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View Full Version : नीति कथाएं ..जो आपको कुछ सीख देंगी !



Ranveer
09-04-2011, 04:39 PM
प्रिय मित्रों
इस सूत्र में आपको कुछ नीति कथाएं पढने को मिलेंगी ।
भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है।
पंचतंत्र उनमें प्रमुख है।
पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी।
उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया।
मेरी कहानियां पंचतंत्र , वेद , शास्त्रों आदि आदि से ली गयीं हैं
आशा करता हूँ की ये सूत्र आपलोगों को पसंद आयेगा ।:):bloom:

Ranveer
09-04-2011, 05:19 PM
विद्या बड़ी या बुद्धि



किसी ब्राह्मण के चार पुत्र थे। उनमें परस्पर गहरी मित्रता थी। चारों में से तीन तो शास्रों में पारंगत थे, लेकिन उनमें बुद्धि का अभाव था। चौथे ने शास्रों का अध्ययन तो नहीं किया था, लेकिन वह था बड़ा बुद्धिमान।
एक बार चारों भाइयों ने परदेश जाकर अपनी-अपनी विद्या के प्रभाव से धन अर्जित करने का विचार किया। चारों पूर्व के देश की ओर चल पड़े। रास्ते में सबसे बड़े भाई ने कहा-‘हमारा चौथा भाई तो निरा अनपढ़ है। राजा सदा विद्वान व्यक्ति का ही सत्कार करते हैं। केवल बुद्धि से तो कुछ मिलता नहीं।
विद्या के बल पर हम जो धन कमाएंगे, उसमें से इसे कुछ नहीं देंगे। अच्छा तो यही है कि यह घर वापस चला जाए।’ दूसरे भाई का विचार भी यही था। किंतु तीसरे भाई ने उनका विरोध किया। वह बोला-‘हम बचपन से एक साथ रहे हैं, इसलिए इसको अकेले छोड़ना उचित नहीं है। हम अपनी कमाई का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा इसे भी दे दिया करेंगे।’
अतः चौथा भाई भी उनके साथ लगा रहा। रास्ते में एक घना जंगल पड़ा। वहां एक जगह हड्डियों का पंजर था। उसे देखकर उन्होंने अपनी-अपनी विद्या की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उनमें से एक ने हड्डियों को सही ढंग से एक स्थान पर एकत्रित कर दिया। वास्तव में ये हड्डियां एक मरे हुए शेर की थीं।
दूसरे ने बड़े कौशल से हड्डियों के पंजर पर मांस एवं खाल का आवरण चढ़ा दिया। उनमें उसमें रक्त का संचार भी कर दिया। तीसरा उसमें प्राण डालकर उसे जीवित करने ही वाला था कि चौथे भाई ने उसको रोकते हुए कहा, ‘तुमने अपनी विद्या से यदि इसे जीवित कर दिया तो यह हम सभी को जाने से मार देगा।’
तीसरे भाई ने कहा, ‘तू तो मूर्ख है!’मैं अपनी विद्या का प्रयोग अवश्य करुंगा और उसका फल भी देखूंगा।’ चौथे भाई ने कहा, ‘तो फिर थोड़ी देर रुको। मैं इस पेड़ पर चढ़ जाऊं, तब तुम अपनी विद्या का चमत्कार दिखाना।’ यह कहकर चौथा भाई पेड़ पर चढ़ गया।
तीसरे भाई ने अपनी विद्या के बल पर जैसे ही शेर में प्राणों का संचार किया, शेर तड़पकर उठा और उन पर टूट पड़ा। उसने पलक झपकते ही तीनों अभिमानी विद्वानों को मार डाला और गरजता हुआ चला गया।
उसके दूर चले जाने पर चौथा भाई पेड़ से उतरकर रोता हुआ घर लौट आया। इसीलिए कहा गया है कि विद्या से बुद्धि श्रेष्ठ होती है।

Ranveer
09-04-2011, 05:41 PM
कुपात्र को उपदेश
किसी पर्वतीय प्रदेश में वानरों का एक समूह निवास करता था। एक वर्ष हेमन्त ऋतु में भयंकर वायु चलने लगी। उसके साथ ही वर्षा आरम्भ हुई और हिमपात भी होने लगा। ठंड से व्यथित होने के कारण वानर समूह शरण पाने के लिए इधर-उधर भटकता रहा, किन्तु उनको कहीं भी कोई सुरक्षित स्थान नहीं मिल पाया।
कुछ वानरों ने कहीं से लाल-लाल गुंजा के फल बीने और उनको एकत्रित कर उनको चारों और बैठ गए। उन्हें लगा कि ये अग्निकण हैं और अब इनके आश्रय से उनकी ठंड मिट जाएगी।
सूचीमुख नाम का एक पक्षी उनके इस वृथा प्रयास को देख रहा था। उसने कहा, “लगता है तुम लोग निपट मूर्ख ही हो। ये अग्निकण नहीं, गुंजाफल हैं। इनसे ठण्ड नहीं मिटेगी। कहीं किसी सुरक्षित स्थान की खोज करो। किसी पर्वत-कन्दरा में जाकर छिप जाओ, वर्षा रुकने वाली नहीं है।”तब एक वानर बोला, “तुम्हें इससे क्या, तुम अपना रास्ता नापो।”
सूचीमुख कहीं नहीं गया और उनको बार-बार समझाता ही रहा। बार-बार उसकी बात को सुनकर एक वानर को क्रोध आ गया और उसने उसको पकड़कर वहीं शिला पर पटककर मार दिया।
यह कथा सुनाकर करटक कहने लगा कि तभी मैंने कहा था कि अयोग्य को शिक्षा देने का कोई लाभ नहीं है। सर्प को दूध पिलाने से उसका विष बढ़ता ही है, शान्त नहीं होता। एक बार एक मूर्ख चिड़िया ने एक वानर को उपदेश दिया तो उसने उसको ही गृहविहीन बना दिया।

Ranveer
09-04-2011, 05:45 PM
मूर्खमण्डली


पर्वतप्रदेश के किसी एक भाग में एक बहुत बड़ा वृक्ष था। उस वृक्ष पर सिन्धुक नाम का एक पक्षी रहता था। उस पक्षी की बीट से स्वर्ण निकला करता था। एक दिन की बात है कि एक बहेलिया शिकार करने के लिए उस पर्वत पर गया। उस पेड़ के आगे से वह निकल रहा था कि तभी ऊपर से बीट गिरी और धरती पर पड़ते ही वह स्वर्ण बन गई।
उसको देखकर बहेलिया सोचने लगा कि पक्षियों को जाल में फंसाने का कार्य करते-करते मेरी आयु बीत चली है। किन्तु आज तक मैंने ऐसी आश्चर्यकारक घटना नहीं देखी कि पक्षी के पुरीष से स्वर्ण बन जाता हो। यह सोचकर उसने वहीं पर अपना जाल फैला दिया और फिर स्वयं कुछ दूर पर जाकर बैठ गया।
संयोग से वह पक्षी उस जाल में फंस गया। बहेलिया प्रसन्न हुआ। उसने उसे जाल से निकालकर पिंजड़े में रखा और उसी समय अपने घर वापस आ गया। घर आकर बहेलिया सोचने लगा कि इस पक्षी को रखकर मैं क्या करूंगा। यदि किसी ने इस विचित्र पक्षी को देख लिया तो वह राजा को इसकी सूचना दे देगा। राजा को यदि विदित हो गया तो बस फिर मेरी तो खैर नहीं। तब यही उचित है कि मैं स्वयं ही इसको राजा को दे दूं।
यह सोचकर बहेलिया पक्षी को लेकर राजा को देने के लिए गया। राजा उस पक्षी को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने अपने सेवकों को बुलाकर उस पक्षी की सेवा-सुश्रुषा और देख-भाल करने का आदेश दे दिया। उस समय राजा के एक मंत्री ने कहा, “महाराज! अविश्वस्त व्याध के कथन पर विश्वास करके इस पक्षी को पिंजड़े में बन्द करके रखने से क्या लाभ।
आप ही सोचिए, क्या किसी के पुरीष से भी सोना बन सकता है। मैं तो समझता हूं कि इस पक्षी को बन्धनमुक्त कर देना चाहिए।” राजा ने इस बात पर विचार किया और फिर उस पक्षी को बन्धनमुक्त करने का आदेश दे दिया। पक्षी वहां से उड़कर द्वार के तोरण पर जाकर बैठ गया और फिर उसने वहीं पर बीट कर दी। नीचे गिरते ही वह बीट स्वर्ण में परिवर्तित हो गई।
तब वह पक्षी बोला, “पहले तो मैं मूर्ख था जो बहेलिए के जाल में फंस गया, फिर वह बहेलिया मूर्ख था, जो राजा से डरकर मुझे यहां पहुंचा गया। फिर यह राजा मूर्ख है जिसने अपने मंत्री की बात मानकर मुझे मुक्त कर दिया।
मंत्री ने तो अनुचित परामर्श देकर अपनी मूर्खता पहले ही सिद्ध कर दी है। यह सारा मूर्ख-मण्डल है।” यह कहकर वह आकाश में उड़ गया।

