PDA

View Full Version : उसने कहा था - प्रसिद्ध हिन्दी कहानी



guruji
02-01-2011, 04:57 PM
उसने कहा था
लेखक : चंद्रधर शर्मा गुलेरी
प्रथम भाग
बडे-बडे शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जवान के कोड़ो से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गये हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगायें। जब बडे़-बडे़ शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरे को चींघकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लङ्ढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर, ‘बचो खालसाजी।‘ ‘हटो भाईजी।‘ ‘ठहरना भाई जी।‘ ‘आने दो लाला जी।‘ ‘हटो बाछा।‘ - कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्नें और खोमचे और भारेवालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पडे़। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं – ‘हट जा जीणे जोगिए’; ‘हट जा करमा वालिए’; ‘हट जा पुतां प्यारिए’; ‘बच जा लम्बी वालिए।‘ समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है? बच जा। ऐसे बम्बूकार्टवालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दूकान पर आ मिले।

उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिक्ख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बडि़यां। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।

''तेरे घर कहाँ है?''

''मगरे में; और तेरे?''

'' माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है?''
''अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।''

''मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ , उनका घर गुरूबाजार में हैं।''

इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जा कर लड़के ने मुस्करा कर पूछा, ''तेरी कुड़माई हो गई?''

इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ा कर धत् कह कर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, ‘तेरी कुडमाई हो गई?’ और उत्तर में वही 'धत् मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिये पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरूध्द बोली, ''हाँ, हो गई।''

''कब?''

''कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढा हुआ सालू।''

लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उडेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।

guruji
04-01-2011, 07:20 PM
द्वीतीय भाग
“राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खन्दकों में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाडा और मेंह और बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं। जमीन कहीं दिखती नहीं - घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खन्दक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है।

इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का ज़लज़ला सुना था, यहाँ दिन में पचीस ज़लज़ले होते हैं। जो कहीं खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।”

“लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खन्दक में बिता ही दिये। परसों रिलीफ आ जायेगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फिरंगी मेम के बाग में - मखमल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती। कहती है, तुम राजा हो , मेरे मुल्क को बचाने आये हो।”

“चार दिन तक पलक नहीं झपपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जरमनों को अकेला मार कर न लौटँ, तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े - संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था - चार मील तक एक जर्मन नहीं छोडा था। पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, नहीं तो... ”

“नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते! क्यों?” सूबेदार हजारा सिंह ने मुस्कराकर कहा – “लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाये नहीं चलते। बडे अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा?”

“सूबेदारजी, सच है,” लहनसिंह बोला – “पर करें क्या? हड्डियों में तो जाड्डा धँस गया है। सूर्य निकलता नहीं, और खाई में दोनों तरफ से चम्बे की बावलियों के से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाय, तो गरमी आ जाए।”

“उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बालटियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंकों। महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदल ले।” - यह कहते हुए सूबेदार सारी खन्दक में चक्कर लगाने लगे।

वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गंदला पानी भर कर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला – “मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!” इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गये।

लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भर कर उसके हाथ में देकर कहा – “अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।”

“हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस धुमा जमीन यहाँ मांग लूंगा और फलों के बूटे लगाऊँगा।”

“लाडी होरा को भी यहाँ बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फरंगी मेम...”

“चुप कर। यहाँ वालों को शरम नहीं।”

“देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तम्बाखू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिये लड़ेगा नहीं।”

“अच्छा, अब बोधसिंह कैसा है?”

“अच्छा है।”

“जैसे मैं जानता ही न होऊँ! रात-भर तुम अपने कम्बल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी क़े सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी क़े तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न मंदे पड़ जाना। जाडा क्या है, मौत है, और निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।”

“मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूंगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाये हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी।”

वजीरासिंह ने त्योरी चढ़ाकर कहा - “क्या मरने-मारने की बात लगाई है? मरें जर्मनी और तुरक ! हाँ, भाइयों, कैसे?”

दिल्ली शहर तें पिशोर नुं जांदिए,
कर लेणा लौंगां दा बपार मड़िए;
कर लेणा नादेड़ा सौदा अड़िए --
(ओय) लाणा चटाका कदुए नुँ।
कद्द बणाया वे मजेदार गोरिये,
हुण लाणा चटाका कदुए नुँ।।

कौन जानता था कि दाढ़ियां वाले, घर-बारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएंगे, पर सारी खन्दक इस गीत से गूँज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गये, मानों चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों!

guruji
04-01-2011, 07:21 PM
तृतीय भाग
रात हो गई है। अन्धेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधासिंह खाली बिस्कुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कम्बल बिछा कर और लहनासिंह के दो कम्बल और एक बरानकोट ओढ़ कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आँख खाई के मुँह पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर। बोधासिंह कराहा।

“क्यों बोधा भाई¸ क्या है?”

“ पानी पिला दो।”

लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगा कर पूछा –– “ कहो कैसे हो?” पानी पी कर बोधा बोला – “ कँपनी छुट रही है। रोम–रोम में तार दौड़ रहे हैं। दाँत बज रहे हैं।”

“ अच्छा¸ मेरी जरसी पहन लो !”

“ और तुम?”

“ मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है।”

“ ना¸ मैं नहीं पहनता। चार दिन से तुम मेरे लिए...”

“ हाँ¸ याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सबेरे ही आई है। विलायत से बुन–बुनकर भेज रही हैं मेमें¸ गुरू उनका भला करें।” यों कह कर लहना अपना कोट उतार कर जरसी उतारने लगा।

“ सच कहते हो?”

