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View Full Version : !!अनमोल वचन!!



King_khan
25-01-2011, 04:17 PM
सब धन से श्रेष्ट धन प्रेम है !
सब साधन से भी श्रेष्ट साधन प्रेम है !
यदि महान से महान पतित है और उसके पास प्रेम धन है,
तो वह भी प्रभु का सबसे अधिक प्रिया है !
ह्रदय में प्रेम पैदा करो, और उसे चारो ओर फैलादो !
तुम्हारा प्रेम एक समुन्द्र बन जाये, जिसमे सारा जगत डूब जाये !

King_khan
25-01-2011, 04:18 PM
पानी स्थिर और निर्मल होता है, परन्तु बाहर की हवा उसे चंचल बना देती है !
उसी तरह उद्वेग हमे असहनशील बन देता है !
चित पर बाहरी हवा अर्थात उद्वेगों का असर नही होगा तो वह विकार शून्य हो जायेगा ! हर परिस्थिति में सहनशील रहना ही भक्त्त की पहचान है !

King_khan
25-01-2011, 04:19 PM
भक्त्ति को कितना भी छुपाओ,
परन्तु उसकी सुगन्ध तो फैलती है !
भक्त्ति की सुगन्ध वासनाओं की दुर्गन्ध को
एक एक कर के ख़तम कर देती है !

King_khan
25-01-2011, 04:20 PM
जिस के पास धन है तो वो धन देगा !
भोगी भोग देगा ! ज्ञानी ज्ञान देगा ! भक्त्त भक्त्ति देगा ! धाम निष्ठा बाला धाम निष्ठा देगा ! हर जीव संसार को कुछ ना कुछ देता है ! परन्तु देता वो ही है, जो उसके पास होता है !

King_khan
25-01-2011, 04:21 PM
कलियुग में प्रभु नाम के अतिरिक्त संसार में भव सागर पार करने का ओर कोई साधन नही

King_khan
25-01-2011, 04:23 PM
इच्छा एक रोग है,
परन्तु श्री प्रभु को पाने की इच्छा रोग नही
बल्कि सब रोगों की दवा है !
क्योंकि भगवद मिलन की इच्छा जाग्रत होते ही
समस्त इच्छाए स्वत नष्ट हो जाती है !

King_khan
25-01-2011, 04:23 PM
यहाँ प्रेम के अतिरिक्त कोई भी धर्म आदि शेष नही रहता !
कृष्ण प्रेम के अतिरिक्त ओर कुछ है ही नही !

अब सोच लीजिये कि कितना उच्चा है ये गोपी प्रेम !
गोपिया ही सर्वश्रेष्ट उपासिका है देहधारियों में !
उनका गोविन्द में प्रेम इतना भावरुढ़ हो गया कि
उन्होंने उस प्रेम में सम्पूर्ण मर्यादाए तोड़ दी !
उनके प्रेम में लोक मर्यादा, आर्य पथ, व् वेद् पथ को गोपियों ने सब छोड़ दिया!
श्री कृष्ण ने भी विरह से पीड़ित गोपियों के विरह को दूर किया !
प्रेम के पीछे यहाँ श्री कृष्ण ने भी सब मर्यादायो को तोड़ दिया !

King_khan
25-01-2011, 04:24 PM
सतत आराधना करने का फल धन दौलत नही है,
अपितु चित की निर्मलता है !

King_khan
25-01-2011, 04:25 PM
श्याम को भंवरा कहते है !
भंवरा कहाँ रहता है ?
भंवरा कमल के ऊपर रहता है !
जिस ह्रदय में सुंदर भाव होते है, वो ह्रदय कमल बन जाता है

King_khan
25-01-2011, 04:26 PM
विशुद्व प्रेमी तो यह सोचता है
कि यदि हमारे मिलन से भी प्रभु को कष्ट मिले, तो वह मिलन कभी ना हो !
प्रेमी कभी भी जीतना ही नही चाहता ! प्रेमी व् भक्त्त तो सदा हारता है !
वो तो जैसा उसका प्रेमी कर रहा है, उस में ही प्रसन्न रहता है !
अपना सब कुछ हार जाने के बाद ही प्रेम की सिद्वी हो सकती है,
परन्तु हम सब जीतना चाहते है !