Ranveer
09-04-2011, 05:56 PM
बार-बार बोला गया झूठ भी सच हो जाता है



किसी गांव में मित्रशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहता था। एक बार वह अपने यजमान से एक बकरा लेकर अपने घर जा रहा था। रास्ता लंबा और सुनसान था। आगे जाने पर रास्ते में उसे तीन ठग मिले। ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर तीनों ने उसे हथियाने की योजना बनाई।
एक ठग ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “पंडित जी यह आप अपने कंधे पर क्या उठा कर ले जा रहे हैं। यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर बैठा कर ले जा रहे हैं।”
ब्राह्मण ने उसे झिड़कते हुए कहा, “अंधा हो गया है क्या? दिखाई नहीं देता यह बकरा है।”
पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना था। अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका काम।”
थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला। उसने ब्राह्मण को रोका और कहा, “पंडित जी क्या आपको पता नहीं कि उच्च कुल के लोगों को अपने कंधों पर कुत्ता नहीं लादना चाहिए।” पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया।
आगे जाने पर उसे तीसरा ठग मिला। उसने भी ब्राह्मण से उसके कंधे पर कुत्ता ले जाने का कारण पूछा। इस बार ब्राह्मण को विश्वास हो गया कि उसने बकरा नहीं बल्कि कुत्ते को अपने कंधे पर बैठा रखा है। थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया।
इधर तीनों ठग ने उस बकरे को मार कर खूब दावत उड़ाई। इसीलिए कहते हैं कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है।

anita
09-04-2011, 08:41 PM
बहुत ही अच्छी कहानिया है ये, बहुत ही अच्छी सीख मिलती है इन प्राचीन कथायो से

SUNIL1107
10-04-2011, 04:12 PM
उत्कृष्ट सूत्र रचना की बधाई दोस्त रणवीर जी

hotfriendr
10-04-2011, 04:40 PM
bahut shandar kathaye hai

Ranveer
10-04-2011, 05:19 PM
बुरे कर्म का बुरा नतीजा



किसी नगर में यज्ञदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी अच्छी नहीं थी, वह व्याभिचारिणी थी। वह अपने प्रेमी को नित नये-नये पकवान बनाकर खिलाया करती थी। एक दिन जब उसके पति ने उसको पकवान बनाते देख लिया तो उसने पत्नी से पूछा, “प्रिय! प्रतिदिन इस प्रकार पकवान बनाकर तुम कहां ले जाया करती हो?” औरत बड़ी चालाक थी। तुरंत बोली, “यहां से थोड़ी दूर पर एक देवी का मन्दिर है। मैं देवी का व्रत कर रही हूं। मैं यह पकवान वहां चढ़ाने के लिए बनाया करती हूं।”
पकवान बन जाने पर वह पति के सम्मुख ही उनको लेकर मंदिर की ओर चल पड़ी। वह मन्दिर में पहुंचकर पकवान को उसके सम्मुख रखकर स्वयं नदी में स्नान करने के लिए चली गई। तब तक उसका पति भी किसी अन्य मार्ग से जाकर वहां पहुंच कर पीछे छिप गया था। स्नान करके आने के बाद उसने देवी की पूजा-अर्चना की और फिर प्रार्थना करती हुई कहने लगी, “भगवती! मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूं कि जिससे मेरा पति अन्धा हो जाए।”
पीछे छिपे उसके पति ने अपने स्वर को बदलकर कहा,“यदि तुम प्रतिदिन पकवान आदि बनाकर अपने पति को खिलाया करो तो वह शीघ्र ही अन्धा हो जाएगा।” यह सुनकर उस दिन से ही उसने अपने पति को पकवान बनाकर खिलाने आरम्भ कर दिए। और कुछ दिन बाद एक दिन उसके पति ने कहा, “प्रिय! कुछ समझ में नहीं आता। मुझे अब कुछ कम दिखाई देने लगा है?” यह सुनकर उस कुलटा को बड़ी प्रसन्नता हुई।
दो-चार दिन बाद जब उस ब्राह्मण ने कह दिया कि उसको अब कुछ भी नहीं दिखाई देता तो उसकी पत्नी और प्रेमी को इससे बहुत प्रसन्नता हुई। वह नित्यप्रति निःशंक भाव से उसके घर में आने लगा। किन्तु शीघ्र ही उस ब्राह्मण ने एक दिन अवसर पाकर उसकी इतनी पिटाई की कि वह वहीं पर मर गया। उसको मारकर उसने अपनी पत्नी की नाक काटी और उसको घर से निकाल दिया। इसलिए कहते हैं बुरा कर्म का नतीजा भी बुरा ही होता है।

Ranveer
10-04-2011, 05:24 PM
जैसे को तैसा


किसी नगर में एक व्यापारी का पुत्र रहता था। दुर्भाग्य से उसकी सारी संपत्ति समाप्त हो गई। इसलिए उसने सोचा कि किसी दूसरे देश में जाकर व्यापार किया जाए। उसके पास एक भारी और मूल्यवान तराजू था। उसका वजन बीस किलो था। उसने अपने तराजू को एक सेठ के पास धरोहर रख दिया और व्यापार करने दूसरे देश चला गया।
कई देशों में घूमकर उसने व्यापार किया और खूब धन कमाकर वह घर वापस लौटा। एक दिन उसने सेठ से अपना तराजू माँगा। सेठ बेईमानी पर उतर गया। वह बोला, ‘भाई तुम्हारे तराजू को तो चूहे खा गए।’ व्यापारी पुत्र ने मन-ही-मन कुछ सोचा और सेठ से बोला-‘सेठ जी, जब चूहे तराजू को खा गए तो आप कर भी क्या कर सकते हैं! मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूँ। यदि आप अपने पुत्र को मेरे साथ नदी तक भेज दें तो बड़ी कृपा होगी।’ सेठ मन-ही-मन भयभीत था कि व्यापारी का पुत्र उस पर चोरी का आरोप न लगा दे। उसने आसानी से बात बनते न देखी तो अपने पुत्र को उसके साथ भेज दिया।
स्नान करने के बाद व्यापारी के पुत्र ने लड़के को एक गुफ़ा में छिपा दिया। उसने गुफा का द्वार चट्टान से बंद कर दिया और अकेला ही सेठ के पास लौट आया। सेठ ने पूछा, ‘मेरा बेटा कहाँ रह गया?’ इस पर व्यापारी के पुत्र ने उत्तर दिया,‘जब हम नदी किनारे बैठे थे तो एक बड़ा सा बाज आया और झपट्टा मारकर आपके पुत्र को उठाकर ले गया।’ सेठ क्रोध से भर गया। उसने शोर मचाते हुए कहा-‘तुम झूठे और मक्कार हो। कोई बाज इतने बड़े लड़के को उठाकर कैसे ले जा सकता है?तुम मेरे पुत्र को वापस ले आओ नहीं तो मैं राजा से तुम्हारी शिकायत करुँगा’
व्यापारी पुत्र ने कहा, ‘आप ठीक कहते हैं।’ दोनों न्याय पाने के लिए राजदरबार में पहुँचे। सेठ ने व्यापारी के पुत्र पर अपने पुत्र के अपहरण का आरोप लगाया। न्यायाधीश ने कहा, ‘तुम सेठ के बेटे को वापस कर दो।’ इस पर व्यापारी के पुत्र ने कहा कि ‘मैं नदी के तट पर बैठा हुआ था कि एक बड़ा-सा बाज झपटा और सेठ के लड़के को पंजों में दबाकर उड़ गया। मैं उसे कहाँ से वापस कर दूँ?’ न्यायाधीश ने कहा, ‘तुम झूठ बोलते हो। एक बाज पक्षी इतने बड़े लड़के को कैसे उठाकर ले जा सकता है?’
इस पर व्यापारी के पुत्र ने कहा, ‘यदि बीस किलो भार की मेरी लोहे की तराजू को साधारण चूहे खाकर पचा सकते हैं तो बाज पक्षी भी सेठ के लड़के को उठाकर ले जा सकता है।’ न्यायाधीश ने सेठ से पूछा, ‘यह सब क्या मामला है?’ अंततः सेठ ने स्वयं सारी बात राजदरबार में उगल दी। न्यायाधीश ने व्यापारी के पुत्र को उसका तराजू दिलवा दिया और सेठ का पुत्र उसे वापस मिल गया।

ravi chacha
10-04-2011, 07:40 PM
बहुत ही अच्छी कहानिया है

rahs49
10-04-2011, 08:20 PM
बहुत ही अच्छी कहानिया है

बहुत ही अच्छी कहानिया है:tiranga:

Ranveer
12-04-2011, 02:25 AM
संस्कार नहीं बदल सकते




किसी वन में एक सिंह अपनी पत्नी के साथ रहा करता था। एक बार सिंही ने दो पुत्रों को जन्म दिया। सिंह वन में जाकर भांति-भांति के पशुओं को मारकर अपनी पत्नी के लिए लाया करता था। किन्तु एक दिन की बात है कि दिन भर घूमने पर भी सिंह को कोई शिकार हाथ नहीं लगा।
इसी निराशा में वह घर वापस आ रहा था कि मार्ग में उसको एक सियार का बच्चा मिल गया। सिंह ने उसे उठाया और जीवित अवस्था में ही घर लाकर उसको अपनी पत्नी को सौंप दिया। सिंही ने पूछा, “आज भोजन के लिए कुछ नहीं मिला?”
“नहीं, इसके अतिरिक्त कुछ मिला ही नहीं। इसको भी शिशु समझकर मैंने मारा नहीं। क्योंकि कहा गया है कि प्राण पर संकट आने पर भी बालक की हत्या नहीं करनी चाहिए। अब तुम तो भूखी हो इस समय इसका ही आहार कर लो।”
शेरनी बोली, “जब बालक समझकर तुमने नहीं मारा तो मां होकर अपने पेट के लिए मैं इसकी हत्या क्यों करूं? प्राण जाने पर भी मनुष्य को किसी प्रकार का अकृत्य नहीं करना चाहिए। आज से यह मेरा तृतीय पुत्र है।”
उस दिन से उस सिंही ने उस सियार के शिशु को भी अपने शिशुओं की ही भांति अपना दूध पिलाना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार वह सियार शिशु सिंह-शिशुओं के साथ आहार-विहार करता हुआ आनन्द से दिन बिताने लगा। कुछ दिनों बाद एक जंगली हाथी उस वन में भटकता हुआ आ निकला।
उसको देखकर सिंह के दोनों शिशु उस पर क्रुद्ध होकर उसकी और दौड़ पड़े। उनको जाते देखकर उस सियार ने अपने सिंह भाइयों से कहा, “यह तो हाथी है! हाथी सिंह-कुल का स्वाभाविक शत्रु होता है, उसकी और नहीं जाना चाहिए।”
यह कहकर वह घर की ओर भाग गया। उसको भागता देखकर सिंह-शिशु भी निरुत्साहित होकर घर को लौट आए। किसी ने ठीक ही कहा है कि यदि युद्धभूमि से एक भी कायर भागने लगता है तो शेष सेना का भी उत्साह क्षीण हो जाता है।
घर पहुंचकर दोनों सिंह-शिशुओं ने सियार के हाथी को देखकर भाग आने की बात का उपहास किया। इससे सियार के बच्चे को क्रोध आ गया और उसने क्रोध में उनको भला-बुरा कहा। उसे क्रोधित देख, एकान्त में जाकर सिंही ने कहा, “बेटे! वे दोनों तुम्हारे छोटे भाई हैं। तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।” सियार का क्रोध शान्त नहीं हुआ। वह कहने लगा, “मैं क्या इनसे कम हूं। मैं इनको अपमान का मजा चखाऊंगा।”
सिंही बोली, “हां बेटे! तुम कहते हो ठीक हो। तुम वीर हो, तुम विद्वान हो और तुम दर्शनीय भी हो। किन्तु जिस कुल में तुम उत्पन्न हुए हो उस कुल में हाथी का शिकार नहीं किया जाता।” “अब तुमने क्रोध कर ही लिया है तो मैं तुम्हें बताती हूं। तुम सियार हो, मैंने तुम्हें अपना दूध पिलाकर पालन-पोषण” किया है।
मेरे ये दोनों शिशु जब तक यह नहीं जानते कि तुम सिंह नहीं सियार हो, तब तक ही तुम्हारी कुशल है। इसलिए अच्छा यही है कि तुम अभी चुपचाप यहां से खिसक जाओ, अन्यथा यदि किसी दिन इनको पता लग गया तो ये तुमको मारे बिना नहीं छोड़ेंगे।”
सिंही की बात सुनकर सियार का बच्चा भय से कांप उठा। वह चुपचाप वहां से खिसककर, किसी प्रकार अपनी जान बचा अपने जातियों में जाकर मिल गया। इसलिए कहते हैं अपनी जात-बिरादरी के साथ ही रहना चाहिए, क्योंकि हम अपने स्वभाव नहीं बदल सकते।

Ranveer
20-04-2011, 01:46 PM
परदेश से भला अपना देश


किसी गांव में चित्रांग नाम का एक कुत्ता रहता था। एक बार उस क्षेत्र में अकाल पड़ गया। चित्रांग को कई दिनों तक खाने को कुछ भी न मिला। वह भूख से व्याकुल होने लगा। वह अपना गांव छोड़कर एक दूसरे नगर में जा पहुंचा। वहां वह एक घर में घुस गया। उसने पेट भरकर भोजन किया और चुपके से बाहर निकल आया।

इसके बाद वह प्रतिदिन ऐसा ही करने लगा। लेकिन जब वह खा-पीकर घर से निकलता तो गली के कुत्ते उसे घर लेते। उसे देखकर भौंकते और उसे नोचने-खसोटने लगते। वह लहूलुहान हो जाता। गली के कुत्तों ने उसका जीना मुश्किल कर दिया। एक दिन कुत्तों से परेशान होकर चित्रांग ने सोचा, इससे तो अपना देश ही अच्छा था।

वहां अपना पेट भले ही मुश्किल से भरता था, फिर भी रोज-रोज की परेशानी तो नहीं थी। यह सोचकर वह वापस अपने गांव आ गया। परदेश से लौटने पर उसके साथियों ने पूछा-‘मित्र, हमें भी बताओ, परदेश में कैसा हाल रहा?’

चित्रांग ने उत्तर दिया-‘परदेश में वैसे तो बड़ा सुख ता। पेटभर भोजन भी मिल जाता था, फिर भी अपना ही देश भला लगता है। दूसरे स्थान पर अपनी ही जाति के लोग चैन से नहीं रहने देते थे। इसी कारण मैं घूम-फिरकर अपने ही देश में वापस आ गया हूं।’

Ranveer
21-04-2011, 06:08 PM
गलत मार्ग का अंजाम


किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी।

एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”

वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”

“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए।

दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए।

यह विचार कर उसने कहा, “नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।” “ठीक है, ऐसा ही करो।”

किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला, “अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।” उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।

वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही। इसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।

Ranveer
23-04-2011, 01:09 PM
कुआ का मेढ़क

छिछला पानी वाले कुआ में एक मेढ़क रहता था , रोज वह खुशी में मस्त रहता था । एक दिन पूर्वी समुद्र से एक भीमकाय कच्छ आया , मेढ़क ने उस से कहा , देखो , मैं कितना खुश हूं , चाहे, कुआ से बाहर निकल कर खेलने घूमने जा सकता हूं , कुआ के किनारे पर कूद फुदक सकता हूं , चाहे तो फिर कुआ के अन्दर विश्राम करने लौट सकता हूं , कुआ की टूटी भित्ति पर घुटनी लगा कर बैठ सकता हूं , कुआ के तल की कीचड़ ज्यादा गहरी नहीं है , महज मेरे पांव तक आती है । देखो , वे कीड़ा मकोड़े , छोटे नन्हें कीट पतंग , उन में से कौन मेरा जैसा महान हो सकता । मैं पूरे कुआ पर काबिज हूं , मन आया , छलांग लगा सकता हूं , नहीं चाहता , तो उस में आराम करता हूं । कितना मस्त हूं , कितना मजा आया । आप क्यों नीचे नहीं आए , जरा देखो तो सही ।