“और नहीं झूठ?” यों कह कर नहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहन-कर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा भर थी।

आधा घंटा बीता। इतने में खाई के मुँह से आवाज आई - “ सूबेदार हजारासिंह।”

“ कौन लपटन साहब? हुक्म हुजूर !” - कह कर सूबेदार तन कर फौजी सलाम करके सामने हुआ।

“ देखो¸ इसी समय धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पचास से ज्यादा जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काट कर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहाँ मोड़ है वहाँ पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूँ। तुम यहाँ दस आदमी छोड़ कर सब को साथ ले उनसे जा मिलो। खन्दक छीन कर वहीं¸ जब तक दूसरा हुक्म न मिले डटे रहो। हम यहाँ रहेगा।”

“ जो हुक्म।”

चुपचाप सब तैयार हो गये। बोधा भी कम्बल उतार कर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उँगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझ कर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें¸ इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेर कर खड़े हो गये और जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ा कर कहा- “ लो तुम भी पियो।”

आँख मारते–मारते लहनासिंह सब समझ गया। मुँह का भाव छिपा कर बोला - “ लाओ साहब।” हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा। बाल देखे। तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में ही कहाँ उड़ गए और उनकी जगह कैदियों से कटे बाल कहाँ से आ गए?”

शायद साहब शराब पिये हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया हैं! लहनासिंह ने जाँचना चाहा। लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे।

“ क्यों साहब¸ हमलोग हिन्दुस्तान कब जायेंगे?”

“ लड़ाई खत्म होने पर। क्यों¸ क्या यह देश पसंद नहीं?”

“ नहीं साहब¸ शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ? याद है¸ पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी जिले में शिकार करने गये थे!

हाँ- हाँ, वहीं जब आप खोते पर सवार थे और और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मन्दिर में जल चढ़ाने को रह गया था!

‘बेशक पाजी कहीं का!’

सामने से वह नील गाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थीं। और आपकी एक गोली कन्धे में लगी और पुट्*ठे में निकली। ऐसे अफ़सर के साथ शिकार खेलने में मजा है। क्यों साहब¸ शिमले से तैयार होकर उस नील गाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रेजमेंट की मैस में लगायेंगे।

‘हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया।’

“ ऐसे बड़े–बड़े सींग! दो–दो फुट के तो होंगे?”

“ हाँ¸ लहनासिंह¸ दो फुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पिया?”

“ पीता हूँ। साहब¸ दियासलाई ले आता हूँ।” कह कर लहनासिंह खन्दक में घुसा। अब उसे सन्देह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।
अंधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया।

“ कौन? वजीरसिंह?”

“ हां¸ क्यों लहना? क्या कयामत आ गई? जरा तो आँख लगने दी होती?”

guruji
04-01-2011, 07:22 PM
चतुर्थ भाग
“ होश में आओ। कयामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आई है।”

“ क्या?”

“ लपटन साहब या तो मारे गये है या कैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहन कर यह कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की है। सोहरा साफ उर्दू बोलता है¸ पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।”

“ तो अब!”

“ अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार होरा¸ कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा। उठो¸ एक काम करो। पल्टन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गए होंगे।

सूबेदार से कहो एकदम लौट आयें। खन्दक की बात झूठ है। चले जाओ¸ खन्दक के पीछे से निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो।”

“हुकुम तो यह है कि यहीं-- ”

“ ऐसी तैसी हुकुम की ! मेरा हुकुम -- जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सब से बड़ा अफसर है¸ उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ।”

“ पर यहाँ तो सिर्फ तुम आठ हो।”

“ आठ नहीं¸ दस लाख। एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।”

लौट कर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खन्दक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार सा बांध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी¸ जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जला कर गुत्थी पर रखने ही वाला था कि बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठा कर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तान कर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'आँख मीन गौट्*ट' कहते हुए चित्त हो गये। लहनासिंह ने तीनों गोले बीन कर खन्दक के बाहर फेंके और साहब को घसीट कर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकाल कर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।

साहब की मूर्छा हटी। लहनासिंह हँस कर बोला - “ क्यों लपटन साहब! मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नील गायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो¸ ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आये? हमारे लपटन साहब तो बिन 'डेम' के पाँच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे।”

लहना ने पतलून के जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए¸ दोनों हाथ जेबों में डाले।

लहनासिंह कहता गया - “ चालाक तो बड़े हो पर माझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिये चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुए एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछा कर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़–पढ़ कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं। गौ को नहीं मारते। हिन्दुस्तान में आ जायेंगे तो गोहत्या बन्द कर देंगे। मंडी के बनियों को बहकाता कि डाकखाने से रूपया निकाल लो। सरकार का राज्य जानेवाला है। डाक–बाबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्लाजी की दाढ़ी मूड़ दी थी। और गाँव से बाहर निकल कर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रक्खा तो...”

साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिन के दो फायरों ने साहब की कपाल–क्रिया कर दी। धड़ाका सुन कर सब दौड़ आये।

बोधा चिल्लाया- “ क्या है?”

