View Full Version : भाव
भाव
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भावों के चार रूपों अथवा भावों की चार अवरस्थाओं- भावशान्ति, भावोदय, भावसंधि और भावशबलता- पर विचार किया जायगा।
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जब किसी उठे हुए भाव की शान्ति या समाप्ति के कारण सौन्दर्य उत्पन्न हो, उसे भावशान्ति कहते हैं। काव्यप्रकाशकार ने इसके लिए अमरुकशतक का निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है। इसमें किसी शठ-नायक द्वारा अपनी पत्नी की कोपशान्ति का वर्णन अपने किसी मित्र से करने का उल्लेख किया गया है-
तस्याः सान्द्र-विलेपन- स्तनतट-प्रश्लेष-मुद्रा ङ्कितं
किं वक्षश्चरणानति व्यतिकरव्याजेन गोपायते।
इत्युक्ते क्व तदित्युदीर्य सहसा तत्सम्प्प मार्ष्टुं मया
साSSश्लिष्टा रभसेन तत्सुखव शात्तन्व्या च तद्विस्मृतम्।।
अर्थात अपनी छाती पर दूसरी उस स्त्री के गाढ़े विलेपनवाले स्तनों के अग्रभाग के पड़े निशान को झुकने का बहाना कर पैरों से क्यों छिपा रहे हो? कुपित पत्नी के ऐसा कहने पर, कहाँ है, यह कहते हुए मैंने जोर से अपनी पत्नी का आलिंगन कर लिया। उस सुख के कारण वह उसको भूल गयी।
हिन्दी में भावशान्ति का निम्नलिखित उदाहरण द्रष्टव्य है-
अतीव उत्कंठित ग्वाल बाल हो, सवेग आते रथ के समीप थे।
परन्तु होते अति ही मलीन थे, न देखते थे जब वे मुकुंद को।।
यहाँ उद्धव को आते देखकर ब्रजवासियों के कृष्ण के आने का हर्ष कृष्ण को न देखकर शान्त हो जाता है। अतएव यहाँ भावशान्ति है।
जहाँ भाव के उदय होने से सौन्दर्य या आकर्षण पाया जाय, वहाँ भावोदय माना जाता है। आचार्य मम्मट ने भावोदय का निम्नलिखित उदाहरण दिया है। यह श्लोक भी अमरुकशतक का है।
एकस्मिन् शयने विपक्षरमणीना मग्रहे मग्धया
सद्यो मानपरिग्रहग्ल पितया चाटूनि कुरवन्नपि।
आवेगादवधीरितः प्रियतम स्तूष्णीं स्थितस्तत्क्षणं
मा भूत्सुप्त इवेत्य मन्दवलित ग्रीवं पुनर्वीक्षितः।।
अर्थात सपत्नी (सौत) का नाम ले लेने से रूठी एक ही पलंग पर बगल में लेटी हुई पत्नी ने खुशामद करनेवाले प्रियतम को क्रोधावेश में फटकार दिया और जब वह चुप हो गया तो यह सोचकर कि कहीं वह सो न जाय, गर्दन मोड़कर पुनः उसे देखने लगी।
वैसे यहाँ भाव (कोप) शान्ति की भी उपस्थिति है। पर सुरत-औत्सुक्य भाव की प्रधान रूप से अभिव्यक्ति हुई है अतएव यहाँ सुरत-औत्सुक्य भाव का उदय माना गया है।
इसी प्रकार हिन्दी की निम्नलिखित कविता में उत्कंठा और स्मरण की शान्ति के बाद प्रेम-भाव का उदय चमत्कृत करता है।
देखि री देखि अली, सँग जाइ धौं कौन है का घर में बतराति है।
आनन मोरि कै नैनन जोरि अबै गई ओझल कै मुसकाति है।
दाप जू जा मुख जोति लखे ते सुधाधर जोति खरी सकुचाति है।
आगि लिए चली जाति सु मेरे हिये बिच आगि दिए चलि जाति है।
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जहाँ काव्य में दो भावों के समान रूप से एक साथ मेल के कारण चमत्कार आ जाय तो वहाँ भावसंधि होती है। आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में भावसंधि के लिए महावीरचरित नाटक का निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है-
