View Full Version : सैक्स
great_brother
24-01-2011, 12:22 AM
दोस्तों मैं एक नया सूत्र "सैक्स" शुरू कर रहा हू .......
इस सूत्र के माध्यम से आप सैक्स के प्रति अपने और अनुचाव बात सकते है ...........
सैक्स एक बहुत ही गुढ़ विषय है ........
पहला प्रश्न तो ये उठता है कि जिस सैक्स के पीछे दुनिया पागल है या यु कहे कि जिससे इस दुनिया की शुरुआत हुई है आखिर वो सैक्स है क्या :question:
!! सेक्स की परिभाषा !!
सेक्स का कोई शाब्दिक अर्थ नहीं है, दूसरा हर कोई इसे करना चाहता है. सेक्स का आशय सिर्फ जननेद्रियों से पूर्णतः संबंधित नहीं है. सेक्स का आशय उस बोधगम्य महत्वपूर्ण उद्यम से है जिस पर ईमानदारी से मूल्य लगाया जाय तो यह बहुमूल्य अभ्यास हो सकता है. सेक्स को महसूस किया जा सकता है पर परिभाषित नहीं किया जा सकता और ना ही इसको समाज द्वारा बनाए गए किसी रिश्ते तक सीमित किया जा सकता है सच तो ये है कि सेक्स करना और सेक्स को समझना दो अलग-अलग कार्य हैं. यह ठीक उसी तरह है जिस तरह भोजन करना और पोषण या पाचन क्रिया को समझना है. सेक्स सिर्फ सहवास तक सीमित नहीं है और न ही इसे जननेद्रियों के क्रिया कलापों तक सीमित किया जा सकताहै. वास्तव में सेक्स चंचलता का विशाल दायरा है. इस तरह इसका कोई शब्दार्थ नहीं है बल्कि यह सिर्फ एक अनुभूति है जो अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरीके से मिलती है. वहीं इसका दूसरा अर्थ पऱकृति से उस रिश्ते से लगाया जा सकता है जिसकी अनुभूति से मन को एक संतुष्टि मिलती है चाहे वह जननेन्द्रियों से मिले या किसी अन्य वस्तु, सोच, नामकरण या क्रिया कलापों से. कुल मिलाकर यह एक शब्द की अनुभूति है. इसलिए अब चलिए सेक्स की एक नई यात्रा पर दूसरी ओर एक नए अर्थ में जिस कार्य के बाद शरीर को एक नए आनंद की अनुभूति होती है वह सेक्स है. जो दिमाग से चलकर जनन इन्द्रियों द्वारा आत्मानंद को प्राप्त करता है. इस दौरान शरीर के हर अंग अपना अलग अलग महत्व रखते हुए अपनी सहभागिता निभाते है. सेक्स शब्द के अर्थ में कई शब्दार्थ समाहित रहते हैं. जिनमे मित्रता, दृढ़ परिचय, घनिष्टता, आनंद, उत्पादकता, शारीरिक सम्पूर्णता और वह विश्वास की जिंदगी सही है. सेक्स का लाक्षणिक अर्थ है यथार्थता और यह धर्म तथा रीति के निबंधो के तहत चलती है. एक विद्वान का मत है कि सेक्स मूलतः शरीर में ही विद्यमान है. यह एक अरैखिक अनुभव है. सेक्स का विश्लेषण अनुभूति आदि तो किया जा सकता है किन्तु सेक्स करना और समझना दोनों अलग-अलग कार्य हैं. वहीं कुछ का मानना है कि एक ऐसी कल्पना जिसे हर कोई आनंद के लिए पाना चाहता है सेक्स कहलाती है. दूसरी ओर आधुनिक ख्याल के लोगों के अनुसार असीम आनंद की अनुभूति के लिए दो विपरीत या समान लिंग वालों द्वारा शरीर के कुछ विशेष अंगों द्वारा की जाने वाली क्रियाएं सेक्स कहलाती हैं. इन सबके विपरीत शब्दकोश में दिये गए शाब्दिक अर्थों पर जाएं तो उसका मतलब लिंग, स्त्री पुरुष भेद, काम क्रिया, यौन क्रिया, संभोग, सहवास आदि है.....
अपने विचार और अनुभव जरुर बांटे ............
Pooja1990 QUEEN
24-01-2011, 05:40 AM
apne parivar ko aage babane ka ek jadui eksas hai sex.do aatmao ka milan hai sex. sex bo samunder hai jisme dub kar marne ko sabi taiyar hai. ggttk
Dr.Ashusingh
24-01-2011, 06:19 AM
परम आनन्द की प्राप्ति ही सभोंग का अर्थ हॆ...
abhi18
24-01-2011, 08:44 AM
सच्ची देव पूजा है सॆक्स
ROSERAJA
04-04-2011, 01:07 PM
PARAM ANAND KO PANA HAI SEX , PYAR MEIN DOOB JANA HAI SEX ,JO KI KISI KISI KO HI NASEEB HOTA HAI..
SUNIL1107
04-04-2011, 04:39 PM
इतने अच्छे विषय पर बनाया हुआ सूत्र और उसकी इतनी दुर्दशा कोई सुध ही नहीं ले रहा , ग्रेट भाई आप भी नहीं क्यूँ ?
amol05
04-04-2011, 05:00 PM
सेक्स का अर्थ अलग अलग समय पर अलग अलग होता है जैसे प्यार क हर व्यक्ति के साथ अलग अर्थ होता है पर ये होना चैये स्वेचा से तभी सर्तक होता है सेक्स जीवन उत्पत्ति क मूल आधार है सेक्स इतना बड़ा विषय उठाया है मित्र आपने की सारी जिंदगी लगे रहो तो भी पूरा नहीं होगातो इसलिए संशिप्त में येहियो कह सकते है की
रोज लो मोज लो ना मिले तो खोज लो:kiss:
great_brother
18-04-2011, 01:10 PM
ठीक है मित्र,
मैं ही इस सूत्र को आगे लिए चलता हू .....
लेकिन आपका सहयोग अतिआवश्यक है ...............:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
18-04-2011, 01:30 PM
सेक्स का दर्शन और अध्यात्म से बहुत गहरा संबंध है ...........
दोस्तों ,
जब तुम किसी को आलिंगन में लेते हो, तब दूसरे का हड्डी-मांस-मज्जा ही तुम्हारे हाथ में आती है। वह कुछ तकिए से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। आखिर हड्डी या मांस या चमड़ी तकिए से कैसे ज्यादा मूल्यवान हो सकती है ? बस तुम्हारा खयाल है कि दूसरा मौजूद है। इसलिए तुम अपने प्रेम को विस्तीर्ण कर पाते हो।जब तुम किसी आदमी के सिर पर चोट करते हो, तो उस चोट में और एक तकिए पर लकड़ी से चोट करने में क्या फर्क है ? फर्क तुम्हें दिखाई पड़ता है, क्योंकि तुम मानते हो, दूसरा वहां है और तकिया तो कोई भी नहीं। फर्क दिखाई पड़ता है, क्योंकि दूसरे से प्रत्युत्तर मिलेगा और तकिए से प्रत्युत्तर नहीं मिलेगा, इतना ही फर्क है।दूसरा जवाब देगा। जब तुम प्रेम से किसी व्यक्ति को आलिंगन में लोगे, तो वह भी तुम्हें आलिंगन में लेगा। उससे तुम्हें प्रेम करने में सुविधा पड़ेगी, क्योंकि प्रत्युत्तर जगाएगा, प्रत्युत्तर उत्तेजित करेगा और श्रृंखला निर्मित हो जाएगी।तकिए के साथ कठिनाई यह है कि तुम अकेले हो। तकिया कोई उत्तर न देगा। सब कुछ तुम्हें ही निर्मित करना पड़ेगा।लेकिन यह प्राथमिक कठिनाई सभी वेगों में होगी-काम हो, क्रोध हो या कोई भी वेग हों। थोड़े ही क्षणों में, थोड़े ही दिनों में, तुम समर्थ हो जाओगे। और तब तुम्हें बड़ी हंसी आएगी कि तुमने अब तक जितने लोगों को आलिंगन किया था, वे भी तकिए से ज्यादा नहीं थे, वे भी निमित्त थे।:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
18-04-2011, 01:45 PM
दोस्तों,
प्रेम में तुम्हारा एकांत ध्यान बने, इसमें कई अड़चनें हैं। अड़चनें संस्कार की हैं। अड़चनें ऐसी हैं कि बचपन से कुछ बातें सिखाई गई हैं, और वे बाधा डालेंगी।जैसे पुरुष है, अगर कामवासना तकिए पर प्रकट करे, तो यह भी हो सकता है कि उसका वीर्य स्खलित हो जाए। तो भय है। वह भय बचपन से सिखाया गया है कि वीर्य की एक बूंद भी स्खलित हो जाए, तो महागर्त में गिर रहे हो, बड़ी जीवन-ऊर्जा नष्ट हो रही है।
पुराने लोग मानते हैं कि चालीस दिन में भोजन करने से एक बूंद वीर्य बनता है। सरासर असत्य है, झूठ बात है, इसमें रत्तीभर भी सच्चाई नहीं। लेकिन बच्चों को डराने के लिए ईजाद की गई है। और बच्चे डरते हैं वह तो ठीक है बूढ़े भी डरते हैं।एक साधारण पुरुष सत्तर वर्ष के जीवन में आसानी से कोई चार हजार बार संभोग कर सकता है। प्रत्येक संभोग में कोई एक करोड़ से लेकर दस करोड़ तक वीर्याणु स्खलित होते हैं।