लहनासिंह ने उसे यह कह कर सुला दिया कि 'एक हड़का हुआ कुत्ता आया था¸ मार दिया' और¸ औरों से सब हाल कह दिया। सब बन्दूकें लेकर तैयार हो गये। लहना ने साफा फाड़ कर घाव के दोनों तरफ पट्टियाँ कस कर बाँधी। घाव मांस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू निकलना बंद हो गया।

इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिक्खों की बन्दूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहाँ थे आठ (लहनासिंह तक-तक कर मार रहा था - वह खड़ा था और¸ और लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़ कर जर्मन आगे घुसे आते थे।

अचानक आवाज आई 'वाह गुरूजी का खालसा, वाह गुरूजी की फतह!!' और धड़ाधड़ बन्दूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गये। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।

एक किलकारी और - 'अकाल सिक्खाँ दी फौज आई! वाह गुरूजी दी फतह! वाह गुरूजी दा खालसा! सत श्री अकालपुरूख!!!' और लड़ाई खत्म हो गई। तिरेसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खों में पन्द्रह के प्राण गये। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आरपार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खन्दक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कस कर कमरबन्द की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना को दूसरा घाव -भारी घाव लगा है।

लड़ाई के समय चाँद निकल आया था¸ ऐसा चाँद¸ जिसके प्रकाश से संस्कृत–कवियों का दिया हुआ 'क्षयी' नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी वाणभट्*ट की भाषा में "दन्तवीणोपदेशाचार य" कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर वे उसकी तुरत–बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते।

इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होंने पीछे टेलीफोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाडियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घण्टे के अन्दर-अन्दर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नजदीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएंगे¸ इसलिये मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गये और दूसरी में लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही। पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है सबेरे देखा जायेगा। बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़ कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा - “ तुम्हें बोधा की कसम है, और सूबेदारनीजी की सौगन्ध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।”

“ और तुम?”

“ मेरे लिये वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुरदों के लिये भी तो गाड़ियाँ आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ, वजीरासिंह मेरे पास है ही।”

“अच्छा, पर..”

“बोधा गाड़ी पर लेट गया, भला। आप भी चढ़ जाओ। सुनिये तो, सूबेदारनी होरां को चिठ्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया।”

गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते–चढ़ते लहना का हाथ पकड़ कर कहा- “ तैने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं। लिखना कैसा, साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?”

“अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना, और कह भी देना।”

गाड़ी के जाते लहना लेट गया। - “ वजीरा पानी पिला दे¸ और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।”

मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जन्म-भर की घटनायें एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं। समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है।

लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दही वाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं, एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है, तेरी कुड़माई हो गई? तब ‘धत्*’ कह कर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा, तो उसने कहा – “ हाँ, कल हो गई¸ देखते नहीं यह रेशम के फूलोंवाला सालू!' सुनते ही लहनासिंह को दु:ख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?”

“ वजीरासिंह¸ पानी पिला दे।”

guruji
04-01-2011, 07:22 PM
पचीस वर्ष बीत गये। अब लहनासिंह नं 77 रैफल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न-मालूम वह कभी मिली थी¸ या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमें की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजिमेंट के अफसर की चिठ्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है¸ फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिठ्ठी मिली कि मैं और बोधसिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे। सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा।

जब चलने लगे¸ तब सूबेदार बेढे में से निकल कर आया। बोला-“ लहना¸ सूबेदारनी तुमको जानती हैं¸ बुलाती हैं। जा मिल आ।” लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती हैं? कब से? रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाजे पर जा कर 'मत्था टेकना' कहा। आसीस सुनी। लहनासिंह चुप।

मुझे पहचाना?”

“नहीं।”

'तेरी कुड़माई हो गई -धत्* -कल हो गई - देखते नहीं¸ रेशमी बूटोंवाला सालू -अमृतसर में.. '

भावों की टकराहट से मूर्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।

'वजीरा¸ पानी पिला' – ‘उसने कहा था।'

स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है – “ मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है¸ लायलपुर में जमीन दी है¸ आज नमक-हलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पल्टन क्यों न बना दी¸ जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए¸ पर एक भी नहीं जीया।‘ सूबेदारनी रोने लगी। ‘अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टाँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दूकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे¸ आप घोड़े की लातों में चले गए थे¸ और मुझे उठा-कर दूकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आँचल पसारती हूँ।‘

रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई। लहना भी आँसू पोंछता हुआ बाहर आया।

‘वजीरासिंह¸ पानी पिला दे’ - 'उसने कहा था।'

लहना का सिर अपनी गोद में रखे वजीरासिंह बैठा है। जब माँगता है¸ तब पानी पिला देता है। आध घण्टे तक लहना चुप रहा¸ फिर बोला – “कौन ! कीरतसिंह?”

वजीरा ने कुछ समझकर कहा- “ हाँ।”

“ भइया¸ मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।” वजीरा ने वैसे ही किया।

“हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस¸ अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चचा-भतीजा दोनों यहीं बैठ कर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था¸ उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।”

वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे।

कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा - फ्रान्स और बेलजियम -- 68 वीं सूची -- मैदान में घावों से मरा - नं 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह।

- समाप्त -

Lofar
04-01-2011, 08:17 PM
Dil ko chhoo lene wali kahani hai.

NEERAJDEXTER.008
04-01-2011, 09:16 PM
Guru ji.................bahut he srahniy hai .................
Plz keep it up

lover 1234
23-01-2011, 10:02 PM
maza aa gya guruji
is kahani ko padhne ki liye me bhut dino se bechain tha
vese me ia form pr porn he dekhta hu pr aaj ek achi story padhkar dil khush ho gya

Khanpasha
07-02-2011, 05:34 PM
बहुत ही शानदार कहानी है

GForce
11-10-2011, 01:15 AM
विस्तृत कालखंड व्यतीत हुआ, जब इस कथा का पाठ किया था ! आज पुनर्पाठ से अप्रतिम आनंद की अनुभूति अनुभव हुई ! अद्भुत कथा है यह ! सूत्र निर्माता को प्रस्तुति के लिए धन्यवाद !

