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View Full Version : पारिवारिक सेक्स संबंधों पर स्वस्थ चर्चा.



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dev b
13-01-2011, 09:46 PM
दोस्तों मेरे विचार से सेक्स अपने परिवार में या समंधिन्यो में , उन लोगो के साथ सेक्स नहीं करना चाहिए , जिस के किये समाज अनुमति नाहे देता..

दोस्तों, यह सूत्र परिवार में अनैतिक संबंधों के विषय में स्वस्थ चर्चा करने के उद्देश्य से बनाया गया है. कृपया कोई किसी पर छींटाकसी ना करें. और केवल तर्कपूर्ण तरीके से अपने विचार यहाँ रखें.
आप सभी से अनुरोध है की इस सूत्र में कोई वाद विवाद ना करें अन्यथा यह सूत्र प्रबंधन द्वारा बंद कर दिया जाएगा.

dev b
13-01-2011, 09:48 PM
दोस्तों मेरे विचार से सेक्स अपने परिवार में या समंधिन्यो में , उन लोगो के साथ सेक्स नहीं करना चाहिए , जिस के किये समाज अनुमति नाहे देता

दोस्तों सारी दुनिया पड़ी है , जरुरी तो नहीं की पवित्र रिश्तो के लोगो के साथ ही सेक्स किया जाए ,

rudra_rng
13-01-2011, 10:01 PM
बिलकुल सही कहा डीके भाई...
पूरी दुनिया है इस काम के लिए अपना परिवार नहीं...
हर रिश्ते अपना अलग महत्व और मतलब है...
हमें उन्हें अपवित्र नहीं करना चहिये

dev b
13-01-2011, 10:04 PM
रूद्र जी पहले आप वरिस्थ सदस्य बनाने पर बधाई स्वीकार करे ....आप का अपना देव भारद्वाज
बिलकुल सही कहा डीके भाई...
पूरी दुनिया है इस काम के लिए अपना परिवार नहीं...
हर रिश्ते अपना अलग महत्व और मतलब है...
हमें उन्हें अपवित्र नहीं करना चहिये

rudra_rng
13-01-2011, 10:14 PM
बहुत बहुत धन्यवाद आपका देव भाई...


रूद्र जी पहले आप वरिस्थ सदस्य बनाने पर बधाई स्वीकार करे ....आप का अपना देव भारद्वाज

Pooja1990 QUEEN
13-01-2011, 10:18 PM
Aisa kaise kar dete hai log. aisa tabi hota hoga jab ladka or ladki dono raji hote hoge. .kuch to sharm aani chahiye.

akamboj2000
13-01-2011, 10:22 PM
Aisa kaise kar dete hai log. aisa tabi hota hoga jab ladka or ladki dono raji hote hoge. .kuch to sharm aani chahiye. bs ji kalyug aa gya hahaha vry funny

dev b
13-01-2011, 10:27 PM
Aisa kaise kar dete hai log. aisa tabi hota hoga jab ladka or ladki dono raji hote hoge. .kuch to sharm aani chahiye.

पूजा मेरी अच्छी दोस्त , मुद्दा तो ये है क़ि परिवार के ऐसे लोग जिन में मर्यादा क़ि जरुरत होती है उन सन संबंधो में सेक्स होना ही नहीं चाहिए , इस के लिए बाकी साड़ी दुनिया पडी है यार .....कृपया सभी मित्र अपने विचार de?........आप का अपना ...देव भारद्वाज

dev b
13-01-2011, 10:33 PM
Aisa kaise kar dete hai log. aisa tabi hota hoga jab ladka or ladki dono raji hote hoge. .kuch to sharm aani chahiye.

पूजा जी समाज में भेड चाल होती है , हम सब का फर्ज है क़ि हम समाज को अच्छाई क़ि और ले जाए ........कृपया सभी महिला मित्र भी अपनी राय दे .......आप का अपना देव भारद्वाज

dev b
13-01-2011, 10:35 PM
bs ji kalyug aa gya hahaha vry funny

कालरा साहब हम लोग अपने विचार तो रख ही सकते है ना , ये लोगो पर छोड़ा जाए क़ि लोग हम से कितना सहमत है

dev b
13-01-2011, 10:50 PM
कालरा साहब हम लोग अपने विचार तो रख ही सकते है ना , ये लोगो पर छोड़ा जाए क़ि लोग हम से कितना सहमत है

डाक्टर साहब आप कृपया हम सभी का मार्ग दर्शन करे

Miss Smarty Pants
14-01-2011, 02:25 AM
मुझे ये विचार बहुत ही घृणित लगता है. ऐसे लोग चाहें इसके पक्ष में कितनी दलीलें दे ये गलत ही है. अगर आपका खुद पे इतना भी कण्ट्रोल नहीं तब तो आप जानवर से भी बदतर हैं..:eek: किशोरावस्था में जब हमें उतना ज्ञान नहीं होता तो ऐसी भूलें माफ़ करने योग्य हो सकती है परन्तु जब आप वयस्क हैं अच्छा बुरा समझते है तो फिर ऐसी गन्दी कल्पनाएँ आपके सड़े हुए दिमाग की पहचान है, सॉरी कड़े शब्दों के लिए पर सच में मुझे ऐसे लोगो से नफरत है!:mad:

dev b
14-01-2011, 02:27 AM
मित्र मेरे विचार से सेक्स इन्स्सन क़ि भौतिक आवश्यकता है , परन्तु रिश्तो का अपना महत्व होता है . इस लिए हम को रिश्तो की मर्यादा को ध्यान मै रख कर ही कोई काम करना चाहिए
बिलकुल सही कहा डीके भाई...
पूरी दुनिया है इस काम के लिए अपना परिवार नहीं...
हर रिश्ते अपना अलग महत्व और मतलब है...
हमें उन्हें अपवित्र नहीं करना चहिये

dev b
14-01-2011, 02:29 AM
प्रिय मित्र मै आप से सहमत हू परन्तु घ्रणा पाप से करनी चाहिए पापी से नहीं
मुझे ये विचार बहुत ही घृणित लगता है. ऐसे लोग चाहें इसके पक्ष में कितनी दलीलें दे ये गलत ही है. अगर आपका खुद पे इतना भी कण्ट्रोल नहीं तब तो आप जानवर से भी बदतर हैं..:eek: किशोरावस्था में जब हमें उतना ज्ञान नहीं होता तो ऐसी भूलें माफ़ करने योग्य हो सकती है परन्तु जब आप वयस्क हैं अच्छा बुरा समझते है तो फिर ऐसी गन्दी कल्पनाएँ आपके सड़े हुए दिमाग की पहचान है, सॉरी कड़े शब्दों के लिए पर सच में मुझे ऐसे लोगो से नफरत है!:mad:

Miss Smarty Pants
14-01-2011, 02:36 AM
प्रिय मित्र मै आप से सहमत हू परन्तु घ्रणा पाप से करनी चाहिए पापी से नहीं