King_khan
25-01-2011, 04:27 PM
सूर्यं कभी नही पूछता कि अन्धकार कितना पुराना है !
अन्धकार आज का है या वर्षो पुराना है ?
सूर्य की किरणे तो अंधकार के पास पहुँचते ही उसे मिटा देती है !

ऐसे ही प्रभु की कृपा कभी यह नही पूछती कि सामने बाला कितना बड़ा पापी है !
प्रभु की कृपा होते ही जीव के समस्त पाप व् कष्ट मिट जाते है !

King_khan
25-01-2011, 04:31 PM
प्रेम क्या है ?

प्रेम वही है जहाँ बुद्वि का लय हो जाता है !
फ़िर उस जीव को ये पता ही नही रहता की धर्म क्या है ?
अधर्म क्या है ? सत्कर्म क्या है ?
प्रेम ईशवर रूप है !
प्रेम में भगवान की भगवता या मर्यादा भी लुप्त हो जाती है !

dev b
25-01-2011, 04:41 PM
बहुत अच्छा सूत्र है मित्र कृपया जारी रखे
प्रेम क्या है ?

प्रेम वही है जहाँ बुद्वि का लय हो जाता है !
फ़िर उस जीव को ये पता ही नही रहता की धर्म क्या है ?
अधर्म क्या है ? सत्कर्म क्या है ?
प्रेम ईशवर रूप है !
प्रेम में भगवान की भगवता या मर्यादा भी लुप्त हो जाती है !

gumnamm
25-01-2011, 05:16 PM
श्याम को भंवरा कहते है !
भंवरा कहाँ रहता है ?
भंवरा कमल के ऊपर रहता है !
जिस ह्रदय में सुंदर भाव होते है, वो ह्रदय कमल बन जाता है
कहा जाता है कि भँवरे को पुष्प प्यारा होता है
शाम के समय कमल बंद हो जाता है
प्यार का मारा भंवर जब कमल में बैठा होता है और शाम को कमल में बंद हो जाता है तो भी वह कमल के फूल को काट कर बाहर नहीं निकलता
चाहे दम घुट कर वह अपनी जान ही क्यों ना गंवा दे...
यही प्यार है

draculla
25-01-2011, 05:56 PM
कहा जाता है कि भँवरे को पुष्प प्यारा होता है
शाम के समय कमल बंद हो जाता है
प्यार का मारा भंवर जब कमल में बैठा होता है और शाम को कमल में बंद हो जाता है तो भी वह कमल के फूल को काट कर बाहर नहीं निकलता
चाहे दम घुट कर वह अपनी जान ही क्यों ना गंवा दे...
यही प्यार है

सत्यवचन.................दिल को छु गयी.

draculla
25-01-2011, 06:02 PM
प्रेम क्या है ?

प्रेम वही है जहाँ बुद्वि का लय हो जाता है !
फ़िर उस जीव को ये पता ही नही रहता की धर्म क्या है ?
अधर्म क्या है ? सत्कर्म क्या है ?
प्रेम ईशवर रूप है !
प्रेम में भगवान की भगवता या मर्यादा भी लुप्त हो जाती है !

प्यार ओंस के बूंद के समान होनी चाहिए,
हमेशा स्वच्छ और निर्मल/
भक्ति की तरह हमेशा निर्गुण और निर्भाव/

Pooja1990 QUEEN
25-01-2011, 06:44 PM
Love is the second name of god. sabi se pyar karo .pyar hi bhagban hai.

