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View Full Version : विचार विमर्श



bawa009
16-02-2011, 03:59 AM
आप अपनी राय प्रस्तुत कीजिये


यहाँ कोई भी किसी भी विषय को व्यक्तिगत तरीके से मत लें
और न ही व्यक्ति विशेष पर कोई टिप्पणी करैं

bawa009
16-02-2011, 04:06 AM
लीव इन में रहने वाली महिला रखैल नहीं तो और क्या? लीव इन में रहने वाली महिला रखैल नहीं तो और क्या?





गत दिनों सुप्रीम कोर्ट ने लीव इन में रह रही महिलाओं के संबंध में एक अहम फैसला देते हुये कहा की अगर कोई पुरूष रखैल रखता है , जिसको वो गुज़ारे का खर्च देता है और मुख्य तौर पर यौन रिश्तों के लिए या नौकरानी की तरह रखता है तो यह शादी जैसा रिश्ता नहीं है। इस फैसले के बाद बहुत से लोगों को रखैल शब्द पर आपत्ति है। प्रख्यात वकील और अडिशनल सॉलीसिटर जनरल इंदिरा जय सिंह ने लिव-इन रिश्तों में रह रही महिलाओं के लिए ‘ रखैल ‘ शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है की फैसले में इस्तेमाल किया गया रखैल शब्द बेहद आपत्तिजनक है और इसे हटाए जाने की जरूरत है। जयसिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 21वीं सदी में किसी महिला के लिए ‘ रखैल ‘ शब्द का इस्तेमाल आखिर कैसे कर सकता है? क्या कोई महिला यह कह सकती है कि उसने एक पुरुष को रखा है?
यह सही है की कोई महिला यह नहीं कहेगी की उसने पुरूष रखा हुआ है मगर इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता की जिस प्रकार पुरूष महिला को बिना शादी के साथ में रखते हैं उसी प्रकार महिलायें भी पुरूष को बिना शादी के अपने साथ रखती हैं। अब इस के बाद एक अहम सवाल यह पैदा हो गया है और इस पर बहस की ज़रूरत है की ऐसी महिलाओं के लिए रखैल शब्द का प्रयोग उचित कियून नहीं है। यह अलग बात है की कानून के मुताबिक कोई भी बालिग लिव इन में रह सकता है या रह सकती है। मगर क्या भारत जैसे देश में इस रिश्तों को सही माना जाएगा या सही माना जाना चाहिए। कोई भी धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें बिना शादी के महिला और पुरूष को एक पति पत्नी की तरह रहने और शारीरिक संबंध बनाने की इजाज़त देता है। इस के बावजूद यदि कोई ऐसा करता है तो उसे बुरी नज़र से कियून नहीं देखा जाए। ऐसा नहीं हैं रखैल शब्द सिर्फ महिलाओं के लिए ही है यदि कोई पुरूष किसी महिला के साथ बिना शादी के रह रहा है और शारीरिक संबंध बना रहा है तो उसके लिए भी यही शब्द इस्तेमाल होना चाहिए। यह कहना की 21 वीं सदी में किसी महिला के लिए रखैल शब्द का इस्तेमाल सही नहीं है बेकार की बात है। यह 21 वीं सदी है, देश तरक़्क़ी कर रहा है, महिलायें भी जीवन के विभिन्न मैदानों में आगे बढ़ रही हैं इसका मतलब यह नहीं है की वो बिना शादी के किसी पुरूष के साथ पति पत्नी की तरह रहें। ईमानदारी की बात यह है और सच्चाई भी इसी में है की जो कोई महिला या पुरूष इस तरह लीव इन में रहता है या रहती वो सिर्फ और सिर्फ ऐसा मज़े के लिए और जिम्मेदारियों से भागने के लिए करता है। इस प्रकार के रिश्तों में रहने वालों के लिए नैतिकता की बात करना बेमानी है। यह इंसान की फितरत है और इस लिए एक लड़का और लड़की में पियार मुमकिन है ऐसे में यदि उन दोनों को साथ रहना है और दोनों बालिग हैं तो फिर उनके लिए शादी एक बेहतरीन तरीका है। ऐसे लड़के या लड़कियां शादी जैसे पवित्र बंधन में बांधने से कियून भागते है। अगर कोई शादी से भागता है तो इसका मतलब यह है की शादी के बाद आने वाली जिम्मेदारियों से भाग रहा है। और जो लोग समाज से भागते हों , सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से भागते हों ऐसे लोगों के साथ हमदर्दी किस बात की। एक आसान सी बात है जो हर किसी को समझना चाहिए की बिना शादी के शारीरिक संबंध बनाना ग़लत है और इसे ग़लत माना जाना चाहिए। जब बिना शादी के शारीरिक संबंध बनाने को ग़लत माना जाता है तो फिर लीव ईन में रहने और हर प्रकार के मज़े करने की जितनी भी निंदा की जाये कम है। जो लोग इस प्रकार के रिश्ता रखने वालों का साथ देते हैं, उनके साथ हमदर्दी रखते हैं और उनके हक़ की लड़ाई लड़ते हैं वो दरअसल भारत की संस्कृति के साथ मज़ाक करते हैं। मेरी जितनी समझ है उस से मुझे लगता है की लीव इन वेस्टर्न मुल्कों में फैली एक बुराई है जो अब बड़ी तेज़ी से भारत में भी फैलती जा रही है यदि ऐसे रिश्तों की निंदा नहीं की गयी तो धीरे धीरे शादी का सिस्टम ही खत्म हो जाएगा और पार्टनर बदल बदल कर मज़ा बदलने का रिवाज भी बढ्ने लगेगा.

