View Full Version : कबीरा......... सर र र र र र र र र र
sonie
02-02-2011, 11:54 AM
होली दस्तक दे रही है दरवाजे पर... सुनी होगी आपने भी या कुछ व्यस्त रहे होंगे.. ना सुन पाए हों... कोई बात नहीं मैं आ पहुंची हूँ आपके दरवाजे पर फगुआ मांगने.. जमाना था जब यार-दोस्त छोटे-बड़े घर घर फगुआ मांगने जाते थे कि आयें और मुझे प्रेम के रंगों में रंग दें.. (रंग लगाने नहीं जाते थे लगवाने जाते थे..)
फगुवा मांग रही हूँ... मुठ्ठी भर गुलाल.. इस कविता के माध्यम से.. मुझे आशा है वो मुठ्ठी भर गुलाल मुझे मिलेगा ऐसी ही होली पर लिखी मन कि आन्तरिक प्रेम पगी भावनाओं को झिंझोड़टी कविताओं के माध्यम से..
sonie
02-02-2011, 12:24 PM
पाँव दबाये आ घुसा
घर में सजन बसंत
छू कर मुझको कर गया
हाय कतई बदरंग
चुरा ले गया लाली गालों की
अधरों से मकरंद
धड़कन धीमी छुई मुई सी
बिंदिया से पूनो चंद
हरियाली चोली लाल चुनरिया
मेरा बाजूबंद
माला, नथनी, मांगतिलक भी
सांसों की भीनी गंध
कुछ भी नहीं बचा है प्रियतम
होली में क्या दूं तुमको
आ जाओ घर फाग से पहले
फगुआ दे दो मुझको
फगुआ के रंग मांग रही हूँ
साथ तुम्हारा संग
अधरों से अधरों पर लिख दो
कोई रसवंती अनुबंध.
gulluu
02-02-2011, 02:56 PM
होली में कहाँ ठिठोली अब
अब कहाँ रंग हैं चटकीले
हैं जब से श्याम गए मथुरा
तब ही से नयना हैं गीले
सब ग्वाल -बाल बेहाल हुए
अब फीके रंग गुलाल हुए
सब सखी हुईं बैरागिन सी
अब सूने सब चौपाल हुए
और श्याम तुमाहरे बिन अब तक
राधा-कर हो न सके पीले
सब चंदन और गुलाल लिए
रंग नीले पीले लाल लिए
अब लौट चले हैं घर अपने
सब मन मैं एक मलाल लिए
अब घर आँगन पगडंडी सब
कुछ लगते हैं सीले सीले
अब लौटें श्याम तो हो होरी
हो गोपीन के संग बरजोरी
सब सखियाँ राधा प्यारी की
और श्याम बीच हो झक झोरी
जब चले श्याम की पिचकारी
तब लहंगा -चूनर हों गीले
ChachaChoudhary
02-02-2011, 05:12 PM
<b>
आज के दिन इस दुनिया में, फिर बंदूक चलेगी
कहीं निकलेगी गोली इससे, और कहीं होली मनेगी।
कहीं पे बच्चे ले के घूमें, बंदुकनुमा पिचकारी
और देखो कहीं पे गूँजें, बच्चों की सिसकारी।
रंग वही है लाल सब जगह, मगर फर्क है इतना
एक रंग से नफरत फैले, दूजे में प्यार है कितना।
आओ मिला दें सब रंगों को, हर दिल में प्यार जगा दें
अगली होली से पहले, हम नफरत दूर भगा दें।
कहे ‘तरूण’ इस होली देखो, सुंदर प्यारा सपना
सबके दिल में प्यार बढे, सागर में पानी जितना।
</b>
Dr.Ashusingh
02-02-2011, 11:17 PM
ठंडी चले बयार,
गंध में डूबे आँगन द्वार
फागुन आया।
जैसे कोई थाप चंग पर देकर फगुआ गाए