हाँ कोशिश तो करती हूँ लेकिन कभी कभी पाप और पापी को अलग करना मुश्किल होता है.:p

dev b
14-01-2011, 02:38 AM
आप के बात बिलकुल ठीक है मित्र हम को बस प्रयास करना चाहिए
हाँ कोशिश तो करती हूँ लेकिन कभी कभी पाप और पापी को अलग करना मुश्किल होता है.:p

dev b
14-01-2011, 02:44 AM
बिलकुल सही कहा आप ने अगर १ वयस्क इंसान को अपने पर नियंत्रण नहीं है तो पशु और इंसान मै अंतर क्या हुआ
मुझे ये विचार बहुत ही घृणित लगता है. ऐसे लोग चाहें इसके पक्ष में कितनी दलीलें दे ये गलत ही है. अगर आपका खुद पे इतना भी कण्ट्रोल नहीं तब तो आप जानवर से भी बदतर हैं..:eek: किशोरावस्था में जब हमें उतना ज्ञान नहीं होता तो ऐसी भूलें माफ़ करने योग्य हो सकती है परन्तु जब आप वयस्क हैं अच्छा बुरा समझते है तो फिर ऐसी गन्दी कल्पनाएँ आपके सड़े हुए दिमाग की पहचान है, सॉरी कड़े शब्दों के लिए पर सच में मुझे ऐसे लोगो से नफरत है!:mad:

Bhawani7000
14-01-2011, 06:24 AM
सही बात है एक घर तो डायन भी छोडती हेै फिर तो वो हमारे घरवाले है परिवार के सदस्यों के साथ सैक्स उचित नहीं है

Ranveer
14-01-2011, 04:46 PM
दोस्तों मै आप लोगों के विचार से खुश हुआ....................... चलो अन्तर्वासना में आनेवाले कुछ लोग तो इन्सिस्ट सेक्स को गलत मानतें हैं .............

Ranveer
14-01-2011, 04:51 PM
बहुत बढ़िया सूत्र शुरू किया है भाई .......इस पर बहस होना ही चाहिए

meet6301
14-01-2011, 05:01 PM
mere hisab se ye to apni-apni soch par nirbhar karta hai ki ham apne pariwar me ye kare ya na kare.

mai apni baat kehta hu... mai khud apni mameri sis. se jab bhi milta hu uske sath ye karta hu or vo bhi mera sath deti hai.

isme ham dono ki rajamandi hoti or hame accha lagta hai.












agar ye galat hai to bataiye me kya karu????

prithviparmar
14-01-2011, 05:11 PM
apny perivar logo k shaat aisa nahe karna chiye
or aisa hota be nahe ...

Ranveer
14-01-2011, 05:12 PM
गलत तो गलत ही है भाई ...चाहे हम कितना तर्क दें...

dev b
14-01-2011, 05:26 PM
प्रिय मित्र हमारा समाज १ बड़े बदलाव की और अग्रसर है परन्तु वो बदलाव समाज मे फैले दुर्गुणों को दूर करने के लिए होने चाहिए , मगर आज देखा ये जा रहा है की बदलाव दुर्गुणों को बढ़ावा दे रहा है , ऐसे मे हम सभी प्रबुद्ध वर्का दायित्व है कि समाज को सही दिशा में ले जाए वरना आने वाली पीढी हम को कभी माफ़ नहीं करेगी
बहुत बढ़िया सूत्र शुरू किया है भाई .......इस पर बहस होना ही चाहिए

dev b
14-01-2011, 05:35 PM
मित्र अगर गलती से भावेश में आ कर अगर आप के अपनी ममेरी बहन से सेक्स सम्बन्ध हो गए है तो अभी भी आप अपनी गलती को सुधार सकते है
mere hisab se ye to apni-apni soch par nirbhar karta hai ki ham apne pariwar me ye kare ya na kare.

mai apni baat kehta hu... mai khud apni mameri sis. se jab bhi milta hu uske sath ye karta hu or vo bhi mera sath deti hai.

isme ham dono ki rajamandi hoti or hame accha lagta hai.












agar ye galat hai to bataiye me kya karu????

rudra_rng
14-01-2011, 09:59 PM
बिलकुल सही कहा आपने भाई...
अगर हम ये जानते है की हमारा कुछ किया हुआ गलती है और हम उसे बार बार दोहराते है तो वो गलत है...
वो किसी बी कीमत में सही हो नहीं सकता

मित्र अगर गलती से भावेश में आ कर अगर आप के अपनी ममेरी बहन से सेक्स सम्बन्ध हो गए है तो अभी भी आप अपनी गलती को सुधार सकते है

Dr.Ashusingh
14-01-2011, 11:19 PM
डाक्टर साहब आप कृपया हम सभी का मार्ग दर्शन करे
मेरे प्यारे दोस्त ..देव..माफ करना..लेट हो गया ..पर अब सब लोगो के विचार पढने का सॊभाग्य प्राप्त हुआ हॆ..तो अब जरा सब को पढ लू..तभी विचारो का आदा्न प्रदान सम्भव हे..

Dr.Ashusingh
14-01-2011, 11:47 PM
लोगो के विचार पढने का सॊभाग्य मिला..आभार..अच्छा लगा कि आज भी लोग गलत को गलत मानते हे...देव तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो मिल ही गया होगा कि ये अनुचित हे..अब बात करते हॆ कि आखिर क्यो ऎसा होता हॆ..दोस्तो प्यार व वासना में बहुत थोडा अन्तर होता हॆ..एक मां ऒर बेटे के बीच..बहन ऒर भाई के बीच एक प्यार ऒर लगाव होता हॆ..एक बेटे हमेशा अपनी मां सबसे प्यारी होती हॆ..वही मां को भी अपने बेटे से सुन्दर किसी का बेटा नही लगता....ये एक लगाव प्यार की वजह से होता हॆ....एक बहन जितने अच्छॆ से अपने भाई को जानती हॆ व एक भाई जितने अच्छे से अपनी बहन को जानता हॆ उतना वह किसी अन्य लडकी को शादी के पहले नही जानता..कई बार जाने अनजाने मे एक दूसरे के य़ॊन अंग भी देखना पड जाता हॆ...जव य़ॊन उत्तेजना होती हे..तो दिमाग ये सोचना बन्द कर देता हॆ कि क्या अच्छा हॆ क्या बुरा...ऒर जब..सामाजिक मर्यादा ...परम्परा ...सस्कार,,.ये सब खत्म होने के कगार पर हो .तब वही लगाव व प्यार वासना मे बदल जाती हॆ..ऒर इस आग मे घी का काम करती हॆ..कुछ इन्सेक्ट कहानिया....

dev b
15-01-2011, 12:41 AM
आप ने बिलकुल थी कहा , गलत तो गलत है , गलत को ठीक ठहराने का प्रयास कुतर्क होता है और कुतर्क करने से गलत ठीक नहीं हो सकता
गलत तो गलत ही है भाई ...चाहे हम कितना तर्क दें...