Pooja1990 QUEEN
16-02-2011, 07:34 AM
Court apni jagah sahi hai mitra. tum kyo chinta karte ho.j

gopu
16-02-2011, 09:16 AM
जीवन में सम्बंध या तो जन्म से मिलते हैं , अथवा विवाह से , अन्य कोई भी सम्बन्ध भावनात्मक या शारीरिक ही होता है
कोर्ट संबंधों को परिभाषित करता है , भावनाओं को नहीं
हमारे समाज में इस प्रकार के प्रचलन विवाह और परिवार जो की समाज के मूल स्तंभ हैं , के विरुद्ध हैं इसलिए अस्वीकार्य हैं
२१ वी सदी का मानव विकसित जरुर है पर भावनात्मक स्तर पे और कमजोर हो गया है जिससे भटकाव बढ़े हैं
यदि इन प्रवृतियों पे रोक नहीं लगी तो अंत में यह समाज के लिए विनाशकारी होगा
इसे रोकने के लिए परिवार की महत्ता को सर्वोपरि मानना होगा
कोर्ट इसे लागु नहीं करा सकता है

Lofar
16-02-2011, 09:52 AM
भारतीय समाज में लीव इन रिलेशनशिप का कोई मूल्य नहीं है भारतीय समाज परिवार के संबंधों पर आधारित है
इस तरह के रिलेशनशिप का कोई मतलब ही नहीं .अगर शादी के बगैर आप एक साथ रहते हैं तो फिर इंसान और जानवरो में क्या फर्क रह जायेगा
भारतीय संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति बहुत अलग है और हम उन्हें तुलना नहीं कर सकते.

coolcool
16-02-2011, 02:50 PM
लिव इन रिलेशनशिप आज के बदलते भारतीय समाज का एक प्रतीक है. इसको किसी भी प्रकार से सही नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन एक कटु सत्य यह भी है की यह प्रथा बहुत तेजी से हमारे समाज में विशेषकर महानगरों में चलन में आ रही है. इसके पीछे की वजह कोई भी हो पर मेरे विचार से ज्यादातर लोग शारीरिक सुख के लिए लिव इन रिलेशन को स्वीकार करते. जो भावनात्मक बंधन विवाह है वो लिव इन में नहीं मिलता. मैं ये तो दावा नहीं करता की लिव इन पूरी तरह से असफल है परन्तु सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती है. भारतीय समाज में अभी भी इसकी स्वीकार्यता नहीं है और जहाँ तक हो सके आगे भी नहीं होनी चाहिए.

bawa009
16-02-2011, 08:50 PM
क्या बात कही है दिल को छु गई
सही में इंसान और जानवरो के बीच में फर्क जरूरी है



भारतीय समाज में लीव इन रिलेशनशिप का कोई मूल्य नहीं है भारतीय समाज परिवार के संबंधों पर आधारित है
इस तरह के रिलेशनशिप का कोई मतलब ही नहीं .अगर शादी के बगैर आप एक साथ रहते हैं तो फिर इंसान और जानवरो में क्या फर्क रह जायेगा
भारतीय संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति बहुत अलग है और हम उन्हें तुलना नहीं कर सकते.

