View Full Version : अच्छी कविताओं का अनुपम संग्रह
Akhand
25-01-2011, 10:00 AM
नेता बोला अपने कुत्ते से,
“ऐ श्वान बता-
क्या तू मुझसे बढ़ कर पूँछ हिलाता है?
मैं दुम-हीन भले ही हूँ पर,
मेरा टेढ़ा मन दुम कहलाता है।
“कान खोल कर सुन ले कुत्ता,
तू क्या गुर्रायेगा जितना मैं गुर्राता हूँ!
तू क्या जाने पीना और पिलाना,
मैं पीता और पिलाता हूँ।
“तेरी टेढ़ी पूँछ किसी दिन
सीधी भी हो सकती है,
पर मेरे मन की पूछ सदा
टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है।
“ऐ कुत्ता, तू ही क्या-
जन जन मेरा दास बना है,
तुझको तो मैं भोजन देता हूँ
पर जाने क्या क्या मेरा ग्रास बना है।
“मेरे सम्मुख छुटभैया नेता
बिन दुम के पूँछ हिलाते हैं,
हम भी अपने से ऊँचे नेता को
चमचा बन खूब रिझाते हैं।
“वर्ष पाँचवें में मैं
महा नम्र बन जाता हूँ,
नाच नाच कर भीख माँगता,
वोट बहुत पा जाता हूँ।
“फिर तो चांदी काट काट कर
प्रति पल अकड़ दिखाता हूँ,
मेरा मुँह बनता पूँछ तुम्हारी
झूम नशे में इठलालता हूँ।”
सुनता रहा श्वान सब कुछ
फिर धीरे से ली अंगड़ाई,
बोला, “कान खोल कर सुन ले,
ऐ मेरे नेता भाई।
“तू नेता है, मैं कुत्ता हूँ,
पर ईमान सदा ही रखता हूँ,
मस्त जीव हूँ निश्चिन्त हमेशा
तुम जैसों को ही परखता हूँ,
नहीं काटता मैं तुमको भाई,
वरना मैं मैं मर जाऊँगा,
जितना जहर भरा है तुममें,
उतना कहाँ मैं पाऊँगा।”
Akhand
25-01-2011, 10:11 AM
हट्टा-कट्टा मेरा तन है,
तन के भीतर चंचल मन है,
बहुत बड़ा परिवार है मेरा
घर में भी काफी ज्यादा धन है।
शिक्षा की कमी नहीं मुझमें,
डिग्री बहुत बढ़ा ली है,
हर शिक्षा संस्था में मैंने,
अपनी टांग अड़ा दी है।
राजनीति में भी अपनी ही,
तूती बोला करती है,
भोले-भाले लोगों का मन,
बुद्धि हमारी हरती है।
पंचों में मैं सरपंच बड़ा,
न्यायालय का कानूनी कीड़ा,
जनता की सेवा करने का,
उठा लिया है मैंने बीड़ा।
लोगों की नजरों में मैं हूँ,
बड़ा आदमी इस युग का,
सारे लोग कहा करते हैं,
धर्मवीर मुझे कलियुग का।
सभी दृष्टि से पूरा हूँ मैं,
पर मेरा सम्मान नहीं है, क्योंकि-
केवल एक कमी है मुझमें,
बस मुझमें ईमान नहीं है!
Akhand
25-01-2011, 10:17 AM
वज्र से भी कठोर, फूल से भी कोमल,
क्या केवल भगवान ही है?
नहीं, इसी स्वभाव का एक सभ्य प्राणी-
मेरे घर में भी है;
जिसकी आवाज ऐसी है
जैसे चल रही हो बन्दूक दुनाली,
आप शौक से पूछिये – “कौन है वह?”
तो मेरा छोटा से उत्तर है-
मेरी घरवाली।
अतीत के आधे घण्टे में
सात फेरे हुये थे उससे-
पर वर्तमान में नित्य निरन्तर
एक दिन में एक की दर से
सप्ताह में सात फेरे होते ही रहते हैं-
हम दोनों एक दूसरे के इर्द-गिर्द घूमते,
लड़ते-झगड़ते, मुँह फुलाते,
फिर भी हँसते रहते हैं
वह हमारी सहती है,
हम उसकी सहते हैं;
मेरे पीछे वह ऐसे दौड़ती है
जैसे मोटर के पीछे ट्राली-
दौड़ दौड़ कर थक जाती है-
मेरी घरवाली।
नजर उसकी रहती है मेरी पाकेट पर
यह कोई नई बात नहीं है।
लेकिन कइयों की घरवालियाँ तो
छीन लेती हैं उनके मनीबेग उनसे
यह भण्डाफोड़ एकदम दुरुस्त और सही है;
पर हम सब सभ्य हैं,
उदार हैं, महान हैं, भव्य हैं,
न कभी हम उसे मारते और न देते गाली,
जो है अपने अपने घर में
अपनी अपनी घरवाली।
गीता रामायण पढ़ती है,
महाभारत भी कर लेती है,
जब जब गुस्सा आता है उसे मुझ पर,
तब तब बच्चों के कोमल गालों पर,
दो-चार तमाचे जड़ देती है;
कभी पड़ोसन से घुलमिल कर बातें करती है
जाने दोनों आपस में क्या साजिश रचती हैं
फिर दोनों में जब ठन जाती है,
तब पड़ोसन बन जाती है काली
और यह महाकाली – जो है
मेरी घरवाली।
पूजा-पाठ किया करती है,
कथा-पुराण सुना करती है,
पर सबमें मैं ही केन्द्रित रहता हूँ,
इसीलिये उसके नखरे सहता हूँ,
वह सीता है पर मैं राम नहीं,
यही सोच कर खुश रहता हूँ।
मेरे मुन्नों को वह सभ्य बनाती है,
उससे ही है मेरे घर की लाली,
खूब समझता हूँ उसको, जो है-
मेरी घरवाली।
Akhand
26-01-2011, 06:11 AM
आज अगर तुलसी आयें तो,
सन्देश नहीं दे पायेंगे;
लुप्त देख सद्ग्रंथों को,
आश्चर्यचकित रह जायेंगे।
विनय पत्रिका के बदले में,
घोर अवज्ञा वे पायेंगे;
‘मानस’ के देश निकाले पर,
भौचक्के से रह जायेंगे।
रामचन्द्र पर रावण का ही,
सब ओर विजय वे पायेंगे;
ऐसे में तुलसी भी कैसे,
शक्ति, शील, सौन्दर्य जगायेंगे!