एक शरीर के भीतर इतने वीर्याणु हैं कि अगर प्रत्येक वीर्याणु गर्भस्थ हो जाए, तो इस पृथ्वी पर जितनी जनसंख्या है, वह एक जो़ड़े से पैदा हो सकती है। चार अरब व्यक्ति एक स्त्री और एक पुरुष से पैदा हो सकते हैं।और यह जो वीर्य है, यह कोई आपके भीतर संचित संपदा नहीं है कि रखा हुआ है, इसमें से कुछ निकल गया, तो कुछ कम हो जाएगा। यह वीर्य प्रतिफल पैदा हो रहा है। शरीर श्वास ले रहा है भोजन कर रहा है, व्यायाम कर रहा है-यह वीर्य पैदा हो रहा है।और आप हैरान होंगे कि जो आधुनिक खोजें हैं चिकित्साशास्त्र की, वे बड़ी भिन्न हैं, विपरीत हैं। वे कहती हैं, जो व्यक्ति जितना वीर्य का उपयोग करेगा, उतने ज्यादा दिन तक पुंसत्व उसमें शेष रहेगा। जो जितनी जल्दी भय से बंद कर देगा वीर्य का उपयोग या संभोग उतने जल्दी उसका वीर्य खो जाएगा। क्योंकि जब तुम वीर्य का उपयोग करते हो, तो तुम्हारे पूरे शरीर को फिर वीर्य पैदा करने की क्रिया में संलग्न होना पड़ता है। जब तुम वीर्य का उपयोग नहीं करते, तो शरीर को संलग्न नहीं होना पड़ता। धीरे-धीरे शरीर की क्षमता वीर्य को पैदा करने की कम हो जाती है।यह बहुत उलटा दिखाई पड़ेगा। जो लोग जितना ज्यादा संभोग करेंगे, उतनी लंबी उम्र तक संभोग करने में समर्थ रहेंगे।
दोस्तों , जो लोग जितना कम संभोग करेंगे, उतनी जल्दी रिक्त हो जाएंगे और चुक जाएंगे।तो पश्चिम में चिकित्सक समझाते हैं कि बुढ़ापे तक, सत्तर और अस्सी वर्ष और नब्बे वर्ष तक भी अगर संभोग जारी रखा जा सके, तो तुम्हारे ज्यादा जीने की संभावना है। क्योंकि शरीर तुम्हारा ताजा रहेगा। वीर्य बाहर जाता है, तो नया वीर्य शरीर पैदा करता है। और नए वीर्य में शक्ति होती है, ताजगी होती है। पुराना वीर्य धीरे-धीरे बासा हो जाता है, जड़ हो जाता है। और वीर्य की जड़ता के साथ तुम्हारे पूरे शरीर में जड़ता व्याप्त हो जाती है।
:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
18-04-2011, 01:47 PM
दोस्तों अपने विछार भी देते रहे और सूत्र को आगे बढाए..........
great_brother
18-04-2011, 02:03 PM
दोस्तों,
हमें यहां हैरानी होती है-पश्चिम में हम सुनते हैं, कोई नब्बे वर्ष का व्यक्ति शादी कर रहा है। हमें बहुत हैरानी होती है कि शादी का क्या प्रयोजन है अब ? लेकिन पश्चिम में नब्बे वर्ष का बूढ़ा भी संभोग कर सकता है। और करने का कारण सिर्फ यह है कि वीर्य के संबंध में सारी धारणा बदल गई है। और वैज्ञानिक धारणा सच्चाई के ज्यादा करीब है।जीवन के सभी अंगों में यह बात सच है कि उनका तुम उपयोग करो, तो वे सक्षम रहते हैं। एक आदमी चलता रहे, बुढ़ापे तक चलता रहे, तो पैर मजबूत रहते हैं चलना बंद कर दे, पैर कमजोर हो जाते हैं।
:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
18-04-2011, 02:05 PM
इतने अच्छे विषय पर बनाया हुआ सूत्र और उसकी इतनी दुर्दशा कोई सुध ही नहीं ले रहा , ग्रेट भाई आप भी नहीं क्यूँ ?
दोस्त मैंने आपके कहने से सूत्र को पुन: जिवंत कर दिया है आपका और सभी का सहयोग वांछनीय है .........
great_brother
18-04-2011, 02:16 PM
दोस्तों ,
शरीर का नियम है कि तुम जितना ज्यादा उपयोग लोगे, उतना ज्यादा जीवंत रहेगा। तुम भयभीत हुए डरे, उपयोग बंद किया, उतनी ही जल्दी शरीर क्षीण हो जाएगा।और यह एक दुष्टचक्र है। क्योंकि जो व्यक्ति डरता है, कम उपयोग करता है, शरीर क्षीण होता है। क्षीण होने से और डरता है। और डरने से अपने को और रोकता है। और रोकने से और क्षीण होता है। फिर कोई उपाय नहीं। फिर उसने एक रास्ता पकड़ लिया, जिस पर वह जल्दी ही मिट जाएगा।:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
18-04-2011, 02:21 PM
दोस्तों,
एक आदमी चलता रहे, बुढ़ापे तक चलता रहे, तो पैर मजबूत रहते हैं चलना बंद कर दे, पैर कमजोर हो जाते हैं। एक आदमी मस्तिष्क का उपयोग करता रहे आखिरी क्षण तक, जो मस्तिष्क ताजा रहता है। उपयोग बंद कर दे, मस्तिष्क जड़ हो जाता है।सारी इंद्रियों का जीवन उपयोग पर निर्भर है, क्रियात्मकता पर निर्भर है।
तुम जिन इंद्रियों का उपयोग करते हो, वे उतने ही ज्यादा दिन तक ताजी रहेंगी। और वीर्य भी एक इंद्रिय है। उसके लिए कोई अपवाद नहीं है। वह भी शरीर का ही अंग है। शरीर का नियम है कि तुम जितना ज्यादा उपयोग लोगे, उतना ज्यादा जीवंत रहेगा। तुम भयभीत हुए डरे, उपयोग बंद किया, उतनी ही जल्दी शरीर क्षीण हो जाएगा।और यह एक दुष्टचक्र है। क्योंकि जो व्यक्ति डरता है, कम उपयोग करता है, शरीर क्षीण होता है। क्षीण होने से और डरता है। और डरने से अपने को और रोकता है। और रोकने से और क्षीण होता है। फिर कोई उपाय नहीं। फिर उसने एक रास्ता पकड़ लिया, जिस पर वह जल्दी ही मिट जाएगा। भय रोकता है, रोकने से हम मरते हैं।
निर्भय होकर जीवन को ऐसा उपयोग करो-रोजा लक्जेंबर्ग ने, एक जर्मन महिला ने कहा है-जैसे कोई मशाल दोनों तरफ से जले, ऐसे जलो।घबड़ाओ मत, तुम ज्यादा जलोगे, जीवन बड़ा विराट है। तुम्हारे दीए में बहुत तेल है। लेकिन तुम जलाओ ही नहीं बाती को, भयभीत हो जाओ, तो तुम डूब जाओगे। सारी दुनिया में पुरानी संस्कृति और सभ्यताओं ने वीर्य के संबंध में बड़ा भयभीत किया है लोगों को। इसके कारण हैं। क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति वीर्य के संबंध में भयभीत हो जाता है, उसे गुलाम बनाना आसान है। आपने उसकी जड़ पकड़ ली। वीर्य जड़ है।
अगर किसी व्यक्ति को कामवासना के संबंध में बहुत अपराध से भर दिया, तो वह व्यक्ति न तो विद्रोही रह जाएगा, न शक्तिशाली रह जाएगा। और सदा अपराध की भावना इसको दबाएगी। अपराधी को दबाना बहुत आसान है।तो राज्य भी चाहता है कि आप अपराध अनुभव करें, समाज भी चाहता है। सभी-जिनके हाथ में सत्ता है-चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, जो पैदा हो, वह भयभीत रहे। भयभीत रहे, तो उसकी मालकियत की जा सकती है, उसका मालिक हुआ जा सकता है। निर्भय हो जाए, तो वह सब बंधन तोड़ देगा, सब रास्ते, वह स्वतंत्रता से जीएगा। विद्रोही हो जाएगा।
great_brother
18-04-2011, 02:52 PM
दोस्तों,
बचपन से ही हमारे बुजुर्ग अपने परिवार के बच्चों को सिखाते हैं कि वीर्य का स्खलन न हो जाए, सम्हालना। वीर्य के संबंध में हम कंजूसी सिखाते हैं। और इसको हम ब्रह्मचर्य कहते हैं।यह ब्रह्मचर्य नहीं है। कृपणता ब्रह्मचर्य नहीं है। और न वीर्य को जबर्दस्ती रोक लेने से ब्रह्मचर्य का कोई संबंध है। ब्रह्मचर्य तो एक ऐसे आनंद की घटना है, जब आपका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया; और इसलिए व्यक्ति के साथ संभोग की कोई जरूरत नहीं रह जाती।
यह जरा कठिन है समझना। और अगर मैं कहूं तो बहुत बेचैनी होगी। संत वैसा व्यक्ति है, जिसका अस्तित्व के साथ संभोग शुरू हो गया। वहां कोयल कूकती है, तो उसका पूरा शरीर संभोग के आनंद को अनुभव करता है। वहां वृक्ष में फूल खिलते हैं, तो उसके पूरे शरीर पर, जैसी संभोग में आपको थिरक अनुभव होती है, उसका रोआं-रोआं वैसा थिरकता है और नाचता है। सुबह सूरज उगता है, रात चांद आकाश में होता है तो हर घड़ी संभोग की समाधि उसे उपलब्ध होती रहती है। उसका रोआं-रोआं संभोग में समर्थ हो गया है; आपका केवल जननेंद्रिय संभोग में समर्थ है।