bawa009
28-02-2011, 02:13 AM
भारत-विरोधी चीनी लेख पर चुप्पी क्यों


अपने पड़ोसियों के बारे में चीन की असली सोच क्या है, यह पता लगाना आसान नहीं है। साम, दंड, भेद से भरी चीनी कूटनीति कब कौन सा पैंतरा अख्तियार करेगी, पता नहीं चलता। कौटिल्य का अर्थशास्त्र लिखा तो गया है भारत में लेकिन उसे लागू किया जाता है, चीन में ! चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रसिद्ध सैद्धांतिक पत्रिका, ‘सत्य की खोज’ के ताजा अंक में एक लेख छपा है, जिसमें भारत को अमेरिका का अनुचर और चीन का प्रतिद्वंदी बताया गया है। लेखक सू युन हांग ने भारत को युद्ध की धमकी भी दी है। यह लेख इतना आक्रामक है कि भारतीय विदेश मंत्रालय को इस पर अधिकारिक आपत्ति पेश करनी चाहिए। चीनी सरकार से कहा जाना चाहिए कि यह लेख वह वापस ले और इस पत्रिका का संपादक खेद प्रकट करे। यदि चीनी सरकार इतना भी नहीं करती तो माना जाएगा कि उस लेख में प्रतिपादित भारत-विरोधी विचार ही चीन की असली नीति है। किसी भी विदेश नीति विशेषज्ञ को अपनी राय प्रगट करने की पूरी छूट होनी चाहिए लेकिन पहली बात तो यह कि चीन लोकतांत्रिक देश नहीं है। वहां का संपूर्ण समाचार-तंत्र सरकार के नियंत्रण में है। दूसरा, सू का लेख कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिका में छपा है। ऐसी पार्टी, जो चीन की असली मालिक है। वह सरकार से भी अधिक शक्तिशाली है। इसीलिए इस लेख पर चुप्पी लगाए रखने का कोई कारण नहीं है।
सू ने भारत पर आरोप लगाया है कि वह अमेरिका का दुमछल्ला बन गया है। अमेरिका चीन को चारों तरफ से घेरने की कोशिश कर रहा है। चीन के सभी पड़ौसियों भारत, जापान, वियतनाम, इंडोनेशिया , फिलीपिन्स, कोरिया, आस्ट्रेलिया आदि देशों पर अमेरिका ने डोरे डाल दिए हैं। वह इन देशों की पीठ ठोकता है कि वे चीन का विरोध करें। इन देशों के साथ या तो पहले चीन का युद्ध हो चुका है या किसी न किसी मुद्दे पर तनाव रहता चला आया है। इन देशों को अमेरिका या तो नए-नए हथियार दे रहा है या अपूर्व आर्थिक सहायता पहुंचा रहा है या उनमें से कुछ को सुरक्षा परिषद में घुसवाकर वह चीन का महत्व घटाना चाहता है।

bawa009
28-02-2011, 02:15 AM
लेख में गिनाए गए तथ्य निराधार नहीं हैं लेकिन वे अतिरंजित जरूर है। इसमें शक नहीं कि पिछले साल चीन और जापान में कुछ टापुओं को लेकर चला आ रहा पुराना विवाद ज़रा तूल पकड़ गया था और द्वितीय महायुद्ध के दौरान किए गए जापानी अत्याचारों के लिए क्षमा-याचना के मुद्दे ने भी दोनों देशों के बीच तनाव पैदा कर दिया था लेकिन इस तरह के दलदल में भारत को घसीटना कहां तक ठीक है ? चीन के साथ चल रहे सीमा-विवाद को बड़े सभ्य और शालीन तरीके से निपटाने के लिए भारत लगातार वार्ता कर रहा है और पिछले दिनों चीनी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा के दौरान भी कोई अप्रियता नहीं हुई। जापान के मामले में चीन अब भी दो-टूक शब्दों में कहता है कि वह उसे सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के विरूद्ध है जबकि भारत के बारे में वह पहले से नरम पड़ा है। चीनी नेताओं और कूटनीतिज्ञों ने कई बार कहा है कि वे भारत की हसरत को समझते हैं। यह ठीक ही है कि भारत अंतरराष्ट्रीय जगत में अपने लिए बेहतर भूमिका चाहता है। माना यह जा रहा है कि चीन भारत के सुरक्षा परिषद में जाने का विरोध नहीं करेगा।
लेकिन इस लेख में इस बात का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है कि ओबामा ने सुरक्षा परिषद के लिए भारत का समर्थन किया है याने इसका अर्थ क्या यह लगाया जाए कि चीन भारत का समर्थन नहीं करेगा ? यह वह पेच है, जिसके बारे में भारत को चीनी सरकार का ध्यान तुरंत आकृष्ट करना चाहिए। यदि लेखक ओबामा के समर्थन को चीन-विरोधी कदम मानता है तो यह उसकी नासमझदारी है। सुरक्षा परिषद के मसले पर भारत का समर्थन ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जर्मनी आदि देशों ने भी किया है तो क्या ये देश भी चीन को घेरने के लिए भारत को उकसा रहे हैं ? लेखक का बचपना इसी बात से जाहिर होता है कि वह भारत को पाकिस्तान-जैसे दुमछल्ले राष्ट्रों के बराबर समझता है। भारत की अपनी महत्ता है। क्या वह किसी राष्ट्र का मोहरा बन सकता है ?

