.

राजा का वजीर एक बार राज्य भ्रमण पर निकला...

राज्य के बाहरी रास्तों पर बने हुए दरवाजों को तो बंद कर उन पर ताले लगवा सकता हूँ, मगर मनुष्य की जुबान पर नहीं. और उनकी ये जुबानें मुझे सदैव उत्तम कार्य करते रहने को प्रेरित करती रहती हैं कि शायद कभी उनकी जुबान बदल जाएँ.

समीर भाई जी सबसे पहले उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद।
आपके द्वारा प्रस्तुत यह कथा मुझे बेहद पसंद आई।

ben ten
27-12-2011, 11:28 PM
पुरानी नाक-
एक ग़रीब मनुष्य ने देवता से वर प्राप्त किया था। देवता संतुष्ट हो कर बोले तुम ये पासा लो। इस पाँसे को जिन किन्हीं तीन कामनाओं से तीन बार फेंकोगे वे तीनों पूरी हो जाएँगी।
वह आनंदोल्लासित हो घर जाकर अपनी स्त्री के साथ परामर्श करने लगा क्या वर माँगना चाहिए। स्त्री ने कहा धन दौलत माँगो किंतु पति ने कहा देखो हम दोनों की नाक चपटी है उसे देख कर लोग हमारी बड़ी हँसी करते हैं। अत: प्रथम बार पाँसा फेंक कर सुंदर नाक की प्रार्थना करनी चाहिए। किंतु स्त्री का मत वैसा नहीं था। अंत में दोनों में खूब तर्क प्रारंभ हुआ। आख़िर पति ने क्रोध में आकर यह कह कर पाँसा फेंक दिया - हमें सुंदर नाक मिले, सुंदर नाक मिले, सुंदर नाक मिले।
आश्चर्य! जैसे ही उसने पासा फेंका वैसे ही उसके शरीर में तीन नाकें उत्पन्न हो गईं। तब उसने देखा यह तो विपत्ति आ पड़ी। फिर उसने दूसरी बार पासा फेंक कर कहा नाक चली जाएँ। इस बार सभी नाकें चली गईं। साथ ही अपनी नाक भी चली गई।
अब शेष रहा एक वर, तब उन्होंने सोचा यदि इस बार पासा फेंक कर चपटी नाक के बदले में सुंदर नाक प्राप्त करें तो लोग अवश्य ही चपटी नाक के स्थान पर अच्छी नाक देख कर उसके बारे में पूछताछ करेंगे। फिर तो हमें सभी बातें बतानी पड़ेगी। तब वे हमें मूर्ख समझ कर हमारी और भी हँसी उडाएँगे। कहेंगे कि ये लोग ऐसे तीन वरों को प्राप्त कर के भी अपनी अवस्था की उन्नति नहीं कर सके। यह सोच कर उन्होंने पासा फेंक कर अपनी पुरानी चपटी नाक ही माँग ली।
ठीक ही है समझबूझ कर काम न करने वाले लोग अवसरों को अपने हाथ से यों ही गँवा देते हैं। उनका लाभ नहीं उठा पाते।

इंटरनेट से आभार सहित!

बिल्कुल सही बात है मित्रों, हमें अपने जीवन को बदलने के लिए चंद अवसर ही मिलते हैं। हम में से जो भाई/ बहिन उन अवसरों को भुना लेते हैं, वे अपनी जिंदगी में नए मकाम तय करते हैं और बाकी के वहीं रह जाते हैं।

Badtameez
27-12-2011, 11:51 PM
मिट्टी का या सोने का?

कालिदास से एक बार राजा ने पूछा – कालिदास, ईश्वर ने आपको बुद्धि तो भरपूर दी है, मगर रूप-रंग देने में भी यदि ऐसी ही उदारता वे बरतते तो बात ही कुछ और होती.