dev b
15-01-2011, 12:47 AM
डॉ आशु जी आप ने बिलकुल ठीक बोला , परन्तु असली इंसान वही है , जो वासना और प्यार में अंतर करते हुए अपनी मर्यादा में रहे , वरना इंसान और जानवर में अंतर कन्हा रह जाएगा . समाज के प्रबुद्ध नागरिक होने के नाते हमारा फर्ज बनता है की हम सभी समाज के अच्छे मूल्यों की रक्षा करते हुए समाज को अच्छी दिशा की और ले जाए .......आप का अपना देव भारद्वाज
लोगो के विचार पढने का सॊभाग्य मिला..आभार..अच्छा लगा कि आज भी लोग गलत को गलत मानते हे...देव तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो मिल ही गया होगा कि ये अनुचित हे..अब बात करते हॆ कि आखिर क्यो ऎसा होता हॆ..दोस्तो प्यार व वासना में बहुत थोडा अन्तर होता हॆ..एक मां ऒर बेटे के बीच..बहन ऒर भाई के बीच एक प्यार ऒर लगाव होता हॆ..एक बेटे हमेशा अपनी मां सबसे प्यारी होती हॆ..वही मां को भी अपने बेटे से सुन्दर किसी का बेटा नही लगता....ये एक लगाव प्यार की वजह से होता हॆ....एक बहन जितने अच्छॆ से अपने भाई को जानती हॆ व एक भाई जितने अच्छे से अपनी बहन को जानता हॆ उतना वह किसी अन्य लडकी को शादी के पहले नही जानता..कई बार जाने अनजाने मे एक दूसरे के य़ॊन अंग भी देखना पड जाता हॆ...जव य़ॊन उत्तेजना होती हे..तो दिमाग ये सोचना बन्द कर देता हॆ कि क्या अच्छा हॆ क्या बुरा...ऒर जब..सामाजिक मर्यादा ...परम्परा ...सस्कार,,.ये सब खत्म होने के कगार पर हो .तब वही लगाव व प्यार वासना मे बदल जाती हॆ..ऒर इस आग मे घी का काम करती हॆ..कुछ इन्सेक्ट कहानिया....

akayemm
15-01-2011, 10:16 PM
पारिवारिक सम्बन्ध
मित्रों , मैं विस्मित हूं संकीर्ण/सीमित विचारों को पढ़ कर . संकीर्ण/सीमित इस लिए कि अधिकतर विचार बिना तर्क हैं . कुछ लोग चरित्र की दुहाई दे रहें हैं बिना सोचे समझे कि क्या इस मंच पर विचरण करना अच्छे चरित्र का प्रमाण है ? क्या फिर चरित्रवान होने की निशानी है वैचारिक रूप से परागामी होना ? जैसा कि इस मंच पर आने वाला हर व्यक्ति है . अभी तक किसी भी माई के लाल (अथवा लाली) ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है कि अगर हम कहानियों में पूर्ण स्थान दे सकतें हैं और ऐसी कहानियां पढ़ सकतें हैं जो पारिवारिक संबंधों पर आधारित हैं तो ऐसे विचारों को स्थान क्यों नहीं मिल सकता इस संभाग में ? क्या ऐसी पारिवारिक संबंधों पर आधारित प्रत्येक कहानी का लेखक/लेखिका समालोचना की अपेक्षा नहीं करता/करती ? क्या वे सब तारीफ़ की आशा नहीं करते ? और क्या हम उनके प्रयासों को सराहते नहीं हैं ? और जन मानस को देखते हुए ही मंच के संचालकों ने एक विशिष्ट स्थान दिया है उन कहानियों को . क्या आप इस तथ्य को नकारना चाहते हैं ?
एक और तर्क देता हूं . क्या अन्य यौन प्रक्रिया पर आधारित कहानियां और ‘गर्म मसाला ‘ के विभिन्न सूत्र पाठकों को प्रेरित करते हैं चरित्रवान बनने के लिए ? यदि हाँ , तो ये मंच और इस जैसे लाखों और मंच भी विद्यालयों में एक आवश्यक विषय के रूप में प्रारंभ होने चाहिए , और इन्हें ‘केवल वयस्कों’ की श्रेणी में से निकाल देना चाहिए . इस प्रकार के क्रिया कलापों को दूरदर्शन के माध्यम से भी जनता में प्रचलित करना चाहिये !
इस तर्क पर पर भी विचार करें कि क्या अब तक किसी भी मंच ने सफलतापूर्वक प्रेरित किया है आपको वो करने के लिए जो आप नहीं करना चाहते थे ?
हाँ , ये तो हो सकता है कि कोई मंच सहायक सिद्ध हुआ हो आपके किसी मंतव्य को सफल करने में . और यही है इस ज्ञान प्राप्ति की आधुनिक तकनीक का कमाल !
तो क्या पारिवारिक यौन संबंधों पर टिप्पणियां पढने से ही परिवार का वातावरण दूषित हो जायेगा ? मैं हर आगंतुक से पूछता हूं , कि क्या आप ऐसा मानते हैं कि आपके सिवाय आपके किसी भी परिवार वाले को नहीं पता कि इस मंच जैसे कई मंच हैं साइबर की दुनियाँ में ? क्या उन सब जगह विचरण करने से उनके चरित्र का नाश नहीं हो रहा ? और यदि उनको नहीं पता , फिर चिंता किस बात की ? तो भला ये मंच भी उन पर कैसे असर करेगा ? और यदि ऐसे अन्य प्रकार के मंचों पर विचरण करने बाद भी उनका चरित्र सही सलामत है, तो ये बेचारा अकेला मंच कैसे बिगाड़ देगा आपके परिवार के सदस्यों का उच्च चरित्र ?
तो मित्रों ! कृपया विचारिये, गुनिये , बुद्धिमत्ता के साथ , मात्र बुराइ करने के उद्देश्य से नहीं ! क्यों कि इस संसार में सम्पूर्ण रूप से कुछ भी अच्छा या कुछ भी बुरा नहीं होता है , सब कुछ सापेक्षिक है ! --- अनिल

dev b
16-01-2011, 12:08 AM
मित्र अनिल जी ये सूत्र बनाने का मेरा मकसद ही यहाँ था , की हम सब मिल कर अपने समाज को एक अच्छी दिशा की और ले जाए . हमारे समाज में अछाईया और बुराइया दोनों है , परन्तु इस सूत्र का मकसद सिर्फ इतना है की हम सब इस बारे मे विमर्श करे की जब सारी दुनिया पडी है तो जरुरी तो नहीं की अपने परिवार के मर्यादित संबंधो वाले शक्श के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाए जाए .ना तो हम को अपने चरित्र के प्रमाण पत्र देने की आवश्यकता हे और ना ही हम किसी और से उस के चरित्र का प्रमाण पत्र मांग रहे है . साइबर की दुनिया में हर तरह का मसाला मौजूद है , परन्तु हम अपना १ ऐसा अच्छा प्रयास तो कर ही सकते है जो किसी की मानसिकता को अच्छाई की और ले जाए ...........आप सब का अपना देव भारद्वाज