इस संबंध में एक बात समझ लेनी जरूरी है। कभी खयाल भी नहीं आया होगा ! हमने भगवान शिव की प्रतिमा, शिवलिंग निर्मित की है। शिव जैसे पूरे के पूरे लिंग हैं, इसका मतलब यह होता है। इसका मतलब होता है, भगवान शिव के पास न आंखें हैं, न हाथ हैं, न पैर हैं, मात्र लिंग है, सिर्फ जननेंद्रिय है।यह संतत्व की आखिरी दशा है, जब व्यक्ति का पूरा शरीर जननेंद्रिय हो गया। इसका प्रतीक अर्थ यह हुआ कि अब वह पूरे शरीर के साथ जगत के साथ संभोग में रत है। अब यह संभोग लोकल नहीं है। यह जननेंद्रिय और जननेंद्रिय का मिलना नहीं है, अब यह अस्तित्व और अस्तित्व का मिलना है। भगवान शिव का शिवलिंग हमने निर्मित करके जगत को एक ऐसी धारणा दी है, जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है। लेकिन कोई भी यह अर्थ नहीं करेगा। अर्थ बिलकुल साफ है। अंधे हम हैं। हम इतने भयभीत हैं कि हम यह अर्थ ही नहीं करेंगे। हम तो छिपाने की कोशिश करते हैं।:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
20-04-2011, 11:46 AM
दोस्तों आपको बताना चाहता हू कि पश्चिम में बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक हुआ कार्ल गुस्ताव जुंग। वह भारत आया यात्रा पर। तो वह पुरी, कोणार्क, खजुराहो के मंदिर देखने गया। जब वह कोणार्क के मंदिर को देखने गया, तो जो पंडित उसे मंदिर दिखा रहा था, वह बड़ा बेचैन परेशान था-क्योंकि जगह-जगह नग्न-मैथुन की प्रतिमाएं थीं-और बहुत गिल्टी, अपराधी अनुभव कर रहा था। और जुंग बहुत प्रभावित था। क्योंकि जुंग इस सदी के उन थोड़े से लोगों में है, जिन्होंने मनुष्य की चेतना में बड़ा गहरा प्रवेश किया है।और जितनी गहराई में प्रवेश होगा, उतना ही मैथुन अर्थपूर्ण होगा। क्योंकि मैथुन से ज्यादा गहरा आपके भीतर कुछ भी नहीं जाता।
शायद मैथुन के क्षण में आप जिस अवस्था में होते हैं, उससे ज्यादा गहरी अवस्था में साधारणत: आप कभी नहीं लेते। जिस दिन समाधि उपलब्ध होगी, उस दिन ही मैथुन के पार आप जाएंगे, उससे गहरी अवस्था उपलब्ध होगी। जो जुंग तो बहुत आनंद से देख रहा था। वह पंडित बहुत परेशान था। उसको लग रहा था कि क्या गलत चीजें हम दिखा रहे हैं। और यह आदमी पश्चिम में खबर ले जाएगा, तो हमारी संस्कृति के बाबत क्या सोचेंगे :question: और ऐसा वह पंडित ही सोचता था, ऐसा नहीं है।
गांधीजी तक सोचते थे कि कोणार्क और खजुराहों को मिट्टी के ढेर में दबा देना चाहिए, ताकि हमारी बदनामी न हो।एक लोग थे इस मुल्क में, जिन्होंने खजुराहो बनाया, कोणार्क बनाया। और बनाया था संतों के निर्देशन में क्योंकि ये मंदिर हैं। फिर महात्मा हमारे मुल्क में होने लगे जो उन्हें मिटा देना चाहते हैं या दबा देना चाहते हैं।
दोस्तों अपने विचार भी देते रहे ..........
SUNIL1107
20-04-2011, 03:38 PM
जिस समय कोणार्क या खजुराहो के मंदिर बने उस समय के लोग कितने खुले हुए और सुलझे मस्तिष्क के स्वामी रहे होंगे ! कहीं पढ़ा है की खजुराहो मंदिर की यह विशेषता है कि पहले मंदिर कि ध्यान से परिक्रमा करो अर्थात काम(विषयों) से निवृत हो जाओ तत्पश्चात मंदिर में प्रवेश करो और शिव का साक्षात्कार करो !
SUNIL1107
20-04-2011, 03:45 PM
यहाँ विषयों से निवृत होने से तात्पर्य काम से मुंह मोड़ना नहीं वरन काम से तृप्त होना है ! इतना करो कि मन काम से स्वमेव ही विमुख हो जाये, और जब मन काम से परितृप्त हो जावेगा तभी समाधी की ओर अग्रसर हो पाएंगे !
Devil khan
20-04-2011, 06:10 PM
बहुत उम्दा दोस्त ....................
दोस्तों आपका स्वागत है मेरे नए सूत्रों पर कृपया यंह पधार कर अपने विचार जरूर दे .............धन्यवाद
http://www.antarvasna.com/forum/showthread.php?t=4347
http://www.antarvasna.com/forum/showthread.php?t=4339
http://www.antarvasna.com/forum/showthread.php?t=4094
great_brother
20-04-2011, 10:58 PM
यहाँ विषयों से निवृत होने से तात्पर्य काम से मुंह मोड़ना नहीं वरन काम से तृप्त होना है ! इतना करो कि मन काम से स्वमेव ही विमुख हो जाये, और जब मन काम से परितृप्त हो जावेगा तभी समाधी की ओर अग्रसर हो पाएंगे !
सही कहा मित्र आप अपने विचार देते रहे .....................:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
20-04-2011, 11:20 PM
दोस्तों हो सकता है आप मेरे विचारों से सहमत न हो लेकिन आज कल के समाज के लोगो की शिक्षा-दीक्षा के कारण उनकी पकड़ ईसाई की है। ईसाई लोग शुरू से बहुत डरे हुए है इस तरह की चीजों से। ईसाई सोच ही नहीं सकता कि चर्च में और मैथुन की प्रतिमा हो सकती है, या शिवलिंग हो सकता है।
जैसे ही मंदिर से विदा होने लगे जुंग, तो उस आदमी ने, पंडित के , कान में कहा कि क्षमा करें, यह विकृति अतीत में कुछ लोगों के मन की प्रतिछवि है; यह कोई हमारा राष्ट्रीय प्रतीक नहीं है। और ऐसा मत सोचना आप कि यह हमारा धर्म या हमारा दर्शन है। यह तो कुछ विकृत मस्तिष्कों का उपद्रव है।
जुंग ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं हैरान हुआ कि इतनी महत्वपूर्ण प्रतिमाएं हैं, और इतने गहरे गई प्रतिमाएं हैं। लेकिन आज का आदमी भी कमजोर हो गया है।
शिवलिंग का अर्थ है : एक ऐसी दशा, जब तुम्हारा पूरा शरीर रोएं-रोएं से संभोग अनुभव कर सकता है। तभी तुम्हें जननेंद्रिय के संभोग से छुटकारा मिलेगा और ब्रह्मचर्य उपलब्ध होगा।तो ब्रह्मचर्य भोग से मुक्ति नहीं है, परमभोग का आस्वाद है। लेकिन भोग इतना परम हो जाता है कि तु्म्हें उसे करने की अलग से जरूरत नहीं होती।:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
21-04-2011, 12:56 PM
दोस्तों,
जैसे एक हवा का झोंका आता है, तो तुम्हारा रोआं-रोआं उस पुलक को अनुभव करता है, जो प्रेमी अपनी प्रेयसी के स्पर्श से अनुभव करेगा।
लेकिन हमने बच्चों को डराया हुआ है। उनको इतना डरा दिया है कि कभी काम में ठीक संभोग उपलब्ध ही नहीं हो पाता। वह भय बना ही रहता है कंजूसी कृपणता बनी ही रहती है। डर बना ही रहता है कि कहीं शक्ति खो न जाए। एक-एक दर्जन बच्चों के मां-बाप हो जाने के बाद भी लोगों को यह डर बना रहता है कि शक्ति कहीं खो न जाए।शक्ति खोने का डर नास्तिक को हो सकता है। आस्तिक को नहीं होना चाहिए।
आस्तिक कृपण हो जाए, बिलकुल समझ में नहीं आता।उस भय के कारण तुम्हें एकांत में प्रेम बड़ा मुश्किल मालूम पड़ेगा। लेकिन दोस्तों मेरा तो मानना है कि भय छोड़ो। और जैसा तुमने क्रोध तकिए पर प्रकट किया है, वैसा ही तुम प्रेम तकिए पर प्रकट करो। जो भी परिणाम हों, परिणामों की फिक्र जल्दी मत करो। यह भी हो सकता है कि प्राथमिक चरणों में तुम इतने उत्तेजित हो जाओ कि वीर्य-स्खलन हो जाए।
उस स्खलन को तुम परमात्मा के चरणों में समर्पण ही समझना। जिससे ऊर्जा आती है, उसी में वापस चली गई। तुम उससे भयभीत मत होना।जल्दी ही वह क्षण आ जाएगा, जब इस प्रेम के ध्यान में वीर्य का स्खलन नहीं होगा। और जब यह ध्यान गहन होगा और वीर्य का स्खलन न होगा, तब तुम एक नए स्वाद को उपलब्ध होओगे।
दोस्तों आपके विचारों का भी स्वागत है .........