Devil khan
11-10-2011, 02:22 AM
गुरूजी आपसे अनुरोध करना चाहूँगा .............फेसबुक पर अन्तर्वासना फोरम के सदस्यों के लिए एक् फैन पेज बनाया है आप् से अनुरोध है आप् भी पधारे ...........धन्यवाद


http://www.facebook.com/groups/113087215466872/

umabua
07-05-2012, 11:24 AM
एक और आनन्दी

कमरे से आती खट पट की आवाज ने मुझे अचानक चौंका दिया।धडाक से कलेजा उछलकर जैसे मेरी जिव्हा पर आकर ठहर गया था ।कुछ क्षण को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कमरे के भीतर कोई चोर छुप कर बैठ गया है।किसी वस्तु के जमीन पर गिरने की आवाज थी।अवश्य कोई उचक्का मेरी कीमती चीजों पर हाथ साफ कर रहा था। विचित्र चोर था, आवाज क़े खटके से पकड लिया जायेगा इसका शायद उसे भय न था।भीरू प्रकृति होने के बावजूद भी मैं शरीर के भीतर का सारा साहस बटोर हाथ में शीशम की लबेदी थामे कमरे में जा घुसी थी कि अगर सामना हुआ तो एक ही वार में उस निकृष्ट को मार गिराऊंगी।अन्दर जा कर देखा तो दंग रह गई ,वकुल बैठी थी चटाई पर।

उसका दांया हाथ फर्श पर उलट पडी मेरी श्रंगार पेटी में हिलडुल रहा था।निश्चय ही वह मेरे बालों के क्लिप चोरी करने आयी थी।मेरे कीमती खूबसूरत क्लिप, साटिन के जापानी रिबन, रंगबिरंगे इथोपियन हेयर बैण्ड्स अब तक कितनी ही ऐसी गैरमामूली चीजों पर वह हाथ साफ कर चुकी है। ये सब चीजें मैंने अक्सर उसकी फ्राक की जेब अथवा रूखे केशों में खुंसी देखी हैं। प्रायः रंगे हाथों पकडा भी है पर वह एक पत्थर की शिला के समान है जिस पर प्रभाव डालना आसान नहीं। मुझे सामने खडी देख कर भी उसकी अंगुलिया पेटी के भीतर पूर्ववत् चलती रही थीं।
'' उफ् बत्तमीज लडक़ी। '' मैं जोर से चीख उठी थी।मेरा रौद्र रूप देख कर भी वह तनिक विचलित हुए बगैर मेरा हाथ थाम कहने लगी -
'' चाक पैन्सिल ढूंढ रही थी कहीं मिल नहीं रही मेरी मदद कर दो न अन्ना।'' वह मुझे ऐसे ही सम्बोधित करती है।मैंने उसे कभी भी अपने लिये माँ जैसे समान्तर शब्दों को कहना सिखलाया ही नहीं। इसके पीछे मेरी गहन विवशता है। कैसी निर्ल्लजता से सफेद झूठ बोल रही थी। आहबित्ते भर की आदिवासी छोकरी का यह दुःसाहस। मैने उसकी काली सख्त बांहो को झिंझोड क़र रख दिया , ''तू बहुत बर्बाद हो गयी है, साज सजावट का रंग जम गया है तेरी मन्द - बुद्वी परअब तुझे अधिक दिन यहां रहने न दूंगीओह विनाशकारी लडक़ी।'' फटकार सुन उसकी नाक के टापू पर अनगिनत रेखाओं का जाल उभर आया ।आँखें सिकोड क़र वह मुझे बेहद नाराजग़ी से देखने लगी और क्रोध में भरी, ओठों को दांतों के बीच दबा, चप्पलें फटकाती जाने कब कमरे से ओझल हो गई ।

umabua
07-05-2012, 11:32 AM
वकुल, यानी मेरी परम सहेली आनन्दी की अवैध सन्तान। आनन्दी कभी भित्तिकला की शोधछात्रा थी और
उडीसा के कोरापुट नामक आदिवासी इलाके में अपना शोध कार्यपूर्ण करने के उद्देश्य से रहने लगी थी।स्वभाव से बेहद चपला और झक्की तबियत की। वैमात्री माँ (STEP MOTHER) की रूक्षता और अहर्निश (DAY NIGHT)तीखे कटाक्षों से आहत उसके मस्तिष्क में हर वक्त अजीबोगरीब कार्य करने की सनक रहती। जब - तब नये किस्से गढने की बीमारी भी। विमाता (STEP MOTHER)के उपद्रव से बचने के लिये अधिकांशतः वह
किताबें थाम मेरे घर आ जाती ,भोजन करती और कभी कभार रात्री में भी ठहर जाती। गृह जीवन की वक्र वीथिका (TOUGH WAY) पर चलते चलते , स्वभाव संभलने के बजाय तनिक बंकिम (ROUGH) हो चला था।इसी कारण किसी भी प्रकार की रोक - टोक उसे पसन्द न आती थी। वह बन्धन मुक्त प्राणी कभी 'कैम्पस' की बाउन्डरी पर बैठ कर सुट्टे मारता तो सभी लडक़ियों की आँखें फैल कर चौडी हो जातीं। वे सब फुसफुस कर ढके मुन्दे स्वरों में उसे कुलटा - कुलक्षणी कहतीं। उसे देखतीं तो व्यंगवाण चलातीं।