पारिवारिक सम्बन्ध
मित्रों , मैं विस्मित हूं संकीर्ण/सीमित विचारों को पढ़ कर . संकीर्ण/सीमित इस लिए कि अधिकतर विचार बिना तर्क हैं . कुछ लोग चरित्र की दुहाई दे रहें हैं बिना सोचे समझे कि क्या इस मंच पर विचरण करना अच्छे चरित्र का प्रमाण है ? क्या फिर चरित्रवान होने की निशानी है वैचारिक रूप से परागामी होना ? जैसा कि इस मंच पर आने वाला हर व्यक्ति है . अभी तक किसी भी माई के लाल (अथवा लाली) ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है कि अगर हम कहानियों में पूर्ण स्थान दे सकतें हैं और ऐसी कहानियां पढ़ सकतें हैं जो पारिवारिक संबंधों पर आधारित हैं तो ऐसे विचारों को स्थान क्यों नहीं मिल सकता इस संभाग में ? क्या ऐसी पारिवारिक संबंधों पर आधारित प्रत्येक कहानी का लेखक/लेखिका समालोचना की अपेक्षा नहीं करता/करती ? क्या वे सब तारीफ़ की आशा नहीं करते ? और क्या हम उनके प्रयासों को सराहते नहीं हैं ? और जन मानस को देखते हुए ही मंच के संचालकों ने एक विशिष्ट स्थान दिया है उन कहानियों को . क्या आप इस तथ्य को नकारना चाहते हैं ?
एक और तर्क देता हूं . क्या अन्य यौन प्रक्रिया पर आधारित कहानियां और ‘गर्म मसाला ‘ के विभिन्न सूत्र पाठकों को प्रेरित करते हैं चरित्रवान बनने के लिए ? यदि हाँ , तो ये मंच और इस जैसे लाखों और मंच भी विद्यालयों में एक आवश्यक विषय के रूप में प्रारंभ होने चाहिए , और इन्हें ‘केवल वयस्कों’ की श्रेणी में से निकाल देना चाहिए . इस प्रकार के क्रिया कलापों को दूरदर्शन के माध्यम से भी जनता में प्रचलित करना चाहिये !
इस तर्क पर पर भी विचार करें कि क्या अब तक किसी भी मंच ने सफलतापूर्वक प्रेरित किया है आपको वो करने के लिए जो आप नहीं करना चाहते थे ?
हाँ , ये तो हो सकता है कि कोई मंच सहायक सिद्ध हुआ हो आपके किसी मंतव्य को सफल करने में . और यही है इस ज्ञान प्राप्ति की आधुनिक तकनीक का कमाल !
तो क्या पारिवारिक यौन संबंधों पर टिप्पणियां पढने से ही परिवार का वातावरण दूषित हो जायेगा ? मैं हर आगंतुक से पूछता हूं , कि क्या आप ऐसा मानते हैं कि आपके सिवाय आपके किसी भी परिवार वाले को नहीं पता कि इस मंच जैसे कई मंच हैं साइबर की दुनियाँ में ? क्या उन सब जगह विचरण करने से उनके चरित्र का नाश नहीं हो रहा ? और यदि उनको नहीं पता , फिर चिंता किस बात की ? तो भला ये मंच भी उन पर कैसे असर करेगा ? और यदि ऐसे अन्य प्रकार के मंचों पर विचरण करने बाद भी उनका चरित्र सही सलामत है, तो ये बेचारा अकेला मंच कैसे बिगाड़ देगा आपके परिवार के सदस्यों का उच्च चरित्र ?
तो मित्रों ! कृपया विचारिये, गुनिये , बुद्धिमत्ता के साथ , मात्र बुराइ करने के उद्देश्य से नहीं ! क्यों कि इस संसार में सम्पूर्ण रूप से कुछ भी अच्छा या कुछ भी बुरा नहीं होता है , सब कुछ सापेक्षिक है ! --- अनिल

Ranveer
16-01-2011, 01:44 AM
पारिवारिक सम्बन्ध
मित्रों , मैं विस्मित हूं संकीर्ण/सीमित विचारों को पढ़ कर . संकीर्ण/सीमित इस लिए कि अधिकतर विचार बिना तर्क हैं . कुछ लोग चरित्र की दुहाई दे रहें हैं बिना सोचे समझे कि क्या इस मंच पर विचरण करना अच्छे चरित्र का प्रमाण है ? क्या फिर चरित्रवान होने की निशानी है वैचारिक रूप से परागामी होना ? जैसा कि इस मंच पर आने वाला हर व्यक्ति है . अभी तक किसी भी माई के लाल (अथवा लाली) ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है कि अगर हम कहानियों में पूर्ण स्थान दे सकतें हैं और ऐसी कहानियां पढ़ सकतें हैं जो पारिवारिक संबंधों पर आधारित हैं तो ऐसे विचारों को स्थान क्यों नहीं मिल सकता इस संभाग में ? क्या ऐसी पारिवारिक संबंधों पर आधारित प्रत्येक कहानी का लेखक/लेखिका समालोचना की अपेक्षा नहीं करता/करती ? क्या वे सब तारीफ़ की आशा नहीं करते ? और क्या हम उनके प्रयासों को सराहते नहीं हैं ? और जन मानस को देखते हुए ही मंच के संचालकों ने एक विशिष्ट स्थान दिया है उन कहानियों को . क्या आप इस तथ्य को नकारना चाहते हैं ?
एक और तर्क देता हूं . क्या अन्य यौन प्रक्रिया पर आधारित कहानियां और ‘गर्म मसाला ‘ के विभिन्न सूत्र पाठकों को प्रेरित करते हैं चरित्रवान बनने के लिए ? यदि हाँ , तो ये मंच और इस जैसे लाखों और मंच भी विद्यालयों में एक आवश्यक विषय के रूप में प्रारंभ होने चाहिए , और इन्हें ‘केवल वयस्कों’ की श्रेणी में से निकाल देना चाहिए . इस प्रकार के क्रिया कलापों को दूरदर्शन के माध्यम से भी जनता में प्रचलित करना चाहिये !
इस तर्क पर पर भी विचार करें कि क्या अब तक किसी भी मंच ने सफलतापूर्वक प्रेरित किया है आपको वो करने के लिए जो आप नहीं करना चाहते थे ?
हाँ , ये तो हो सकता है कि कोई मंच सहायक सिद्ध हुआ हो आपके किसी मंतव्य को सफल करने में . और यही है इस ज्ञान प्राप्ति की आधुनिक तकनीक का कमाल !
तो क्या पारिवारिक यौन संबंधों पर टिप्पणियां पढने से ही परिवार का वातावरण दूषित हो जायेगा ? मैं हर आगंतुक से पूछता हूं , कि क्या आप ऐसा मानते हैं कि आपके सिवाय आपके किसी भी परिवार वाले को नहीं पता कि इस मंच जैसे कई मंच हैं साइबर की दुनियाँ में ? क्या उन सब जगह विचरण करने से उनके चरित्र का नाश नहीं हो रहा ? और यदि उनको नहीं पता , फिर चिंता किस बात की ? तो भला ये मंच भी उन पर कैसे असर करेगा ? और यदि ऐसे अन्य प्रकार के मंचों पर विचरण करने बाद भी उनका चरित्र सही सलामत है, तो ये बेचारा अकेला मंच कैसे बिगाड़ देगा आपके परिवार के सदस्यों का उच्च चरित्र ?
तो मित्रों ! कृपया विचारिये, गुनिये , बुद्धिमत्ता के साथ , मात्र बुराइ करने के उद्देश्य से नहीं ! क्यों कि इस संसार में सम्पूर्ण रूप से कुछ भी अच्छा या कुछ भी बुरा नहीं होता है , सब कुछ सापेक्षिक है ! --- अनिल

चलिए हम मान लेते हैं की सब कुछ सापेक्ष है...अछा बुरा कुछ नहीं होता...तो इस बात से आप क्या चाहतें हैं की इन्सेस्ट सेक्स को हम मान्यता दे दें...हम जानवरों से इसलिए अलग है क्योंकि हमने बहुत सोच समझ कर हर क्षेत्र में नियम कानून बनायें हैं ...अगर आपकी बात मन ले तो कैसी हो जाएगी ये दुनिया....दूसरी बात इन्सेस्ट कहानियां पढना एक गलत सोच को बढावा देता है मै मानता हूँ...लेकिन यह केवल मस्ती के लिए पढ़ा जाता है और उसे तुरंत भुला दिया जाता है तो यह उतनी बड़ी विकृति नहीं है......ऐसे तो हम गुस्से में किसी को गाली दे देते हैं लेकिन अगर किसी को ठन्डे दिमाग से मारतें है तो यह विकृति है...उसी तरह इन्सेस्ट सेक्स करना भी नैतिकता और मानवता के विपरीत है....