अपना सहयोग दे कर सूत्र को आगे बढाए ..................
:globe::partly_cloudy::globe:
usha chauhan
21-04-2011, 01:58 PM
very nice
philogynist
23-04-2011, 01:18 PM
क्या कहना मर्द और औरत के रिश्ते का बड़ा ही अजीब होता है ये रिश्ता
“दूर हो तो लम्बी जुदाई ”
और ..
“पास हो तो लम्बी चुदाई “.
philogynist
23-04-2011, 01:19 PM
Sex & shopping have one thing in common!
In both the cases men start sweating in 15 minutes and women want to go on and on and on and on
dev bajpai1234
23-04-2011, 02:34 PM
बढिया जानकारी है
philogynist
24-04-2011, 02:25 PM
सेक्स आपकी सैलरी की तरह होता है। आप किसी को नहीं बताते कि आपको कितना मिलता है, लेकिन आपको हमेशा यही लगता है कि दूसरों को आपसे ज्यादा मिलता है...
shahbaaz4
24-04-2011, 02:50 PM
बहुत ही अच्छा और बहुत ही ज्ञान वर्धक सूत्र है
great_brother
28-04-2011, 01:14 PM
दोस्तों ,
जो भी परिणाम हों, परिणामों की फिक्र जल्दी मत करो। यह भी हो सकता है कि प्राथमिक चरणों में तुम इतने उत्तेजित हो जाओ कि वीर्य-स्खलन हो जाए। उस स्खलन को तुम परमात्मा के चरणों में समर्पण ही समझना। जिससे ऊर्जा आती है, उसी में वापस चली गई। तुम उससे भयभीत मत होना।जल्दी ही वह क्षण आ जाएगा, जब इस प्रेम के ध्यान में वीर्य का स्खलन नहीं होगा। और जब यह ध्यान गहन होगा और वीर्य का स्खलन न होगा, तब तुम एक नए स्वाद को उपलब्ध होओगे।
वह स्वाद है बिना शक्ति को खोए आनंद के अनुभव का। शक्ति जब तुम्हारे भीतर दौड़ती है प्रगाढ़ता से, तुम एक तूफान बन जाते हो शक्ति के, तुममें एक ज्वार आता है, लेकिन यह ज्वार तुम उलीचकर फेंक नहीं देते, यह ज्वार एक नृत्य बनकर तुममें ही लीन हो जाता है।इस फर्क को ठीक से समझ लें। एक तो साधारण जीवन का ढंग है, जिसको हम भोग कहते हैं, वह ढंग यह है कि तुममें एक ज्वार आता है, वह ज्वार भी जैसे चाय की प्याली में आया तूफान, क्योंकि लोकल है, जननेंद्रिय से संबंधित है। तो सारे शरीर में जो भी तरंगें उठती हैं, वे जननेंद्रिय पर जाकर केंद्रित हो जाती है। एक दो क्षण में चुक जाता है ज्वार। एक हवा आई, तुम आंदोलित हुए, जननेंद्रिय ने सारी ऊर्जा को लेकर निष्कासित कर दिया। जैसे फुग्गे से हवा निकल गई, तुम मुर्दा पड़ गए, सो गए। :globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
28-04-2011, 01:16 PM
दोस्तों,
यह जो क्षणभर के लिए ज्वार आना और खो जाना है, इसको तुमने भोग समझा है। यह तो भोग का अ, ब, स भी नहीं है।भोग की तंत्र की जो व्याख्या है, वह है, तुम्हारा पूरा शरीर ज्वार से भर जाए। रोआं-रोआं तरंगित हो, तुम अपने को इस तरंगायित स्थिति में बिलकुल विस्मृत ही कर जाओ, तुम्हें याद भी न रहे कि मैं हूं। नृत्य रह जाए, नर्तक न बचे। गीत रह जाए, गायक न बचे। तुम्हारा पूरा अस्तित्व एक्सटेटिक हो, समाधिस्थ हो, तो तुम एक ऊंचाई पर पहुंचोगे-ऊंचाई पर-रोज ऊंचाई बढ़ती जाएगी।और ध्यान रहे : यह जो ऊंचाई के बढ़ने की प्रतीति है, यह तुम्हारे पूरे शरीर को होगी, जैसे तुम्हारा पूरा शरीर स्पंदित हो रहा है, सजग हो रहा है। .
:globe::partly_cloudy::globe:
great_brother
28-04-2011, 01:19 PM
दोस्तों ,
अब अभी जननेंद्रिय में तुम स्पंदन अनुभव करते हो, सजगता अनुभव करते हो। तब पूरा शरीर शिवलिंग हो जाएगा और तुम अनुभव करोगे कि तुम्हारे शरीर की जो रूपरेखा है, वह खो गई है।
शिवलिंग कविता नहीं है, एक अनुभव है। और जब पूरे ज्वार से जीवन भर जाता है और तुम्हारा सारा शरीर रोमांचित होता है, तब तुम अपने आसपास ठीक शिवलिंग की आकृति में प्रकाश का एक वर्तुल देखोगे। तुम पाओगे कि तुम्हारे पूरे शरीर की रूपरेखा खो गई और शिवलिंग बन गया। एक प्रकाश का अंडाकार रूप, जिसमें तुम्हारी आंखें नहीं होंगी, नाक नहीं होगी, कान नहीं होंगे, हाथ नहीं होंगे, सिर्फ एक अंडाकार रूप रह जाएगा।यह ज्योतिर्मय जो रूप हैं, यह जो अंडाकार रूप है, यही तुम्हारी आत्मा का रूप है।
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great_brother
28-04-2011, 01:23 PM
दोस्तों ,
जिस दिन तुम मां के गर्भ में प्रवेश हुए, ठीक शिवलिंग की आकृति का एक प्रकाश-बिंदु मां के गर्भ में प्रविष्ट हुआ। शरीर तो तुम्हें गर्भ के भीतर मिला। जब तुम शरीर को छोड़ेगो, मृत्यु घटित होगी-पहले भी घटित हुई है-तब तुम्हारा शरीर आकार पड़ा रह जाएगा; शिवलिंग ज्योतिर्मय पिंड तुमसे उठेगा और दूसरी यात्रा पर निकल जाएगा।जिस दिन तुम संभोग की परम अवस्था में आओगे और पूरा शरीर रोमांचित होगा, उस दिन तुम जैसे जन्म के समय में घटना घटी थी, मृत्यु के समय में घटी थी, लेकिन जन्म के समय तुम मूर्च्छित थे, मृत्यु के समय फिर तुम मूर्च्छित हो जाओगे, इस संभोग के क्षण में-इस संभोग का कोई संबंध दूसरे से नहीं है, इस संभोग का संबंध तुम्हारे भीतर शरीर के सब बांध को तोड़कर तुम्हारी चेतना का शिवलिंग बन जाने से है-तुम्हें पहली दफा अपने स्वरूप को अनुभव होगा।
यह स्वरूप अस्तित्व के साथ जो आनंद का अनुभव करता है, उसको तंत्र ने संभोग कहा है।यह एकांत में भी घट सकता है, किसी के साथ भी घट सकता है।लेकिन दोस्तों मैं तुमसे कहता हूं, एकांत की ही तुम चिंता करना, क्योंकि दूसरे के साथ भी घटेगा, तो भी तुम जानोगे कि इसका दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं है।
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आप अपने पुण्य विचार देते रहे ............
great_brother
28-04-2011, 01:26 PM
दोस्तों ,
यह घटना स्वतंत्र है। रोएं-रोएं से प्रकाश निकलता है, तुम्हारे भीतर एक ज्वार उठता है। और जो फर्क है...जब तुम्हारे भीतर पूर्ण ज्वार होता है, तो उस पूर्ण ज्वार का कोई भी स्खलन नहीं है।
वह स्खलित होगा भी कैसे :question: और जो अंडाकार आकृति है, वह स्खलन को रोकती है। उसमें कहीं छिद्र भी नहीं है, जहां से स्खलन हो सके। ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है। और धीरे-धीरे, धीरे-धीरे तुममें फिर लीन हो जाती है, तुमसे बाहर नहीं जाती। तुममें उठती है, तुममें लीन हो जाती है। जैसे सागर में ज्वार आता है, फिर लीन हो जाता है। कहीं कुछ खोता नहीं।....