कालिदास ने राजा के व्यंग्यात्मक लहजे को पहचान लिया. कालिदास ने कुछ नहीं कहा, परंतु सेवक को पानी से भरे एक जैसे दो पात्र लाने को कहा – एक सोने का एक मिट्टी का.

दोनों पात्र लाए गए. गर्मियों के दिन थे. कालिदास ने राजा से पूछा – राजन्! क्या आप बता सकते हैं कि इनमें से किस पात्र का पानी पीने के लिए उत्तम है?

राजा ने छूटते ही उत्तर दिया – यह तो सीधी सी बात है, मिट्टी का. और फिर तुरंत उन्हें अहसास हुआ कि कालिदास क्या कहना चाहते हैं!

"बाह्य रूपरंग सरसरी तौर पर लुभावना लग सकता है, मगर असली सुंदरता तो आंतरिक होती है. मिट्टी का घड़ा आपकी (वास्तविक) प्यास बुझा सकता है, सोने का घड़ा नहीं!"

समय के साथ-साथ रूप की सुन्दरता निरन्तर घटती ही है, किन्तु अपने कृत्यों से मानव अमरता को प्राप्त कर लेता है।
बहुत ही सुन्दर कथा थी।

miss.dabangg
28-12-2011, 01:23 AM
मैं तुझे तो कल देख लूंगा।



सूफी संत जुनैद के बारे में एक कथा है.


एक बार संत को एक व्यक्ति ने खूब अपशब्द कहे और उनका अपमान किया. संत ने उस व्यक्ति से कहा कि मैं कल वापस आकर तुम्हें अपना जवाब दूंगा.


अगले दिन वापस जाकर उस व्यक्ति से कहा कि अब तो तुम्हें जवाब देने की जरूरत ही नहीं है.


उस व्यक्ति को बेहद आश्चर्य हुआ. उस व्यक्ति ने संत से कहा कि जिस तरीके से मैंने आपका अपमान किया और आपको अपशब्द कहे, तो घोर शांतिप्रिय व्यक्ति भी उत्तेजित हो जाता और जवाब देता. आप तो सचमुच विलक्षण, महान हैं.


संत ने कहा – मेरे गुरु ने मुझे सिखाया है कि यदि आप त्वरित जवाब देते हैं तो वह आपके अवचेतन मस्तिष्क से निकली हुई बात होती है. इसलिए कुछ समय गुजर जाने दो. चिंतन मनन हो जाने दो. कड़वाहट खुद ही घुल जाएगी. तुम्हारे दिमाग की गरमी यूँ ही ठंडी हो जाएगी. आपके आँखों के सामने का अँधेरा जल्द ही छंट जाएगा. चौबीस घंटे गुजर जाने दो फिर जवाब दो.


क्या आपने कभी सोचा है कि कोई व्यक्ति पूरे 24 घंटों के लिए गुस्सा रह सकता है? 24 घंटे क्या, जरा अपने आप को 24 मिनट का ही समय देकर देखें. गुस्सा क्षणिक ही होता है, और बहुत संभव है कि आपका गुस्सा, हो सकता है 24 सेकण्ड भी न ठहरता हो




सच बात कही है आपने !!!!

Sameerchand
28-12-2011, 02:24 PM
पुरानी नाक-
एक ग़रीब मनुष्य ने देवता से वर प्राप्त किया था। देवता संतुष्ट हो कर बोले तुम ये पासा लो। इस पाँसे को जिन किन्हीं तीन कामनाओं से तीन बार फेंकोगे वे तीनों पूरी हो जाएँगी।
वह आनंदोल्लासित हो घर जाकर अपनी स्त्री के साथ परामर्श करने लगा क्या वर माँगना चाहिए। स्त्री ने कहा धन दौलत माँगो किंतु पति ने कहा देखो हम दोनों की नाक चपटी है उसे देख कर लोग
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बिल्कुल सही बात है मित्रों, हमें अपने जीवन को बदलने के लिए चंद अवसर ही मिलते हैं। हम में से जो भाई/ बहिन उन अवसरों को भुना लेते हैं, वे अपनी जिंदगी में नए मकाम तय करते हैं और बाकी के वहीं रह जाते हैं।

काफी अच्छी और सीख देने वाली कहानी हैं मित्र बेन टेन जी...