Pooja1990 QUEEN
25-01-2011, 06:49 PM
sikandar ji me kuch kahna chahugi. . . . .SIKANDAR MAHAN THA MAHAN HAI OR MAHAN RAHEGA. ja

bhoomi ji
25-01-2011, 08:00 PM
"सुख ही दुखों का मूल कारण है "


क्योंकि मनुष्य हमेशा राजस सुख की कल्पना करता है और चाहता है की उसे हर राजस सुख प्राप्त हो

जितनी मात्र मैं सुख की इच्छा है उतना सुख नहीं मिलना या दुसरे व्यक्तियों के पास आपने से ज्यादा सुख होना- इन स्थितियों. मैं क्योंकि सभी मनुष्यों को राजस सुख बराबर नहीं मिल पाता है

जिसके कारण घुटन और तनाव की स्थितियां उत्पन्न होती हैं

Dark Saint
26-01-2011, 12:23 AM
अद्भुत विचार ! इन वचनों का किंचित मात्र ग्रहण कर लेने वाला ही जीवन रूपी सागर कुशलता से पार कर लेगा ! यह सूत्र अनंत काल तक अपनी सुरभि बिखेरता रहे, ऎसी मेरी कामना है !

marwariladka
12-03-2011, 01:06 AM
इस सूत्र को जीवित रखें...अगर अन्तर्वासना को असीम उचाईयों पर ले कर जाना है तो हर प्रकार के सूत्र होने चाहिए और ऐसे सूत्र ही विविधता लाते हैं

SUNIL1107
14-03-2011, 01:54 PM
कहा जाता है कि भँवरे को पुष्प प्यारा होता है
शाम के समय कमल बंद हो जाता है
प्यार का मारा भंवर जब कमल में बैठा होता है और शाम को कमल में बंद हो जाता है तो भी वह कमल के फूल को काट कर बाहर नहीं निकलता
चाहे दम घुट कर वह अपनी जान ही क्यों ना गंवा दे...
यही प्यार है

धन्यबाद बड़े भाई इस विषय का जिक्र भागवत में भी है ! दत्तात्रेय जी ने भंवरे को भी गुरु रूप में स्वीकार किया था ! ''भंवरे की भांति सार ग्रहण करो किन्तु आसक्त मत बनो ! भंवरे ने कमल में आसक्त होकर अपने प्राणों से हाथ धो लिए ! वह लकड़ी में तो छेद कर सकता है किन्तु कमल की कोमल पंखुड़ियों में नहीं, क्यूंकि वो कमल के प्रति आसक्त है !

King_khan
20-03-2011, 06:36 PM
गोपी प्रेम !

यहाँ प्रेम के अतिरिक्त कोई भी धर्म आदि शेष नही रहता !
कृष्ण प्रेम के अतिरिक्त ओर कुछ है ही नही !

अब सोच लीजिये कि कितना उच्चा है ये गोपी प्रेम !
गोपिया ही सर्वश्रेष्ट उपासिका है देहधारियों में !
उनका गोविन्द में प्रेम इतना भावरुढ़ हो गया कि
उन्होंने उस प्रेम में सम्पूर्ण मर्यादाए तोड़ दी !
उनके प्रेम में लोक मर्यादा, आर्य पथ, व् वेद् पथ को गोपियों ने सब छोड़ दिया!
श्री कृष्ण ने भी विरह से पीड़ित गोपियों के विरह को दूर किया !
प्रेम के पीछे यहाँ श्री कृष्ण ने भी सब मर्यादायो को तोड़ दिया !

King_khan
03-08-2011, 08:15 AM
भक्त्तो का सच्चा प्रेम तो ऐसा है जैसे तुफानो में दिया जल रहा हो !
चाहे लाख अंधिया चले, लाख तूफान आये,
परन्तु भक्त्त के प्रेम की ज्योंति बुझना तो दूर
जरा सी भी विचलित भी नही होती

King_khan
03-08-2011, 08:44 AM
वह इंसान महान है , जो अपने नियम और मर्यादा में हमेशा खरा उतरता है !
जिसके सोने का अपना नियम ,

जागनेका अपना नियम ,भोजन का अपना नियम ,काम करने का नियम हो ,
वह जीवन में अवश्य सफल होता है !