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great_brother
28-04-2011, 01:29 PM
दोस्तों,
मैंने जो अब तक आपको बताया वो अपने आप में काफी बड़ा मामला है लेकिन इसमें जो सबसे बड़ी बात निकल कर सामने आती है वह यह कि जैसे जैसे उम्र ढलती जाती है वैसे-वैसे सेक्स की क्षमता कम होती जाती है. शायद कई लोग तो यह भी कह देते हैं कि एक उम्र के बाद लोग सेक्स के काबिल भी नहीं रहते जबकि यह गलत है. यह सही है कि उम्र और सेक्स का गहरा नाता है वहीं सबसे जरूरी है विषय के बारे में जानकारी. ज्यादातर लोग अपने अधकचरे ज्ञान या कई बार अज्ञानता की वजह से ढलती उम्र में सेक्स को सही नहीं मानते......
आप अपने पुण्य विचार देते रहे ............
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great_brother
28-04-2011, 01:38 PM
दोस्तों,
खैर यह सब तो बाते है अब आते हैं मूल विषय में - यह सही है कि ढलती उम्र में सेक्स युवा दिनों के सेक्स के समान तो नहीं होता है लेकिन उसे पूर्ण संतोषजनक बनाया जा सकता है. अगर यह कह दें कि सेक्स के लिये उम्र की कोई बाध्यता नहीं है बस जरूरत है तो थोड़ी सी जागरुकता की.. दोस्तों थोड़ा सब्र रखे मैं आपको आगे विस्तार से बताऊंगा कि ऐसा कैसे संभव है .............
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आप भी इस विषय पर अपने पुण्य विचार देते रहे ............
great_brother
28-04-2011, 01:40 PM
दोस्तों ,
एक बेहतर सेक्स लाइफ का आशय सिर्फ चरम उत्कर्ष मात्र से नहीं लगाया जाना चाहिये बल्कि इसमें बेहतर स्वास्थ्य व स्वाभिमान भी शामिल होता है. इसलिये उम्र बढ़ने के साथ ही स्वास्थ्य व स्वाभिमान पर भी ध्यान दें तो इस अवस्था में भी आप शानदार व संतोषजनक सेक्स लाइफ का आनंद उठा सकते हैं. कई बार तो यह भी देखा गया है कि लोग 80 साल की उम्र में भी शानदार सेक्स लाइफ गुजार रहे होते हैं. इस लिये यह भूल जाइये कि सेक्स सिर्फ युवाओं के लिये हैं. फिर सवाल उठता है कि उम्र के साथ क्या परिवर्तन आता है :question:
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great_brother
28-04-2011, 01:46 PM
दोस्तों ,
समय के साथ पुरुषों में टेस्टॉस्टेरॉन का स्तर कम होता है जिससे लोगों की सेक्स के प्रति रुचि कम होती है साथ ही अवस्था के अनुरूप सेक्स क्षमता में भी कुछ कमी आती है. उत्थान(erection) व चरमोत्कर्ष - कामोन्माद(orgasm) के लिये काफी पहले की अपेक्षा काफी उकसावे(stimulation) की जरूरत होती है. रति निष्पत्ति जल्दी हो जाती है. स्खलन कम शक्तिशाली हो जाता है तथा वीर्य भी कम मात्रा में निकलता है. तथा एक स्खलन के पश्चात दूसरे उत्थान के लिये काफी लंबा समय लगता है. इसके अलावा व्यक्ति का स्वास्थ्य भी बेहतर सेक्स लाइफ का सबसे बड़ा इम्पैक्ट या मूल्यांकन होता है.
यदि आप या आपका पार्टनर का स्वास्थ्य कमजोर है या फिर काफी समय से हृदय संबंधी बीमारी या संधिशोथ (arthritis) से पीड़ित हैं तो बढती उम्र के साथ सेक्स और चैलेन्जिंग होता जाता है.
वहीं कुछ सर्जरी तथा औषधियां जैसे ब्लड प्रेशर, एन्टीहिस्टामीन, एन्टी डिप्रेशेन्ट सहित एसिड ब्लोकिंग की दवाएं भी सेक्सुअल प्रणाली पर प्रभाव डालती हैं. इस लिये इस उम्र में शारीरिक अवस्था में हो रहे परिवर्तन के अनुरूप अपनी सीमाएं जाननी चाहिये इसलिये महज सुने सुनाए सगूफे के आधार पर ढलती उम्र में अपनी सेक्स लाइफ का सहज निर्धारण न करें बल्कि जरूरत हो तो अपने चिकित्सक से भी बात करें साथ ही अपने पार्टनर से भी लगातार बात करनी चाहिये.
40 वर्ष या फिर उससे ज्यादा के होने पर सेक्स लाइफ में कुछ स्वाभाविक परिवर्तन आने लगते है. इस दौरान भी बेहतर सेक्स लाइफ बनाए रखने के लिये जरूरी है कि अपने पार्टनर से ज्यादा से ज्यादा इस बारे में बात करें. सेक्स को लेकर पार्टनर की राय क्या है इसपर खुलकर बात करनी चाहिये. ज्यादतर उम्रदराज लोग इस उम्र में सेक्स चर्चा को असंगत व निषिद्ध मानते हैं. जबकि पार्टनर से खुली सेक्स चर्चा (जिसमें आपकी जरूरतें , पसंद, अभिलाषा व कमजोरी) करनी चाहिये. इससे आप एक दूसरे के और ज्यादा करीब आते हैं साथ ही बेहतर सेक्स लाइफ गुजारने में भी काफी मदद मिलती है.
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आप अपने पुण्य विचार देते रहे ............
पसंद आने पर रेपो++ देना ना भूले ..............
great_brother
03-05-2011, 10:20 PM
3 मिनट पर्याप्त है सेक्स के लिये
मित्रों,
अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि सेक्स समय बढ़ाने का उपाय बतायें जिससे पता चलता है कि ज्यादातर लोगों को सेक्स की टाइमिंग के बारे में काफी भ्रम है. जबकि हकीकत कुछ मिनटों की ही होती है.
अमेरिकी और कनाडाई यौन विशेषज्ञों द्वारा सेक्स संबंधी एक नए सर्वेक्षण के नतीजों के मुताबिक ‘श्रेष्ठतम यौन क्रिया’ कुछ ही मिनटों की होती है। सर्वेक्षण में साफतौर पर कहा गया है कि ‘लंबी’ यौन क्रिया का दावा करने वाले संभवत: झूठ कहते हैं। पेन्न स्टेट विश्वविद्यालय के शोधकर्मियों एरिक कोर्टी एवं जिने गार्डियानी ने सोसायटी फॉर सेक्स थैरेपी एंड रिसर्च के सदस्यों के समूह से बात करने के बाद अपने नतीजे घोषित किए। समूह के सदस्यों में अनेक मनोविश्लेषक, डॉक्टर, समाजसेवी, विवाह एवं परिवार सलाहकार और नर्से शामिल हैं जिन्होंने कई दशकों के अनुभव के आधार पर अपने विचार दिए।
शोधकर्ताओं के अनुसार ‘संतोषप्रद’ यौन क्रिया का काल तीन से 13 मिनट के बीच का ही होता है। समूह के 68 प्रतिशत सदस्यों ने यौन क्रिया की शुरुआत से अंत तक की भिन्न समयावधियां निर्धारित की।
उन्होंने सात मिनट की अवधि को ‘पर्याप्त’, 13 मिनट को ‘संतोषप्रद’, एक से दो मिनट को ‘काफी कम’, और दस से तीस मिनट को ‘उबाऊ’ कहा। शोधकर्ताओं के अनुसार आधुनिक समाज में यौन क्रियाओं संबंधी अनेक भ्रामक धारणाओं ने सिर उठा लिया है। अनेक युवक और युवतियां लंबी यौन क्रियाओं की फंतासियां रचने लगे हैं।
उनके अनुसार इस सर्वेक्षण से सेक्स संबंधी अनेक झूठी धारणाओं को समाप्त करने में मदद मिलेगी और इससे यौन संबंधी उदासीनता और असमर्थता पर भी रोक लगेगी।
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great_brother
03-05-2011, 10:36 PM
दोस्तों इस सूत्र के बारे में अपने विचार अवश्य दे .........