आगे आपकी और भी कहानियों का इन्तजार रहेगा.......धन्यवाद....

Sameerchand
28-12-2011, 02:28 PM
समीर भाई जी सबसे पहले उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद।
आपके द्वारा प्रस्तुत यह कथा मुझे बेहद पसंद आई।


समय के साथ-साथ रूप की सुन्दरता निरन्तर घटती ही है, किन्तु अपने कृत्यों से मानव अमरता को प्राप्त कर लेता है।
बहुत ही सुन्दर कथा थी।


धन्यवाद मित्र बेन टेन जीऔर सुरेश जी.......... आपको मेरे द्वारा कहानी पसंद आयी.....इसके लिए आपको मेरा हार्दिक आभार.........

Raman46
28-12-2011, 02:30 PM
एक से बढ़ कर एक लघु कहानियां है समीर भाई जो वास्तविक जीवन के लिए जान लेना ज्ञान वर्धक है

Sameerchand
28-12-2011, 02:31 PM
सच बात कही है आपने !!!!

धन्यवाद मित्र मिस दब्बंग जी, आप इस सूत्र पर आकर अपने कीमती विचार व्यक्त किये उसके लिए मेरा तहे दिल से आभार.

मित्र आप सब की कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
28-12-2011, 02:44 PM
एक से बढ़ कर एक लघु कहानियां है समीर भाई जो वास्तविक जीवन के लिए जान लेना ज्ञान वर्धक है

रमण भाई जी आपको मेरे द्वारा कहानिया पसंद आये..........इसके लिए हार्दिक आभार......

आप सही कह रहे हैं, ये सारी कहानिया वास्तविक जीवन को प्रोत्साहित करने वाली हैं.....

आपकी कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Badtameez
28-12-2011, 02:48 PM
व्यवहारिक ज्ञान की यहाँ बातत होती है जोकि पुस्तकीय ज्ञान से महान है।
धन्यवाद!

Badtameez
28-12-2011, 02:49 PM
व्यवहारिक ज्ञान की यहाँ बात होती है जोकि पुस्तकीय ज्ञान से महान है।
धन्यवाद!

Sameerchand
28-12-2011, 03:08 PM
अपने भाग्यविधाता बनो

एक दिन नसरुद्दीन अपने गाँव में टहल रहा था। तभी उसके कुछ पड़ोसी पास आकर बोले - "नसरुद्दीन। तुम बहुत बुद्धिमान और नेक इंसान हो। हम लोगों को अपना चेला बना लो। तुम हमें यह समझाओ कि हम किस तरह अपना जीवन व्यतीत करें और जीवन में सुख और शांति के लिए हमें क्या करना चाहिये?"

नसरुद्दीन ने कहा - "ठीक है। मैं तुम्हें पहला शिक्षा अभी दिए देता हूँ। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तुम अपने पैरों और चप्पलों का विशेष ध्यान रखो। उन्हें हर समय साफ और स्वच्छ रखो। "

पड़ोसी उसकी बात को ध्यान से सुन रहे थे, तभी उनका ध्यान नसरुद्दीन के पैरों की ओर गया जो बहुत मैले-कुचैले थे तथा उसकी चप्पलें भी टूटी-फूटी थीं।

एक पड़ोसी तपाक से बोला - "लेकिन नसरुद्दीन, तुम्हारे पैर तो बहुत ही गंदे हैं और चप्पलों का तो कहना ही क्या। जिन बातों का तुम खुद ही पालन नहीं कर रहे हो, उनका पालन हम कैसे कर सकते हैं ?"