समुद्र से आये भीमकाय कच्छ ने कुआ के भीतर जाने की कोशिश की , लेकिन अभी कुआ के मुह में पांव बढ़ा कि एक पांव कुआ की भित्ति पर अटक पड़ा और कुआ बड़ा छोटा था कि कच्छ उस के अन्दर नहीं जा पाता । कच्छ पीछे हट कर मेढ़क से बोला, तुम ने कभी समुद्र देखा हो , हां, वह इतना विशाल है कि हजारों किलोमीटर जितना दूर हो , वह समुद्र से लम्बा चौड़ा नहीं है , हजारों मीटर पर्वत जितना ऊंचा हो , वह समुद्र से गहरा नहीं हो पाता । प्राचीन राजा शायो के समय दस सालों के दौरान नौ साल तक लगातार मुसलाधार वर्षा हुई थी , किन्तु समुद्र का पानी उस के कारण नहीं बढ़ा , सांग राज्यवंश के जमाने में आठ सालों में सात साल सूखा पड़ा , किन्तु समुद्र का पानी कुछ भी नहीं घटा । ओह , अनन्त असीम समुद्र है , वह समय के साथ साथ छोटा या बड़ा नहीं होता , वह बारिश की मात्रा से घटता बढ़ता नहीं जाता । इसी तरह के समुद्र में रहते हुए असली खुशी मसहूस हो सकती है ।

समुद्र से आए भीमकाय कच्छ की बातें सुन कर मेढ़क को बड़ा आश्चर्य आया , उस की दोनों आंखें फुट फुट कर खुलीं और अवाक रह गयी। तभी उसे लगा कि वह कितना मामूली और छोटा है ।

नीति कथा की शिक्षा है कि लोग अहंकार से बच जाना चाहिए और अपने को सही समझना चाहिए ।

Pooja1990 QUEEN
23-04-2011, 02:31 PM
कुछ तो में समज गयी

slimsima
03-05-2011, 01:02 PM
वीरपुर नामक राज्य में एक राजा राज्य करता था एक बार उसे अपने राज्य कोष को सँभालने हेतु एक कोषाध्यक्ष की आवश्कता महसूस हुई उसने अपने राज्य में मुनादी करवा दी की जो राजा के बकरे का पेट पूरा भर देगा उसे ही कोशाद्यक्ष का पद सोंप दिया जाएगा
अब थो राज महल में लोगों का ताँता लग गया प्रति दिन एक व्यक्ति को चुन कर उसे वो बकरा पुरे दिन चराने के लिए दे दिया जाता
लोग उसे सारा दिन चराते हरी हरी घंस खिलाते अच्छा अच्छा सानी और पानी देते शाम होने पर बकरे को ले कर वापस राज महल जाते तब राजा हरी घांस का एक गट्ठर बकरे के आगे डलवा देता और बकरा उसमे भी मुह चलाने लगता इस प्रकार कोई भी व्यक्ति राजा के बकरे का पेट नहीं भर पाया जो भी बकरे को लेकर चराने जाता उसे यही लगता की बकरे का पेट पूरी तरह भर गया होगा क्योंकि मैंने सारा दिन इसको अच्छा चारा और सानी जो खिलाया हे पर शाम को राज महल जाने पर बकरा राजा द्वारा डलवाए गए घास के गट्ठर को भी खाने लगता
इसी प्रकार लोग आते कोशिश करते और चले जाते एक दिन राज महल में एक किसान आया और बकरे को चराने के लिए ले गया
अब बकरा जैसे ही हरी घास खाने के लिए मुह आगे बढ़ता किसान उसे एक छड़ी मार देता सारा दिन यही हुआ जैसे ही बकरा गास खाना चाहता किसान उसे छड़ी मार देता शाम होने पर किसान बकरे को ले कर राजा के पास गया और कहा की'' राजन इस बकरे का पेट पूरी तरह भर गया हे ये अब कुछ नहीं खायेगा'' राजा ने कहा ''अभी पता चल जायगा ''
ऐसा बोल कर राजा ने एक हरी गास का गट्ठर बकरे के आगे डालने का आदेश दिया पर बकरे ने उसे देख कर मुह फेर लिया अब राज ये देख कर बड़ा प्रसन हुआ और उस किसान को गले से लगते हुए उसे कोशाद्यक्ष का पद सोंप दिया अब आप सोच रहे होंगे की बकरे का पेट भरे से क्या कोशाद्यक्ष के पद को सँभालने की योग्यता आ जाती हे
दरअसल दोस्तों ये बकरा नहीं हमारा मन हे हम अपने मन की इछाओं और आवश्कताओं को जितना पूरा करेंगे ये अपनी आवश्कताएं बढ़ता ही जाएगा हमारा मन कभी संतुस्ट नहीं हो सकता इसलिए हमे अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना आना चाहिये

Ranveer
03-05-2011, 01:12 PM
सहयोग के लिए धन्यवाद सीमा जी

sultanmirja
03-05-2011, 01:29 PM
एक बढिया सूत्र के लिए सूत्रधार को धन्यवाद

Ranveer
03-05-2011, 01:36 PM
एक बढिया सूत्र के लिए सूत्रधार को धन्यवाद
धन्यवाद मिर्ज़ा साहब ..:cup:

Amigo.
17-09-2011, 01:45 AM
रणवीर जी आपकी आज्ञा के बिना कुछ मेरी तरफ से

Amigo.
17-09-2011, 01:46 AM
लाओत्से के पास एक युवा सैनिक, जिसने धर्मशास्त्रों का भी अध्ययन किया था, पहुंचा। उसने सुन रखा था कि लाओत्से के पास सभी समस्याओं का समाधान है। युवा सैनिक लाओत्से से जानना चाहता था कि स्वर्ग और नरक में क्या अंतर है? लाओत्से ने उसे अच्छी तरह देखा और पूछा, 'युवक तुम्हारा पेशा क्या है?' सैनिक ने अपने पेशे के बारे में बताया तो लाओत्से ने उसका उपहास करते हुए कहा, 'तुम और सैनिक! तुम्हें तो देखकर पता चलता है कि तुम बड़े डरपोक हो। तुम्हें तो बंदूक भी ठीक से उठाना नहीं आता होगा। तुमने तो शायद ही आज तक कोई वीरता का काम किया हो।' यह कहकर लाओत्से ने ठहाका लगाया।

इस पर सैनिक की भौंहें तन गई। उसका खून खौल उठा। उसने बंदूक निकाल ली और ज्यों ही घोड़ा दबाने को हुआ कि तभी लाओत्से बोल पड़े, 'बस यही है नरक का द्वार। तुम इससे आगे बढ़े नहीं कि नरक में पहुंच जाओगे।' इसके बाद लाओत्से ने विस्तार से क्रोध, उससे होने वाले नुकसान और क्रोध पर नियंत्रण की जरूरत पर चर्चा की। उन्होंने इस क्रम में उसे समझाते हुए कहा, 'स्वर्ग और नरक कहीं बाहर नहीं हैं। वे हमारे भीतर हैं। वे हमारी सोच और व्यवहार में प्रकट होते हैं।' लाओत्से की बात का मर्म समझते ही युवक की आंखें खुल गईं। वह अपने किए पर ग्लानि से भर गया और लाओत्से के चरणों में गिर पड़ा। लाओत्से ने कहा, 'लो, अब तुम्हारे लिए खुल गया स्वर्ग का द्वार। आगे बढ़ते ही तुम्हारा दुनिया की हर खुशियों से सामना होगा।'

Amigo.
17-09-2011, 01:48 AM
एक सेठ के पास लाखों की संपत्ति थी और भरा-पूरा परिवार था, फिर भी उसका मन अशांत रहता था। जब उसकी परेशानी बहुत बढ़ गई तो वह एक साधु के पास गया और अपना कष्ट बताकर प्रार्थना की, 'महाराज, जैसे भी हो, मेरी अशांति दूर कीजिए।'

साधु ने उसकी बात ध्यान से सुनी और कहा, 'तुम्हारे कष्ट का एकमात्र कारण यह है कि तुम जिंदगी को सहजता से नहीं लेते। अगर सुख या दुख को समान भाव से लेने लगोगे तो कोई कष्ट नहीं होगा।' सेठ को यह बात समझ में नहीं आई। साधु इस चीज को भांप गए। उन्होंने कुछ सोचकर कहा, 'यहां से थोड़ी दूर पर तुम्हारी तरह ही एक अमीर कारोबारी रहता है, उसके पास जाओ वह तुम्हें रास्ता बता देगा।'

सेठ ने सोचा कि साधु उसे बहका रहे है। उसने साधु से कहा, 'स्वामीजी, मैं तो आपके पास बड़ी आशा लेकर आया हूं। आप ही मेरा उद्धार कीजिए। मैंने सोचा था कि आप मुझे कोई मंत्र वगैरह बताएंगे।' साधु ने हंसकर कहा, 'जाओ उसी कारोबारी के पास तुम्हें प्रसन्नता का मंत्र मिल जाएगा।' लाचार होकर सेठ उस कारोबारी के पास पहुंचा। पहुंचते ही वह समझ गया कि उस कारोबारी का लाखों का व्यापार है।

सेठ एक ओर बैठ गया। इतने में एक आदमी आ गया। उसका मुंह उतरा हुआ था। वह कारोबारी से बोला, 'मालिक हमारा जहाज समुद्र में डूब गया। लाखों का नुकसान हो गया।' कारोबारी ने मुस्कराकर कहा, ' इसमें परेशान होने की क्या बात है? व्यापार में ऐसा होता ही रहता है।' इतना कहकर वह अपने साथी से बात करने लगा। थोड़ी देर में दूसरा आदमी आया और बोला, 'सरकार रूई का दाम चढ़ गया है। हमें लाखों का फायदा हो गया।' कारोबारी ने कहा, 'मुनीमजी, इसमें ज्यादा खुश होने की क्या बात है? व्यापार में तो ऐसा होता ही रहता है।' सेठ सब कुछ समझ गया। उसे प्रसन्नता का मंत्र मिल गया।

Teach Guru
17-09-2011, 07:06 AM
क्या बात है , मस्त है भाई.................

arjun32
17-09-2011, 07:55 AM
अच्छा सूत्र प्रस्तुत करने के लिए शुक्रिया रणवीर जी...