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ravi chacha
03-05-2011, 10:54 PM
दोस्तों ,
जो भी परिणाम हों, परिणामों की फिक्र जल्दी मत करो। यह भी हो सकता है कि प्राथमिक चरणों में तुम इतने उत्तेजित हो जाओ कि वीर्य-स्खलन हो जाए। उस स्खलन को तुम परमात्मा के चरणों में समर्पण ही समझना। जिससे ऊर्जा आती है, उसी में वापस चली गई। तुम उससे भयभीत मत होना।जल्दी ही वह क्षण आ जाएगा, जब इस प्रेम के ध्यान में वीर्य का स्खलन नहीं होगा। और जब यह ध्यान गहन होगा और वीर्य का स्खलन न होगा, तब तुम एक नए स्वाद को उपलब्ध होओगे।
वह स्वाद है बिना शक्ति को खोए आनंद के अनुभव का। शक्ति जब तुम्हारे भीतर दौड़ती है प्रगाढ़ता से, तुम एक तूफान बन जाते हो शक्ति के, तुममें एक ज्वार आता है, लेकिन यह ज्वार तुम उलीचकर फेंक नहीं देते, यह ज्वार एक नृत्य बनकर तुममें ही लीन हो जाता है।इस फर्क को ठीक से समझ लें। एक तो साधारण जीवन का ढंग है, जिसको हम भोग कहते हैं, वह ढंग यह है कि तुममें एक ज्वार आता है, वह ज्वार भी जैसे चाय की प्याली में आया तूफान, क्योंकि लोकल है, जननेंद्रिय से संबंधित है। तो सारे शरीर में जो भी तरंगें उठती हैं, वे जननेंद्रिय पर जाकर केंद्रित हो जाती है। एक दो क्षण में चुक जाता है ज्वार। एक हवा आई, तुम आंदोलित हुए, जननेंद्रिय ने सारी ऊर्जा को लेकर निष्कासित कर दिया। जैसे फुग्गे से हवा निकल गई, तुम मुर्दा पड़ गए, सो गए। :globe::partly_cloudy::globe:
बेहतरीन सूत्र है मित्र सफलता आपके नित कदम चूमें...
bharat_aashish
04-05-2011, 12:30 AM
लगता हैं की, इस सूत्र के लेखक, विदेश के मनोवेग्यानिक फ्रायड से प्रभवित हैं, फ्रायड के भी विचार इनसे मिलते जुलते हैं.
में लेखक से ये पूछना चाहता हूँ की जो ज्यादा सेक्स करते हैं उनके चेहरे की चमक, और शरीर की ताकत कम क्यूँ होती हैं (मुझे इस की सफाई देने की जरुरत नहीं हैं क्यूंकि मेने ये देखा हैं और मेरा अनुभव हैं.)
अगर आप नए ज़माने की बात करते हैं तो science ने माना हैं की जयादा सेक्स करने से सेक्सुअल हेअलथ को नुकसान होता हैं चाहो तो किसी सेक्सोलोगिस्ट से पूछ सकते हो.
और दूसरी बात आप तो इसे फोरम से वरिष्ठ सदस्य हैं पर जो दुनिया से महान दार्शनिक ने कहा था.
"स्त्री से सम्भोग जीवन में एक बार,
अगर इसे इच्छ शांत न होतो साल में एक बार,
अगर इसे भी इच्छ शांत न होतो महीने में एक बार,
अगर इसे भी इच्छ शांत न होतो रोज करो पर उससे पहले अपने कब्र खोद्लेना "
और अगर आप इंडियन मेथोलोगी को मानते हैं तो उसे ध्यान से पड़े आपके विचार बदलेंगे.
वैसे आप वरिष्ठ सदस्य हैं तो में कुछ नहीं कर सकता, अगर कर सकता तो सूत्र बंद करने के लिए पोस्ट करता. पर वो हो नहीं सकता.
और वैसे भी किसीको दुसरो के अनुभाव से सिखाने की आदत नहीं होती, तो आप अपने विचार पर कायम रहें और अपने जीवन की आखरी साँस तक का अनुभव हमें भेजे हम उस पर विचार करेंगे. बस आपको इसके लिए अपना जीवन देना होगा.
great_brother
03-10-2011, 02:21 PM
मित्रों,
सेक्स वैज्ञानिकों का कहना है कि सेक्स के बारे में स्त्री-पुरुष दोनों के विचार अलग-अलग होते हैं। लोग अक्सर अपनी शिक्षा और ज्ञान के आधार पर सेक्स की परिभाषा देते हैं। सेक्स विशेषज्ञों ने सेक्स के बारे में लोगों के विचारों का अध्ययन करके यह पता लगाया कि लोगों कि मानसिकता और सोच जिस प्रकार की होती है उसके मन में सेक्स के लिए उसी तरह के विचार उत्पन्न होते हैं।
great_brother
03-10-2011, 02:22 PM
सेक्स के प्रति व्यक्तियों के विचारः–
1.जब विशेषज्ञों ने लोगों से पूछा कि सेक्स क्या है? तो उनका जवाब था कि सेक्स मन की भावना है जो संसार के सभी स्त्री-पुरुषों में मौजूद होती है।
2. कुछ अन्य लोगों से सेक्स के बारे में पूछने पर पता चला कि उनके विचार दूसरों के विचारों से बिल्कुल अलग हैं। उन लोगों का कहना था कि सेक्स स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे के प्रति आकर्षण पैदा करनी वाली मानसिक प्रतिक्रिया है।
3. कुछ लोगों के अनुसार सेक्स ही प्रकृति है। उनका कहना था कि स्त्री-पुरुष के मिलन से ही मावन जीवन का अस्तित्व मौजूद है। इनके मिलने से ही इस सुन्दर प्रकृति का निर्माण होता है।
great_brother
03-10-2011, 02:23 PM
4. समाज में कुछ ऐसे भी लोग मौजूद हैं जिनका जबाव प्राकृतिक से बिल्कुल अलग था। ऐसे लोगों के अनुसार सेक्स एक प्रकार की मानसिक भूख है जो हर स्त्री-पुरुष को अवश्य लगती है।
5. जब सेक्स विशेषज्ञों ने कुछ युवक-युवतियों से सेक्स के बारे में अपने विचार प्रकट करने को कहा तो उनका कहना था कि सेक्स प्यार का एक स्रोत है जो स्त्री-पुरुष के बीच संपन्न होता है और इससे संसार में अमन और चैन कायम रहता है।
6. सेक्स स्त्री-पुरुष दोनों के मन में उत्पन्न एक इच्छा होती है जो सेक्स करने के बाद भी खत्म नहीं होती।
great_brother
03-10-2011, 02:24 PM
7. शरीर विज्ञान के अनुसार सेक्स शारीरिक व मानसिक आवश्यकता है जो स्त्री-पुरुष के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में लाभकारी होती है।
8. कुछ विचारों का कहना है कि सेक्स एक कला है जो स्त्री-पुरुष को शारीरिक व मानसिक आनन्द देती है।
9. सेक्स सफल जीवन की एक सुखद यात्रा है। सेक्स के द्वारा स्त्री-पुरुष को शारीरिक, मानसिक और आंतरिक सुख और शांति मिलती है।
great_brother
03-10-2011, 02:25 PM
मित्रों,
इस तरह अलग-अलग विचारकों के लिए सेक्स की परिभाषा भी अलग-अलग है। साधारण रूप में कहा जाए तो सेक्स स्त्री-पुरुष के शारीरिक व मानसिक सुख और आनन्द का मात्र एक साधन है। सेक्स विशेषज्ञों के अनुसार मनुष्य के जीवन में सेक्स का काफी महत्व है। सेक्स के बिना मनुष्य जीवन का सही आनन्द नहीं प्राप्त कर सकता है। सेक्स संबंध सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि भावनात्मक भी होना चाहिए अर्थात सेक्स के लिए स्त्री-पुरुष दोनों के मन में इच्छा होनी चाहिए। सेक्स एक ऐसी क्रिया है जिसे यदि स्त्री-पुरुष अपनी इच्छा से करे तो शारीरिक व मानसिक आनन्द प्राप्त होता है लेकिन सेक्स के लिए यदि दोनों में से किसी एक की इच्छा न हो फिर भी सेक्स किया जाए तो उसे बलात्कार ही कहा जाएगा ।
great_brother
03-10-2011, 02:36 PM
मित्रों,
अपने विचार और अनुभव भी इस सूत्र पर दे... और इस सूत्र को सफल बनाने में योगदान दे .............
great_brother
03-10-2011, 04:17 PM
मित्रों,
विवाह के बाद स्त्री-पुरुष अपने नए जीवन अर्थात पारिवारिक जीवन की शुरुआत करते हैं। पारिवारिक जीवन सुखद बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि स्त्री-पुरुष दोनों के आपसी संबंध अच्छे हों और दोनों के बीच सेक्स संबंध भी अच्छे हों। पारिवारिक जीवन को सफल बनाने के क्रम में सेक्स संबंध काफी महत्वपूर्ण होता है। सेक्स संबंध में असफलता के कारण स्त्री-पुरुष दोनों में कई प्रकार की परेशानी उत्पन्न होने लगती है। सेक्स में असफलता से लोगों में निराशा, परेशानी तथा भय उत्पन्न होने लगते हैं। इस तरह की परेशानी के कारण पति-पत्नी का वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है। सेक्स एक व्यक्तिगत कार्य है जिसके बारे में व्यक्ति किसी दूसरे को बताना नहीं चाहता है। कुछ ऐसे भी लोग होते है जो सेक्स संबंधी किसी भी परेशानी को दूसरे को बताने से शर्माते हैं। सेक्स के बारे में सही ज्ञान न होने से भी व्यक्ति का वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है। सेक्स संबंधों में असफलता के कारण कभी-कभी वैवाहिक जीवन पूर्ण रूप से बिखर जाते हैं। कुछ लोग तो इसी समस्या से परेशान होकर हत्या, आत्महत्या, तलाक, मारपीट तथा अन्य हिंसक कार्य कर बैठते हैं।
great_brother
03-10-2011, 04:19 PM
मित्रों सेक्स एक प्रकार की कला है ..........