कोई भीड़ भरे मेले में मिले और खो जाए
वेसे मन के द्वारे आकर
रूप करे मनुहार
जाने कितनी बार
फागुन आया।
जैसे कोई किसी बहाने अपने को दुहराए
तन गदराए, मन अकुलाए, कहा न कुछ भी जाए,
वैसे सूने में हर क्षण ही
मौन करे शृंगार,
रंगों के अंबार
फागुन आया।
-डॉ० तारादत्त 'निर्विरोध`
१७ मार्च २००८
Dr.Ashusingh
02-02-2011, 11:18 PM
कूक उठी कोयलिया वन रे
शिशिर त्रास से नग्न डाल पर,
नवल पात निकले तरुवर पर
फाग खेलते सुमन सुवासित,
रंग बिरंगे किसलय दल पर
तरुण विभाकर लगे उमगने
तपन लगे वियोगिन तन रे
कूक उठी कोयलिया वन रे
सुरभित शीतल मंद वसंती
मलयानिल मदमाता डोले
नयन मनोहर सरस कटीले
अल्हड़ नवकलियों ने खोले
डाल डाल पर तितली नाचे
मुदित हुए जोगिन के मन रे
कूक उठी कोयलिया वन रे
द्रुम बेली से सज अलबेली
हरी भरी वसुधा लहराए
फूलों का रस पी मतवाला
गुन गुन करता छलिया गाए
अवनी पर अमृत वर्षा कर
झूम उठे अंबर में घन रे
कूक उठी कोयलिया वन रे
- डॉ. बनवारी लाल मिश्र
Dr.Ashusingh
02-02-2011, 11:19 PM
भोले बाबा की भंग हो या हो हलाहल विष
होली पर साली दे तो बेहिचक पत्थर पर घिस
अगर यह भंग हुई तो पीकर मंजनू भौंरा सम मंडराएगा
अगर कहीं विष हुआ मजनूँ की पदवी पा जाएगा।
परएक बात ध्यान रख साली होनी चाहिये मिस
नहीं तो अगर सपने में भी तूने उसे कर लिया किस
सर पर बेहिसाब पड़ेंगे औ अपना मुँह भी नुचवाएगा
और बीवी जानेगी तब होली पर रक्षाबंधन याद आएगा।
sonie
04-02-2011, 09:28 AM
गुलजार खिले हों परियों के
और मजलिस की तैयारी हो
कपड़ों पर रंग के छीटों से
खुशरंग अजब गुलकारी हो |
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sonie
04-02-2011, 09:30 AM
रंगरेज बने मोरे श्याम तुम हू बन जाओ ना
रंग डारो धरती धाम होरी खेरन आओ ना
- सोनी
SUNIL1107
07-03-2011, 09:58 PM
आयी है रंगो की बहार
गोरी होली खेलन चली
ललिता भी खेले विशाखा भी खेले
संग में खेले नंदलाल...
गोरी होली खेलन चली ।
लाल गुलाल वे मल मल लगावें
होवत होवें लाल लाल...
गोरी होली खेलन चली
रूठी राधिका को श्याम मनावें
प्रेम में हुए हैं निहाल...
गोरी होली खेलन चली
सब रंगों में प्रेम रंग सांचा
लागत जियरा मारै उछाल...
गोरी होली खेलन चली
होली खेलत वे ऐसे मगन भयीं
मनुंआ में रहा न मलाल...
गोरी होली खेलन
तन भी भीग गयो मन भी भीग गयो
भीगा है सोलह शृंगार...
गोरी होली खेलन चली
झ्सको सतावें उसको मनावें
कान्हा की देखो यह चाल...
गोरी होली खेलन चली
कैसे बताऊँ मैं कैसे छुपाऊँ
रंगों ने किया है जो हाल...
गोरी होली खेलन चली
आओ मिल के प्रेम बरसायें
अम्बर तक उड़े गुलाल...