JEETJAWAN
17-09-2011, 09:18 AM
एक सेठ के पास लाखों की संपत्ति थी और भरा-पूरा परिवार था, फिर भी उसका मन अशांत रहता था। जब उसकी परेशानी बहुत बढ़ गई तो वह एक साधु के पास गया और अपना कष्ट बताकर प्रार्थना की, 'महाराज, जैसे भी हो, मेरी अशांति दूर कीजिए।'

साधु ने उसकी बात ध्यान से सुनी और कहा, 'तुम्हारे कष्ट का एकमात्र कारण यह है कि तुम जिंदगी को सहजता से नहीं लेते। अगर सुख या दुख को समान भाव से लेने लगोगे तो कोई कष्ट नहीं होगा।' सेठ को यह बात समझ में नहीं आई। साधु इस चीज को भांप गए। उन्होंने कुछ सोचकर कहा, 'यहां से थोड़ी दूर पर तुम्हारी तरह ही एक अमीर कारोबारी रहता है, उसके पास जाओ वह तुम्हें रास्ता बता देगा।'

सेठ ने सोचा कि साधु उसे बहका रहे है। उसने साधु से कहा, 'स्वामीजी, मैं तो आपके पास बड़ी आशा लेकर आया हूं। आप ही मेरा उद्धार कीजिए। मैंने सोचा था कि आप मुझे कोई मंत्र वगैरह बताएंगे।' साधु ने हंसकर कहा, 'जाओ उसी कारोबारी के पास तुम्हें प्रसन्नता का मंत्र मिल जाएगा।' लाचार होकर सेठ उस कारोबारी के पास पहुंचा। पहुंचते ही वह समझ गया कि उस कारोबारी का लाखों का व्यापार है।

सेठ एक ओर बैठ गया। इतने में एक आदमी आ गया। उसका मुंह उतरा हुआ था। वह कारोबारी से बोला, 'मालिक हमारा जहाज समुद्र में डूब गया। लाखों का नुकसान हो गया।' कारोबारी ने मुस्कराकर कहा, ' इसमें परेशान होने की क्या बात है? व्यापार में ऐसा होता ही रहता है।' इतना कहकर वह अपने साथी से बात करने लगा। थोड़ी देर में दूसरा आदमी आया और बोला, 'सरकार रूई का दाम चढ़ गया है। हमें लाखों का फायदा हो गया।' कारोबारी ने कहा, 'मुनीमजी, इसमें ज्यादा खुश होने की क्या बात है? व्यापार में तो ऐसा होता ही रहता है।' सेठ सब कुछ समझ गया। उसे प्रसन्नता का मंत्र मिल गया।

बहुत बढीया कहानी है मित्र आप इसी तरह नयी नयी कहानियां प्रस्*तुत करे ......
आपको मेरी तरफ से रेपो .......

JEETJAWAN
17-09-2011, 09:22 AM
प्रिय मित्रों
इस सूत्र में आपको कुछ नीति कथाएं पढने को मिलेंगी ।
भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है।
पंचतंत्र उनमें प्रमुख है।
पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी।
उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया।
मेरी कहानियां पंचतंत्र , वेद , शास्त्रों आदि आदि से ली गयीं हैं
आशा करता हूँ की ये सूत्र आपलोगों को पसंद आयेगा ।:):bloom:




बहुत ही बढीया सुत्र है रणवीर जी ........
इसके लिए आपको मेरी तरफ से रेपो

Akash78
17-09-2011, 05:51 PM
ज़िम्मेदारी - जेन कथा
जेन गुरु रयोकान को उनकी बहन ने कोई जरूरी बात करने के लिए अपने घर आने का निमंत्रण दिया। वहां पहुंचने पर रयोकान की बहन ने उनसे कहा, ‘अपने भांजे को कुछ समझाओ। वह कोई काम नहीं करता। अपने पिता के धन को वह मौज-मस्ती में उड़ा देगा। केवल आप ही उसे राह पर ला सकते हो।’

रयोकान अपने भांजे से मिले। वह भी अपने मामा से मिलकर बहुत प्रसन्न था। रयोकान के जेन मार्ग अपनाने से पहले दोनों ने बहुत समय साथ में गुजरा था। भांजा यह समझ गया था कि रयोकान उसके पास क्यों आए थे। उसे यह आशंका थी कि रयोकान उसकी आदतों के कारण उसे अच्छी डांट पिलाएंगे।

लेकिन रयोकान ने उसे कुछ भी न कहा। अगली सुबह जब उनके वापस जाने का समय हो गया, तब वह अपने भांजे से बोले, ‘क्या तुम मेरी जूतियों के तसमे बांधने में मेरी मदद करोगे? मुझसे अब झुका नहीं जाता और मेरे हाथ कांपने लगे हैं।’

भांजे ने बहुत ख़ुशी-ख़ुशी रयोकान की जूतियों के तसमे बांध दिए। ‘शुक्रिया’ रयोकान ने कहा- ‘दिन प्रतिदिन आदमी बूढ़ा और कमजोर होता जाता है। तुम्हें याद है, मैं कभी कितना बलशाली और कठोर हुआ करता था?’

‘हां’- भांजे ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘अब आप बहुत बदल गए हैं।’ भांजे के भीतर कुछ जाग रहा था। उसे अनायास यह लगने लगा कि उसके रिश्तेदार, उसकी मां और उसके सभी शुभचिंतक लोग अब बुजुर्ग हो गए थे। उन सभी ने उसकी बहुत देखभाल की थी और अब उनकी देखभाल करने की जिम्मेदारी उसकी थी। उस दिन से उसने सारी बुरी आदतें छोड़ दीं और सबके साथ-साथ अपने भले के लिए काम करने लगा।

Akash78
18-09-2011, 11:04 AM
जातक कथा -
पाप का फल
ब्रह्मदत्त काशी राज्य पर राज्य करते थे। उन दिनों बोधिसत्व ने सुतनु नाम से एक गरीब किसान के रूप में जन्म लिया। बड़ा होने पर सुतनु अपनी कमाई से अपने माता-पिता का पालन-पोषण करने लगा। थोड़े दिन बाद उसके पिता का देहान्त हो गया। वह सारा दिन मेहनत करके जो कुछ कमाता, वह उसके और उसकी माता के लिए पर्याप्त न होता था।

उस देश के राजा को शिकार खेलने का बड़ा शौक था। वह अक्सर जंगल में जाकर जंगली जानवरों का शिकार किया करता था। एक दिन राजा ने एक हिरण का पीछा करते हुए उस पर तीर चलाया। तीर की चोट खाकर हिरण मर गया। समीप में राजा का कोई भट न था। इसलिए वह उस हिरन को अपने कन्धे पर डाल वापस लौटने लगा।

दुपहर का समय था। कड़ी धूप थी। शिकार खेलने तथा हिरण को ढोने से राजा थक गया था। उस अवस्था में उस को एक विशाल वट वृक्ष की छाया बड़ी सुखद प्रतीत हुई । राजा हिरण को वहाँ पर रखकर पेड़ की छाया में विश्राम करने लगा।

दूसरे ही क्षण राजा के सामने एक ब्रह्म राक्षस प्रत्यक्ष हुआ और उसकी ओर बढ़ते हुए चिल्ला उठा, ‘‘मैं तुम्हें खा जाऊँगा।''

‘‘तुम कौन हो? मुझे खाने का तुम्हें क्या अधिकार हैं?'' राजा ने ब्रह्म राक्षस से पूछा।

‘‘मैं एक ब्रह्म राक्षस हूँ। यह वृक्ष मेरा है। इस की छाया में जो आ जाता है, इस पेड़ के नीचे की ज़मीन पर जो पैर रखता है, उन सबको खाने का मुझे अधिकार है,'' भूत ने कहा।
राजा ने गंभीरतापूर्वक विचार किया, कुछ युक्ति सोची और ब्रह्म राक्षस से पूछा, ‘‘तुम केवल आज के लिए आहार चाहते हो या प्रतिदिन तुम्हें आहार चाहिए?''