इन्हीं कारणों से कन्या समूह में उसकी पटती न थी। उनके दिन रात के शादी ब्याह के कीर्तन ,रीति रिवाजों के विषयों पर लम्बी पंगतें, ऐसे बोझिल संलापों से वह सदा दूर ही रहती। खींची गई परिपाटी पर घिसटना वह न चाहती थी। नियम तोडने में आनन्द प्राप्त होता है और आत्मविश्वास भी। मुझे भी उसकी इन बातों का मर्म समझ न आता था। अकेले आदिवासी जंगली लोगों के साथ रहने में उसे तनिक भय न लगता था। दिन के वक्त पानी में पेडों की छाल से निकाले एक लसीले पदार्थ को घोलती, उसमें तरह तरह के रंग मिलाती और आदिवासी स्त्रियों की सहायता से अजीबोगरीब नमूने धरती और मिट्टी की दिवारों पर उकेर देती। रात्री में गुलबकावली की झुरमुटी बेल के मध्य गडे हुए तम्बू में, मिट्टी के फर्श पर पडी माँझ की खाट पर पसर जाती। उसकी इस बेढब शोध शिक्षा पर मुझे बेहद आपत्ति थी और क्रोध भी । मैं उससे अपने पत्रों द्वारा रोष व्यक्त करती, फटकार लगाती किन्तु वह न मानती थी। कन्धे पर मोटे सूत का थैला और उसमें ढेरों प्रकार के अल्लम गल्लम कागज पत्तर भरकर वह जाने क्या - क्या आदिवासी बूढी महिलाओं से सीखा करती।

एक बार उसने पत्र के साथ कुछ तस्वीरें भेजी थीं। उसने लिखा भी था, 'यह कोरू हैबढिया,पक्के और चटख रंग बनाने वाला कमाल का रंगैया, दुबली सी बुढिया स्त्री वह टाकी माई है एक तजुर्बेकार भित्ती चित्रकार , हंसते हुए सांवले से ,बडी आखों वाले, वे हैं बीजू टोप्पो, एक सधे हुए उत्कृष्ट सहकलाकार, मेरे अग्रज , युनिवर्सिटी में संयोगिक (Occasional) मुलाकात, तब से साथ ही रहते हैं। उनकी काटेज है यहां, अब वे ही मेरे निरीक्षक हैं', मेरे सब कुछ उसके नवीन सहचर (NEW FRIEND) का सम्पूर्ण परिचय पत्र द्वारा ही हो गया था।

umabua
07-05-2012, 11:35 AM
आदिवासी परिवार से आये उस नवयुवक की अजब त्रासदी थी। बाप धान के खेत सींचता था और माँ मेलों में मुर्गे लडवाने का तमाशा दिखाती थी। स्वभाव से अत्यन्त कडवी। मुर्गों को पिंजडों में कैद कर, दस दस दिन फाके पर रखती और तमाशे वाले दिन जठराग्नि से बिलखते पक्षियों को हुर्र - हुर्र कर खूब लडवाती। भूख से व्याकुल जब एकआध पक्षी वहीं दम तोड देता तब ग्राहक प्रसन्न हो कर ताली पीटते और वह उनसे मनमाने पैसे ऐंठती । उस पर भी जी न भरता तो पीछे से किसी धनी से दिखते तमाशगीर की पाकेट चट से साफ कर देती।ऐसे ही तमाशे में एक पहलवान की जेब काटते वक्त चूक गई थी और निर्दयी ने पीट - पीट कर उसको वहीं अधमरा कर छोड दिया था।उस रात ही वह अभागी चल बसी थी। बाप,दुःख में पागल बना स्त्री को खेतों में लुक छुप ढूंढता न जाने कहां लोप हो गया था। दयावश मिली रोटियों से पलता बढता वह नौजवान अब कला विज्ञान का प्रख्यात व्याख्याता था।

किन्तु स्वयं आनन्दी को पहचान कर मुझे काफी तकलीफ हुई। कायापलट हो गया था उसके रंग रूप का।यूं तो वह सुन्दर कहलाने लायक नाक नक्शे की स्वामिनी न थी, किन्तु उसका फडक़ता व्यक्तित्व अच्छे भले लोगों को विकल कर देता था । उजबक से लबादे में लिपटी वह मुझे अनचीन्हे भय से भयभीत कर गयी थी। पत्र के अन्त में लिखा था- '' कुछ आवश्यक बातें कहनी हैं तुझसे मन बेहद अशान्त है जल्द चली आ।''

उसका चंचल मस्तिष्क निःसन्देह, बेढब और विपरीत दिशा में दौड रहा था। मैंने कोरापुट जाने का निर्णय जल्द से जल्द ले लिया था। भुवनेश्वर का स्टेशन जहां वह मेरा स्वागत करने आई थी अपनी लम्बी मस्तूल सी बांहो को दायें बांए हिलाते हुए। मैं उसे आँखें फाडक़र देखती रह गई थी कैसी जादूगरनी सी दिख रही थी।गर्दन में झूलती चम्पाकली , कानों से चिपकें गोल गोल अगढ टपके ,चिबुक (cheek) पर रखे डिठौने व अस्त व्यस्त कपडों में लिपटी वह मन्द मन्द मुस्कुरा रही थी । मेरे जूट के थैले को शीघ्रता से लपकते हुएकहने लगी- ''चल तेरे दर्शन हुए बहुत बढिया हुआ ढेर सारी बातें करनी हैं तुझसे ओह कितना वक्त गुजर गया यूं ही। एक दीर्घ उसांस ऐसा करते वक्त जैसे उसके हृदय पर रखा कोई भीषण बोझ हट गया था। मैंने उसकी आखों में झांक कर गौर किया, वह वास्तव में किसी गहरी उलझन में थी ।स्टेशन से बाहर एक लम्ब तडंग अजनबी युवक भी हमारे साथ चल रहा था।मुझे इसका आभास तब हुआ जब मेरे कन्धे पर हल्की सी थपकी देते हुए आनन्दी ने उस ताम्बई रंग के पुरूष की और इशारा किया।