वह दूसरों के लिए प्रेरणा है.

r prasad
05-08-2011, 09:52 AM
उत्तम सूत्र है बंधु....जारी रखें ....

King_khan
10-08-2011, 11:39 AM
चलती हुई व् मिटती हुई दुनिया में किसी की सता नही रही !
जो अपनी सता जमाने की कोशिश कर रहा है, वो तो निरामुर्ख है !
हम सोचते है कि हमारे पास शक्त्ति है !
हमारे पास शक्त्ति कहाँ है
जब हम अपने ही शरीरी की एक छोटी सी भी क्रिया को नही रोक सकते !

King_khan
10-08-2011, 11:40 AM
यदि प्रभु जीव को कुछ ना दे तो, उसमे भी प्रभु की कृपा ही है !
प्रभु का अनुगृह तथा निगृह दोनों ही प्रभु की कृपा है !

King_khan
19-11-2011, 10:02 PM
हे नाथ! मैंने हार मान लिया !
सब तरफ से मेरी हार हो गयी !
माया से भी मैं हारा, और सभी साधनों से भी हार मान लिया !
मैं किसी भी साधन के योग्य नहीं हूँ !
हारकर के, निराश होकर के मैं तुम्हें बुलाता हूँ !
मेरी हार को जीत में बदल दो !
ये संसार दुःखमय है !
स्वयं भगवान ने कहा कि हे अर्जुन, यहाँ की प्राप्ति अनित्य है !
ये शरीर भी थोड़े दिन में चला जायेगा, ये शरीर जाने वाला है,
ये सब अनित्य है!
इससे किसीको आज तक सुख नहीं मिला,
ना शरीर से मिला, ना संसार से मिला !
कोई भी प्राणी जब मरने लग जाता है,
तो क्या लेकर जाता है , दुःख !
जब आया था, जब पैदा हुआ था, तब भी रोया था !
जीवन की शुरुआत भी रोने से होती है और
जीवन का अंत भी रोने से होता है !
इसलिए भगवान ने कहा ये दुखमय संसार है !
जीव यहाँ दुःख के साथ रोता हुआ पैदा होता है,
कष्ट से पैदा होता है और कष्ट में मरता है !
हम लोग भूल गये जब गर्भ में थे, तब कष्ट था,
लेकिन संसार में जन्म लेने के बाद क्षुद्र विषयों में हंसते है,
वो भी उसे नहीं मिलते
क्योंकि अनित्य है संसार !
इसलिये हे गोविन्द!
फिर भी मेरी आसक्ति नहीं जाती है, शरीर से,
शरीर के संबंधों से, संसार से !
इसलिये मैं हार गया !
हे गोविन्द! हे श्याम! मेरी टेर तू सुनले, मेरी टेर तू सुन ले !
माया के पानी में मै डूब रहा हूँ !
किनारे को देख रहा हूँ, जहाँ तक किनारा है !
आपके चरण,
आपके चरणों की शरण मिल जाए तो, किनारा मिल गया !
आपके चरणों की शरण ना मिला तो, सदा डूबते ही रहेंगे !
माया के प्रभाव में, ना जाने कितनी दूर चले जायेंगे,
अभी तो आपके पास हैं !
ये चरण, उनकी शरण का किनारा,
ना मिला, तो ना जाने कहाँ चले जायेंगे !
कितनी दूर चले जायेंगे, पता नहीं !
८४ लाख योनियाँ हैं , पता नहीं किस योनी में जन्म लेना पड़ेगा !
वहाँ भजन तो क्या कुछ भी ज्ञान नहीं रहता !
चारों ओर घोर अन्धकार होता है !
इसलिये मै डूब तो रहा हूँ
पर आपकी ओर भी देख रहा हूँ !
हे दीनबंधु दीनानाथ, मेरी डोरी तेरे हाथ !
जिसको भगवान का आश्रय मिल गया, वो पार हो गया !
वरना स्वर्ग में भी दुःख है !
दुःख है, जहाँ भी भोग है ,