नसरुद्दीन - "तो मैं भी यह जानने के लिए इधर-उधर नहीं भटकता कि मुझे अपना जीवन कैसे बिताना चाहिये?"

Sameerchand
28-12-2011, 03:12 PM
अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो

एक गांव में एक आदमी अपने प्रिय तोते के साथ रहता था.

एक बार जब वह आदमी किसी काम से दूसरे गांव जा रहा था, तो उसके तोते ने उससे कहा – “मालिक, जहाँ आप जा रहे हैं वहाँ मेरा गुरु-तोता रहता है. उसके लिए मेरा एक संदेश ले जाएंगे?”

“क्यों नहीं!” – उस आदमी ने जवाब दिया.

“मेरा संदेश है,” तोते ने कहा - “आजाद हवाओं में सांस लेने वालों के नाम एक बंदी तोते का सलाम.”

वह आदमी दूसरे गांव पहुँचा और वहाँ उस गुरु-तोते को अपने प्रिय तोते का संदेश बताया. संदेश सुनकर गुरु-तोता तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया.

जब वह आदमी अपना काम समाप्त कर वापस घर आया तो उस तोते ने पूछा कि क्या उसका संदेश गुरु-तोते तक पहुँच गया था.

आदमी ने तोते को पूरी कहानी बताई कि कैसे उसका संदेश सुनकर उसका गुरु-तोता तत्काल मर गया था.

यह बात सुनकर वह तोता भी तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया.

उस आदमी ने बुझे मन से तोते को पिंजरे से बाहर निकाला और उसका दाह-संस्कार करने के लिए ले जाने लगा. जैसे ही उस आदमी का ध्यान थोड़ा भंग हुआ, वह तोता तुरंत उड़ गया और जाते जाते उसने अपने मालिक को बताया – “मेरे गुरु-तोते ने मुझे संदेश भेजा था कि अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो!”

sushilnkt
28-12-2011, 03:13 PM
बहुत ही सुन्दर
आप की कहानी .........

Sameerchand
28-12-2011, 03:16 PM
कोयल , पंख और कीड़े

एक जंगल में एक कोयल अपने सुर में गा रही थी। तभी एक किसान वहाँ से एक बक्सा लेकर गुजरा जिसमें कीड़े भरे हुये थे। कोयल ने गाना छोड़ दिया और उसने किसान से पूछा - "इस बक्से में क्या है और तुम कहाँ जा रहे हो?'

किसान ने उत्तर दिया कि बक्से में कीड़े भरे हुये हैं जिन्हें वह पंख के बदले शहर में बेचने जा रहा है। यह सुनकर कोयल ने कहा - "मेरे पास बहुत से पंख हैं जिनमें से एक पंख तोड़कर मैं आपको दे सकती हूँ। इससे मेरा बहुत समय बच जाएगा और आपका भी।'

किसान ने कोयल को कुछ कीड़े निकालकर दिए जिसके बदले में कोयल ने अपना एक पंख तोड़कर दिया। अगले दिन भी यही हुआ। फिर ऐसा रोज ही होने लगा। एक दिन ऐसा भी आया जब कोयल के सभी पंख समाप्त हो गए।

सभी पंख समाप्त हो जाने के कारण कोयल उड़ने में असमर्थ हो गयी और कीड़े पकड़कर खाने लायक भी नहीं बची। वह बदसूरत दिखने लगी, उसने गाना बंद कर दिया और जल्द ही भूख से मर गयी।

"भोजन प्राप्त करने का जो आसान मार्ग कोयल ने चुना,

वही मार्ग अंततः सबसे कठिन साबित हुआ।'

Sameerchand
28-12-2011, 03:21 PM
सभी तीर निशाने पर

एक बार एक राजा एक छोटे से शहर की यात्रा पर था. वहाँ उसने आश्चर्य से देखा कि पेड़ों के तनों पर, घरों की दीवारों पर तीर बिंधे हुए हैं और हर तीर ठीक निशान के बीचों बीच है. उसने ऐसे विलक्षण धनुर्धर से मिलना चाहा. राजा ने उस धनुर्धर को बुलाया और पूछा कि वह हर बार इस तरह का सटीक निशाना कैसे लगा लेता है.