bawa009
28-02-2011, 02:17 AM
जहां तक चीन के अन्य पडोसी राष्ट्रों का संबंध है, भारत उनसे अपने रिश्ते घनिष्ट बना रहा है, इसमें जरा भी शक नहीं है लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भारत चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है। यदि भारत वियतनाम, द. कोरिया, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ नए-नए सैन्य और व्यापारिक सहयोग के समझौते कर रहा है तो चीन भी तो भारत के निकट पड़ोसियों -नेपाल, बंगलादेश, म्यांमार, श्रीलंका और अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति अपूर्व ढंग से बढ़ा रहा है। कुछ देशों के भारत-विरोधी तत्वों को वह खुले-आम प्रोत्साहित भी करता है। इन देशों में वह अपनी सामरिक उपस्थिति भी दर्ज करा रहा है। और पाकिस्तान तो उसका पुराना मोहरा है ही ! पाकिस्तान और चीन के बीच मेल-जोल का कारण क्या है ? सिर्फ भारत-विरोध ! यह अंतरराष्ट्रीय जीवन का कटु यथार्थ है लेकिन भारत के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह चीन के किसी भी पड़ौसी के साथ इसलिए संबंध बढ़ा रहा है कि उसके मूल में चीन-विरोध है। इसके बावजूद चीनी लेखक ने भारत को युद्ध की धमकी दी है। उसने कहा है कि पडोसी राष्ट्रों को यह स्पष्ट संकेत दे दिया जाना चाहिए कि चीन युद्ध से नहीं डरता। वह अपने राष्ट्रहितों की रक्षा के लिए युद्ध के मैदान में कूदने से नहीं डरेगा। इस तरह की उत्तेजक और आक्रामक बातें लिखनेवाला लेखक या तो अब भी माओत्से तुंग के दौर में जी रहा है या फिर लिखने के पहले उसने अफीम का भारी ‘डोज़’ निगल लिया होगा। चीन-जैसा महाजनी देश आज युद्ध क्यों करना चाहेगा ? दुनिया में सबसे तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ता देश अपनी टांगे क्यों तोड़ना चाहेगा ? लेखक ने चीन की अर्थ-शक्ति को स्वयं रेखांकित किया है। इसके बावजूद उसने चीनी इरादों को इतने विकृत ढंग से पेश किया है कि उससे चीन की छवि तो खराब होती ही है, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संदेह और तनाव के दायरे भी फैलते जाते हैं।

bawa009
28-02-2011, 02:19 AM
चीनी लेखक ने अपनी सरकार को सुझाव दिया है कि वह अमेरिका को घेरने के लिए यूरोप और लातीनी अमेरिका में अपना जाल बिछाए। इस दिशा में चीन पहले से सक्रिय है। उसने क्यूबा, वेनेजुएला और ब्राज़ील शक्तिशाली हो गया है कि वह अमेरिका का घेराव करने में जुट जाए। यदि वह अपनी शक्ति और अपना पैसा इस निषेधात्मक अभियान में लगाएगा तो यह निश्चित है कि वह अपने करोड़ों नंगे-भूखे चीनियों के साथ अन्याय करेगा। अपूर्व आर्थिक समृद्धि के बावजूद चीन में अमीर और गरीब की खाई जितनी गहरी है, दुनिया में कहीं नहीं है। चीनी नेताओं को सोचना होगा कि वे इस खाई को पहले पाटें या पहले दो-ध्रुवीय विश्व खड़ा करने की कोशिश करें। से अपने संबंध घनिष्ट बनाए हैं लेकिन यह मानना तो हास्यास्पद ही होगा कि चीन इतना
चीन इतना शक्तिशाली हो गया है कि वह अमेरिका का घेराव करने में जुट जाए। यदि वह अपनी शक्ति और अपना पैसा इस निषेधात्मक अभियान में लगाएगा तो यह निश्चित है कि वह अपने करोड़ों नंगे-भूखे चीनियों के साथ अन्याय करेगा। अपूर्व आर्थिक समृद्धि के बावजूद चीन में अमीर और गरीब की खाई जितनी गहरी है, दुनिया में कहीं नहीं है। चीनी नेताओं को सोचना होगा कि वे इस खाई को पहले पाटें या पहले
दो-ध्रुवीय विश्व खड़ा करने की कोशिश करें।

kally
28-02-2011, 10:29 AM
ऐसे महत्व पूर्ण बिचारो के लिये मै आपको धन्यबाद करती हो

bawa009
02-03-2011, 12:26 AM
कुछ दिन पहले मुझे एक ब्लॉग पर यह निम्न लेख मिला जो दिल को छु गया और हिंदी साहित्य की तरक्की में होने वाली एक बाधा को दर्शाता है


क्यों खरीदें ऐसी हिन्दी की किताबें….. (http://hindi.amitgupta.in/2010/06/25/why-buy-such-hindi-books/)