अंग्रेजी द्वारा हिन्दी की,
घोर उपेक्षा ही पायेंगे;
तब तो तुलसी भी सोचेंगे,
कल हिन्दी को बिसरायेंगे।
लोप भारती का लख तुलसी,
अकुलायेंगे, पछतायेंगे;
जैसे आयेंगे भारत में,
वैसे ही वापस जायेंगे।
Akhand
03-03-2011, 07:17 AM
घोटाले करने की शायद दिल्ली को बीमारी है
रपट लिखाने मत जाना तुम ये धंधा सरकारी है ।
तुमको पत्थर मारेंगे सब रुसवा तुम हो जाओगे
मुझसे मिलने मत आओ मुझपे फतवा जारी है ।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई हैं
इस चक्कर मेँ मत पड़िएगा ये दावा अख़बारी है ।
भारतवासी कुछ दिन से रूखी रोटी खाते हैं
पानी पीकर जीते हैं महँगी सब तरकारी है ।
जीना है तो झूठ भी बोलो घुमा-फिरा कर बात करो
केवल सच्ची बातें करना बहुत बड़ी बीमारी है
Akhand
03-03-2011, 07:19 AM
गिर के उठने में सम्भलने में बहुत वक़्त लगा
ग़म-ए-उल्फत से निकलने में बहुत वक़्त लगा
नज़र से गिरने में इक पल नहीं लगा लेकिन
किसी के दिल में उतरने में बहुत वक़्त लगा
मैं इंतज़ार में छत पे खड़ा रहा पहरों
चाँद को आज निकलने में बहुत वक़्त लगा
कितनी दुशवार थीं राहें तेरे इंकार के बाद
अपने घर तक भी पहुँचने में बहुत वक़्त लगा
ख़ुदा ने दुनिया बना दी पलक झपकते ही
मेरा नसीब बदलने में बहुत वक़्त लगा
तेरा अफ़साना-ए-ग़म भी अजीब है 'फ़ैसल'
देखने सुनने समझने में बहुत वक़्त लगा
Akhand
03-03-2011, 07:22 AM
कफ़्न पर आँसू गिराना छोड़ दे ।
बेवफा अब तो बहाना छोड़ दे ।
नींद पर वर्ना सितम ढाऊँगा मैं,
मान जा ख़्वाबोँ मेँ आना छोड़ दे ।
शौक़ ये बर्बाद कर देगा तुझे,
तितलियों के पर जलाना छोड़ दे ।
अपना क़द दुनिया की नज़रों में बढ़ा,
मुझको नज़रों से गिराना छोड़ दे ।
दर्द पाएगा बहुत रोएगा तू,
ख़त किताबों में छुपाना छोड़ दे ।
कोशिशें कर जीतने की मुझसे तू
ख़्वाब में मुझको हराना छोड़ दे ।
हसरतों से आसमाँ मत देख तू
उड़ना है तो आशियाना छोड़ दे ।
इश्क से परहेज़ है जिसको भी, वो
मीर-ओ-ग़ालिब घराना छोड़ दे ।
अपनी फितरत किसने छोड़ी है 'सिराज'
फूल कैसे मुस्कुराना छोड़ दे ।
SUNIL1107
03-03-2011, 12:39 PM
बहुत ही उम्दा संग्रह है मित्र ! धन्यवाद
Akhand
22-03-2011, 05:51 AM
चाँद को देखो चकोरी के नयन से
माप चाहे जो धरा की हो गगन से।
मेघ के हर ताल पर
नव नृत्य करता
राग जो मल्हार
अम्बर में उमड़ता
आ रहा इंगित मयूरी के चरण से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से।
दाह कितनी
दीप के वरदान में है
आह कितनी
प्रेम के अभिमान में है
पूछ लो सुकुमार शलभों की जलन से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से।
लाभ अपना
वासना पहचानती है
किन्तु मिटना
प्रीति केवल जानती है
माँग ला रे अमृत जीवन का मरण से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से
माप चाहे जो धरा की हो गगन से।
Akhand
22-03-2011, 05:53 AM
चाँद को देखो चकोरी के नयन से
माप चाहे जो धरा की हो गगन से।
मेघ के हर ताल पर
नव नृत्य करता
राग जो मल्हार
अम्बर में उमड़ता
आ रहा इंगित मयूरी के चरण से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से।
दाह कितनी
दीप के वरदान में है
आह कितनी
प्रेम के अभिमान में है
पूछ लो सुकुमार शलभों की जलन से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से।
लाभ अपना
वासना पहचानती है
किन्तु मिटना
प्रीति केवल जानती है
माँग ला रे अमृत जीवन का मरण से
चाँद को देखो चकोरी के नयन से
माप चाहे जो धरा की हो गगन से।
SHASWAT_BHARDWAJ
26-04-2011, 11:25 PM
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
:- दुष्यंत कुमार
sivprasad sajag
26-04-2011, 11:43 PM
achcha laga bhai
man-vakil
27-04-2011, 12:44 AM
"मेरे प्यारे मित्र अखंड...आपकी रचनाएँ है दिल को छू लेने वाली, इनमे नहीं कोई पाखण्ड"..