वैवाहिक जीवन में सेक्स संबंधों का महत्व होने के कारण ही सेक्स विशेषज्ञों व विचारकों ने इसे एक कला का नाम दिया है। इस कला की सही जानकारी सभी लोगों को होनी चाहिए ताकि व्यक्ति सेक्स का सही आनन्द प्राप्त कर सके और इससे जुड़े वैवाहिक जीवन सुखी हो सके। सेक्स की सही जानकारी होने से स्त्री-पुरुष दोनों ही सेक्स क्रिया द्वारा शारीरिक व मानसिक आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। सेक्स की इन कलाओं को जानने के लिए सेक्स के प्रति रुचि व इच्छा होनी आवश्यक है। सेक्स की कला को जानने के लिए स्त्री के हर अंग, अदा. आदतें और हर बात को समझना आवश्यक है। सेक्स का सही ज्ञान होने से ही व्यक्ति अपने वैवाहिक जीवन को सुखी बना सकता है।
great_brother
03-10-2011, 04:20 PM
मित्रों,
सेक्स के ज्ञान के लिए व्यक्ति को स्त्री के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। इस तरह सेक्स और स्त्री के बारे में जानकारी होने से ही व्यक्ति अपनी पत्नी को सेक्स से संतुष्ट व खुश कर सकता है और अपने सेक्स संबंध को सफल बना सकता है। जिन्हें सेक्स के बारे में सही जानकारी नहीं होती वे सेक्स करते समय स्त्री को खुश नहीं कर पाते और न स्वयं ही सेक्स का आनन्द ले पाते हैं। सेक्स कला को जानने वाले व्यक्ति ही स्त्री को सही संतुष्ट कर पाते हैं और सेक्स का पूर्ण आनन्द प्राप्त कर पाते हैं। सेक्स कला को जानने के बाद समय के साथ उसमें और निखार आता जाता है। अतः सेक्स के बारे में सही ज्ञान होना आवश्यक है और वह वैवाहिक जीवन के लिए बेहद आवश्यक है।
great_brother
03-10-2011, 04:22 PM
मित्रों ये भी जाना जरुरी है कि सेक्स सुख क्या है?
सेक्स क्रिया के दौरान जब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे में लीन हो जाते हैं और वह शारीरिक व मानसिक रूप से जो महसूस करते उसे ही सेक्स सुख कहते हैं। सफल सेक्स संबंध बनाने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को ही एक-दूसरे को अच्छी तरह जानना और समझना चाहिए। सेक्स संबंध बनाने के लिए दोनों की सहमति होनी आवश्यक है जिससे दोनों को सेक्स का सही आनन्द प्राप्त हो सके। सेक्स विशेषज्ञों का कहना है कि सेक्स जल्दबाजी में किया जाने वाला काम नहीं है बल्कि सूझ-बूझ और धैर्य से किये जाने वाला काम है। सेक्स संबंध का वास्तविक सुख वही है जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों को ही शारीरिक व मानसिक सुख प्राप्त हो सके। अतः सेक्स विशेषज्ञों के अनुसार अच्छे सेक्स संबंधों के लिए सेक्स का ज्ञान होने के साथ-साथ स्त्री-पुरुष दोनों को एक-दूसरे को जानना बेहद आवश्यक है।
great_brother
03-10-2011, 04:24 PM
शारीरिक क्रिया और सेक्सः
जब स्त्री-पुरुष के मन में एक-दूसरे के लिए आकर्षण उत्पन्न होता है तब उनके शरीर की गंध, स्पर्श और आवाज से मन में सेक्स की इच्छा उत्पन्न होती है जिससे मस्तिष्क में सेक्स हार्मोन का स्राव होने लगता है। इस तरह जब मन में सेक्स की इच्छा उत्पन्न होती है तब यह इच्छा सीधे मेरुदण्ड के उत्थान केंद्र पर पहुंचकर सेक्स तंत्रिकाओं को सेक्स इच्छा की सूचना देती है जिससे तुरंत लिंग में हार्मोन भर जाता है और वह उत्तेजित हो जाता है।
great_brother
03-10-2011, 04:25 PM
मित्रों,
सेक्स संबंध बनाते समय जब लिंग योनि में प्रवेश करता है तब स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर में तेजी से परिवर्तन होता है। इस क्रिया के दौरान नाड़ी की गति बढ़ जाती है, रक्तचाप (ब्डप्रेशर) तेज हो जाता है, पूरे शरीर में खून तेजी से प्रवाह होने लगता है और त्वचा पर लाली आ जाती है। सेक्स के दौरान स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर रोमांच से भर जाते हैं और सांस की गति बढ़ जाती है। सेक्स क्रिया जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे शरीर की गति तेज होती जाती है और मुंह से सिसकारियों की आवाज होने लगती है। सेक्स संबंध के दौरान कुछ लोग इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि सेक्स क्रिया में वे बड़बड़ाने भी लगते हैं।
great_brother
03-10-2011, 04:26 PM
सेक्स संबंधों के दौरान जैसे ही पुरुष स्त्री की योनि में लिंग प्रवेश करता है वैसे ही उसके कामोत्तेजक अंगों में तेजी से परिवर्तन होने लगते हैं। लिंग में तनाव आते ही प्रोस्टेट और शुक्राशय भी उत्तेजित हो जाते हैं और उसमें वीर्य के रूप में मौजूद दो करोड़ शुक्राणु सक्रिय हो जाते हैं। सेक्स क्रिया के दौरान पुरुष द्वारा अपने लिंग के योनि से घर्षण कराने की गति जैसे-जैसे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे मस्तिष्क तथा तंत्रिकाओं में उत्तेजना बढ़ती जाती है। जब सेक्स क्रिया अंतिम स्थिति में पहुंच जाती है तो शुक्राशय से शुक्राणु निकलने की स्थिति बन जाती है अर्थात वीर्यपात होने की स्थिति बन जाती है। सेक्स क्रिया के दौरान जब लिंग अधिक उत्तेजित हो जाता है और वीर्य वाली नली भर जाती है तो वीर्यपात हो जाता है जैसे ही वीर्यपात होता है वैसे ही मस्तिष्क और कामांगों का संपर्क टूट जाता है। इसके बाद प्रोस्टेट ग्रंथि, शुक्राशय तथा अन्य पेशियों और तंत्रिकाओं की उत्तेजना समाप्त हो जाती है और वे ढ़ीले पड़ने लगते हैं। वीर्यपात होने के बाद लिंग में खून का प्रवाह धीरे-धीरे कम हो जाता है और वह सिकुड़ने लगता है।
great_brother
03-10-2011, 04:33 PM
सेक्स ज्ञान की आवश्यकताः
सेक्स का भरपूर आनन्द व सुख प्राप्त करने के लिए सेक्स के बारे में जानना आवश्यक है। जब तक सेक्स के बारे में सही जानकारी नहीं होती तब तक सेक्स का पूर्ण आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता। सेक्स की जानकारी के अभाव में व्यक्ति न तो स्वयं सेक्स का आनन्द ले पाता है और न ही अपनी पत्नी को संतुष्ट कर पाता है। कुछ लोग सेक्स की जानकारी के अभाव में अधूरी सेक्स क्रिया करते हैं जो स्त्री-पुरुष दोनों के लिए शारीरिक व मानसिक रुप से हानिकारक होता है। सेक्स की सही जानकारी सेक्स को पॉवरफुल बनाए रखने में मदद करती है। सेक्स की सही जानकारी से ही सेक्स क्रिया को लम्बे समय तक बनाए रखा जा सकता है।
great_brother
03-10-2011, 04:33 PM
मित्रों,
सेक्स के मामले में वैज्ञानिकों का कहना है कि सेक्स क्रिया में पुरुष जल्दी उत्तेजना का अनुभव करने लगते हैं जबकि स्त्री में सेक्स की उत्तेजना देर से होती है। ऐसे में स्त्री को पूर्ण रुप से उत्तेजित किए बिना ही सेक्स संबंध बनाने से स्त्री को सेक्स का सही सुख नहीं मिल पाता है जिसका परिणाम होता है कि स्त्री अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में स्त्री को उत्तेजित करने के लिए फोर प्ले का प्रयोग किया जाता है जिसमें सेक्स संबंध बनाने से पहले स्त्री के कामुक अंगों को स्पर्श करके उत्तेजित किया जाता है और जब वह पूर्ण रुप से उत्तेजित हो जाती है तो फिर सेक्स किया जाता है। इसलिए अनेक प्रकार के रोग से बचने और सेक्स का सही आनन्द उठाने के लिए सेक्स क्रिया की सही जानकारी होनी आवश्यक है।
great_brother
03-10-2011, 04:34 PM
सेक्स करने के तरीकेः
सेक्स संबंध के लिए स्त्री में उत्तेजना पैदा करने के लिए पुरुष कई प्रकार की क्रियाएं करते हैं लेकिन स्त्री को उत्तेजित करने वाली इन क्रियाओं को पुरुष एक साथ न करके आगे-पीछे करते हैं। स्त्री के साथ की जाने वाली सेक्स क्रियाएं हैं- स्त्री को आलिंगन करना अर्थात बाहों में भरना, चुम्बन लेना और सहलाना।
great_brother
03-10-2011, 04:37 PM
मित्रों,
जब पुरुष, स्त्री के साथ ये सभी क्रियाएं करते हैं तो उसमें उत्तेजना पैदा होती है जिसके बाद स्त्री-पुरुष दोनों सेक्स संबंध बनाते हैं जिससे सेक्स का सही आनन्द प्राप्त होता है। इस तरह सेक्स क्रिया का सही आनन्द प्राप्त करने के लिए पुरुष को चाहिए कि वह अपनी स्त्री या प्रेमिका को प्यार करें, उसके होंठ को चूमें, उसके स्तनों को सहलाएं, उसे बांहों में भरकर चुम्बन लें और उसकी जांघों पर हाथ फेरें। इस तरह की क्रिया करने से स्त्री की कामोत्तेजना तेज होती है और वह सेक्स करने के लिए तैयार हो जाती है। इस प्रकार सेक्स करने से स्त्री-पुरुष दोनों को ही अत्यंत आनन्द मिलता है।
Raman46
03-10-2011, 04:37 PM
बहुत अच्छी जानकारी दे रहे मित्र / धन्यबाद
great_brother
03-10-2011, 04:38 PM
मित्रों,
वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में सेक्स करने के कई तरीके बताएं हैं। उनका कहना है कि सेक्स करने के कई तरीके हैं लेकिन सेक्स की क्रियाविधि एक ही होती है। इस क्रिया में पुरुष अपने उत्तेजित लिंग को स्त्री की योनि में प्रविष्ट कराकर घर्षण करता है और स्खलित हो जाता है। इस तरह किये जाने वाले कार्य को सेक्स क्रिया कहते हैं। इस क्रिया में पुरुष अपने लिंग को स्त्री की योनि में प्रवेश कराकर घर्षण करता है और स्खलित होने के बाद अपने लिंग को योनि से बाहर निकाल लेता है। इस प्रकार साधारण रुप से किये गए सेक्स क्रिया को सेक्स एक्ट कहा जाता है।
great_brother
03-10-2011, 10:30 PM
मित्रों अपेक्षा से बहुत कम रिस्पोंस आ रहा है ............... अपने विचार अवश्य दे ...........