हिन्दी साहित्य के हिमायती और अंग्रेज़ी को कोसने वाले काफ़ी लोग बहस के लिए कहते हैं कि लोग अपनी भाषा की कद्र नहीं करते, अंग्रेज़ी के उपन्यास आदि 400-500 रूपए में भी ले लेते हैं जबकि हिन्दी उपन्यासों का इतना दाम नहीं देना चाहते। आज रिलायंस टाइम आऊट में जाना हुआ; यह रिलायंस की रिटेल चेन के बुकस्टोर्स का नाम है जहाँ किताबें, संगीत और फिल्मों की सीडी-डीवीडी आदि मिलती हैं। मैं ऐसे ही हिन्दी साहित्य वाले भाग में विचर रहा था कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यास “भूतनाथ” पर नज़र पड़ी। दरिया गंज के इंडिया बुक हाऊस ने यह वाला संस्करण छापा है, लगभग पाँच सौ पन्नों की किताब और कीमत लगभग पाँच सौ रूपए। पाँच सौ रूपए अधिक नहीं हैं लेकिन इस संस्करण के लिए मैं पचास रूपए से अधिक देना नहीं पसंद करूँगा। क्यों? किताब का कलेवर बेकार है, कागज़ कोई बढ़िया नहीं लगा हुआ, छपाई बिलकुल ऐसी है जैसी सड़क की पटरी पर मिलने वाले 20-30 रूपए के उपन्यासों की होती है। तो जब किताब की गुणवत्ता ऐसी है तो क्यों मैं पब्लिक डोमेन में मौजूद कहानी पर छपी किताब के पाँच सौ रूपए दूँ? ऐसा भी नहीं है कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों पर कॉपीराइट है और उसकी रॉयल्टी प्रकाशक को अदा करनी पड़ती हो!! पब्लिक डोमेन में मौजूद अंग्रेज़ी के उपन्यास सौ-सौ रूपए में बिकते हैं और उनका कागज़ और छपाई इससे कई गुणा बेहतर होती है!!
बात हिन्दी की भी नहीं है, ऐसी किताब किसी भी भाषा में हो मैं उसका ऐसा मूल्य कदापि चुकाना पसंद नहीं करूँगा!!

पुनश्चः - मैं सभी हिन्दी किताबों को ऐसा नहीं बता रहा हूँ, केवल कुछ ऐसी किताबों के बारे में बात कर रहा हूँ जो कि इस तरह खरीददार के उत्साह पर पानी उड़ेल देती हैं। अन्य भाषाई किताबों की भांति हिन्दी किताबें भी एक से अधिक प्रकाशक छापते हैं और ये हर प्रकार के कलेवर आदि में आती हैं। उनमें से कुछेक ऐसी होती हैं जिनका दाम तो ऊँचा होता है लेकिन कलेवर बदमज़ा और कागज़ तथा छपाई रद्दी होती है।

bawa009
03-03-2011, 03:34 AM
दोस्ती, खुशी का मीठा दरिया है (http://girishsingh.blogspot.com/2010/08/blog-post.html)


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए समाज से उसके रिश्तों का ताना-बाना बड़ा ही वृहद होता है। वैसे तो उसके रिश्तों की फेहरिस्त बड़ी लंबी होती है, परंतु कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो जीने का जुनून जगाते हैं, कुछ कर गुजरने की जिद बन जाते हैं क्योंकि उन रिश्तों में 'प्रेरणा' की ऊर्जा निहित होती है। ये रिश्ते उस स्पंदन की अनुभूति होते हैं, जिनका आधार ही दोस्ती की नींव है। दोस्ती कहें या मित्रता, बोलने-सुनने में भले ही सहज सा लगे परंतु इस आत्मीय रिश्ते की गहराइयाँ पग-पग पर किस तरह हमें अनुकूलता/प्रतिकूलताओं में प्रेरित करती है, हमारा सम्बल बनती है, हमें संभालती है, यह वही समझ सकता है जिसके पास एक अच्छा दोस्त है। कुछ रिश्ते तो निभाए जाते हैं मगर यह इकलौता ऐसा है, जिसे जिया जाता है। 'दोस्ती' जिंदादिली का नाम है। 'दोस्त' बनकर दर्द दूर नहीं किया तो दोस्ती क्या खाक निभाई। सुख-दु:ख में दोस्ती ठंडी हवा का झोंका बनकर गले से लिपट जाती है, जिसका स्नेहिल स्पर्श तनाव में भी सुकून देता है।