शब्दों के मोती भावों के धागे से पिरोकर कैसा काव्य-सूत्र की रचना की आपने,
मन पुलकित हुआ है की इस मंच पर बहुत काव्य रत्न छुपे है जो अब फोरम के समक्ष आ रहे है...आपका अभिवादन आपके लेखन रचना-सृजन कला को वंदन ....मित्र इस धार को कम न होने देवे...
============मन-वकील
Akhand
02-05-2011, 06:26 PM
हैं जन्म लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता ।
मेह उन पर है बरसता एक सा,
एक सी उन पर हवाएँ हैं बहीं
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक से होते नहीं ।
छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ,
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भँवर का है भेद देता श्याम तन ।
फूल लेकर तितलियों को गोद में
भँवर को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगन्धों और निराले ढंग से
है सदा देता कली का जी खिला ।
है खटकता एक सबकी आँख में
दूसरा है सोहता सुर शीश पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर ।
Akhand
02-05-2011, 06:28 PM
मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,
एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।
मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे,
ऐंठ बेचारी दबे पॉंवों भागने लगी।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया,
तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।
Akhand
02-05-2011, 06:29 PM
आँख का आँसू ढलकता देखकर
जी तड़प कर के हमारा रह गया
क्या गया मोती किसी का है बिखर
या हुआ पैदा रतन कोई नया ?
ओस की बूँदें कमल से हैं कहीं
या उगलती बूँद हैं दो मछलियाँ
या अनूठी गोलियाँ चांदी मढ़ी
खेलती हैं खंजनों की लड़कियाँ ।
या जिगर पर जो फफोला था पड़ा
फूट कर के वह अचानक बह गया
हाय था अरमान, जो इतना बड़ा
आज वह कुछ बूँद बन कर रह गया ।
पूछते हो तो कहो मैं क्या कहूँ
यों किसी का है निराला पन भया
दर्द से मेरे कलेजे का लहू
देखता हूँ आज पानी बन गया ।
प्यास थी इस आँख को जिसकी बनी
वह नहीं इस को सका कोई पिला
प्यास जिससे हो गयी है सौगुनी
वाह क्या अच्छा इसे पानी मिला ।
ठीक कर लो जांच लो धोखा न हो
वह समझते हैं सफर करना इसे
आँख के आँसू निकल करके कहो
चाहते हो प्यार जतलाना किसे ?
आँख के आँसू समझ लो बात यह
आन पर अपनी रहो तुम मत अड़े
क्यों कोई देगा तुम्हें दिल में जगह
जब कि दिल में से निकल तुम यों पड़े ।
हो गया कैसा निराला यह सितम
भेद सारा खोल क्यों तुमने दिया
यों किसी का है नहीं खोते भरम
आँसुओ, तुमने कहो यह क्या किया ?
Akhand
02-05-2011, 06:33 PM
सुरसरि सी सरि है कहाँ मेरु सुमेर समान।
जन्मभूमि सी भू नहीं भूमण्डल में आन।।
प्रतिदिन पूजें भाव से चढ़ा भक्ति के फूल।
नहीं जन्म भर हम सके जन्मभूमि को भूल।।
पग सेवा है जननि की जनजीवन का सार।
मिले राजपद भी रहे जन्मभूमि रज प्यार।।
आजीवन उसको गिनें सकल अवनि सिंह मौर।
जन्मभूमि जल जात के बने रहे जन भौंर।।
कौन नहीं है पूजता कर गौरव गुण गान।
जननी जननी जनक की जन्मभूमि को जान।।
उपजाती है फूल फल जन्मभूमि की खेह।
सुख संचन रत छवि सदन ये कंचन सी देह।।
उसके हित में ही लगे हैं जिससे वह जात।
जन्म सफल हो वार कर जन्मभूमि पर गात।।
योगी बन उसके लिये हम साधे सब योग।
सब भोगों से हैं भले जन्मभूमि के भोग।।
फलद कल्पतरू–तुल्य हैं सारे विटप बबूल।
हरि–पद–रज सी पूत है जन्म धरा की धूल।।
जन्मभूमि में हैं सकल सुख सुषमा समवेत।
अनुपम रत्न समेत हैं मानव रत्न निकेत।।
Akhand
02-05-2011, 06:38 PM
धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?
दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।
बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।
आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।
मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं,
अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं।
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे;
फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।
ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे।
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।
Akhand
02-05-2011, 06:39 PM
जाग रहे हम वीर जवान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान !
हम प्रभात की नई किरण हैं, हम दिन के आलोक नवल,
हम नवीन भारत के सैनिक, धीर,वीर,गंभीर, अचल ।
हम प्रहरी उँचे हिमाद्रि के, सुरभि स्वर्ग की लेते हैं ।
हम हैं शान्तिदूत धरणी के, छाँह सभी को देते हैं।
वीर-प्रसू माँ की आँखों के हम नवीन उजियाले हैं
गंगा, यमुना, हिन्द महासागर के हम रखवाले हैं।
तन मन धन तुम पर कुर्बान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान !
हम सपूत उनके जो नर थे अनल और मधु मिश्रण,
जिसमें नर का तेज प्रखर था, भीतर था नारी का मन !
एक नयन संजीवन जिनका, एक नयन था हालाहल,
जितना कठिन खड्ग था कर में उतना ही अंतर कोमल।
थर-थर तीनों लोक काँपते थे जिनकी ललकारों पर,
स्वर्ग नाचता था रण में जिनकी पवित्र तलवारों पर
हम उन वीरों की सन्तान ,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान !
हम शकारि विक्रमादित्य हैं अरिदल को दलनेवाले,
रण में ज़मीं नहीं, दुश्मन की लाशों पर चलनेंवाले।
हम अर्जुन, हम भीम, शान्ति के लिये जगत में जीते हैं
मगर, शत्रु हठ करे अगर तो, लहू वक्ष का पीते हैं।
हम हैं शिवा-प्रताप रोटियाँ भले घास की खाएंगे,
मगर, किसी ज़ुल्मी के आगे मस्तक नहीं झुकायेंगे।
देंगे जान , नहीं ईमान,
जियो जियो अय हिन्दुस्तान।
जियो, जियो अय देश! कि पहरे पर ही जगे हुए हैं हम।
वन, पर्वत, हर तरफ़ चौकसी में ही लगे हुए हैं हम।
हिन्द-सिन्धु की कसम, कौन इस पर जहाज ला सकता ।
सरहद के भीतर कोई दुश्मन कैसे आ सकता है ?
पर की हम कुछ नहीं चाहते, अपनी किन्तु बचायेंगे,
जिसकी उँगली उठी उसे हम यमपुर को पहुँचायेंगे।
हम प्रहरी यमराज समान
जियो जियो अय हिन्दुस्तान!
Akhand
06-05-2011, 05:22 PM
'सुबह' क्या सचमुच होगी ?
'दिन' जैसी कोई वस्तु होती है क्या ?
क्या मैं उसे पहाड़ों से देख पाती
यदि मैं उन्हीं की तरह ऊँची होती ?
क्या उसके कुमुदिनी की तरह पैर हैं ?
क्या उसके पंछी की तरह पर हैं ?
क्या वह उन प्रसिद्ध देशों से आयात होती है
मैंने जिनके बारे में कभी नहीं सुना ?
अरे कोई विद्वान! अरे कोई नाविक!
अरे कोई जादूगर आकाश का !
छोटे-से इस तीर्थयात्री को बताएगा
वह जगह जिसे 'सुबह' कहते हैं, कहाँ होती है
Akhand
06-05-2011, 05:24 PM
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
चिर अतीत में ’आज’ समाया,
उस दिन का सब साज समाया,
किंतु प्रतिक्षण गूँज रहे हैं नभ में वे कुछ शब्द तुम्हारे!
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
लहरों में मचला यौवन था,
तुम थीं, मैं था, जग निर्जन था,
सागर में हम कूद पड़े थे भूल जगत के कूल किनारे!
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
साँसों में अटका जीवन है,
जीवन में एकाकीपन है,
’सागर की बस याद दिलाते नयनों में दो जल-कण खारे!’
’आज सुखी मैं कितनी, प्यारे!’
Akhand
06-05-2011, 05:25 PM
पानी पर लिखा
एक ने संदेश
दूसरे ने ठीक-ठीक पढ़ा
समझ लिया
गढ़ा नया वाक्य
नयी लिपि
नयी भाषा का जैसे आविष्कार किया
दौर की हवा कुल हवा
से एक की साँसों की हवा
को चुम्बन में चुना
होंठों पर सजा लिया
प्रेम में
उन पर
जैसे सच साबित हुए
घटिया फ़िल्मों के गाने
बहाने भी
कितने विश्वसनीय लगे
प्रेम में
चुना क्या शब्द कोई एक
नया वाक्य नई लिपि नई भाषा
महसूस सका?
पूछूँ जो कविता से- "तेरी कुड़माई हो गई?"-
- "धत्*" -कहे और भाग जाये ऐसे
कि लगे
सिमट आई है और... और पास।
Akhand
06-05-2011, 05:28 PM
'मन्त्र पुराने काम नं देंगें, मन्त्र नया पढ़ना है
मानवता के हित मानव का रूप नया गढ़ना है
सागर के उस पार शक्ति का कैसा स्रोत निहित है?
ज्ञान और विज्ञान कौन वह जिससे विश्व विजित है?
मुझे सिंह की गहन गुफा में घुसकर लड़ना होगा
दह में धँस कर कालिय के मस्तक पर चढ़ना होगा
मुक्ति नहीं, पिंजरे में पक्षी कितना भी पर मारे
बिना युक्ति के राम न मिलते, कोई लाख पुकारे’
. . .
मद्य-मांस-मुक्ताचारी उस भ्रष्ट देश में जाकर
लौट सका है कोई अपना धर्माचरण बचाकर!
यद्यपि मोहन के चरित्र में तनिक नहीं है शंका
किन्तु मोहिनी मायावाली वह सोने की लंका
उस काजल के घर से अमलिन कौन भला फिर आये!
"मेरे भोले बालक को तो, चाहे जो, ठग जाये"
जननी की आँखों को लगता पुत्र सदा बालक ही
कितना भी हो जाय बड़ा, रहता है घुटनों तक ही
कंस-विजय को दया यशोदा ने देवों की माना
कब, रावण का जयी, राम को कौशल्या ने जाना
मिल पाये कैसे माँ का आदेश विदेश-गमन को?