‘‘मुझे तो प्रतिदिन आहार चाहिए,'' ब्रह्म राक्षस ने झट उत्तर दिया।

‘‘यदि तुम इस हिरण को खाकर मुझे छोड़ दो तो मैं तुम्हारे प्रतिदिन के आहार की समस्या को हल कर दूँगा। मैं इस देश का राजा हूँ। इसलिए प्रतिदिन तुम्हारे पास अन्न के साथ एक आदमी को भी भेज सकता हूँ,'' राजा ने सुझाया।

ब्रह्म राक्षस बहुत प्रसन्न हुआ और बोला, ‘‘तब तो तुम्हें छोड़ देता हूँ परन्तु एक शर्त पर! जिस दिन मुझे समय पर आहार न मिला, उस दिन मैं स्वयं आकर तुम्हें खा जाऊँगा।''

इस के बाद राजा हिरण को ब्रह्म राक्षस के हाथ सौंपकर अपनी राजधानी लौट गया और अपने मंत्री को सारा वृत्तान्त सुनाया।

मंत्री ने राजा को समझाया, ‘‘महाराज, आप चिन्ता न कीजिए। हमारे कारागार में बहुत से क़ैदी हैं। उनमें से प्रतिदिन एक को ब्रह्म राक्षस के आहार के रूप में भेज दूँगा।''

उस दिन से मंत्री प्रतिदिन एक क़ैदी को अन्न के साथ भेजता रहा और ब्रह्म राक्षस उस क़ैदी को खाता रहा।

थोड़े दिन बाद सब क़ैदी समाप्त हो गये। मंत्री घबरा गया। उसकी समझ में न आया कि क्या किया जाये? उसने सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया, ‘‘जो आदमी खाना लेकर जंगल में रहनेवाले भूतों के बरगद के पास जाएगा, उसको राजा पुरस्कार में एक हज़ार सोने के सिक्के देंगे।''
यह ढिंढ़ोरा सुनकर सुतनु ने सोचा, ‘‘वाह! यह कितने आश्र्चर्य की बात है! मैं हड्डी तोड़ मेहनत करूँ तो भी तांबे के चार सिक्के हाथ नहीं लगते। परन्तु ब्रह्म राक्षस का आहार बन जाने पर मुझको इतने सारे सोने के सिक्के हाथ लग जायेंगे।''

यह विचार करके सुतनु ने अपनी माँ से कहा, ‘‘माँ, मैं एक हज़ार सिक्के लेकर भूतों वाले बरगद के पास खाना ले जाऊँगा। उस धन से तुम्हारी सारी जिन्दगी आराम से कट जाएगी।''

‘‘बेटा, इस समय मुझे किस बात की कमी है? मैं तो सुखी हूँ। मुझे उस धन का क्या करना है जिसे पाने के लिए अपना बेटा खोना पड़े? लगता है तुम्हारी मति मारी गई है। क्या तुम्हें यह बात समझ में नहीं आई कि वहाँ जाने पर वह राक्षस तुम्हें खा जायेगा? नहीं, तुम्हें कहीं जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, '' सुतनु की माँ ने कहा।

‘‘माँ, मुझे कोई खतरा न होगा। मैं सकुशल लौट आऊँगा।'' इस प्रकार सुतनु माँ को समझा कर राजा के पास गया।

उसने राजा से कहा, ‘‘महाराज, यदि आप अपने जूते, छतरी, तलवार और सोने का एक पात्र मुझे दिलवाएँ तो मैं जंगल में रहनेवाले भूतों के बरगद के पास आहार ले जाऊँगा।''

‘‘खाना ले जाने के लिए इन सारी चीज़ों की क्या आवश्यकता है?'' राजा ने पूछा।

‘‘ब्रह्म राक्षस को हराने के लिए!'' सुतनु ने झट उत्तर दिया।

इसके बाद सुतनु ने तलवार धारण की, जूते पहने, हाथ में छतरी ली और सोने के पात्र में अन्न लेकर दुपहर तक भूतों के बरगद के पास पहुँचा। पर वह पेड़ की छाया से थोड़ी दूरी पर छतरी की छाया में खड़ा रहा ।

ब्रह्म राक्षस उसकी प्रतीक्षा करता रहा। जब काफ़ी समय तक वह पेड़ के नीचे नहीं आया तो राक्षस असमंजस में पड़ गया। आज तक तो कभी ऐसा नहीं हुआ था। अन्त में उसने सुतनु से कहा, ‘‘तुम इस धूप में काफी दूर चल कर आये हो। छाया में आकर विश्राम कर लो।''

‘‘नहीं, मुझे तुरन्त वापस लौटना है। यह लो, तुम्हारे लिए खाना लाया हूँ।'' यह कहकर सुतनु ने सोने के पात्र को धूप में रख दिया और तलवार से उसे पेड़ की छाया में ढकेल दिया।
इस पर ब्रह्म राक्षस क्रोध में आकर हुँकार उठा, ‘‘मैं आहार के साथ आहार लानेवाले को भी खाता हूँ। क्या तुम्हें यह नहीं पता है?''

‘‘लेकिन याद रखो, मैं तुम्हारे पेड़ की छाया में नहीं आया हूँ। इसलिए तुम को मुझे खाने का क्या अधिकार है?'' सुतनु ने पूछा।

‘‘यह तो सरासर धोखा है! मेरा तो राजा के साथ समझौता है कि प्रतिदिन आहार में मुझे एक आदमी भी मिलेगा। आज तुम यह नियम तोड़ रहे हो। लगता है इसमें राजा की कोई चाल है या वह अपने ही किये हुए समझौते को तोड़ना चाहता है! मुझे राजा को दिखाना होगा कि वचन तोड़ने से क्या हो सकता है। आज मैं सीधे जाकर उस राजा को ही खा डालूँगा!'' ब्रह्म राक्षस ने झल्ला कर कहा।

‘‘तुमने किसी जन्म में महान पाप करके इस प्रकार राक्षस का जन्म धारण किया है। इसी के परिणाम-स्वरूप भूत बनकर इस बरगद के आश्रय में रहते हो। ऐसा नीच जीवन बिताते रहने पर भी तुम्हारी बुद्धि अभी तक ठिकाने नहीं लगी। अब भी सही, अपने मन को बदल डालो।'' इस प्रकार सुतनु ने ब्रह्म राक्षस को डाँट दिया।

इस पर ब्रह्म राक्षस सोच में पड़ गया। सुतनु की बात ने उसे बहुत प्रभावित किया परन्तु वह अपने स्वभाव और परिस्थितियों के कारण असमर्थ था। अन्त में उस ने चिन्तित स्वर में पूछा, ‘‘बताओ, मैं क्या करूँ? इससे अच्छा जीवन बिताने का क्या रास्ता है?''

‘‘तुम मेरे साथ चलकर हमारे नगर के द्वार पर निवास करो। वहाँ पर प्रतिदिन मैं तुम्हारे लिए सात्विक आहार भिजवाने का प्रबन्ध करूँगा। तुम मानवों को नोच-नोच कर खाने की अपनी बुरी आदत छोड़ दो,'' सुतनु ने समझाया।

ब्रह्म राक्षस ने ऐसा ही किया।

सुतनु को जीवित आया देखकर राजा को विस्मय हुआ। सुतनु ने सारा वृत्तान्त राजा को सुनाया। राजा ने परमानन्दित होकर सुतनु को अपना सेनापति नियुक्त किया और उसकी सलाह से सुखपूर्वक राज्य पर शासन किया।

Akash78
18-09-2011, 11:14 AM
जातक कथा -
पंच कल्याणी
जब ब्रह्मदत्त काशी पर राज्य करते थे, उन दिनों बोधिसत्व ने एक उत्तम नस्ल के घोड़े के रूप में जन्म लिया। वह राजा के घोड़ों में उत्तम घोड़ा और पंच कल्याणी माना जाता था। इस कारण उसका पोषण और अलंकार विशेष रूप से राज परिवार की गरिमा के अनुरूप किया जाता था।