'' इनको तो तू पहचान ही गई होगी पत्र के साथ जो तस्वीरें भेजीं थीं उनमें।'' मुझे उसे देख याद आया, वहबीजू टोप्पो था । टापूदार भद्दी नासिका (nose) और भरे माँसल थुलथुल ओंठ उसके चेहरे पर मरूभूमि पर उग आए कैक्टस की भांति चमक रहे थे। किस हब्शी के मोहजाल में आ पडी थी मेरी दिग्भ्रमित सहेली। पहुंचने में अनगिनत अग्निरेखाएं लिये वह मुझे अविश्वास भरी नजरों से घूरता रहा था, मानो पूछता हो किसने बुलाया था तुम्हें, क्या कर सकती हो तुम कुछ नहीं कुछ भी नहीं। उसने मुझे कतई नापसन्द कर दिया था।मुख पर विषाद की गहन कालिमा लपेटे वह चीख - चीख कर जैसे कह रहा था जाओ चली जाओ यहां से । आनन्दी ने अपने वार्तालाप में उसकी प्रशंसा के पुल बान्ध दिये थे। घर परिवार का कुशल मंगल जान अपने प्रिय सखा की रास्ते भर पीठ थपथपाती चलती रही थी -

umabua
07-05-2012, 11:43 AM
'' बेहद सधा हुआ प्रखर हाथ है इनका, ब्रश को जब कैनवास पर फेरते हैं , मैं तो मन्त्रमुग्ध ही हो जाती हूं इनके बनाए कितने ही चित्र प्रदर्शनियों में जाते हैं पुरस्कृत होते हैं , कितनी चर्चाएं होती हैं इनकी कला दीर्घाओं में, कला प्रेमियों के मध्य इस पर भी क्या मजाल कि कोई दंभ - घमंड करते हों। एक प्रथित वट वृक्ष (great banyan tree) की भांति अविकल ।'' मैंने गौर किया वह किसी गहरे अवसाद में डूबा था और अपराधी जैसी भाव भगिमाओं से प्रच्छन्न सिर झुकाकर चला जा रहा था । 'दुष्ट मर्कट' (rubbish monkey) मैंने अपने ओंठ दन्तपंक्ति के बीच हौले से कतर दिये थे। उसकी, अपने प्रति बेरूखी से मैं बेहद चिढी हुई और उद्विग्न थी। इसी कारण उसके लिये किया गया अखंड परिकीर्तन मुझ पर कोई असर न दिखा सका था। गङ्ढों और कीचड से भरे परनालों पर उछलते लुढक़ते मेरी समूची देह ऐंठ गई थी और टांगें सीधीकर विश्राम करने की इच्छा बलवती हो उठी थी । इस साधनहीन बीहड इलाके में कैसी निर्भीकता से विचरती होगी मेरी विमुक्त सहेली - बस यही सोच सोच कर विस्मित थी।

''ठहर जा विनीठहर जा।'' मेरे लडख़डाते पांव एकाएक थमे थे। सामने कच्ची ईटों की एक सफेद धवल झोंपडेनुमा 'काटेज' दोपहरी की प्रचण्ड तपती किरणों से प्रकाशित हो जगमगा रही थी । श्रीफल के वृक्षों से घिरी थी वह ,खुरदुरी ईंट की दिवारों व फर्श पर अद्भुत चित्र, अनूठे किन्तु रहस्यमयी प्राणरक्षा के लिये चौकडी मार भागता थरथराता हुआ हिरन, युद्व में धूल चाटते योद्वा का विवस्त्र विक्षिप्त शरीर , किसी कालदण्डित विरक्त स्त्री के अग्नेय कोटर। प्रत्येक चित्र में एक गहन अन्तर्द्वन्द्व, चित्रकार ने जैसे कालविभीषिका का समर छेड रखा था, अपने चित्रों में ।

''यह काटेज बीजू जी की है और ये सभी चित्र स्वयं मैंने खींचे हैं कह तो कैसे लगे तुझे ।'' प्रश्न को वहीं अनुत्तरित छोड , मैं धीरे से भीतर की ओर बढ ग़ई थी।अन्धकार से भरी दो छोटी छोटी कोठरियों से घिरे ओसारे के बीचोंबीच पत्थरीले लाल चबूतरे पर गुडमुडी बन एक आदीवासी बुढिया बैठी थी।कन्धों पर किसी नवजात शिशु बालिका के कृष्ण कपाल(balckish forehead) को टिकाए वह सूखी हथेलियों से उसे हौले होले थपक रही थी ।बालिका का लोमश (hairy) बदन रह रह कर कांप उठता था।उसके पीत वर्ण (yellow coloured) के मलिन मुख पर सूखे सफेद ओठ देख कर प्रतीत होता था जैसे बूढी क़ी बांहो में कोई व्याधबेधित (wounded) कबूतर छटपटा रहा हो ।मैंने करूण भाव से बच्ची के कोमल केशगुच्छ को सहला दिया था,'' जान पडता है किसी संघाती ज्वर की चपेट में हैइसको दवा दारू दो वरन मर जाएगी।''

बुढिया सन से सफेद सिर को हिलाती धीमे से उठी थी और अपनी जलविहीन आँखें मेरे चेहरे पर टिका कर यूं खडी हो गई थी जैसे कहती हो - यह बहुत बीमार है बेटी, पर अब तुम आ गई हो तो धीमे धीमे सब ठीक हो जाऐगा।'' भोजन पर बैठ बेझड (barley & gram mixed) क़ी रोती टूंगते हुए मैने अन्तःकरण में अब तक दबे प्रश्न को दागा था -

'' तेरी रिसर्च कितनी शेष है कब तक रहती रहेगी यहांछोड यह वनवासी जीवन वापिस घर को चल बहुत हुई तेरी पढाई।'' इतना सुन उस की पहुंचने में लबालब जल भर आया था।अपने हाथों में मेरा हाथ दाब कर कहने लगी - '' चलने की बात मत कह विनी मेरा जीवन बिगडा जाता है । उज्जवल भविष्य है मेराबस एक भला करवह बच्ची जो टाकी माई की गोद में देखती थी उसे अपने संग ले जा।''