सच्चा दोस्त किस्मत वालों को ही मिलता है। आसान नहीं है दोस्त मिलना और खुद किसी का दोस्त बन जाना। क्योंकि आज हम जिन लोगों के साथ घूमते-फिरते हैं। पिक्चर देखते हैं। टाइम पास करने के लिए हँस-बोल लेते हैं। उन्हें ही दोस्त कहने और समझने भी लग जाते हैं। दोस्ती एक अनमोल रिश्ता है जिसमें आदमी कब बँध जाता है। पता ही नहीं चलता। मुश्किल समय में काम आने वाला, नेक सलाह देने वाला मित्र ही सच्चा मित्र है। सच्ची मित्रता को किसी फ्रेंडशिप डे या फ्रेंडशिप बेल्ट जैसी औपचारिकताओं की जरूरत नहीं होती। उनके लिए प्रत्येक दिन ही मित्रता दिवस होता है। यह दिन शायद उन मित्रों के लिए बना हो जोकि बहुत ही मुश्किल से साल भर में यदा-कदा ही मिल पाते हों तो कम से कम इस दिन उन्हें याद कर लें।

'दोस्ती' की सरगम पर विश्वास के सुर पैरों में अपनेपन के नुपूर बाँधकर थिरकते हैं। 'दोस्ती' के पर्वत से ही प्रेरणा के झरने बहकर सफलतारूपी सरोवर में जा मिलते हैं। 'दोस्ती' वह जुगनू है, जिसकी टिमटिमाती रोशनी प्रतिकूलताओं की निशा में उम्मीद की किरण की तरह हमेशा जगमगाती रहती है।

'दोस्ती' उस सुरभि का नाम है जिसका अहसास 'अपनत्व' का अनुभव कराता है। कोई कहे 'दोस्त' हमदर्द होता है परंतु सच्चाई तो यह है कि 'दोस्त' वह गुरूर होता है, जिसके आश्रय में हममें मुसीबतों से लड़ने का साहस जाग जाता है।

बदलते कालचक्र में भले ही दोस्ती ने नया आयाम ले लिया हो परंतु इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता है कि दोस्ती का रिश्ता आज भी उसी विश्वास, समर्पण और अगाध स्नेह का पर्याय है, जितना कि वह बीते समय में रहा है। चूँकि समय बलवान है इसलिए बदलता रहता है परंतु तमाम रिश्तों में एक सच्चे दोस्त की 'दोस्ती' का रिश्ता समय की धारा के साथ परिवर्तित नहीं बल्कि प्रगाढ़ होता है।

वॉशिंगटन अर्विंग ने कहा है - सच्ची दोस्ती कभी व्यर्थ नहीं जाती, यदि उसे प्रतिदान नहीं मिलता तो वह लौट आती है और दिल को कोमल और पवित्र बनाती है।

तो बोलिए... क्या आप बन सकते हैं, ऐसे दोस्त। यदि 'हाँ' तो आज ही के दिन से इसकी शुरुआत कीजिए...।

bawa009
17-11-2011, 04:09 AM
जब हिंदी में होंगे वेबसाइटों के पते

डोमेन नामों से संंबंधित नियम.कायदे बनाने वाली संस्था आईकैन ने हिंदी सहित सात भारतीय भाषाओं में डोमेन नेमों का पंजीकरण शुरू करने को हरी झंडी दे दी है।



अपने इंटरनेट ब्राउज़र की एड्रेस बार में किसी भी वेबसाइट का एड्रेस डालते समय क्या कभी आपके मन में ख्याल आया है कि वेब एड्रेस (यूआरएल) अंग्रेजी में ही क्यों होते हैं और क्या हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं में वेब एड्रेस लिखना संभव नहीं है? जैसे प्रभासाक्षी॰कॉम। जल्दी ही यह संभव होने जा रहा है क्योंकि इंटरनेट पर डोमेन नामों (वेबसाइटों के पंजीकृत नाम जो ॰कॉम, ॰नेट, ॰इन आदि से खत्म होते हैं) से संंबंधित नियम.कायदे बनाने वाली संस्था आईकैन (इंटरनेट कारपोरेशन फॉर असाइन्ड नेम्स एंड नंबर्स) ने हिंदी सहित सात भारतीय भाषाओं में डोमेन नेमों का पंजीकरण शुरू करने को हरी झंडी दे दी है। कुछ ही महीनों में देवनागरी, गुजराती, उर्दू, पंजाबी, बंगला, तमिल और तेलुगू डोमेन नेमों की व्यवस्था पर अमल शुरू हो जाएगा और आप अपनी ही भाषा में वेब एड्रेस लिख सकेंगे। चूंकि देवनागरी लिपि अनेक भाषाओं में इस्तेमाल होती है इसलिए हिंदी के साथ.साथ मराठी, संस्कृत, नेपाली, कोंकणी आदि भाषाएं भी लाभान्वित होंगी।