Awara.ladka
16-01-2011, 01:56 AM
दोस्तों मेरे विचार से सेक्स अपने परिवार में या समंधिन्यो में , उन लोगो के साथ सेक्स नहीं करना चाहिए , जिस के किये समाज अनुमति नाहे देता

duniya kam pad gayi thi k????????//bahar muh maro kamino

dev b
16-01-2011, 02:03 AM
मित्र मै आप से सहमत hoo
चलिए हम मान लेते हैं की सब कुछ सापेक्ष है...अछा बुरा कुछ नहीं होता...तो इस बात से आप क्या चाहतें हैं की इन्सेस्ट सेक्स को हम मान्यता दे दें...हम जानवरों से इसलिए अलग है क्योंकि हमने बहुत सोच समझ कर हर क्षेत्र में नियम कानून बनायें हैं ...अगर आपकी बात मन ले तो कैसी हो जाएगी ये दुनिया....दूसरी बात इन्सेस्ट कहानियां पढना एक गलत सोच को बढावा देता है मै मानता हूँ...लेकिन यह केवल मस्ती के लिए पढ़ा जाता है और उसे तुरंत भुला दिया जाता है तो यह उतनी बड़ी विकृति नहीं है......ऐसे तो हम गुस्से में किसी को गाली दे देते हैं लेकिन अगर किसी को ठन्डे दिमाग से मारतें है तो यह विकृति है...उसी तरह इन्सेस्ट सेक्स करना भी नैतिकता और मानवता के विपरीत है....

akayemm
16-01-2011, 12:55 PM
निकट सम्बन्धियों के साथ यौन सम्बन्ध

मित्रों , मैं एक बात पर हैरान हूं . कि कोई भी मित्र इस बात पर टिप्पणी नहीं कर रहा है जो मैंने इस मंच पर प्रेषित होने वाली कहानियों के सन्दर्भ में लिखी है ! आप लोग अच्छे बुरे की दुहाई दे रहें हैं ! मैं आप सब से , मतलब सब से , पूछता हूं कि बताएं निम्न लिखित कहानियों के पढने में कौन सी भलाई है ,
१. ननद का जेठ और उसका दोस्त
२. ड्राइवर और नौकर से चुदी
३. फार्महाउस में मम्मी
४. एकाकीपन में खुश
५. नौकर से चुदवाया आदि आदि , प्रथम प्रकार में , और अब परिवार में ...
६. चचेरी बहन से प्यार
७. जीजू ने मेरी सील तोडी
८. मान भी जाओ बहु
९. भाभी के पैरों का दर्द
१०. बुआ की प्यास
११. मेरी माँ चुद गयी
१२. बारिश और दीदी ...... और कितनी कहानियां गिनवाऊं ?
क्या ये सब चरित्र निर्माण के लिए लिखी गयी हैं ? इनमें कौनसी धार्मिकता दर्शाई गयी है जिससे कि मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी , आपकी और आपके परिवार के सदस्यों की. ? कृपया गंभीरता से सोचिये , विवेक द्वारा न कि क्षणिक आवेश के वशीभूत हो कर ! मेरा इशारा इम्पल्सिव टिप्पणियों की ओर है !.
यदि इन दोनों प्रकार की कथाओं को स्थान मिल सकता है तो इन कथाओं से सम्बंधित भावनाओं पर किसी सूत्र रूप में वार्तालाप करने पर विरोध क्यों ? विवाद क्यों ? अतः विनम्र आग्रह है कि विरोध केवल विरोध के लिए न करे . जो भी विचार इस पटल पर रखें वे सब इस अन्तर्वासना मंच की सम्पूर्ण रूप रेखा के प्रारूप के अनुसार हों ! ऐसी मेरी हार्दिक कामना है .

शायद आप सब भूल रहें है कि इस अन्तर्वासना मच पर दो मुख्य उप मंच है एक , ‘ गर्म मसाला ‘ और दूसरा है , ‘ सामान्य मंच ‘ और इस दूसरे मंच में सामान्य सामग्री के अंतर्गत हर प्रकार भली बातें होती हैं . और जहाँ वयस्क सामग्री की अनुमति नहीं है .

ऐसा प्रतीत होता है कि विरोधियों में से किसी ने भी ‘ सामान्य मंच ‘ के उप मंच के टाइटल अथवा ‘मुख्य विषय ’ तक नहीं पढ़े हैं ! ऐसे मित्रों की जानकारी के लिए बता दूं कि ये विषय हैं , मेरा भारत , विश्व दर्शन , हमारा स्वास्थ्य , साहित्य एवं ज्ञान की बातें , खेल खिलाड़ी , तकनीकी जानकारी , पाक कला , और आओ समय बिताएं
क्या विरोधीगण बताएंगे .कि क्या उन लोगों ने इन विषयों में से किसी एक पर भी विचरण किया है ? शायद कुछ लोग ‘तकनीकी जानकारी ’ जैसे पटल पर गए हों , लेकिन बाकियों पर नहीं ! - अनिल

Ranveer
16-01-2011, 01:33 PM
निकट सम्बन्धियों के साथ यौन सम्बन्ध

मित्रों , मैं एक बात पर हैरान हूं . कि कोई भी मित्र इस बात पर टिप्पणी नहीं कर रहा है जो मैंने इस मंच पर प्रेषित होने वाली कहानियों के सन्दर्भ में लिखी है ! आप लोग अच्छे बुरे की दुहाई दे रहें हैं ! मैं आप सब से , मतलब सब से , पूछता हूं कि बताएं निम्न लिखित कहानियों के पढने में कौन सी भलाई है ,
१. ननद का जेठ और उसका दोस्त
२. ड्राइवर और नौकर से चुदी
३. फार्महाउस में मम्मी
४. एकाकीपन में खुश
५. नौकर से चुदवाया आदि आदि , प्रथम प्रकार में , और अब परिवार में ...
६. चचेरी बहन से प्यार
७. जीजू ने मेरी सील तोडी
८. मान भी जाओ बहु
९. भाभी के पैरों का दर्द
१०. बुआ की प्यास
११. मेरी माँ चुद गयी
१२. बारिश और दीदी ...... और कितनी कहानियां गिनवाऊं ?
क्या ये सब चरित्र निर्माण के लिए लिखी गयी हैं ? इनमें कौनसी धार्मिकता दर्शाई गयी है जिससे कि मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी , आपकी और आपके परिवार के सदस्यों की. ? कृपया गंभीरता से सोचिये , विवेक द्वारा न कि क्षणिक आवेश के वशीभूत हो कर ! मेरा इशारा इम्पल्सिव टिप्पणियों की ओर है !.
यदि इन दोनों प्रकार की कथाओं को स्थान मिल सकता है तो इन कथाओं से सम्बंधित भावनाओं पर किसी सूत्र रूप में वार्तालाप करने पर विरोध क्यों ? विवाद क्यों ? अतः विनम्र आग्रह है कि विरोध केवल विरोध के लिए न करे . जो भी विचार इस पटल पर रखें वे सब इस अन्तर्वासना मंच की सम्पूर्ण रूप रेखा के प्रारूप के अनुसार हों ! ऐसी मेरी हार्दिक कामना है .

शायद आप सब भूल रहें है कि इस अन्तर्वासना मच पर दो मुख्य उप मंच है एक , ‘ गर्म मसाला ‘ और दूसरा है , ‘ सामान्य मंच ‘ और इस दूसरे मंच में सामान्य सामग्री के अंतर्गत हर प्रकार भली बातें होती हैं . और जहाँ वयस्क सामग्री की अनुमति नहीं है .