इसलिये मैं हार चुका हूँ !
इस भव- सागर में आपने हम को जहाज दिया !
ये शरीर, एक जहाज है !
ये शरीर, भगवान ने दिया
इस जहाज में बैठके तुम हमारे पास आ जाना !
बिना कारण प्यार करते हैं भगवान !
हमारे जैसे नीच, पापी, भगवद विमुख प्राणियों से
और शरीर दे दिया यानि ये शरीर एक साधन है, भगवान के ओर जाने का !
ये शरीर जहाज दिया भगवान ने !
पर आसक्तियों का बोझ उठा लेता है मनुष्य, फिर डूब जाता है !
धन, धान, स्त्री, पुत्र, आदि की आसक्ति में डूब जाता है !
समस्त आसक्तियाँ, ये बड़े- बड़े बंधन हैं !
ये भारी भारी वजन लाद लिया, जिससे जहाज डूब रहा है !
अब ये जहाज डूबने वाला है !
जब जहाज भँवर
में फंस जाता है,
तब घूमने लग जाता है, चक्कर काटने लग जाता है
और उसमें पानी भर जाता है और वो डूब जाता है !
हमारे इस शरीर रूपी जहाज में
भ्रम का पानी भ्रम का भँवर घुस गया है !
विषयों में सुख है, ये भ्रम है,
ये भ्रम का पानी जब घुस जाता है, तो जहाज डूब जाता है !
ये भ्रम ही हमें भटका रहा है
कि धन में सुख है, स्त्री में सुख है,
आसक्ति में सुख है, विषयों में सुख है !
ये अनंत भँवर उठ रहे हैं !
ये अब डूबने वाला है !
बचाओ रे गोपाल! बचायो रे मोहे डूबत से बचायो !
हे गोविन्द! ये जीव का भ्रम है
कि अव विषयों में सुख मिलेगा !
इस भ्रम में उमर चली जाती है और कुछ नहीं मिलता !
ना भजन हो पाता है,
ना कोई साधन हो पाता है,
इस भँवर में भटकते- भटकते फिरते रहता है !
इस भँवर से निकलने के
मैंने सब उपाय कर लिये,
पर मैं नहीं निकल पाया !
एक भी भ्रम नहीं निकला मेरा !
मनुष्य इन भ्रमों में ही मर जाता है !
आदि शंकराचार्य जी ने कहा
कि देखो, इस बूढ़े को, सब अंग गल गये हैं ,
बाल सफेद हो गये हैं , दाँत मुँह में नहीं हैं ,
फिर भी ये आशा लगाये है,
संसार से, विषयों से, आसक्तियों से
और ऐसे ही ये मर जायेगा !
बूढ़ा हो गया है, चल नहीं पाता है,
लाठी लेकर चलता है !
कहाँ गया वो बचपन, वो जवानी,
फिर भी आशा, जीव को नहीं छोडती !
अनेक प्रकार के उपाए किये, निकल नहीं पाया मैं,
इसीलिये मैं हार गया !
मेरी हार हुई , हे नाथ !
मनुष्य सब विधि कर लेता है,
सब साधन कर लेता है,
सब विचार कर लेता है,
विरक्त भी हो जाता है,
साधू भी हो जाता है,
लेकिन इस भ्रम से नहीं निकल पाता !
इस भव सागर से पार होने का एक रास्ता है,
जैसे पूर्णिमा का चाँद, जब निकलता है
तो सागर उमड़ता है, उसको ज्वार कहते हैं !
समुन्द्र उमड़ता है,लहरें बढ़, जाती हैं
तो दूर- दूर किनारे में लहरें चली जाती हैं !
हे नाथ! जब आप अपना चन्द्र मुख दिखायेंगे,
तो ये माया की लहरें बड़े जोर से उठेंगी
और उनमें मैं किनारे लग जाऊंगा, मैं बाहर निकल जाऊंगा,
मैं पार हो जाऊँगा !
इसलिये हे नाथ! एक झांकी दिखा दो,
अपना मुख दिखा दो !
राधा बरसाने बाली! तेरी करुणा का मैं भिखारी !