भारत में डोमेन नेमों के प्रशासन का जिम्मा नेशनल इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया के पास है जिसने कुछ साल पहले ॰इन, ॰को॰इन जैसे कंट्री लेवल डोमेन नेमों का आवंटन शुरू किया था। ये नेम भारत ही नहीं, दुनिया भर में काफी लोकप्रिय हैं। हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में दिए जान वाले डोमेन नेमों का अंत '॰भारत' से होगा, यानी 'डेलीन्यूज॰कॉम' तो नहीं किंतु 'डेलीन्यूज॰भारत' का प्रयोग आप जरूर कर पाएंगे। ऐसे ही कुछ और डोमेन एक्सटेंशनों पर मंथन जारी है। अंग्रेजी की तुलना में भारतीय भाषाएं ज्यादा व्यापक, या यूं कहिए कि ज्यादा जटिल हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय मंजूरी मिलने के बावजूद हमारे अपने स्तर पर इन्हें लागू करने में थोड़ी देर लग रही है। यह देर छह महीने से साल भर के बीच हो सकती है। यह जटिलता कुछ इस तरह की है. अंग्रेजी में हिंदी॰भारत को आप एक ही तरह से लिख सकते हैं, लेकिन हिंदी में इसे तीन तरह से लिखा जा सकता है. हिंदी॰भारत, हिन्दी॰भारत और हिन्दी॰भारत। अब इन्हें अलग.अलग डोमेन नेम माना जाए या फिर एक? अंतरजाल और अंतर्जाल, अंतरराष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, दुकान और दूकान, इनाम और ईनाम जैसे शब्दों के कई रूप प्रचलित हैं। उन्हें किस तरह लिया जाए? इसी तरह, डोमेन नेमों में आने वाले अंक अंग्रेजी के हों या हिंदी के, या दोनों? ऐसी उलझनें सुलझते ही हमारी अपनी भाषाओं के वेब एड्रेस मिलने शुरू हो जाएंगे।

जब तक भारतीय भाषाओं के टेक्स्ट को कंप्यूटर में मानकीकृत (स्टैंडर्ड) तरीके से सहेजने की व्यवस्था नहीं थी तब तक यह असंभव था लेकिन यूनिकोड एनकोडिंग के आने के बाद इन भाषाओं के टेक्स्ट इनपुट, स्टोरेज, प्रोसेसिंग और डिस्प्ले आदि की प्रक्रियाएं आसान हो गई हैं। अब इस बात की कोई आशंका नहीं है कि डेलीन्यूज॰भारत लिखने पर कोई कंप्यूटर उसे कुछ समझेगा और दूसरा कुछ और (जो हिंदी फॉन्ट्स की अराजकता के दिनों में आम बात थी)। कंप्यूटर की दुनिया ने अब यूनिकोड को अपना लिया है जिसने टेक्स्ट रेन्डरिंग से जुड़ी बहुत सी उलझनों को सुलझा दिया है। स्वाभाविक तौर पर, भारतीय भाषाओं में पंजीकृत किए जाने वाले वेब एड्रेस भी यूनिकोड में ही होंगे।

ऐसा नहीं है कि डोमेन नेम में हिंदी या अन्य गैर.अंग्रेजी भाषाओं का इस्तेमाल पहली बार होगा। आंशिक रूप से तो यह पांच.छह साल पहले ही शुरू हो गया था, जब डोमेन नेम का मूल हिस्सा गैर.अंग्रेजी भाषा में लिखने की इजाजत दी गई थी। लेकिन तब भी डोमेन एक्सटेंशन अंग्रेजी में ही रहता था। ये अजीब किस्म के डोमेन नेम हैं, जिन्हें न हिंदी में माना जा सकता है और न ही अंग्रेजी में। लेकिन इन्हें पूर्ण भाषायी डोमेन नेमों की दिशा में बड़ा शुरूआती कदम माना गया था जो यूनिकोड एनकोडिंग और 'पनीकोड' तकनीक के जरिए संभव हुआ था। अलबला, नई व्यवस्था के तहत डोमेन नेम सौ फीसदी हिंदीमय हो जाएगा, आधा.अधूरा नहीं।

Raman46
17-11-2011, 01:39 PM
चीनी लेखक ने अपनी सरकार को सुझाव दिया है कि वह अमेरिका को घेरने के लिए यूरोप और लातीनी अमेरिका में अपना जाल बिछाए। इस दिशा में चीन पहले से सक्रिय है। उसने क्यूबा, वेनेजुएला और ब्राज़ील शक्तिशाली हो गया है कि वह अमेरिका का घेराव करने में जुट जाए। यदि वह अपनी शक्ति और अपना पैसा इस निषेधात्मक अभियान में लगाएगा तो यह निश्चित है कि वह अपने करोड़ों नंगे-भूखे चीनियों के साथ अन्याय करेगा। अपूर्व आर्थिक समृद्धि के बावजूद चीन में अमीर और गरीब की खाई जितनी गहरी है, दुनिया में कहीं नहीं है। चीनी नेताओं को सोचना होगा कि वे इस खाई को पहले पाटें या पहले दो-ध्रुवीय विश्व खड़ा करने की कोशिश करें। से अपने संबंध घनिष्ट बनाए हैं लेकिन यह मानना तो हास्यास्पद ही होगा कि चीन इतना
चीन इतना शक्तिशाली हो गया है कि वह अमेरिका का घेराव करने में जुट जाए। यदि वह अपनी शक्ति और अपना पैसा इस निषेधात्मक अभियान में लगाएगा तो यह निश्चित है कि वह अपने करोड़ों नंगे-भूखे चीनियों के साथ अन्याय करेगा। अपूर्व आर्थिक समृद्धि के बावजूद चीन में अमीर और गरीब की खाई जितनी गहरी है, दुनिया में कहीं नहीं है। चीनी नेताओं को सोचना होगा कि वे इस खाई को पहले पाटें या पहले
दो-ध्रुवीय विश्व खड़ा करने की कोशिश करें।