गोरी होली खेलन चली ।
SUNIL1107
07-03-2011, 10:14 PM
आज बिरज में होरी है रे रसिया
होरी है रे रसिया, बरजोरी है रे रसिया | आज बिरज में ...
आज बिरज में होरी है रे रसिया
कहूँ बहुत कहूँ थोरी है रे रसिया | आज बिरज में ...
इत तन श्याम सखा संग निकसे
उत वृषभान दुलारी है रे रसिया | आज बिरज में ...
उड़त गुलाल लाल भये बदरा
केसर की पिचकारी है रे रसिया | आज बिरज में ...
बाजत बीन, मृदंग, झांझ ओ डफली
गावत दे -दे - तारी है रे रसिया | आज बिरज में ...
श्यामा श्याम संग मिल खेलें होरी,
तन मन धन बलिहारी है रे रसिया | आज बिरज में ...
होरी है रे रसिया, बरजोरी है रे रसिया | आज बिरज में ...
आज बिरज में होरी रे रसिया
SUNIL1107
07-03-2011, 10:31 PM
डाला सिर पे गुलाल
हटाऊं कैसे ?
धुलवाऊं कैसे ?
डाला...
होली मेरीजान की दुश्मन
है जी का जंजाल
बाहर से मैं आया बचकर
घर में मला गुलाल।
ओ ऽऽ होली निगोड़ी से खुद को
बचाऊं कैसे, कहीं जाऊं कैसे ?
डाला सिर पे गुलाल,
हटाऊं कैसे)
SUNIL1107
08-03-2011, 04:42 PM
कुछ रंग भरा ,कुछ भंग भरा ,
होली का मौसम आता है
कुछ जीजा का ,कुछ साली का ,
होली में मौसम आता है .
देवर -भाभी के रिश्तों पर
तो रंग और चढ़ जाता है ,
उनकी ठिठोलियाँ देख देख ,
पति मन ही मन जल जाता है .
सजनी की भींज गयी चोली ,
साजन की मस्त निगाहों से ,
रंग पिचकारी बेकार लगे ,
जब होली का दिन आता है
बाबा ,देवर से लगते हैं ,
होली के देखो तो तेवर .
बुड्ढों के गालोँ पर भी जब ,
होली में दम -ख़म आता है .
साली -जीजा ,भाभी -देवर ,
सजनी -सजन हैं मस्त आज
बाबा ,देवर से कूद रहे ,
होली में यौवन आता है
SUNIL1107
11-03-2011, 03:35 PM
आज बिरज में होरी रे रसिया। होरी रे होरी रे बरजोरी रे रसिया।
घर घर से ब्रज बनिता आई, कोई श्यामल कोई गोरी रे रसिया। आज बिरज में…॥१॥
इत तें आये कुंवर कन्हाई, उत तें आईं राधा गोरी रे रसिया। आज बिरज में…॥२॥
कोई लावे चोवा कोई लावे चंदन, कोई मले मुख रोरी रे रसिया । आज बिरज में ॥३॥
उडत गुलाल लाल भये बदरा, मारत भर भर झोरी रे रसिया । आज बिरज में ॥४॥
चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण प्रभु, चिर जीवो यह जोडी रे रसिया । आज बिरज में ॥५॥
SUNIL1107
11-03-2011, 03:42 PM
राग बसंत
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लाल गोपाल गुलाल हमारी आँखिन में जिन डारो जू।
बदन चन्द्रमा नैन चकोरी इन अन्तर जिन पारो जू ॥१॥
गावो राग बसन्त परस्पर अटपटे खेल निवारो जू।
कुमकुम रंग सों भरी पिचकारी तकि नैनन जिन मारो जू॥२॥
बंक विलोचन दुखमोचन लोचन भरि दृष्टि निहारो जू।
नागरी नायक सब सुख गायक कृष्णदास को तारो जू॥३॥
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