King_khan
19-11-2011, 10:04 PM
प्रिय साधकों


तुम्हारी ठकुराई
हे नाथ

सबसे बड़ी आपकी जो विशेषता है,
जो आपकी ठकुराई है, वो ये है,


आपका नाम जीव की वासनाओं का हरन कर लेता है !
वासनायें अनंत हैं और बिना वासनाओं के समाप्त हुए,

बंधन नहीं छूटेगा !
अनंत कर्म हैं, अनंत उनकी वासनाएँ, गांठें हैं !


उनको आपका नाम जला देता है,
तब जीव आपकी ओर चलता है !
तव जीव आपका भजन कर सकता है !

वासनाओं वाला आपका भजन नहीं कर सकता है !
वासनाओं वाला आपका भजन नहीं करेगा!
वो गिरेगा और लौट जायेगा !

सबसे बड़ी आपकी जो कृपा है, वासनाओं के सहित कर्मों का हरन,
आपका नाम कर लेता है !
हर कर्म, एक संस्कार बनता है !
प्रतिदिन उठते- बैठते जीव कर्म कर रहा है !

आपसे विमुख हो रहा है !
हर कर्म वासना बनता जा रहा है !
कर्म कर लिया तो उसकी वासना जमा हो जाती है, मन में !
लड्डू तो खा लिया
पर बुरा ये हुआ कि उसकी वासना जमा हो गई
मन में कि, बड़ा मीठा है !
हे नाथ, इनसे केवल आपकी कृपा ,

आपका नाम ही बचा सकता है !
वासनायो को जीव नहीं जला सकता,
उसको तो केवल आप का नाम जलाता है !
हे नाथ सब से बड़ी यही कृपा है !


आपने स्वयम कहा था
कि अर्जुन वासनायो के अन्धेरे को जीव कैसे हटा सकता है !
मै ही उसकी भावनायो में घुसता हूँ
और वहाँ जा के अन्धेरो को नष्ट करता हूँ
जो उसके ह्रदय में अनादिकाल का अंधकार है !
आंख बन्द करो तो अन्धेरा दिखाई पड़ेगा !
भीतर अन्त प्रकाश है !
पर जब आँख बन्द करो तो अन्धेरा दिखाई पड़ेगा !
मै इस अन्धकार को दूर करता हूँ उसकी भावनायो में घुस कर के
जिन भावनायो में मल मूत्र घुसा हुआ है, बहाँ मै जाता हूँ
और ज्ञान का दीपक जला देता हूँ !
तब जीव मेरी ओर चलता है !
वेद में बड़े बड़े यज्ञ लिखे है,
पर क्या उनसे वासनाये नहीं जाती है ?
सूरदास जी बोले नहीं !
अपने कर्म से अपने साधन से नहीं जायेंगी !
आप ने कहा है गीता में वेदों ने भी कहा है
कि त्रिगुण विषय है, उनसे ऊपर उठो !
सकाम यज्ञ कामनाये बड़ा देते है और आप से दूर कर देते है
और आप से विमुख कर देते है !
सिमित कर्म मार्ग है !
फूलो की तरह लगता है कि बड़ा आन्नद है इसमें !
जो जीव कामनायो को पूरा करता है बड़ा अच्छा लगता है !
पर ये भगवान् से अलग कर देता है !
बड़ी कठिनता से यज्ञ होता है, इस यज्ञ को भी कर लो
पर जीव फिर भी आप से विमुख ही रहेगा !
इतना बड़ा व् कठिन यज्ञ करके भी जीव आप से विमुख ही रहा !
उसका नाम जरुर हुआ बड़ा कि बहुत बड़ा यज्ञ करवाया
पर ह्रदय में भक्त्ति नहीं आयी !
ये काम तो केवल आपका नाम करता है !
हे नाथ विषयो का बंधन काटिये
और मुझे अपनी शरण में लीजिये !
हे नाथ विषयो की आशा व् संसारियो का भरोसा छुड़ा दीजिये !
ये जो जीव को जड़ बना देती है, हमारी इन जडीतायो को दूर करो !

