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View Full Version : हास्य रचनायें



aawara
29-01-2012, 10:13 PM
साभार राग-दरबारी




दारोगाजी उनकी बड़ी इज्जत करते हैं। वे दारोगाजी की इज्जत करते है। दोनो की इज्जत प्रिंसिपल साहब करते है। कोई साला काम तो करता नही है, सब एक-दूसरे की इज्जत करते हैं।

aawara
29-01-2012, 10:15 PM
वार्ता बेहद आत्मीयता पूर्ण माहौल में हो रही थी। जनप्रतिनिधि पांच मिनट में साहब बहादुर की पच्चास कमियां गिना चुका था। अपनी बात पर वजन रखने के लिये वह उन कमियों को दोहराता भी जा रहा था। इसके बाद उसको फ़िर वजन की कमी लगती तो उन कमियों को एक बार फ़िर दोहरा देता। परम्परा, ट्रेंड, सहयोग, इन्सानियत, भलाई, कल्याण आदि शब्दों का उच्चारण करते हुये उसने दो मिनट में ही यह जता दिया कि उसे बहस-यज्ञ के सारे मंत्र जबानी याद हैं। साहब चेहरे पर ढ़ाई-तीन किलो अतिरिक्त गम्भीरता धारण करके बहस-वार्ता में खड़े-खड़े भाग ले रहे थे।

साहब बहादुर हर आरोप के जबाब में -अगर आपको कोई शिकायत है तो आप लिखकर दीजिये मैं उसकी जांच कराऊंगा कहते हुये तीन मिनट में जांच के बारह आश्वासन दे चुके थे।

जनप्रतिनिधि ने अचानक बिना किसी संदर्भ के कह दिया- हमें आपकी ईमानदारी पर पूरा विश्वास है।

aawara
29-01-2012, 10:19 PM
अचानक वार्तारत जनप्रतिनिधि की याददाश्त ने उनसे, गठबंधन सरकार के शातिर गुट की तरह, बिना किसी पूर्व सूचना के समर्थन वापस ले लिया। उसकी याददाश्त की सरकार भरभराकर गिर गयी। दिमाग पर बहुत जोर डालने पर भी उसे याद नहीं आया कि आगे बहस के लिये कौन सा शब्द-हथियार चलाना है। एक बार तो उसने अपनी कही बात को दोहराकर काम चलाना चाहा लेकिन इसके बाद भी बात खतम ही नहीं हुई! उसको कुछ समझ नहीं आया कि आगे क्या कहे! साहब के चेहरे पर विराजमान गम्भीरता जनप्रतिनिधि की खलास होती उत्तेजना का टेंटुआ दबाने लगी....

ऐसे गाढ़े समय में आमतौर पर नानी को याद करने का रिवाज है। लेकिन जनप्रतिनिधि हमेशा (शायर, सिंह और सपूत मे से कोई भी न होने के बावजूद) लकीर छोड़कर चलने का आदी था। उसने अपने गुरू को , गुरु को भी नहीं उनके उपदेश को याद किया- बेटा जब कभी किसी हाकिम के सामने अर्दभ में फ़ंसना तो उसकी इज्जत करने लगना। एक बार हाकिम की इज्जत करने पर फ़िर वह कुछ बोलने के लायक नहीं बचता।

गुरु का उपदेश याद आते ही जनप्रतिनिधि चिल्ला-चिल्लाकर साहब को बताने लगा कि वह उनकी इज्जत करता है। दो-तीन बार इज्जत का हल्ला मचाने के बाद उसने साहब को फ़िर खुले आम हल्ले की चोट पर बताया कि उनको (साहब को) नहीं पता कि वह (जनप्रतिनिधि) उनकी कितनी इज्जत करता है। उसने उनकी इज्जत करने की बात इतने जोर से कही कि कुछ लोगों ने तो सहमकर अपने कान बंद कर लिये।

aawara
29-01-2012, 10:23 PM
वैसे भी देखा जाये तो आजकल जिसे देखो वही दूसरे की इज्जत करने पर आमादा है। लोग इज्जत बचाते घूमते हैं। लेकिन करने वाले सरेआम इज्जत करके चले जाते हैं। जिसकी इज्जत हो जाती है वो बेचारा अपनी इज्जत समेटे घुग्घू बना बैठा रहता है।

एक बहुत ईमानदार माने जाने वाले इंसान चार भले आदमियों के बीच बैठे अपने ईमानदारी के किस्से सुना रहे थे। उसी क्रम में बताते जा रहे थे कि बेईमान लोग उनसे थर-थर कांपते हैं!