उस धनुर्धर ने स्पष्ट किया – बहुत आसानी से श्रीमान्. मैं पहले तीर चलाता हूँ, फिर जहाँ तीर लगता है उसके चारों ओर निशान बना देता हूँ.

“हम अपनी धारणा पहले बना लेते हैं, वस्तुस्थिति जानने की कोशिश बाद में करते हैं. हम देखते हैं तो इस लिए नहीं कि कुछ नया देखें, बल्कि अपने विचारों को पुख्ता करने वाली चीजों को ढूंढने के लिए.

और, हम वाद-विवाद करते हैं तो सत्य का पता लगाने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी धारणा को ऐन-कैन-प्रकारेण पुख्ता बनाने के लिए!”

Sameerchand
28-12-2011, 03:49 PM
बहुत ही सुन्दर
आप की कहानी .........

भाई सुशिल जी, आपको मेरे द्वारा प्रश्तुत कहानिया पसंद आये..........इसके लिए हार्दिक आभार......

आप सही कह रहे हैं, ये सारी कहानिया वास्तविक जीवन को प्रोत्साहित करने वाली हैं.....

आपकी कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

Sameerchand
28-12-2011, 03:50 PM
व्यवहारिक ज्ञान की यहाँ बातत होती है जोकि पुस्तकीय ज्ञान से महान है।
धन्यवाद!

धन्यवाद सुरेश जी, आपके विचार अतिउत्तम हैं...............

Triple-S HARYANVI
28-12-2011, 04:10 PM
सभी कहानिया एक से बढ़ कर एक है l
मैं इस असमंजस में हूँ की ये जवाब देने के लिए किस कहानी को कोट करू और किस को ना करू l
और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचा की आपको +++++++++++++ डेक आर यही इस बात को विराम दे देता हूँ l

ben ten
28-12-2011, 04:18 PM
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राजा ने उस धनुर्धर को बुलाया और पूछा कि वह हर बार इस तरह का सटीक निशाना कैसे लगा लेता है.

उस धनुर्धर ने स्पष्ट किया – बहुत आसानी से श्रीमान्. मैं पहले तीर चलाता हूँ, फिर जहाँ तीर लगता है उसके चारों ओर निशान बना देता हूँ.

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बहुत खूब समीर भाई जी

Sameerchand
28-12-2011, 05:18 PM
सभी कहानिया एक से बढ़ कर एक है l
मैं इस असमंजस में हूँ की ये जवाब देने के लिए किस कहानी को कोट करू और किस को ना करू l
और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचा की आपको +++++++++++++ डेक आर यही इस बात को विराम दे देता हूँ l


बहुत खूब समीर भाई जी

भाई सीसवाल जी और बेन टेन जी,, आपको मेरे द्वारा प्रश्तुत कहानिया पसंद आये..........इसके लिए हार्दिक आभार......

आपकी कीमती विचारों के साथ साथ सूत्र पर उपस्थिति मुझे प्रोत्साहित करती हैं. आगे भी ऐसे ही हमारा प्रोत्साहन बढ़ाते रहिएगा.