उस घोड़े के लिए तीन साल पूर्व के बढ़िया व पुराने धान के साथ बनाया गया खाना तैयार किया जाता था। उसका खाना एक हज़ार स्वर्ण मुद्राओं के मूल्य के थाल में परोसा जाता था। वह जिस घुड़साल में बंधा रहता था, वह हमेशा सुगंधित द्रव्यों से महकता रहता। उस घुड़साल के चारों तरफ़ सुन्दर परदे लटकते रहते थे। ऊपर की चांदनी सोने के फूलों से सजी रहती थी। चारों तरफ की दीवारें खुशबूदार फूलों से सुशोभित रहतीं, दिन-रात वह घुड़साल अगरबत्तियों तथा सुगंधित द्रव्यों के परिमल से देदीप्यमान दिखाई देता था।

ऐसे उत्तम अश्ववाले राजा के वैभव को देख अड़ोस-पड़ोस के सारे सामंत राजा ईर्ष्या करते थे। वे सभी इस ताक में रहते थे कि कैसे उस राज्य को हड़प लें। लेकिन उनमें से किसी एक को काशी पर आक्रमण करने का साहस नहीं होता था।

इसलिए उन सबने मिलकर काशी पर आक्रमण करने का निश्चय किया। एक बार इकठ्ठे सात सामंत राजाओं ने काशी राजा के पास एक दूत के द्वारा यों संदेशा भेजा, ‘‘आप बिना देरी किये तुरंत अपना राज्य हमें सौंप दीजिए, वरना हमारे साथ युद्ध के लिए तैयार हो जाइये। हम सात राजाओं की सम्मिलित सेना के साथ आप के राज्य की सीमा पर आप के उत्तर का इन्तजार कर रहे हैं।''

इस पर काशी राजा ने अपने मंत्रियों को बुलवा कर सामंत राजाओं का संदेशा उन्हें सुनाया। मंत्रियों ने सोच-समझकर राजा को समझाया, ‘‘महाराज, आपको युद्ध क्षेत्र में स्वयं जाने की कोई ज़रूरत नहीं है। हमारे सेनापति वीरवर्मा को सेना के साथ भेज दीजिए, वे बहादुर और कुशल योद्धा हैं। वही दुश्मन को पराजित कर शीघ्र लौट आयेंगे। अगर वे दुश्मन को हरा नहीं सकेंगे तो फिर आगे की बात सोची जाएगी।''

इस पर राजा ने सेनापति को बुलवाकर कहा, ‘‘वीरवर्मा, हम पर एक भारी विपत्ति आ पड़ी है। एक साथ सात सामंत राजा हमारे देश पर हमला करने जा रहे हैं। क्या आप उन सातों को पराजित कर सकते हैं?''

इसके उत्तर में वीरवर्मा ने कहा, ‘‘महाराज, यदि आप अपने प्यारे घोड़े पंच कल्याणी को मेरे हाथ सौंप दें तो उन सातों सामंतों को क्या, सारे देशों को पराजित कर कुशलपूर्वक लौट सकता हूँ।'' सेनापति का जवाब सुनकर राजा खुश हुए और पंच कल्याणी को उनके हाथ सौंपकर शत्रु पर विजय प्राप्त करने भेजा।

राजा से विदा लेकर पंच कल्याणी को साथ ले सेनापति वीरवर्मा बड़े उत्साह के साथ उसी व़क्त युद्ध भूमि की ओर चल पड़ा।

इसके बाद वीरवर्मा क़िले से बिजली की भांति निकल पड़ा। हिम्मत के साथ लड़कर प्रथम सामंत को बुरी तरह से हराया और उसे बन्दी बनाया। फिर युद्ध क्षेत्र में जाकर दूसरे सामंत को बन्दी बनाया। इस तरह उन्होंने एक-एक करके पाँच सामंतों को हरा कर क्रमशः उन्हें बन्दी बनाया।

छठे सामंत के साथ युद्ध करके उसको भी हराया, लेकिन इस बीच घोड़ा बुरी तरह से घायल हो गया और उसके घावों से खून बहने लगा।

वीरवर्मा ने सोचा कि पंच कल्याणी को एक द्वार के पास बांधकर दूसरे घोड़े को लेकर युद्ध क्षेत्र में चला जाये। इस ख्याल से वीरवर्मा पंच कल्याणी के निकट पहुँचा और उसकी लगाम, जीन वगैरह खोलने को हुआ।

उस व़क्त पंच कल्याणी के रूप में स्थित बोधिसत्व ने आँखें खोलकर देखा। वह मन ही मन यह सोचकर दुखी होने लगा, ‘हे वीर, तुम भी कैसे भोले हो? मुझे घायल देख एक और घोड़े को दुश्मन से लड़ने के लिए तैयार कर रहे हो। सातवें व्यूह को भेदकर सातवें सामंत राजा को बन्दी बनाना बेचारा वह क्या जाने? उस पर विश्वास करके लड़ाई के मैदान में ले जाओगे तो अब तक मैंने जो विजय प्राप्त की, वह सब बेकार जाएगी। तुम अकारण ही दुश्मन के हाथों मर जाओगे। हमारे मालिक काशी के राजा बड़ी आसानी से सामंत राजाओं के हाथों में फँस जायेंगे। तुम यह समझ न पाये कि सातवें सामंत राजा को हराना सिर्फ़ मेरे लिए ही संभव है, कोई दूसरा घोड़ा उसको किसी भी हालत में जीत नहीं सकता!'

यों विचार कर वह चुप नहीं रहा। घायल होकर पड़ा हुआ वह पंच कल्याणी वीरवर्मा को अपने निकट बुलाकर बोला, ‘‘हे वीर-शूर वीरवर्मा, यह अच्छी तरह से समझ लो कि सातवें व्यूह को भेदकर सातवें शत्रु सांमत राजा को पकड़ सकनेवाला घोड़ा मुझे छोड़कर दूसरा कोई नहीं है। अब तक मैंने जो श्रम किया है उसे व्यर्थ मत जाने दो। हर हालत में तुम्हें हिम्मत और पराक्रम को नहीं खोना है। इसके साथ आत्म-विश्वास और सहनशीलता की ज़रूरत होती है। इसलिए तुम मुझ पर पूर्ण रूप से विश्वास रखो। घायल होने मात्र से मुझे कमजोर मत समझो; मेरी बात सुनकर मत त्यागो। मेरे घाव पर तुरंत मरहम पट्टी करके उसे चंगा कर दो। फिर से मुझे लड़ाई के मैदान में ले जाओ।'' यों अनेक प्रकार से पंच कल्याणी ने वीरवर्मा को समझाया।
वीरवर्मा ने पल पर भी विलंब किये बिना पंच कल्याणी की मरहम पट्टी करवा दी। उसके चंगे होने पर ज्यों ही वह उस पर सवार हुआ, त्यों ही वह बिजली की गति से निकल गया और सातवें व्यूह को भेद डाला। इस पर वीरवर्मा ने सातवें सामंत को भी बन्दी बनाया।

इस तरह युद्ध में वीरवर्मा की विजय हुई। बन्दी बने सातों सामंत राजाओं को वीरवर्मा के सैनिकों ने काशी राजा के सामने हाज़िर किया। उस समय पंच कल्याणी के रूप में स्थित बोधिसत्व वहाँ आ पहुँचे।

वे राजा से बोले, ‘‘राजन, ये सातों सामंत राजा आपके ही समान राजा हैं। इनको सताना आपको शोभा नहीं देता। इनका अपमान करना भी उचित नहीं है। आप अपनी इच्छा के मुताबिक़ किसी शर्त को उनसे पूरा करा कर छोड़ देना न्याय संगत होगा। आप अपने दुश्मन के प्रति भी उदार बने रहिए। इसी में आपका बड़प्पन है। काशी राज्य की महान परम्परा और गरिमा के अनुकूल धर्म का पक्ष लेकर न्यायपूर्वक शासन कीजिए।'' यों राजा को पंच कल्याणी ने उपदेश दिया। उसी व़क्त सिपाहियों ने आकर घोड़े की सजावट वाली सारी चीज़ें हटा दीं। शीघ्र ही पंच कल्याणी के रूप में स्थित बोधिसत्व पंच भूतों में मिल गये।

इस के बाद काशी राजा ब्रह्मदत्त के आदेशानुसार राज सम्मान के साथ पंच कल्याणी घोड़े की अत्येष्टि क्रिया संपन्न की गई। इसके बाद सेनापति वीरवर्मा का बड़े पैमाने पर अभिनंदन हुआ।

सातों सामंत राजाओं को उनके राज्यों में वापस भेज दिया गया। वे सभी अपनी ईर्ष्या और शत्रुता की भावना पर बहुत लज्जित हुए। उन सबने राजा ब्रह्मदत्त से क्षमा माँगी। वे हमेशा के लिए काशी राज्य के मित्र बन गये । उस दिन से बोधिसत्व के सुझाव के अनुसार काशी राज्य में न्यायपूर्वक शासन होने लगा।