ऐसा प्रतीत होता है कि विरोधियों में से किसी ने भी ‘ सामान्य मंच ‘ के उप मंच के टाइटल अथवा ‘मुख्य विषय ’ तक नहीं पढ़े हैं ! ऐसे मित्रों की जानकारी के लिए बता दूं कि ये विषय हैं , मेरा भारत , विश्व दर्शन , हमारा स्वास्थ्य , साहित्य एवं ज्ञान की बातें , खेल खिलाड़ी , तकनीकी जानकारी , पाक कला , और आओ समय बिताएं
क्या विरोधीगण बताएंगे .कि क्या उन लोगों ने इन विषयों में से किसी एक पर भी विचरण किया है ? शायद कुछ लोग ‘तकनीकी जानकारी ’ जैसे पटल पर गए हों , लेकिन बाकियों पर नहीं ! - अनिल





भाई मेरे आप इस सूत्र को भटका रहें हैं ...यहाँ अन्तर्वासना की कहानियों के बारे में नहीं ...केवल पारिवारिक सम्बन्ध के बारे में विचार माँगा जा रहा है...आप अपनी सहमति या असहमति रख सकतें हैं...चलिए मै ये मान लेता हूँ की मेरा चरित्र अच्छा नहीं है.....फिर भी अपने विचार तो रख ही सकता हूँ..

akayemm
16-01-2011, 01:49 PM
....चलिए मै ये मान लेता हूँ की मेरा चरित्र अच्छा नहीं है.......मित्र , तो मेरा चरित्र भी कौन सा भला है ? और इस 'गर्म मसाला' जैसे मंच पर विचरने वाले हर व्यक्ति का चरित्र भी उतना ही भला या गिरा हुआ है जितना कि मेरा या आपका ! वैसे आपने अभी भी मेरी वो पंक्ति नहीं पढ़ी विवेक पूर्वक जहां मैंने ये लिखा है कि यदि ऐसी भावानाएं कहानियों के रूप में प्रेषित हो सकती हैं तो ऐसे विचार सूत्र के रूप में क्यों नहीं ? इसे विषय से भटकना नहीं कहते , मित्र . ये कहलाता है उसी विषय को दूसरे रूप में कहना, जैसे रंगीन महफ़िल में जो आप शब्दों में कहते हैं 'मनमोहक चित्र ' नामक स्तंभ में वही भावना चित्रों द्वारा और ' चलचित्र' में चलचित्रो द्वारा व्यक्त करतें हैं . विषय वही लेकिन रूप और माध्यम विभिन्न . समझे मेरे दोस्त ! - अनिल ?

dev b
16-01-2011, 02:17 PM
इस फोरम के सभी करता--धर्ताओ से मेरा नम्र निवेदन है की जो लोग अपने परिवार के मर्यादित सम्बन्ध वालो से सेक्स की हिमायत रखते है उन को शालीन भाषा में समझा कर उन प्रिय मित्रो का मार्ग मार्ग दर्शान करे ताकि हमारा यानी हम सभी का फोरम समाज को आगे अच्छी दिशा में ले जाने में १ महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाए , मित्रो हम को न तो किसी को चरित्र प्रमाण पत्र देना है , और ना ही किसी से चरित्र प्रमाण पत्र लेना है , मित्रो में काम्या जी से सहमत हूँ अगर समाज में ऐसा होने लगेगा तो फिर जानवर और इंसान में अंतर ही कन्हा रह जाएगा , मित्रो अगर इंसान हम ऐसे लोगो को बोले तो कृपया बताये की हैवान किस को बोलेंगे ?मित्रो सारी दुनिया पडी है तो जरुरी तो नहीं की हम मर्यादित संबंधो की गरिमा को धूमिल करे ...................आप का अपना देव भारद्वाज

पारिवारिक सम्बन्ध
मित्रों , मैं विस्मित हूं संकीर्ण/सीमित विचारों को पढ़ कर . संकीर्ण/सीमित इस लिए कि अधिकतर विचार बिना तर्क हैं . कुछ लोग चरित्र की दुहाई दे रहें हैं बिना सोचे समझे कि क्या इस मंच पर विचरण करना अच्छे चरित्र का प्रमाण है ? क्या फिर चरित्रवान होने की निशानी है वैचारिक रूप से परागामी होना ? जैसा कि इस मंच पर आने वाला हर व्यक्ति है . अभी तक किसी भी माई के लाल (अथवा लाली) ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है कि अगर हम कहानियों में पूर्ण स्थान दे सकतें हैं और ऐसी कहानियां पढ़ सकतें हैं जो पारिवारिक संबंधों पर आधारित हैं तो ऐसे विचारों को स्थान क्यों नहीं मिल सकता इस संभाग में ? क्या ऐसी पारिवारिक संबंधों पर आधारित प्रत्येक कहानी का लेखक/लेखिका समालोचना की अपेक्षा नहीं करता/करती ? क्या वे सब तारीफ़ की आशा नहीं करते ? और क्या हम उनके प्रयासों को सराहते नहीं हैं ? और जन मानस को देखते हुए ही मंच के संचालकों ने एक विशिष्ट स्थान दिया है उन कहानियों को . क्या आप इस तथ्य को नकारना चाहते हैं ?
एक और तर्क देता हूं . क्या अन्य यौन प्रक्रिया पर आधारित कहानियां और ‘गर्म मसाला ‘ के विभिन्न सूत्र पाठकों को प्रेरित करते हैं चरित्रवान बनने के लिए ? यदि हाँ , तो ये मंच और इस जैसे लाखों और मंच भी विद्यालयों में एक आवश्यक विषय के रूप में प्रारंभ होने चाहिए , और इन्हें ‘केवल वयस्कों’ की श्रेणी में से निकाल देना चाहिए . इस प्रकार के क्रिया कलापों को दूरदर्शन के माध्यम से भी जनता में प्रचलित करना चाहिये !
इस तर्क पर पर भी विचार करें कि क्या अब तक किसी भी मंच ने सफलतापूर्वक प्रेरित किया है आपको वो करने के लिए जो आप नहीं करना चाहते थे ?
हाँ , ये तो हो सकता है कि कोई मंच सहायक सिद्ध हुआ हो आपके किसी मंतव्य को सफल करने में . और यही है इस ज्ञान प्राप्ति की आधुनिक तकनीक का कमाल !
तो क्या पारिवारिक यौन संबंधों पर टिप्पणियां पढने से ही परिवार का वातावरण दूषित हो जायेगा ? मैं हर आगंतुक से पूछता हूं , कि क्या आप ऐसा मानते हैं कि आपके सिवाय आपके किसी भी परिवार वाले को नहीं पता कि इस मंच जैसे कई मंच हैं साइबर की दुनियाँ में ? क्या उन सब जगह विचरण करने से उनके चरित्र का नाश नहीं हो रहा ? और यदि उनको नहीं पता , फिर चिंता किस बात की ? तो भला ये मंच भी उन पर कैसे असर करेगा ? और यदि ऐसे अन्य प्रकार के मंचों पर विचरण करने बाद भी उनका चरित्र सही सलामत है, तो ये बेचारा अकेला मंच कैसे बिगाड़ देगा आपके परिवार के सदस्यों का उच्च चरित्र ?
तो मित्रों ! कृपया विचारिये, गुनिये , बुद्धिमत्ता के साथ , मात्र बुराइ करने के उद्देश्य से नहीं ! क्यों कि इस संसार में सम्पूर्ण रूप से कुछ भी अच्छा या कुछ भी बुरा नहीं होता है , सब कुछ सापेक्षिक है ! --- अनिल