चैन न लेने देती थी चिंता मोहन के मन को
माँ का आकुल प्रेम उधर श्रृंखला-सदृश लिपटा था
पंख तोलता उड़ने को नवयौवन इधर डटा था
Akhand
06-05-2011, 05:30 PM
कभी देखा है तुमने
देश की तकदीर लिखने वालों ने
क्*या क्*या ना बनाया है हमारे लिए
आग उगलती, जान निगलती
हज़ारों मील दूर मार करने वाली मिसाइलें हैं
हम एटमी ताकत हैं अब
किसकी मजाल जो हमें डराए धमकाए
अंतरिक्ष पर जगमगा रहे हैं
हमारे दर्जनों उपग्रह
चांद पर क़दम रखने की
हम कर रहे हैं तैयारियाँ
और दुनिया मान रही है हमारा लोहा
हम उभरती ताकत है
अमेरिका भी कह रहा है यह बात
हाँ, यह बात दीगर है
कि भूख और प्*यास के मामले में
हम थोड़ा पीछे चल रहे हैं
लेकिन परेशान ना हों
'हाई टी' और 'डिनर' के बाद
नीति-निर्माताओं की
इस पर भी पड़ेगी निगाह
Akhand
06-05-2011, 05:34 PM
जो पिता अपने बेटे की लाश की शिनाख़्त करने से डरे
मुझे घृणा है उससे
जो भाई अब भी निर्लज्ज और सहज है
मुझे घृणा है उससे
जो शिक्षक बुद्धिजीवी, कवि, किरानी
दिन-दहाड़े हुई इस हत्या का
प्रतिशोध नहीं चाहता
मुझे घृणा है उससे
चेतना की बाट जोह रहे हैं आठ शव[1]
मैं हतप्रभ हुआ जा रहा हूँ
आठ जोड़ा खुली आँखें मुझे घूरती हैं नींद में
मैं चीख़ उठता हूँ
वे मुझे बुलाती हैं समय- असमय ,बाग में
मैं पागल हो जाऊँगा
आत्म-हत्या कर लूँगा
जो मन में आए करूँगा
यही समय है कविता लिखने का
इश्तिहार पर,दीवार पर स्टेंसिल पर
अपने ख़ून से, आँसुओं से हड्डियों से कोलाज शैली में
अभी लिखी जा सकती है कविता
तीव्रतम यंत्रणा से क्षत-विक्षत मुँह से
आतंक के रू-ब-रू वैन की झुलसाने वाली हेड लाइट पर आँखें गड़ाए
अभी फेंकी जा सकती है कविता
38 बोर पिस्तौल या और जो कुछ हो हत्यारों के पास
उन सबको दरकिनार कर
अभी पढ़ी जा सकती है कविता
लॉक-अप के पथरीले हिमकक्ष में
चीर-फाड़ के लिए जलाए हुए पेट्रोमैक्स की रोशनी को कँपाते हुए
हत्यारों द्वारा संचालित न्यायालय में
झूठ अशिक्षा के विद्यालय में
शोषण और त्रास के राजतंत्र के भीतर
सामरिक असामरिक कर्णधारों के सीने में
कविता का प्रतिवाद गूँजने दो
बांग्लादेश के कवि भी तैयार रहें लोर्का की तरह
दम घोंट कर हत्या हो लाश गुम जाये
स्टेनगन की गोलियों से बदन छिल जाये-तैयार रहें
तब भी कविता के गाँवों से
कविता के शहर को घेरना बहुत ज़रूरी है
यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश
यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश
यह विस्तीर्ण शमशान नहीं है मेरा देश
यह रक्त रंजित कसाईघर नहीं है मेरा देश
मैं छीन लाऊँगा अपने देश को
सीने मे* छिपा लूँगा कुहासे से भीगी कांस-संध्या और विसर्जन
शरीर के चारों ओर जुगनुओं की कतार
या पहाड़-पहाड़ झूम खीती
अनगिनत हृदय,हरियाली,रूपकथ ा,फूल-नारी-नदी
एक-एक तारे का नाम लूँगा
डोलती हुई हवा,धूप के नीचे चमकती मछली की आँख जैसा ताल
प्रेम जिससे मैं जन्म से छिटका हूँ कई प्रकाश-वर्ष दूर
उसे भी बुलाउँगा पास क्रांति के उत्सव के दिन।
हज़ारों वाट की चमकती रोशनी आँखों में फेंक रात-दिन जिरह
नहीं मानती
नाख़ूनों में सुई बर्फ़ की सिल पर लिटाना
नहीं मानती
नाक से ख़ून बहने तक उल्टे लटकाना
नहीं मानती
होंठॊं पर बट दहकती सलाख़ से शरीर दाग़ना
नहीं मानती
धारदार चाबुक से क्षत-विक्षत लहूलुहान पीठ पर सहसा एल्कोहल
नहीं मानती
नग्न देह पर इलेक्ट्रिक शाक कुत्सित विकृत यौन अत्याचार
नहीं मानती
पीट-पीट हत्या कनपटी से रिवाल्वर सटाकर गोली मारना
नहीं मानती
कविता नहीं मानती किसी बाधा को
कविता सशस्त्र है कविता स्वाधीन है कविता निर्भीक है
ग़ौर से देखो: मायकोव्स्की,हिकमत, नेरुदा,अरागाँ, एलुआर
हमने तुम्हारी कविता को हारने नहीं दिया
समूचा देश मिलकर एक नया महाकाव्य लिखने की कोशिश में है
छापामार छंदों में रचे जा रहे हैं सारे अलंकार
गरज उठें दल मादल
प्रवाल द्वीपों जैसे आदिवासी गाँव
रक्त से लाल नीले खेत
शंखचूड़ के विष -फ़ेन सेआहत तितास
विषाक्त मरनासन्न प्यास से भरा कुचिला
टंकार में अंधा सूर्य उठे हुए गांडीव की प्रत्यंचा
तीक्षण तीर, हिंसक नोक
भाला,तोमर,टाँगी और कुठार
चमकते बल्लम, चरागाह दख़ल करते तीरों की बौछार
मादल की हर ताल पर लाल आँखों के ट्राइबल -टोटम
बंदूक दो खुखरी दो और ढेर सारा साहस
इतना सहस कि फिर कभी डर न लगे
कितने ही हों क्रेन, दाँतों वाले बुल्डोज़र,फौजी कन्वाय का जुलूस
डायनमो चालित टरबाइन, खराद और इंजन
ध्वस्त कोयले के मीथेन अंधकार में सख़्त हीरे की तरह चमकती आँखें
अद्भुत इस्पात की हथौड़ी
बंदरगाहों जूटमिलों की भठ्ठियों जैसे आकाश में उठे सैंकड़ों हाथ
नहीं - कोई डर नहीं
डर का फक पड़ा चेहरा कैसा अजनबी लगता है
जब जानता हूँ मृत्यु कुछ नहीं है प्यार के अलावा
हत्या होने पर मैं
बंगाल की सारी मिट्टी के दीयों में लौ बन कर फैल जाऊँगा
साल-दर-साल मिट्टी में हरा विश्वास बनकर लौटूँगा
मेरा विनाश नहीं
सुख में रहूँगा दुख में रहूँगा, जन्म पर सत्कार पर
जितने दिन बंगाल रहेगा मनुष्य भी रहेगा
जो मृत्यु रात की ठंड में जलती बुदबुदाहट हो कर उभरती है
