View Full Version : हिन्दू मिथक प्रेषित करें और बताएं कि यह कहा तक सच है
vivek soni
25-01-2011, 11:03 PM
दोस्तों यह मेरा पहला सूत्र है, आशा है कि आप सबको पसंद आएगा . यहाँ आप आपने नजरिये हिन्दू मिथक के बारे बता सकते है.
मेरा पहला प्रश्न है कि भगवान शिवलिंग के बारे में क्या जानते है ? क्या ये वास्तव में शिव का लिंग है या फिर इसका कोई और मतलब है.
avf000036
27-01-2011, 01:25 PM
jaha tak mene suna hai or padha hai un sab ka toh yahi kehna hai ke ye shiv ka ling hota hai
slimsima
28-01-2011, 05:33 PM
jab maaharishi brigu ne 1 yagye kiya aur uska havisya dene k liye yogye devta ki talash karne hetu wo trimurtiyon k paas gaaye sabse pahle wo brahmaji k paas gaye aur dekha ki wo manushye nirmaan mai vayst hai tho phir ve bhagwaan siv k paas gaye aur unhone dekha ki wo maata paarvati k saath kaam krida mai vyast hai aur unhe brigu rishi k aane ka bhaan hi nahi hua acaank maata paarvati unko dekh kar apne vastr utha kar khmbe k pice chip gai to aapni kaam krida mai baadha daalne k kaaran shiv rishi par krodhit hone lage tab risi ne kaha ki tune kaam k vashibhut ho kar mera satkaar nahi kiya aur na hi mujhe namaskaar kiya tu ab se saare vishva mai ling rup mai hi puja jaayega phir brigu ne wo havisya visnu ko prdaan kiya
vivek soni
30-01-2011, 08:48 PM
स्लिम्सिमा जी आपका उत्तर मुझे सही लगा.इस कहानी के बारे मुझे पता नहीं था .धन्यवाद्.
ChachaChoudhary
31-01-2011, 01:15 PM
शिवलिङ्ग (शिवलिंग), का मतलब है भगवान शिव का यौन अङ्ग। शिवलिंग के पूजन के प्रारम्भ के सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा है। दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव जी का भाग नहीं रखा, जिससे कुपित होकर जगज्जननी सती दक्ष के यज्ञ मण्डप में योगाग्नि द्वारा जल कर भस्म हो गई। माता सती के शरीर त्याग की सूचना प्राप्त होते ही भगवान शिव अत्यन्त क्रुद्ध हो गए और वे नग्न हो कर पृथ्वी में भ्रमण करने लगे। एक दिन वह उसी अवस्था में ब्राह्मणों की बस्ती में पहुंच गए। शिव जी को उस अवस्था में देख कर वहाँ की स्त्रियां मोहित हो गईं। यह देख कर ब्राह्मणों ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनका लिंग तत्काल शरीर से अलग हो कर भूमि पर गिर जाए। ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से शिव का लिंग उनके शरीर से अलग होकर गिर गया, जिससे तीनों लोकों में उत्पात होने लगा। समस्त देव, ऋषि, मुनि व्याकुल हो कर ब्रह्मा की शरण में गए।
ब्रह्मा ने योगबलसे शिवलिंग के अलग होने का कारण जान लिया और वह समस्त देवताओं, ऋषियों और मुनियों को अपने साथ लेकर शिव जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने शिव जी की स्तुति वन्दना की और उन्हें प्रसन्न करते हुए उनसे लिंग धारण करने का निवेदन किया। तब भगवान शिव ने कहा कि आज से सभी लोग मेरे लिंग की पूजा प्रारम्भ कर दें तो मैं पुनः उसे धारण कर लूंगा। शिव जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम स्वर्ण का शिवलिंग बना कर उसकी पूजा की। तत्पश्चात् देवताओं, ऋषियों और मुनियों ने अनेक द्रव्यों के शिवलिंग बनाकर पूजन किया। तभी से शिवलिंग के पूजन की परिपाटी प्रारम्भ हो गई। शिवलिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मृत्तिका से शिवलिंग बना कर उनका हजार बार अथवा लाख बार अथवा करोड बार विधि-विधान के साथ पूजा करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है। जो मनुष्य तीर्थ में मिट्टी, भस्म, गोबर अथवा बालू का शिवलिंग बनाकर एक बार भी सविधि पूजन करता है, वह दस हजार कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है। शिवलिंग का सविधि पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धन्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर सर्वदा शिवलिंग का पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है। दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।
तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्। नैतस्मादपरंकिंचि ् तारकंब्रह्म सर्वथा॥
ashokjanu
06-02-2011, 08:33 AM
जहा तक मेरा मानना है की हिन्दू धर्म में हर पूजा त्यौहार के पीछे कोई कारन होता है .