Pooja1990 QUEEN
16-01-2011, 02:47 PM
jab aisa india me hone lagega to pakistan me kya hoga.

dev b
16-01-2011, 03:03 PM
मेरी प्यारी मित्र पूजा जी हम को दुसरे के घर में कमेन्ट करने की बजाये अपने घर को दुरुस्त करना है . इस लिए कृपया अपने अमूल्य विचार दे
..........आप का अपना देव भारद्वाज
jab aisa india me hone lagega to pakistan me kya hoga.

kkbhati
16-01-2011, 04:30 PM
mere ek raay hei

kkbhati
16-01-2011, 04:38 PM
mei samjta hu ki samaj keval hamei bachpanse rataya gaya hei like abcd aur ye jaruri nahi ki samaj ka har niyame sahi ho app धर्म विशेष ko lejeye us me to incert galt nahi hei usme to chacha ki ladki se shadi hoti aaee hei to fri pura धर्म विशेष galt
aur bhi kai udharan hei app sab log soche

dev b
16-01-2011, 04:48 PM
प्रिय मित्र हम यंहा हिन्दू धर्म के बारे मे चर्चा कर रहे है
mei samjta hu ki samaj keval hamei bachpanse rataya gaya hei like abcd aur ye jaruri nahi ki samaj ka har niyame sahi ho app musalim samaj ko lejeye us me to incert galt nahi hei usme to chacha ki ladki se shadi hoti aaee hei to fri pura muslim samaj galt
aur bhi kai udharan hei app sab log soche

kkbhati
16-01-2011, 05:21 PM
mager mere pyare dost keval ek dharm se puri duniya ko dekhna galat hei
ur maei to ek hee dhar samjheta hu insaneyat aur samaj ko ek dharm se nahi chalta

dev b
16-01-2011, 07:00 PM
भाटी जी क्या इंसानियत -- धर्म के हिसाब से भी इस तरह के सम्बन्ध उचित है जिन से की संबंधो की मर्यादा धूमिल होती है
mager mere pyare dost keval ek dharm se puri duniya ko dekhna galat hei
ur maei to ek hee dhar samjheta hu insaneyat aur samaj ko ek dharm se nahi chalta

dev b
16-01-2011, 10:32 PM
इस सूत्र में काम्या जी व् डॉक्टर साहब के अमूल्य विचारों का इन्तजार है

Ranveer
16-01-2011, 11:20 PM
mager mere pyare dost keval ek dharm se puri duniya ko dekhna galat hei
ur maei to ek hee dhar samjheta hu insaneyat aur samaj ko ek dharm se nahi chalta

मुस्लिम समुदाय हो या हिन्दू या कोई और सभी में इसे गलत माना गया है ..biology ने भी इसे परमानित किया है..हाँ पर अलग अलग समाज अपने परिस्थिति के हिसाब से पारिवारिक संबंधो की सीमाएं तय की है..फिर भी किसी समाज में आज भी एक माँ बाप के बच्चों की शादी नहीं होती ...

dev b
16-01-2011, 11:49 PM
आप बिलकुल ठीक बोल रहे है मित्र , समाज के साथ २ विज्ञान ने भी ये सिद्ध किया है की ये गलत है
मुस्लिम समुदाय हो या हिन्दू या कोई और सभी में इसे गलत माना गया है ..biology ने भी इसे परमानित किया है..हाँ पर अलग अलग समाज अपने परिस्थिति के हिसाब से पारिवारिक संबंधो की सीमाएं तय की है..फिर भी किसी समाज में आज भी एक माँ बाप के बच्चों की शादी नहीं होती ...

Miss Smarty Pants
16-01-2011, 11:56 PM
mager mere pyare dost keval ek dharm se puri duniya ko dekhna galat hei
ur maei to ek hee dhar samjheta hu insaneyat aur samaj ko ek dharm se nahi chalta

मेरे ख्याल से आपको ये बोलने से पहले जीवविज्ञान और गुन्सुत्रीय बिमारियों के बारे में थोडा पढ़ लेना चाहिए. यह एक प्रमाणिक बात है की खून के रिश्तों से पैदा हुए बच्चों की genetic लाइन कमजोर होती है और इनसे इंसानी जींस में गड़बड़िया भी पैदा होती हैं. और कुछ चीजें चूँकि पहले से चली आ रही है मात्र इस कारण से सही नहीं हो जाती. इन्सान पहले इन्सान को ही खा लेता था इसका मतलब ये तो नहीं की आज के ज़माने में भी यह practice चालू रहे.

dev b
17-01-2011, 12:01 AM
आप बिलकुल ठीक बोल रही हो मित्र परिवर्तन समाज का नियम है , परन्तु परिवर्तन सकारात्मक होना चाहिए , जिस चीज को विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया हो वंहा शंका कँहा रह जाती है
मेरे ख्याल से आपको ये बोलने से पहले जीवविज्ञान और गुन्सुत्रीय बिमारियों के बारे में थोडा पढ़ लेना चाहिए. यह एक प्रमाणिक बात है की खून के रिश्तों से पैदा हुए बच्चों की genetic लाइन कमजोर होती है और इनसे इंसानी जींस में गड़बड़िया भी पैदा होती हैं. और कुछ चीजें चूँकि पहले से चली आ रही है मात्र इस कारण से सही नहीं हो जाती. इन्सान पहले इन्सान को ही खा लेता था इसका मतलब ये तो नहीं की आज के ज़माने में भी यह practice चालू रहे.

Miky
17-01-2011, 12:27 AM
दोस्तों बहुत ज्वलंत सवाल है मैं यह पूछता हूँ की क्या दुनिया में बाकि के लड़के या लड़किया खतम हो गयी है की आपको अपने रिश्तेदारों के साथ सेक्स करना पड़ता है हम एक ऐसे समाज में रहते है जहाँ ऐसे रिश्तों की इजाजत नहीं मिलती ऐसे सूत्र पोस्ट करके हम अपने समाज में गंदगी ही फैला रहे है.

Pooja1990 QUEEN
17-01-2011, 09:15 AM
agar jaldi shadi kara di jaye to isse bach sakte hai.

akamboj2000
17-01-2011, 09:32 AM
agar jaldi shadi kara di jaye to isse bach sakte hai.