ये जड़ताये मुझे परमार्थ के मार्ग पे नहीं चलने देंगी !
यहाँ कपट नहीं चलेगा !
यहाँ संसार में जगह जगह मन फंसा हुआ है !
अनेक जगह विशवास है
कि ये मेरी माँ है ये मेरी स्त्री है ये मेरा घर है ये मेरा प्यारा है !
ये सब झूठे विशवास है ! ये सब ख़त्म कर दो !
हे राधा रानी अब कृपा करो, ये विषयो का अन्धेरा दूर करो !

ये कृपा भक्त्ति से मिलती है !
ये कृपा योग आदि से नहीं मिलती !
गाओ नाचो, कीर्तन करो !
ये सच्चा मार्ग है ! ये भक्त्ति का मार्ग है !
ये बड़ा सरल मार्ग है, पर लोगो को विशवास नहीं होता !
जीव कठिन मार्ग की ओर चलता है !
भक्त्ति का मार्ग भगवान् के बहुत पास है , बहुत सरल है !

खूब गाओ, खूब नाचो, कृष्ण गुणगान करो आनंद से !
कठिन मार्ग की ओर क्यों जाते हो ?
सरल मार्ग से आनंद से क्यों नही गाते हो ?


कभी कभी महात्मा लोग दया कर के
अपना अनुभव भी बता देते है !
वैसे तो अपने को पापी अधम बताते है
लेकिन कभी कभी बता देते है तांकि जीव को विशवास हो जाये !
इस भजन में सूरदास जी ने अपना अनुभव बताया है
कि मैंने भक्त्ति का प्रभाव देख लिया, इसलिए समझ के कह रहा हूँ
अनुभव करके इसकी कह रहा हूँ कि इसकी छाप अन्य साधनों में नहीं है !
इसकी टकर नहीं हो सकती !
कठिन साधनों की ओर क्यों जाते हो ?
हे गोपाल हे गोविन्द हे राधे तेरी करुना का मै भिखारी !

King_khan
19-11-2011, 10:10 PM
जितना मनुष्य अपनी मै को काटता है, उतना ही भीतर ज्ञान प्रकाश होगा !
तुम्हारे अंदर के प्रकाश से तुम्हारे साथ साथ दूसरो को भी लाभ होगा |
दो पैसे का भी अगर दिया जला दो, तो उससे भी प्रकाश सब को लाभ देता है,
ये तो फ़िर भी तुम्हारे आचरण का दिया होगा !

Raman46
19-11-2011, 10:23 PM
चापलूसी का जहरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुंचा सकता, जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझकर पी न जाएं।

Raman46
19-11-2011, 10:24 PM
मीठी बातें तो वह करता है जिसका कुछ स्वार्थ होता है, जो डरता है, जो प्रशंसा अथवा मान का भूखा रहता है।

Raman46
19-11-2011, 10:24 PM
जो आदर्श हमने सच्चे अंत:करण से बनाया है, मन वचन और काया एक करके जिस आदर्श की सृष्टि की है, वह अवश्य ही हमारे सामने सत्य के रूप में प्रकट होगा।

Raman46
19-11-2011, 10:25 PM
आवेश और क्रोध को वश में कर लेने पर शक्ति बढ़ती है और आवेश को आत्मबल के रूप में परिवर्तित कर दिया जा सकता है।