सीसवाल भाई, आपके द्वारा दिए गए रेप++ का बहुत बहुत धन्यवाद......

ben ten
29-12-2011, 11:35 PM
दोस्तों एक और कहानी लेकर हाजिर हूँ

बुद्धिमान कौन-
वजीर के अवकाश लेने के बाद बादशाह ने वजीर के रिक्त पद पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवार बुलवाए। कठिन परीक्षा से गुज़र कर 3 उम्मीदवार योग्य पाए गए।
तीनों उम्मीदवारों से बादशाह ने एक-एक कर एक ही सवाल किया, "मान लो मेरी और तुम्हारी दाढ़ी में एक साथ आग लग जाए तो तुम क्या करोगे?"
"जहाँपनाह, पहले मैं आप की दाढ़ी की आग बुझाऊँगा," पहले ने उत्तर दिया।
दूसरा बोला, "जहाँपनाह पहले मैं अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊँगा।"
तीसरे उम्मीदवार ने सहज भाव से कहा, "जहाँपनाह, मैं एक हाथ से आपकी दाढ़ी की आग बुझाऊँगा और दूसरे हाथ से अपनी दाढ़ी की।"
इस पर बादशाह ने फ़रमाया,"अपनी ज़रूरत नज़रंदाज़ करने वाला नादान है। सिर्फ़ अपनी भलाई चाहने वाला स्वार्थी है। जो व्यक्तिगत जिम्मेदारी निभाते हुए दूसरे की भलाई करता है। यही बुद्धिमान है।"
इस तरह बादशाह ने वजीर के पद पर तीसरे उम्मीदवार की नियुक्ति कर दी।

इंटरनेट से आभार सहित!

दोस्तों इसका मतलब हुआ हमें पैरेलल प्रोसेसिँग करनी चाहिए। हा हा...
(मजाक कर रहा हूँ दोस्तों प्रसंग के मूल भाव से जोड़कर न देखें )

Badtameez
30-12-2011, 08:49 AM
दोस्तों एक और कहानी लेकर हाजिर हूँ

बुद्धिमान कौन-
वजीर के अवकाश लेने के बाद बादशाह ने वजीर के रिक्त पद पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवार बुलवाए। कठिन परीक्षा से गुज़र कर 3 उम्मीदवार योग्य पाए गए।
तीनों उम्मीदवारों से बादशाह ने एक-एक कर एक ही सवाल किया, "मान लो मेरी और तुम्हारी दाढ़ी में एक साथ आग लग जाए तो तुम क्या करोगे?"
"जहाँपनाह, पहले मैं आप की दाढ़ी की आग बुझाऊँगा," पहले ने उत्तर दिया।
दूसरा बोला, "जहाँपनाह पहले मैं अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊँगा।"
तीसरे उम्मीदवार ने सहज भाव से कहा, "जहाँपनाह, मैं एक हाथ से आपकी दाढ़ी की आग बुझाऊँगा और दूसरे हाथ से अपनी दाढ़ी की।"
इस पर बादशाह ने फ़रमाया,"अपनी ज़रूरत नज़रंदाज़ करने वाला नादान है। सिर्फ़ अपनी भलाई चाहने वाला स्वार्थी है। जो व्यक्तिगत जिम्मेदारी निभाते हुए दूसरे की भलाई करता है। यही बुद्धिमान है।"
इस तरह बादशाह ने वजीर के पद पर तीसरे उम्मीदवार की नियुक्ति कर दी।

इंटरनेट से आभार सहित!

दोस्तों इसका मतलब हुआ हमें पैरेलल प्रोसेसिँग करनी चाहिए। हा हा...
(मजाक कर रहा हूँ दोस्तों प्रसंग के मूल भाव से जोड़कर न देखें )

वाह जी वाह क्या बात कही गई है इस कहानी में। सिर्फ अपने लिए जाने वाले अधिक हैं । दूसरों के लिए जीने वाले कम है । लेकिन दूसरों के लिए जीने वाले कभी-कभी अपने घर परिवार के बारे में भी नहीं सोचते ऐसे में कलह का वातावरण हो जाता है।इस बात पर एक फिल्मी गीत याद आ गया जिसमें नायिका कहती है-
गैरों पे करम, अपनों पे सितम ,ऐ जाने वफा ये जुर्म न कर , ये जुर्म न कर।