वह दिन वह युद्ध वह मृत्यु लाओ
रोक दें सेवेंथ फ़्लीट को सात नावों वाले मधुकर
शृंग और शंख बजाकर युद्ध की घोषना हो
रक्त की गंध लेकर हवा जब उन्मत्त हो
जल उठे कविता विस्फ़ोटक बारूद की मिट्टी-
अल्पना-गाँव-नौकाएँ-नगर-मंदिर
तराई से सुंदरवन की सीमा जब
सारी रात रो लेने के बाद शुष्क ज्वलंत हो उठी हो
जब जन्म स्थल की मिट्टी और वधस्थल की कीचड़ एक हो गई हो
तब दुविधा क्यों?
संशय कैसा?
त्रास क्यों?
आठ जन स्पर्श कर रहे हैं
ग्रहण के अंधकार में फुसफुसा कर कहते हैं
कब कहाँ कैसा पहरा
उनके कंठ में हैं असंख्य तारापुंज-छायापथ-समुद्र
एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक आने जाने का उत्तराधिकार
कविता की ज्वलंत मशाल
कविता का मोलोतोव कॉक्टेल
कविता की टॉलविन अग्नि-शिखा
आहुति दें अग्नि की इस आकांक्षा में.
शब्दार्थ:
↑ पिछली शताब्दी के सत्तर के दशक में कोलकाता के आठ छात्रों की हत्या कर धान की क्यारियों में फेंक दिया था। उनकी पीठ पर लिखा था देशद्रोही.
Akhand
06-05-2011, 05:37 PM
जब से भूख तुम्हारी जागी
धरती बिकी
बिकी धरती की संतानें हत*भागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !
धरती के भीतर का लोहा
काढ़ा, हमने तार खिंचाए
तार पे फटी दिहाड़ी लटकी
बिजली की विरुदावलि गाए
जब से भूख तुम्हारी जागी
लोहा बिका
बिकी लोहे की संतानें हतभागी !
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !
धरती के भीतर का पानी
खींचा हमने खेत सधाए
पानी बंधुआ बोतल में
साँस नमी की घुटती जाए
जब से भूख तुम्हारी जागी
पानी बिका
बिकी पानी की संतानें हतभागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !
धरती के भीतर का कोयला
खोदा और फ़र्नेस दहकाए
चिमनी ऊपर बैठ के कोयल
कटे हाथ के असगुन गाए
जब्से भूख तुम्हारी जागी
कोयला बिका
बिकी कोयले की संतानें हतभागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !
lalji1964
06-05-2011, 06:15 PM
कभी देखा है तुमने
देश की तकदीर लिखने वालों ने
क्*या क्*या ना बनाया है हमारे लिए
आग उगलती, जान निगलती
हज़ारों मील दूर मार करने वाली मिसाइलें हैं
हम एटमी ताकत हैं अब
किसकी मजाल जो हमें डराए धमकाए
अंतरिक्ष पर जगमगा रहे हैं
हमारे दर्जनों उपग्रह
चांद पर क़दम रखने की
हम कर रहे हैं तैयारियाँ
और दुनिया मान रही है हमारा लोहा
हम उभरती ताकत है
अमेरिका भी कह रहा है यह बात
हाँ, यह बात दीगर है
कि भूख और प्*यास के मामले में
हम थोड़ा पीछे चल रहे हैं
लेकिन परेशान ना हों
'हाई टी' और 'डिनर' के बाद
नीति-निर्माताओं की
इस पर भी पड़ेगी निगाह
वह भाई क्या कविता लिखी! हमारे तरफ से रेपो++स्वीकार करें !
Akhand
07-05-2011, 06:27 AM
वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो
चट्टानों की छाती से दूध निकालो
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो
चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे
जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है
सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है
अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे
जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है
उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
तलवार प्रेम से और तेज होती है
छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
मरता है जो एक ही बार मरता है
तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे
स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है
वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे
जब कभी अहम पर नियति चोट देती है
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है
चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे
उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है
सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!
Akhand
07-05-2011, 06:30 AM
तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?
भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?
भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !
खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !
दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !
उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !
Akhand
07-05-2011, 06:32 AM
हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े
वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा
संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में
वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे
Akhand
07-05-2011, 06:34 AM
नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।
संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।
Akhand
07-05-2011, 06:37 AM
एक भी आँसू न कर बेकार
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!
पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाय!
चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं
हर छलकते अश्रु को कर प्यार
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!
व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!
Akhand
07-05-2011, 06:56 AM
ए भारत के नेताओं ,
उठो मोहनिद्रा त्यागो
जनप्रतिनिधि कहलाने वालों
ए सत्ता के लोभी जागो
बहुत हुआ यह गोरख धंधा
चार सौ बीसी का मोडर्न फंडा
यदि जनता ने ठान लिया
अपनी ताकत को पहचान लिया
पांच वर्षों के विश्वासघात के बाद
अगर पहुंचा दिया तुम्हे आघात
तो किसे अपना यह मुखड़ा दिखाओगे
उल्टा जनता के जूते खाओगे
इतिहास ने तो सिकंदर को हारते देखा है
तुम तो छुछुंदर हो मसल दिए जाओगे
Akhand
07-05-2011, 06:59 AM
सरकार को चाहिए कि वह
गरीबी की रेखा के नीचे भी
एक रेखा खींच दे
जिसके नीचे आने वाले इन्सान को
इन्सान नही माना जाए
दरअसल वे तो बोझ है
इस धरती पर
इसलिए नही होना चाहिए उन्हे
जिन्दा रहने का अधिकार ॥
सरकार को चाहिए कि वह
खोल दे उनके लिए भी एक बूचड़खाना
जिसमे
उनको पकड, पकडकर
सफाई का पूरा ध्यान रखते हुए,
सफाई से काट़ दिया जाए ॥
जिन्हे गरीबी की महान रेखा के
नीचे रहने योग्य भी नही पाया गया है
जिन्हे
मुफ्त की जमीन,
आवास, सडक,प्रकाश,पानी, नाली
और एकबत्ती का मुफ्त बिजली कनेक्शन
बैंक ऋण, निराश्रित सहायता, ऋण राहत,माफी,
आदि, गरीबो की ,ढ़ेरो सुविधाओ का
लाभ लेने की भी
क्षमता, योग्यता,या शऊर नही
जिनके पास
अपनी निजी या संयुक्त परिवार की
मालिकियत वाली ,किराये की
अतिक्रमण,या कही कब्जा कर हथियाई गई छत नही
जिनकी अपनी यूनियन नही
जिनको अपने अधिकारो के लिए
बंद, प्रदशर्न,हडताल तक
करने की तमीज नहीं
जिनका कोई धर्म संप्रदाय नही
जिनके पास गरीबी रेखा तक का, राशनकार्ड नहीं
जिनका वोटर लिस्ट में नाम नही
जिनका वोट नही
उनकी गणना नही
उनका समीकरण नही
अर्थात वे इन्सान ही नही ॥
सरकार को चाहिए कि वह
इन्हे इन्सान की परिभाषा से बाहर करे
ओर इन्हे घोषित करे,
कृषिफसल
कुंवारी मांए सडको पर अनवरत
उत्पादित करती रहे यह कृषिफसल
ताकि इस कृषिफसल को हमारे बूचडखानो में काट कर
इनके मांस को
पांच सितारा होटलो में
मेरे मुल्क के जागीरदारो, ईदीअमीन के भारतीय संस्करणो को
और उनके सम्मानित मेहमानो को
हमारे देश की विशष्ट डिश के रूप में
सर्व किया जा सके ॥
इस कृषिफसल की खोपडी
और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अवयवो का
निर्यात किया जा सके,विकसित देशो को
जहाँ से प्राप्त हो सके
भारी मा़त्रा मे, कींमती विदेशी मुद्रा
ताकि हम चला सके
और अधिक सुविधा व गति के साथ
गरीबी हटाने के हमारे
महान कार्यक्रम ॥
Akhand
07-05-2011, 07:02 AM
मैने गल्ती की
बुजुर्गो की सलाह मानी
विवाह किया
बुजुर्ग खुश हुए
वे देखना चाहते थे
अपना वंश
किन्तु मै अब नही चाहता
अपना आगे वंश
किसी में भी अपना अंश
बस इसीलिए
अपनी
नसबन्दी करा दी
मै कतई नही चाहता
बुजुर्गो की इच्छा के लिए
जो पाप मै कंरू
किसी और को लाकर
वह भी वही अपराध करे
और मेरा वंश ,मेरा अंश
इस दोजख की आग में जले ॥
अब शुभ,शेष क्या है इस संसार में
न कहीं सत्य है न कही शिव न कहीं सुन्दर
है तो चारो और
ह्रिंसा,घृणा,इप्र् या,द्वेष और नफरत
दो ही आवाज सुनाई देती है
मारो या मरो
तुम मारो नही तो कोई
तुम्हे मार डालेगा
मै नही चाहता कि
दुनिया के अंत तक
मेरा खून/मेरा वंश/ मेरा अंश
इस आग में खुद जले
औरो को जलाए
नही मेरे साथ
यह नही चलेगा
मै निरवंशया कहलाउंगा
वह मुझे चलेगा ||
Akhand
08-05-2011, 06:45 AM
एक दिन रूक जाएगी जो लय
उसे अब और क्या सुनना?
व्यतिक्रम ही नियम हो तो
उसी की आग में से
बार-बार, बार-बार
मुझे अपने फूल हैं चुनना।
चिता मेरी है: दुख मेरा नहीं।
तुम्हारा भी बने क्यों, जिसे मैंने किया है प्यार?
तुम कभी रोना नहीं, मत
कभी सिर धुनना।
टूटता है जो उसी भी, हाँ, कहो संसार
पर जो टूट को भी टेक दे, ले धार, सहार,
उस अनन्त, उदार को
कैसे सकोगे भूल—
उसे, जिस को वह चिता की आग
है, होगी, हुताशन—
जिसे कुछ भी, कभी, कुछ से नहीं सकता मार—
वही लो, वही रखो साज-सँवार—
वह कभी बुझने न वाला
प्यार का अंगार!