Raman46
19-11-2011, 10:26 PM
जो आदर्श हमने सच्चे अंत:करण से बनाया है, मन वचन और काया एक करके जिस आदर्श की सृष्टि की है, वह अवश्य ही हमारे सामने सत्य के रूप में प्रकट होगा।

Raman46
19-11-2011, 10:26 PM
जो मनुष्य दूसरों के व्यवहार से ऊबकर क्षण प्रतिक्षण अपने मन बदलते रहते हैं, वे दुर्बल हैं। उनमें आत्मबल नहीं है।

Raman46
19-11-2011, 10:27 PM
आत्मविश्वास बढ़ाने का तरीका यह है कि तुम वह काम करो जिसे तुम करते हुए डरते हो। इस प्रकार ज्यों-ज्यों तुम्हें सफलता मिलती जाएगी तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ता जाएगा।

Raman46
19-11-2011, 10:28 PM
केवल वही जीवन में उन्नति करता है, जिसका हृदय कोमल और मस्तिष्क तेज होता है और जिसके मन को शांति मिलती है।

Raman46
19-11-2011, 10:29 PM
शत्रु को उपहार देने योग्य सर्वोत्तम वस्तु है-क्षमा, विरोधी को सहनशीलता, मित्र को अपना हृदय, शिशु को उत्तम दृष्टांत, पिता को आदर और माता को ऐसा आचरण जिससे वह तुम पर गर्व करे, अपने को प्रतिष्ठा और सभी मनुष्य को उपकार।

Raman46
19-11-2011, 10:30 PM
ज्यादातर लोग समझने की मंशा से दूसरों को नही सुनते ,बल्कि जबाब देने के इरादे से सुनतें हैं

Raman46
19-11-2011, 10:30 PM
आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता।

Raman46
19-11-2011, 10:31 PM
चापलूसी का जहरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुंचा सकता, जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझकर पी न जाएं।

Raman46
19-11-2011, 10:31 PM
मीठी बातें तो वह करता है जिसका कुछ स्वार्थ होता है, जो डरता है, जो प्रशंसा अथवा मान का भूखा रहता है।

Raman46
19-11-2011, 10:32 PM
क्रोध न करके क्रोध को, भलाई करके बुराई को, दान करके कृपण को और सत्य बोलकर असत्य को जीतना चाहिए।

Raman46
19-11-2011, 10:33 PM
शरीर निर्बल और रोगी रखने के समान दूसरा कोई पाप नहीं।

Raman46
19-11-2011, 10:33 PM
आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता।

lotus1782
20-11-2011, 12:04 PM
बहुत अच्छे ..........बढ़िया मित्र
बड़ी काम की जानकारी है
लगे रहे मित्र

King_khan
20-11-2011, 01:01 PM
मै प्रभु को रिझाने का क्या उपाए करू ?
जैसे जैसे ये इच्छा प्रबल होती है,
वैसे वैसे ही सब अन्य इच्छाए इस में लीन हो जाती है !
सांसारिक सुख भी अपने आप फीके लगते है !
जैसे सूर्य अंधेरे को रौंद डालता है
उसी तरह प्रभु रति सारे मल माने विषय व विकारों को भून डालती है !

What can I do to please God ?
This is staring point to meet Krishna!
As soon as this desire becomes strong,
all others merge in it!
Worldly pleasures become meaningless to him!
As the Sun crushes darkness,
same way love for God roasts all pleasures and impurities!

King_khan
26-12-2011, 11:27 PM
भक्त्तो का सच्चा प्रेम तो ऐसा है जैसे तुफानो में दिया जल रहा हो !
चाहे लाख अंधिया चले, लाख तूफान आये,
परन्तु भक्त्त के प्रेम की ज्योंति बुझना तो दूर
जरा सी भी विचलित भी नही होती !


The true devotee is like a burning lamp in midst of storms!
No matter how many storms, tornadoes may come,
but the lamp of devotee's love for Krishna, never flickers!