ऐसे महत्व पूर्ण बिचारो के लिये मै आपको धन्यबाद करती हो


बहुत काम की जानकारी से भरा सूत्र है

बहुत बढ़िया सूत्र है .............वाह भई वाह


शुक्रिया मित्र /स्वागत है आप / धन्यबाद

bawa009
23-12-2011, 12:32 AM
मनुष्य- शाकाहारी या मांसाहारी ?




प्रकृति में सब कुछ नियमबद्ध है | उसमें जो कुछ भी घटता है उसको वैज्ञानिक धरातल पर कसा जा सकता है | जब भी कोई उसके विरुद्ध जा उससे छेड़छाड़ करता है तो उसके दुष्परिणाम उसके साथ-साथ अन्य सभी को भी भोगना पड़ते हैं |
मानव, प्रकृति की सबसे परिष्कृत रचना है | जिसमें उसने बुद्धि का एक ऐसा भण्डार भर दिया है कि यदि वह उसका उपयोग विवेक से करे तो इस धरती को स्वर्ग भी बना सकता है व स्वयं का उत्थान कर ईश्वरत्व भी प्राप्त कर सकता है | किन्तु मनमौजी मनुष्य ने उसका उपयोग अपने स्वार्थ के लिए ज्यादा किया | वह अपनी बुद्धि का उपयोग तथ्यों को तर्कों से झुठलाने में ही करने में अपनी शान समझता आ रहा है | लेकिन सत्य के हीरे को चाहे जितना भी तर्कों की तहों से छुपा लो, वह झूँठ का पत्थर नहीं होता | उसकी चमक उसे जग-जाहिर कर ही देती है |
ऐसे ही कुछ तथ्य हैं जो शाकाहारी व मांसाहारी प्राणियों में स्पष्ट फर्क बतलाते हैं | मैं उन्हें आपकी जानकारी के लिए यहाँ दे रहा हूँ :
[१] मांसाहारी प्राणी पानी चाटते हैं जबकि शाकाहारी पानी पीते हैं |
[२] मांसाहारी प्राणीयों के ‘केनाइन’ दांत ज्यादा लंबे व नुकीले होते हैं, जिनसे वे मांस चीरते-फाडते हैं जबकि शाकाहारियों के ‘केनाइन’ छोटे व बहुत ही कम नुकीले होते हैं |
[३] मांसाहारियों की आँत की लम्बाई कम होती है क्योंकि वे दूसरों के द्वारा पचा-पचाया व संचित किया हुआ खाना खाते हैं जबकि शाकाहारियों की आँत की लम्बाई काफी ज्यादा होती है क्योंकि उन्हें अपना खाना खुद ही पचाना होता है |
[४] मांसाहारियों का पेट छोटा होता है जबकि शाकाहारियों का पेट बड़ा होता है |
[५] मांसाहारियों के नाख़ून मजबूत, लम्बे व नुकीले होते हैं, जिनका इस्तेमाल वे शिकार करने व उसको चिर-फाड़ करने में करते हैं | जिन्हें वे उपयोग न होने पर मोड़ कर पैरों की गद्दीदार पगथलियों के नीचे छुपा लेते हैं जबकि शाकाहारियों के नाख़ून छोटे व गोलाई लिए होते हैं जिन्हें वह मोड़ नहीं सकता और न ही उनकी पगथलियाँ गद्दीदार होती है |
गाय, बकरी, घोड़ा, हिरण, नन्हां खरगोश, लम्बा जिराफ, शक्तिशाली व विशाल हाथी आदि सभी शाकाहारी जानवर भी जानते हैं कि भोजन अपने शरीर के लिए अपनी प्रकृति अनुसार करना चाहिये ना कि मनानुसार सिर्फ़ स्वाद के लिए | क्योंकि अपनी प्रकृति के विरुद्ध जा सिर्फ़ स्वाद के लिए कुछ भी खाना अपने हाथ से अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, जिसके दुष्परिणाम से सभी वाकिफ़ हैं |
अब आप स्वयं ही मनुष्य के बारे में अपने विवेक से निर्णय करें कि वह शाकाहारी है या माँसाहारी |