Akhand
08-05-2011, 06:47 AM
भय से थरथराती हुई आँखों में
कई रात गुज़ारने के बाद
बारूद में भुने हुए बच्चों के
हाथ-पाँव समेट रहे हैं
गुजरात के नन्हे मियाँ
पिछली चार पीढ़ियों से
पटाखों में रचे-बसे नन्हे मियॉ कहते हैं
बच्चे ख़ुदा की नियामत हैं
इनकी निग़ाहों से ही चुराकर भरता हूँ पटाख़े में रोशनी
जब बच्चे ही नहीं रहे तब कहाँ से आएगी पटाख़े में रोशनी
अब वे नहीं बनाएँगे पटाख़े
नन्हे मियाँ के पटाख़े न बनाने से
कहीं कुछ भी नहीं बिगड़ेगा
बाज़ार का पेट तो भर जाएगा
चीन और अमरीका के पटाख़ों से
कभी-कभार उनके घर के सामने से गुज़रते हुए
अचानक ठहर जाएँगे किसी के क़दम
और उसके कानों में गूँजेगी वही आवाज़
कल ही तो दिया था / आज फिर आ गया
फोकट की लत बहुत बुरी होती है/ले अब मत अइयो .......
हाँ सम्भाल के जलइयो
बहुत खतरनाक खेल है बारूद का
इस कविता में एक सुधार जरूरी है, मित्रो !
नन्हे मियाँ केवल गुजरात के नहीं हैं
वे मेरठ के भी थे
मुरादाबाद के भी और मुम्बई के भी
लाहौर और इस्लामाबाद में भी रहते हैं
नन्हे मियॉ
जो अब नहीं बनाएँगे पटाख़े
नन्हे मियॉ
न तो मुसलमान हैं न हिन्दू
सिर्फ अँगूठाभर हैं
जिस पर पुती हुई है स्याही ।
Akhand
08-05-2011, 06:49 AM
अंत में मैं ही हँसूंगा
सर्वप्रथम मैं ही रहूंगा
अन्तिम होने पर भी
राख की ढेरी होते हुए भी
ज्वालामुखी-सा धधकूंगा
काफ़्का का किला होकर भी
खुले हुए आँगन की तरह
खुला रहूँगा
गिलहरियोंके लिए
उनकी चंचलता
चिडियों के लिए
उनकी प्रसन्नता
चींटियों के लिए
उनका अन्न
नदियों के लिए
उनका जल
उदास मनुष्यों की उदास दुनिया के लिए
उसका स्वप्न
लेकर जल्दी ही आऊँगा
अंत में मैं ही हँसूंगा
Akhand
08-05-2011, 06:52 AM
अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?
होता, 'फिर' क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम
Akhand
08-05-2011, 06:54 AM
अब हर फूल खून से नहाया हुआ है
बगीचे सूने पड़े हैं
सुबह की ठंडी हवा में सैर
कल की बात हुई
कमीज़ों पर छींटों का रंग सिर्फ सुख़्ाZ है
जिनमें समाए हुए हैं डरे हुए जिस्म
मासूमों का चुंबन लेने से पहले
सोचना पड़ता है
कहीं ये एक नई वजह तो नहीं
दहशत फैलने की
बारूदी रोशनी के अंधे दौर में
सितार के तार की फीकी पड़ती चमक और
उसके सुरों में डुबो देने वाले अध्यात्म का पता कहीं खो गया है
आजादी में पनपा हुआ प्रेम भी लापता हुआ
स्मृतियों का क्षरण होने से
प्रतिकार का साहस भी
जाता रहा ।
Akhand
12-05-2011, 12:02 PM
तुम
उस परिन्दे की तरह
कब तक डैने फड़फड़ाओगे
जिसकी गर्दन पर रखा हुआ है
चाहत का चाकू
उड़ान भरने से पहले ही
तुमने खो दिए हैं अपने पंख
प्यास बुझने के पहले ही
विष पी लिया
अमृत पान के लिए
तुम्हारे जैसा कौन मरता है
लालसाओं के जलसाघरों में
तिल-तिल, घुट-घुट कर
न तुम्हें प्रेम करना आया
बहती रही वह
तुम्हारी धमनियों में
रक्त की वर्णमाला की तरह
अलिखित अपरिभाषित
और न तुम्हें घृणा करना आया
जिसे तुम नकटी जदूगरनी
कहते ही उदास होकर रो देते हो
सारा जीवन किसके मायाजाल में
जकड़े रहे
कि अन्त में स्पाइडर की तरह
अपनी ही वासना की चरम परिणति में
आखेट कर लिए गए।
Akhand
12-05-2011, 12:17 PM
चुन नहीं सका
अभी तक
जीवन और मृत्यु के बीच
उसके आगमन से
लगता था
वह सम्पूर्ण जीवन है
वह जीवन का आनन्द है
उसका आह्लाद है
जीवन और मृत्यु के बीच
समय ने बनाना चाहा
शाश्वत प्रेम का सेतु
जीवन में उसका ठहरना
और निरन्तर रहना
सम्पूर्ण जीवन का आभास देकर
अचानक उसका चले जाना
देकर मृत्यु का एकान्त
उसकी निर्जनता
उसकी भव्यता
अब, कितना आसान है
उसके प्रस्थान से
चुनना जीवन और मृत्यु के बीच।
chandan_0123
12-05-2011, 01:36 PM
Bahut hi Umda kavitao ka sangrah
Mere pass to shabad hi nahi hai tarif ke liye
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