Akash78
18-09-2011, 11:22 AM
चतुर बालक और दुष्ट शैतान-
अफ्रीका के घने और गहरे जंगल में एक गॉंव था। इस गॉंव में मोबुतो अपनी पत्नी जेली और चतुर युवा बेटे एडने के साथ रहता था। मोबुतो ने गॉंव के बाहर थोड़ी सी जमीन में कसावा (एक प्रकार का अनाज) बो रखा था। मोबुतो और उसके परिवार को कसावा से बने व्यंजन बहुत पसन्द थे।

एक दिन जबकि कसावा की फसल कटाई के लिए बिलकुल तैयार थी, मोबुतो और उसकी पत्नी जेली खेत पर गए। मोबुतो ने कहा, ‘‘कल हम कसावा का दलिया मांस के साथ खाएँगे।’’

जेली को संदेह था, बोली, ‘‘दलिया बनाने से पहले मुझे कसावा की सफाई कर उसे छीलना - कूटना होगा। यह कल तक कैसे हो सकेगा? बस, एक दिन और प्रतीक्षा करो।’’

किन्तु जब वे खेत में पहुँचे, तो उन्हें गहरा धक्का लगा। खेत की अवस्था खराब थी। बहुत से पौधे जड़ से उखड़े थे और उनमें से कसावा गायब था। ‘‘सब लुट गया।’’ जेली बिलख उठी।

‘‘यह अवश्य ही किसी जंगली जानवर का काम है।’’ मोबुतो चीख पड़ा। इसके पहले कि वे हमारे बचे हुए पौधे भी नष्ट करें, हमें उन्हें पकड़ना होगा।’’ उसने कहा। गहरी सोच में डूबे वे झोंपड़ी को लौट पड़े। जब एडने ने उन्हें परेशान देखा, तो उसे कारण जानने की जिज्ञासा हुई। मोबुतो ने उसे सारी बात बताई, इस पर उस चतुर बालक ने एक योजना बनाई।

‘ठीक है।’ जेली ने कहा। ‘‘चलो, जानवरों को पकड़ने के लिए हम एक गड्ढा खोदें। जो जानवर एक बार आया है, वह फिर से आ सकता है, और तब हम उसे पकड़ सकते हैं। इस प्रकार हम खेत में बचे पौधे भी बचा सकते हैं और भोजन के लिए पर्याप्त मांस भी पा जाएंगे।’’
मोबुतो को योजना बहुत पसन्द आई, अतः वह फिर से खेत की तरफ गया और खुदाई में जुट गया। जिस समय मोबुतो खुदाई कर रहा था, उसी वक्त वहां एक दुष्ट शैतान प्रकट हुआ, ‘‘अरे! मेरे जँगल में तुम क्या कर रहे हो?’’ उसने मोबुतो से पूछा। मोबुतो ने चौंक कर ऊपर शैतान को देखा तो वह डर गया। उसने शैतान और उसकी दुष्टता के बारे में सुना था, पर इतने पास से उसका सामना पहली बार हुआ था। ‘‘मैं यहॉं जानवरों कोपकड़ने के लिए गड्ढा खोद रहा हूँ, जिन्होंने मेरा खेत नष्ट कर दिया है’’ वह हकलाया ।

शैतान ने तेवर चढ़ाए, ‘‘म मेरी अनुमति के बिना मेरे जंगल में कैसे खुदाई कर सकते हो, इसके लिए तुम्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।’’ मोबुतो डर से कॉंप उठा, ‘‘मुझे क्षमा कर दो शैतान महोदय, मुझे अपने बच्चों को पालना है।’’ शैतान ने सोच कर कहा, ‘‘ठीक है। मैं इस बार तुम्हें छोड़ता हूँ, मगर एक शर्त पर। जब भी गड्ढे में कोई नर-पशु गिरेगा, उसे तुम ले लेना,किन्तु जब कोई मादा गिरे तो उसे मैं लूँगा।’’

मोबुतो सहमत हो गया। उसने गड्ढा खोदा और उसे पत्तियों, डण्ठलों आदि से लापरवाही पूर्वक ढक दिया और चला गया। दूसरे दिन मोबुतो गड्ढे तक गया। तुरन्त ही शैतान भी टपका। मोबुतो ने गड्ढे में देखा, उसमें एक बन्दर था। ‘‘यह नर है,’’ वह खुशी से बोला। शैतान चला गया। दूसरे दिन मोबुतो फिर गड्ढे पर गया। उसने उत्सुकता से देखा। इस बार वहॉं एक कैरीबो था। वह पुलकित हो उठा।

प्रतिदिन मोबुतो गड्ढे की जॉंच करने जाता और हर दिन उसमें एक नर पशु को पाता। कभी उसमें लकड़बग्घा होता तो कभी जंगली बिलार, कभी सूअर या जेबरा भी। ‘‘ऐसा लगता है कि केवल नर पशुओं को ही कसावा पसन्द है।’’ मोबुतो ने टिप्पणी कसी। शैतान ने उत्तर नहीं दिया। एक महीने बाद जेली ने कसावा के खेत में जा कर पूरी फसल उठाने और नई बुआई करने का निश्चय किया। मोबुतो के सर में दर्द था।
तः वह घर पर ही रुक गया। कई घण्टे बीत गए, किन्तु जेली नहीं लौटी। ‘‘मुझे भूख लगी है।’’ सहसा एडने बड़बड़ाया। मोबुतो जिसे झपकी आ गई थी, जग उठा। अंधेरा तेजी से बढ़ रहा था। ‘‘जेली को क्या हुआ?’’ वह बोला।

पिताजी, चलिए, हम खेत से मां को लिवा लाएँ।’’ एडने ने कहा, जो सचमुच एक होशियार लड़का था। दोनों चल पड़े। दोनों गड्ढे के पास गए। उसे खुला पा कर अन्दर देखना चाहा कि कौन सा जानवर गिरा है। उसमें जेली थी। शायद उसने ध्यान नहीं दिया और उसमें गिर पड़ी। ‘‘इस बार इसमें एक मादा पशु है और वह मेरा है।’’ निकट से एक घिनौनी आवाज आई। मोबुतो डर गया; शैतान उसी के पास था।

‘‘ओह, नहीं! तुम उसे नहीं ले सकते। वह मेरी पत्नी है’’, मोबुतो चीखा। ‘‘तुम केवल मादा पशु ही ले सकते हो।’’ लेकिन शैतान ने एक नहीं सुनी, ‘‘मनुष्य भी एक जानवर है’’ उसने छिपी मुस्कान से कहा, ‘‘आज से वह मेरी है।’’

मोबुतो तो घबराहट में हाथ मलने लगा। उसने घबरा कर हाथों में अपना मुँह छिपा लिया, किन्तु एडने इतनी आसानी से अपनी मॉं को नहीं देने वाला था। ‘‘देखता हूँ, ये कैसे लेता है मेरी मां को?’’ उसने सोचा, फिर उसने शैतान से कहा, ‘‘ठीक है, वह तुम्हारी हुई, अतः तुम गड्ढे में जा कर उसे ले सकते हो।’’

‘‘नहीं!’’ मोबूतो चीखा, मैं ऐसा होते नहीं देख सकता। एडने! तुम ऐसा क्यों कहते हो?’’

किन्तु शैतान हँस पड़ा, ‘‘लो मैं गया।’’ वह चिल्लाया और गड्ढे में कूद पड़ा। ‘‘पिताजी, उठिए, अब गड्ढे में एक नर जानवर है, आइए, हम इसे पकड़ लें।’’ एडने ने कहा। मोबुतो उछल पड़ा। अब उसे समझ में आ गया कि उसके चतुर बेटे ने क्या चाल चली है। ‘हा!हा!’

उसने गड्ढे में ताकते हुए कहा, ‘‘यह नर पशु गुलाम बन कर हमारा काम करेगा।’’ दुष्ट शैतान समझ गया कि वह फंस चुका है। वह मोबुतो का गुलाम नहीं बनना चाहता था। ‘‘तुम उसे वापस ले सकते हो।’’ उसने भरी हुई आवाज में कहा, और गड्ढे से निकल कर चुपचाप जंगल में खिसक गया। मोबुतो और एडने ने जेली को गड्ढे से निकलने में मदद की। तीनों खुशी से नाचते हुए घर वापस आ गये ।

GForce
12-10-2011, 10:07 PM
अति उत्तम कथाएं ! हृदय तथा मस्तिष्क को यह रुचिकर भोज्य उपलब्ध कराने के लिए आपका धन्यवाद !