उत्सिक्तस्य तपःपराक्रम निधेरभ्या गमादेकतः
सत्सङ्ग प्रियता च वीररभसो त्फालश्च मां कर्षतः।
वैदेहीपरिरम्भ एष च मुहुश्चैत न्यमामीलय-
न्नानन्दी हरि चन्दनेन्दु शिशिरः स्निग्धो रुणद्ध्य न्यतः।।
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अर्थात अभिमानी, तप और पराक्रम के निधि परशुरामजी का आगमन उनके सत्संग का प्रेम और वीर रस का आवेग मुझे आकर्षित कर रहे हैं। दूसरी ओर हरिचन्दन के समान शीतल और स्निग्ध आनन्ददायक सीता का आलिंगन मेरे चैतन्य को विलुप्त सा करता हुआ मुझे वहाँ जाने से रोक रहा है।
यहाँ परशुराम के अचानक आ जाने से सीता का आलिंगन करने के लिए उत्सुक राम की यह उक्ति है। इसमें आवेग और हर्ष की संधि है। इसी प्रकार निम्नलिखित हिन्दी दोहे में सुख और दुख, हर्ष और विरह दोनों भावों की संधि के कारण चमत्कार दिखाया गया है-
पिय बिछुरन को दसह दुख, हरष जात प्यौसार।
दुरजोधन लौं देखियत, तजत प्रान यहि बार।।
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जब काव्य में अनेक संचारिभावों के आ जाने से चमत्कार उत्पन्न हो, तो उसे भावशबलता कहते हैं। इसके लिए आचार्य मम्मट ने भावशबलता के लिए निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है। कुछ टीकाकार इसे उर्वशी के प्रति पुरुरवा की उक्ति मानते हैं और कुछ शुक्राचार्य की पुत्री के प्रति महाराज ययाति की-
क्वकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोSपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेSपि कान्तं मुखम्।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्म ाः कृतधियः स्वप्नेSपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलुयवा धन्योSधरं धास्यति।।
अर्थात कहाँ यह अनुचित कार्य और कहाँ चन्द्रमा का वंश (तर्क), क्या फिर कभी यह देखने को मिलेगी (औत्सुक्य), दोषों पर विजय पाने के लिए ही शास्त्रों का अध्ययन किया है (मति), क्रोध में भी उसका मुख कितना सुन्दर लगता था (स्मरण), मेरे इस व्य़वहार से विद्वान और धर्मात्मा लोग मेरे विषय में क्या सोचेंगे (शंका), वह तो अब स्वप्न में भी दुर्लभ हो गयी है (दैन्य), हे मन, धैर्य रखो (धृति), न जाने कौन भाग्यशाली युवक उसका अधरामृत पान करेगा (चिन्ता)।
यहाँ आठ व्यभिचारिभावों- तर्क, औत्सुक्य, मति, स्मरण, शंका, दैन्य, धृति और चिन्ता का योग होने से भावशबलता है। देव कवि की निम्नलिखित कविता भी भावशबलता का उदाहरण है-
जब ते कुँवर कान्ह रावरी कला निधान
कान परी वाके कछु सुजस कहानी सी।
तब ही सी देव देखी देवता सी हँसति सी,
रीझति सी खीझति सी रूठति रिसानी सी।
छोही सी छली सी, छीन लीनी सी, छकी सी छिन
जकी सी टकी सी लगी थकी थहरानी सी।
बींधी सी, बँधी सी, बिष बूड़ति, बिमोहति सी,
बैठी बाल बकति बिलोकति बिकानी सी।
यहाँ भी हँसना, रीझना, खीझना, रूठना, क्रोध आदि कई भावों का संगम हो जाने के कारण भावशबलता है।
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