'' क्या अनर्गल कहती है क्यों ले जाऊं उसे भला उससे मेरा क्या सम्बन्ध ।'' अनिष्ट की आशंका हृदय में दृढ हो चली थी ।

umabua
07-05-2012, 11:45 AM
'' किन्तु मेरा सम्बन्ध तो बेहद गहरा है इसीलिये कहती हूं उसे ले जा।'' उसने रहस्यमयी भाव से मुझे देखा था ।मैं पछाड ख़ा सिर थाम कर बैठ गई थी । कैसा अनर्थ कर गई थी मेरी निर्लज्जा सहेली, मति मारी गई थी उसकी।अपने किये गये दुष्कर्म का परिणाम भोगने के लिये मुझ दुर्बल स्त्री को पकड लिया।आह नियति का खेल मैंने सिर पीट लिया था।
'
'अब जो हुआ उस पर पर्दा डाल तुम दोनों विवाह कर लो।'' इस दुःसाहस में बीजू सहभागी थे यह भी मैं जान गई थी ।

'' नहीं विनी अभी हम विवाह नहीं कर सकते ।''स्वर में दृढता थी ।

'' कारण!''

'' बीजू मेरे लिये अति सम्मानीय हैं और मेरे अग्रज भी, उनकी समस्या मैं समझती और जानती हूं। इतनी अल्प आयु में, विवाह जैसे जटिल बन्धन में पड क़र, उनका भविष्य पूर्णतया बर्बाद हो जाएगा। वे विवाह करेंगे, किन्तु उचित समय आने पर सुभीते के साथ ही।''

'' और यह पाप ।''

'' मात्र एक अनहोनी।'' सहज सपाट उत्तर, खेद या ग्लानिभाव का लेश मात्र भी अंश नहीं था।

'' फिर इस कलंक को जीवित रखने का अर्थ!''

'' तो क्या उस निरीह जीव को नदी नाले में बहा देती , कूडे क़रकट के ढेर के नीचे दाब कर भाग आती क्या, यह पाप न होता कहो उत्तर दो।'' वह आक्रामक हो उठी थी।

मैं मुंह फाडे उसे ताकती रह गई थी।उसके विकल ,उद्वेलित करते चित्रों और उसके स्वयं के चरित्र में कितना अन्तर था। वह कैसे मुझे एक वन्चिका की भान्ति उलट पाठ पढा रही थी। यह मैं भी समझती थी कि उस निविड (all alone) ग़्राम में उस बालिका को जन्म देने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प न था। वह चाहती तो शहर जा कर इस समस्या का अन्त करा सकती थी किन्तु न जाने क्यों उसे मुझ पर अटल विश्वास था। मैं बालिका को अपने संग ले कर जाऊं इसी उद्देश्य से उसने मुझे दिल्ली से इस निर्जन वन तक की दीर्घ यात्रा करने के लिये विवश कर दिया था। अब तो वह त्रिया हठ पर उतर आई थी।इतना शीथिल व्यक्तित्व हो सकता था उसका, यह मैं मूर्खा कभी जान ही न पाई।तीस बरस की परिपक्व स्त्री थी वह। उस वयस में जब अमूमन स्त्रियां जननी का स्वरूप धारण कर अपनी तुच्छ इच्छाओं का शमन कर देती हैं, वहां यह विहंग रूपी ललना अभी तक लडक़पन के झोंकों से आनन्दित हो रही थी।समस्त सामाजिक बन्धनों को तोड मस्त मतवाली फिर रही थी ।

umabua
07-05-2012, 11:49 AM
मुझे ठीक से याद नहीं पडता अब तक कितनी ही बैठकों व व्याख्यानों में मैं वर्तमान युग की नवपीढी क़े प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करती आई हूं । दैनंदिन उनमुक्त होते युवा वर्ग को समय समय पर जी भर लताडती रही हूं । '' लिव इन टुगैदर विदाउट मैरिज'' की तर्ज पर मदमस्त हो रहे युगल समाज की कठोरतम भर्त्सना की है मैंने। परन्तु मेरी व्यथा यह कि वल्लभा (fast friend) ही ऐसा कृत्य कर बैठी थी। समस्त बन्धन तोडने के लिये कैसा व्याकुल था उसका विप्लवित मन। मैं उसे क्या दण्ड देती हां इतना अवश्य कर सकती थी कि उसकी अनैतिक, मृतप्राय सन्तान को स्वीकार करने से साफ इंकार कर देती उसे बुरा भला कहती और खूबलड झगड क़र वापिस लौट जाती। कुछ ऐसा ही निश्चय कर लिया था किन्तु जब सुखंडी देह (thin body) पर झूलते पीत वर्ण के मलिन मुख पर पुनः दृष्टि गई तो ऐसा आभास हुआ जैसे वह निरीह बालिका अधिक दिन जीवित न रह सकेगी।मैं एक प्राणी की मृत्यु का पाप अपने सिर ओढने जा रही थी अकारण ही, व्यर्थ ही।

'' मैं बच्ची को लिये जाती हूं इसकी प्राण रक्षा करूंगी पूर्ण प्रयत्न के साथ। किन्तु जब समय आयेगा तब इसको अपने संग रखने में कोई ऊज्र न करोगी ऐसी आशा भी रखती हूं।'' यह कह कर मैं उस नन्हीको अपने अंक में समेट वापिस दिल्ली आ गई थी । शहर लौट कर कहानी गढ दी कि समाज सेवा हेतु एक अनाथआश्रम से किसी रोगी कन्या के इलाज का कार्य ले लिया है। पडौसी रिश्तेदार उत्सुकतावश, सन्देहास्पद दृष्टि से देखते तो थे किन्तु कुछ भी कह पाने के लिये विवश थे।