great_brother
03-10-2011, 10:36 PM
मित्रों ,
सेक्स विशेषज्ञों का कहना है कि यह बात बिल्कुल सही है कि लिंग को योनि में प्रवेश कराकर घर्षण करने के बाद स्खलित होने को ही सेक्स क्रिया कहते हैं लेकिन ऐसी सेक्स क्रिया पशु भी करते हैं। फिर मनुष्य और पशु की सेक्स क्रिया में क्या अंतर है। ऐसे सवालों का जवाब देते हुए सेक्स विशेषज्ञ कहते हैं कि पशु के सेक्स में मन की भूमिका नहीं होती जबकि मनुष्य के अंदर मन की भूमिका होती है और वे अपनी संवेदन और कल्पना शक्ति द्वारा अपार सेक्स आनन्द अनुभव कर सकते हैं। यही कारण है कि सेक्स क्रिया में अधिक आनन्द और सुख प्राप्त करने के लिए सेक्स के अलग-अलग तरीके बताए हैं।
great_brother
03-10-2011, 10:39 PM
मित्रों जैसा की आप जानते ही होंगे कि सेक्स क्रिया को विभिन्न तरीकों से करके और भी अधिक आनंददायक बनाया जा सकता हैः-
1. सेक्स क्रिया में पूर्ण संतुष्टि पाने के लिए स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे के अगल-बगल लेटकर सेक्स करना चाहिए। सेक्स के लिए पुरुष को बांईं करवट लेटना चाहिए ताकि वह अपने दाएं हाथ से स्त्री के संवेदनशील अंगों को सहला सके। यदि पुरुष का बांईं हाथ तेजी से चलता हो तो दाएं करवट लेटकर भी सेक्स क्रिया आसानी से की जा सकती है।
2. सेक्स का दूसरा तरीका यह है कि सेक्स के लिए पुरुष नीचे लेट जाए और स्त्री ऊपर लेटकर सेक्स क्रिया कर सकती हैं। इससे स्त्री-पुरुष दोनों को ही सेक्स का भरपूर आनंद मिलता है। इस तरह की पोजीशन में सेक्स करना उन लोगों के लिए अधिक लाभकारी है जो शीघ्रपतन के रोगी हैं। इससे विपरीत पोजीशन में लेटकर भी सेक्स क्रिया की जा सकती है।
great_brother
03-10-2011, 10:40 PM
3. पीठ के बाल लेटी हुई स्त्री के दोनों टांगों को पुरुष अपने कंधे पर रखकर लिंग को योनि में प्रवेश कराकर धीरे-धीरे सेक्स किया जा सकता है।
4. सेक्स करने के लिए स्त्री-पुरुष को आमने-सामने बैठकर लिंग को स्त्री की योनि में प्रवेश कराकर धीरे-धीरे सेक्स क्रिया करें।
great_brother
03-10-2011, 10:41 PM
५. स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे के पैरों के बीच में से पैर निकाल कर सेक्स क्रिया करनी चाहिए।
६. सेक्स क्रिया दीवार के सहारे भी किया जा सकता है। इस क्रिया में स्त्री को दीवार के सहारे खड़ा करा दें और फिर अपने लिंग को योनि में प्रवेश कराकर धीरे-धीरे सेक्स करना चाहिए और अपनी दोनों हाथों से स्त्री के स्तनों को सहलाना चाहिए।
great_brother
03-10-2011, 10:41 PM
७. सेक्स करने के लिए पुरुष उकड़ूं की स्थिति में बैठ जाएं और अपनी गोद में स्त्री को बैठाकर सेक्स क्रिया करें। इस क्रिया को स्त्री नीचे बैठकर और पुरुष को गोद में रखकर भी कर सकती है।
८. सेक्स क्रिया में और आनंद प्राप्त करने के लिए स्त्री अपने दोनों घुटने को मोड़कर खड़े हो जाए और पुरुष भी घुटनों के बल खड़े हो जाएं। इसके बाद धीरे-धीरे सेक्स क्रिया करनी चाहिए।
great_brother
03-10-2011, 10:43 PM
९. इस तरह अन्य आसनों की तरह पशु आसन भी होता है जिसमें स्त्री अपने दोनों हाथ-पैरों के सहारे जानवर के समान खड़ी हो जाती हैं और पुरुष भी उसी पोजीशन में खड़े हो जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे सेक्स क्रिया करते हैं। इस तरह किये जाने वाले सेक्स क्रिया को एनीमल पोजीशन कहते हैं।
मित्रों आप भी कुछ आसान, जो आप सैक्स के समय आजमाते है, को यहाँ प्रस्तुत कर सकते है.........
great_brother
03-10-2011, 10:44 PM
मित्रों,
इस तरह अलग-अलग पोजीशन में सेक्स करने से सेक्स का सही आनन्द और सुख प्राप्त किया जा सकता है। सेक्स क्रिया के लिए अपने अनुसार पोजीशन बनाया जा सकता है। हर बार एक ही पोजीशन में सेक्स करने से सेक्स क्रिया में पूर्ण आनन्द नहीं मिल पाता। सेक्स क्रिया चाहे किसी भी पोजीशन में करें लेकिन एक बात का ध्यान अवश्य रखें कि सेक्स के दौरान पत्नी को किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो। उसे किसी स्थिति में खड़े होने, बैठने और लेटने में किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। कठिन आसन में सेक्स कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से सेक्स क्रिया में नयापन तो होता है लेकिन कभी-कभी इसमें मजा नहीं आता। सेक्स क्रिया में आनंद प्राप्त करने के लिए अलग-अलग आसन अपनाना चाहिए। सेक्स संबंध बनाने के लिए अपने साथी से यह अवश्य पूछना चाहिए कि किस आसन में उसे सेक्स संबंध बनाना अधिक अच्छा लगता है और फिर उसी आसन में सेक्स करना चाहिए।
great_brother
03-10-2011, 10:46 PM
मित्रों यहाँ आपको ये बताना जरुरी है कि यदि स्त्री गर्भवती हो तो ऐसी अवस्था में साधारण आसन में ही सेक्स क्रिया करनी चाहिए। यदि स्त्री 6 महीने की गर्भवती हो तो उसके साथ सेक्स संबंध नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इससे जन्म होने वाले बच्चे पर प्रभाव पड़ सकता है।
सेक्स से पहले फोर प्ले के द्वारा स्त्री को उत्तेजित करने की आवश्यकता होती है। फोर प्ले के द्वारा जब स्त्री में उत्तेजना उत्पन्न हो जाए है तब सेक्स संबंध बनाया जा सकता है।
7color
06-10-2011, 04:27 PM
प्रकृति के उत्पन्न होने और आगे बढ़ने के लिए प्रमुख तौर पर जिम्मेदार..........
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