मेरे ख्याल से शिवेलिंग की पूजा में हमारे पूर्वज शिवे लिंग के साथ में पारवती के योनी की भी पूजा
यानि की प्रतीक रूप में अपने जन्म दाता की आराधना करते थे जो की सृस्ती के विकाश में मुख्या रूप जिम्मेदार है .इसलिए हम ऐसे सच्छात देवता का प्रतीक रूप में पूजन करते है .आगे इसमें अनेक कहानिया जुडती चली गई
शिवलिङ्ग (शिवलिंग), का मतलब है भगवान शिव का यौन अङ्ग। शिवलिंग के पूजन के प्रारम्भ के सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा है। दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव जी का भाग नहीं रखा, जिससे कुपित होकर जगज्जननी सती दक्ष के यज्ञ मण्डप में योगाग्नि द्वारा जल कर भस्म हो गई। माता सती के शरीर त्याग की सूचना प्राप्त होते ही भगवान शिव अत्यन्त क्रुद्ध हो गए और वे नग्न हो कर पृथ्वी में भ्रमण करने लगे। एक दिन वह उसी अवस्था में ब्राह्मणों की बस्ती में पहुंच गए। शिव जी को उस अवस्था में देख कर वहाँ की स्त्रियां मोहित हो गईं। यह देख कर ब्राह्मणों ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनका लिंग तत्काल शरीर से अलग हो कर भूमि पर गिर जाए। ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से शिव का लिंग उनके शरीर से अलग होकर गिर गया, जिससे तीनों लोकों में उत्पात होने लगा। समस्त देव, ऋषि, मुनि व्याकुल हो कर ब्रह्मा की शरण में गए।
ब्रह्मा ने योगबलसे शिवलिंग के अलग होने का कारण जान लिया और वह समस्त देवताओं, ऋषियों और मुनियों को अपने साथ लेकर शिव जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने शिव जी की स्तुति वन्दना की और उन्हें प्रसन्न करते हुए उनसे लिंग धारण करने का निवेदन किया। तब भगवान शिव ने कहा कि आज से सभी लोग मेरे लिंग की पूजा प्रारम्भ कर दें तो मैं पुनः उसे धारण कर लूंगा। शिव जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम स्वर्ण का शिवलिंग बना कर उसकी पूजा की। तत्पश्चात् देवताओं, ऋषियों और मुनियों ने अनेक द्रव्यों के शिवलिंग बनाकर पूजन किया। तभी से शिवलिंग के पूजन की परिपाटी प्रारम्भ हो गई। शिवलिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मृत्तिका से शिवलिंग बना कर उनका हजार बार अथवा लाख बार अथवा करोड बार विधि-विधान के साथ पूजा करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है। जो मनुष्य तीर्थ में मिट्टी, भस्म, गोबर अथवा बालू का शिवलिंग बनाकर एक बार भी सविधि पूजन करता है, वह दस हजार कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है। शिवलिंग का सविधि पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धन्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर सर्वदा शिवलिंग का पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है। दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।
तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्। नैतस्मादपरंकिंचि ् तारकंब्रह्म सर्वथा॥
इस ज्ञान के लिए धन्यवाद
INDIAN_ROSE22
06-02-2011, 08:50 PM
mazedar topic hai repo added
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