अचानक एक बहुत बेईमान माना जाना वाला इंसान घुसा और सबके सामने बेहद ईमानदारी से उनके पैर छूकर श्रद्धावनत होकर खड़ा हो गया और भाभीजी कैसी हैं , भतीजे-भतीजी कैसी हैं पूछते हुये सरेआम उनकी इज्जत करने लगा।

उनका ईमानदारी का आख्यान बिना थरथराये बंद हो गया। मानों बेईमान द्वारा सरेआम इज्जत पाकर ईमानदारी की बोलती बंद हो गयी.....



पहले लोग एक-दूसरे की मन ही मन इज्जत कर लेते थे। कभी-कभी तो पता ही नहीं चलता और लोग बिना बताये न जाने कित्ती इज्जत कर डालते। जिन्दगी बीत जाती लोग इज्जत करते रहते लेकिन बता के नहीं देते थे। बताते भी तो सहमते हुये दूसरे के कान में बात डाल देते कि वे उनकी बहुत इज्जत करते हैं। होते करते बात सही जगह पहुंच जाती लेकिन वो भी इज्जत वाली बात को तव्वजो नही देते। इससे इज्जत बेचारी बड़ी उपेक्षित महसूस सी करती। वह होती तो लगातार है लेकिन लोगो को पता नहीं चल पाता। जिधर देखो उधर पता नहीं कित्ती बेनामी इज्जत इधर-उधर छितरी दिखाई देती....

aawara
29-01-2012, 10:25 PM
लेकिन इधर समय के साथ इज्जत करने के मामले में लोग मुखर हुये हैं। हल्ला मचाते हुये इज्जत करते हैं। गाली-गलौज के पहले इज्जत करते हैं। मारपीट के पहले इज्जत करते हैं। हाथापाई के पहले इज्जत करते हैं। हर उठापटक के आगे इज्जत करते हैं। पीछे इज्जत करते हैं। दायें-बायें, ऊपर-नीचे सब तरफ़ इज्जत कर डालते हैं।
आपको अगर जीवन जीना है तो इज्जत करवाये बिना गुजारा नहीं है। हर समय आपको इज्जत करवाने के लिये तत्पर रहना चाहिये। बिना इज्जत कराये आजकल कुछ नहीं मिलता- न पैसा, न पद, न नौकरी, न प्रमोशन, न डी.ए., न एरियर, न पगार , न ओवरटाइम! आपको जिन्दगी में कुछ हासिल करना है उसके लिये आपको इज्जत करानी ही पड़ेगी। बिना इज्जत कराये आजकल कुछ हासिल नहीं होता।

gulluu
29-01-2012, 10:26 PM
बहुत खूब , राग दरबारी पढ़ना पड़ेगा जल्दी से अब . पूरा का पूरा .
या फिर आप यही पर उसके दर्शन करवा देंगे ?
धन्यवाद इस सूत्र के लिए .

aawara
29-01-2012, 10:27 PM
जिस तरह इज्जत करने पर आदमी निरीह बनकर रह जाता है उससे तो लगता है कि हमें हर तरफ़ की समस्याओं पर काबू पाने के लिये इज्जत के हथियार का धड़ल्ले से प्रयोग करना चाहिये। हमें भ्रष्टाचारियों, चोर-उच्क्कों की इज्जत करके उनकी बोलती बंद कर देनी चाहिये। हमें आतंकवादियों, देशद्रोहियों की इतनी इज्जत करके डाल देनी चाहिये कि मारे इज्जत के उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाये। देश की तमाम समस्याओं पर काबू पाने के लिये हमें उनकी इज्जत करने का रास्ता अख्तियार करने का वैकल्पिक मार्ग अपनानाना चाहिये। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद, अवसरवाद, जाहिलपन, पिछड़ापन की हमें थोक के भाव इज्जत कर डालनी चाहिये। जहां एक बार इनकी कायदे से इज्जत हुई ये सकपकाकर जहां की तहां ठिठक कर खड़ी हो जायेंगी और तब फ़िर हम जैसे चिमटी से मरी चुहिया पकड़ कर डस्टबिन में डाली जाती है वैसे ही इन समस्याओं को पकड़कर किनारे कर देंगे।

aawara
29-01-2012, 10:29 PM
कहां तक बतायें! इज्जत करने के ढेरों सामाजिक उपयोग हैं। एक बार आजमा के तो देखिये।

आजमाइये और फ़िर बताइयेगा आपके अनुभव कैसे रहे? आपकी राय हमारे लिये अमूल्य है क्योंकि हम आपकी इज्जत करते हैं!

इज्जत के सिवा आज के समय कोई किसी का कर भी क्या सकता है