मैं उसे एक से एक महंगे डाक्टर के पास लेकर जाती, दवा सेवा में कोई कसर न रखती , जी भर कर पैसा लुटाती, बस एक मात्र ध्येय को लिये कि उस अबोध दुर्भागी को प्राणदान मिल सके। ईश्वर की कृपा से वह कुछ ही अन्तराल में स्वस्थ हो चली थी। गठन व नाक नक्शे में हूबहू अपने पिता का प्रतिरूप। दौडती तो ऐसा प्रतीत होता मानो कोई सिंहनी धरती को प्रकंम्पित कर बढी जा रही हो।पहुंचने से झरते वही अग्नि बाण जो मैंने कभी उसके जनक के नेत्रों में देखे थे और वही बदसूरत टापूदार दीर्घ रन्ध्रों वाली नासिका (nose with big hollow)। स्वभाव से भी बेहद विचित्र ,मस्तिष्क में एक अजीब किस्म की विचलता और खलबलाहट ।छुटपन में घर के कितने ही कीमती गुलदान,वास्तुशिल् उसके नृशंस हाथों की भेंट चढ ग़ये थे और कितनी ही पोर्सिलिन व इरानी मिट्टी की कलात्मक मूर्तियां ।

अब पढने स्कूल जाती थी सो बिना कुछ पूछे धरे मेरे बटुए से रूपये पार लगाती और खाने की छुट्टी में चटोरी,सारे पैसे खांड क़ी चिडिया और चाट के पत्तर चाट कर उडा देती।चोरी करना उसका प्रिय शगल था। धराहीन धात्री (mother) व पितृ (father) की अनैच्छिक सन्तान। यही विचार कर मैं शान्त रहती कि कल को वह चली जाएगी। आनन्दी को अक्सर पत्रलिखती या हर दूसरे तीसरे दिन फोन खटाखटाती कि वह जल्द ही कुछ निणर्य कर विवाह की व्यवस्था करे। पढाई लिखाई तो उसके उपरान्त भी हो जाएगी बिटिया की देह दिन ब दिन मन्जरी की भांति बेरोक खिंचती जाती है और साथ ही उसकी उटपटांग हरकतें भी। उत्तर में खेदभरे पत्रों का सिलसिला चलता थोडी बहुत पढाई शेष है, पण्डित से विचार किया है वे शुभ लग्न देखेंगे अभी मुहुर्त नहीं है ,बीजू भी नेपाल गये हैं उनसे भी सलाह करनी है इत्यादि इत्यादि।मैं मन मसोस कर रह जाती कभी - कभी इच्छा होती कि पगली को उसकी माँ के पास पटक आऊं पर मैं पाषाण हृदय न थी।इसी कारण ही तो आज तक उसके ढंग - बेढंग सभी कृत्यों को उपेक्षित करती आई थी।

umabua
07-05-2012, 11:51 AM
मुझे पहले उससे कभी भय न लगता था पर अब देखती तो देह में सुरसुराहट सी दौड ज़ाती।मैंने निश्चय किया कि उस को उसके निश्चित स्थान पर छोडना ही श्रेयस्कर होगा। इसके उपरान्त भले ही आनन्दी मुझसे आजन्म वैर पाल ले। मैं वकुल को ले कर कोरापुट पहुंच गई थी ठीक उसी प्रकार जब कभी आनन्दी का पत्र पाकर मैं इसी स्थान पर कुछ बरस पूर्व यहां दौडी चली आई थी। पर अब कोई स्वागत को न था मैं स्वयं ही वकुल का हाथ थामे, आनन्दी को उसकी तुच्छ धरोहर वापिस करने जा रही थी। काटेज पहुंची तो वह एक श्रीफल के वृक्ष के नीचे बैठी धूप ताप रही थी।पहले से कहीं अधिक निराश और अकेली। मुख पर घोर कालिमा और दुःख की छाया।

''आओ विनी आओ, अकेले ही आ गईंखबर कर दी होती तो मैं स्टेशन पर।''मुझे देखते ही उसने अपनी जड सी काया को कुर्सी से लगभग धकेल दिया था ।

''बीजू कहां हैं।''मैंने उसकी बात बीच में ही काटी थी।

''वह दुष्ट तो चला गया छोडक़रअब भूल जा उसे, आजकल किसी आस्ट्रेलियन स्टूडेण्ट से इश्क चल रहा है उसका।'' वह लगभग हांफने सी लगी थी। क्षण भर में धूर्त प्रेमी की पोल पट्टी खुल गई थी।आदीवासी छोकरा इतना शातिर निकलेगा किसको खबर थी।

''इस का क्या होगा ।''मैंने वकुल की ओर इशारा किया था।

''होना क्या है किसी अनाथआश्रम में पल जाएगी।''निठुर जननी ने कडवाहट से मुंह फेर लिया था। सत्य ही है - नीम का वृक्ष फल तो देता है किन्तु क्षण भर में उसे अपने से विलग कर धुल धूसरित भी कर देता है।

मैं भी असहाय थी क्या करती।उसी रात मुंह अन्धेरे वकुल को शहर के किसी अनाथआश्रम में जुगत जुगाड क़र डाल आई थी।हृदय से एक गहरा बोझ हट गया था, यद्यपि इस बात का अहसास मुझे लगातार कुरेदता रहा था कि पुनः, कहीं किसी जगह,एक और आनन्दी जन्म ले रही थी।


-विनीता अग्रवाल