पढ़ाई का बहाना कर के

akayemm
17-01-2011, 11:06 AM
............ देवी G-spot , पहले तो मेरी बधाई स्वीकार करे इतने सुन्दर नाम के चयन करने पर . :clap: .
आशा करता हूं आप पूर्ण रूप से अर्थ और महत्ता समझती हैं अपने इस नाम की और " यथा नाम तथा गुण " वाली कहावत को भी चरितार्थ करती होंगी ऐसी मेरी आशा और मनोकामना है . और ऐसा मानता हूं कि ये आपका इशारा है मेरे जैसे उन अनभिग्य मर्दों के लिए जो नारी को पढ़ नहीं पाते या उनकी संकेतावालियों से पूर्ण या आंशिक रूप से अनभिग्य होते हैं . मेरा धन्यवाद स्वीकार हो :salut: . अन्यंत्र आपके सन्देश पर टिप्पणी कर रहा हूं जो आपने इस सूत्र में प्रविष्टी # ५० पर की है . मेरी ओर से एक बार फिर :bloom: एवं :lips: - अनिल

akayemm
17-01-2011, 11:19 AM
मेरे ख्याल से आपको ये बोलने से पहले जीवविज्ञान और गुन्सुत्रीय बिमारियों के बारे में थोडा पढ़ लेना चाहिए. यह एक प्रमाणिक बात है की खून के रिश्तों से पैदा हुए बच्चों की genetic लाइन कमजोर होती है और इनसे इंसानी जींस में गड़बड़िया भी पैदा होती हैं. और कुछ चीजें चूँकि पहले से चली आ रही है मात्र इस कारण से सही नहीं हो जाती. इन्सान पहले इन्सान को ही खा लेता था इसका मतलब ये तो नहीं की आज के ज़माने में भी यह practice चालू रहे.
हे सुंदरी , आपकी बातें से काफी ज्ञान टपकता है . बधाई .
लेकिन कई बातें हैं जिन्हें आपने अनदेखा कर दिया है .
पहले मैं वन्य पशुओं को लेता हूं . उदाहरणार्थ , शेरों को लीजिए. मुखिया शेर यौन सम्बन्ध बनाता है अपनी पत्नि , सालियों और यहाँ तक कि पुत्री के साथ ! और ये तब तक चलता है जब तक कोई अन्य शेर इस मुखिया को अपदस्थ नहीं कर देता .
अब चिम्पांजी का ज़िक्र लें . वहाँ तो सेक्स ही जीने का एकमात्र कारण प्रतीत होता है. और वहाँ भी रिश्तों का कोई विचार नहीं होता.
आपने जिस मुख्य बात पर ध्यान नहीं दिया वो यह है कि यहाँ बात वंश बढ़ाने की नहीं हो रही जो कि अन्य प्राणी जगत के सन्दर्भ में होता है . प्राणी जगत में , शायद चिम्पांजी के सिवाय कोई भी प्राणी आनंद के लिए सेक्स नहीं करता ! और हाँ , सिवाय मानव जाति के !! वे सब संतान उत्पत्ति अथवा वंश बढ़ाने के उद्देश्य से ही सम्भोग करते हैं . इसी लिए मादा भी प्रयास करती है कि वे उस नर का बीज प्राप्त कर सके जो इस मादा को अच्छी से अच्छी संतान दे सके चाहे वो जो भी हो रिश्ते के विचार से !
अतः शायद आपका तर्क उस सन्दर्भ में ठीक हो सकता है .
वैसे एक बात और है जो उचित होगी इस सन्दर्भ में . शायद आप भी भली भांति जानती होंगी कि प्राणी जगत में भी जब किसी विशेष नस्ल को बढ़ाना या बनाना होता है तो पीडी दर पीढ़ी उसी सीमित परिवार में सम्भोग प्रक्रिया दोहराई जाती है .
लेकिन जब हम यौन क्रीड़ा को केवल आनंद के सन्दर्भ में लेतें हैं तो , मित्र , सभी समीकरण बदल जाते हैं !
इन्हें केवल सामाजिक दृष्टि और वैधानिक दृष्टि नहीं देखना चाहिए बल्कि व्यक्तिगत दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए !
एक मजेदार लेकिन अत्यंत आवश्यक तथ्य बताता हूं आपकी व् अन्य सब लोगो की जानकारी के लिए .
आपको शायद पता हो कि हिंदू लौ सन १९५६ में बना . और हिंदू विवाह क़ानून , १९५६ के अंतर्गत ये व्यवथा बनाई गयी कि वैध विवाह के लिए पुरुष ओर से ५ पीढियाँ और स्त्री ओर से ३ पीढ़ियों पहले तक पुरखे एक नहीं होने चाहिए. अधिक समझाने की ज़रूरत नहीं , क्यों कि मैं किसी अन्य बात कि इंगित करना चाहता हूं . क्या आप जानती है कि ये क़ानून पास होने से पहले क़ानून में इससे पहले किस प्रकार की परिपाटी को मान्यता थी ? ये थी पुरुष पक्ष में ७ और स्त्री पक्ष में ५ !!
तो बताइये क्या सही या क्या गलत है ?
और क्या आप और अन्य पाठक बता पायेगे सही-गलत की परिभाषा , जहां कि कई समाजो में प्रजातीय/अंतरजातीय विवाह इतने गलत माने जाते हैं कि विवाह करने वाले जोड़ों की हत्या तक कर दी जाती है ! और अभी तक क़ानून के ‘लंबे हाथ ‘ उन तक नहीं पहुँच पाए हैं .
तो हे रति क्रीड़ा की साम्राज्ञी G-spot ! आभारी होऊंगा यदि आप और आप जैसे कई अन्य अपने विचारों को इस पर्यवेक्ष में भी देखें . आपके G-spot होने का भक्त एवं दास - अनिल

dev b
17-01-2011, 12:26 PM
प्रिय मित्र नमस्कार , मै आप से केवल १ प्रश्न पूछना चाहूँगा की क्या आप सबन्धो की मर्यादाओ को नहीं मानते है , क्या आप अपनी बहन से राखी नहीं बंधवाते है , मै समाज के बनाए हर नियम को नहीं मानता , हमारे समाज में जो कुरीतिया है उन को बदलने की तो आवश्यकता है मित्र , परन्तु जो हमारे समाज की अछाईया है कृपया उन को बदलने की कोशिश ना करो मित्र , क्यों की ऐसे विचारों को पढ़ कर इंसान का दिमाग बदलता
है . प्रिय मित्र हम सब को मिल कर समाज को उन्नति की ओर ले कर जाना है .....मेरे प्यारे मित्र ये आप के कुतर्क है , और कुतर्क आप जैसे १ अच्छे इंसान को शोभा नहीं देते .........आप का अपना देव भारद्वाज

हे सुंदरी , आपकी बातें से काफी ज्ञान टपकता है . बधाई .
लेकिन कई बातें हैं जिन्हें आपने अनदेखा कर दिया है .
पहले मैं वन्य पशुओं को लेता हूं . उदाहरणार्थ , शेरों को लीजिए. मुखिया शेर यौन सम्बन्ध बनाता है अपनी पत्नि , सालियों और यहाँ तक कि पुत्री के साथ ! और ये तब तक चलता है जब तक कोई अन्य शेर इस मुखिया को अपदस्थ नहीं कर देता .
अब चिम्पांजी का ज़िक्र लें . वहाँ तो सेक्स ही जीने का एकमात्र कारण प्रतीत होता है. और वहाँ भी रिश्तों का कोई विचार नहीं होता.
आपने जिस मुख्य बात पर ध्यान नहीं दिया वो यह है कि यहाँ बात वंश बढ़ाने की नहीं हो रही जो कि अन्य प्राणी जगत के सन्दर्भ में होता है . प्राणी जगत में , शायद चिम्पांजी के सिवाय कोई भी प्राणी आनंद के लिए सेक्स नहीं करता ! और हाँ , सिवाय मानव जाति के !! वे सब संतान उत्पत्ति अथवा वंश बढ़ाने के उद्देश्य से ही सम्भोग करते हैं . इसी लिए मादा भी प्रयास करती है कि वे उस नर का बीज प्राप्त कर सके जो इस मादा को अच्छी से अच्छी संतान दे सके चाहे वो जो भी हो रिश्ते के विचार से !
अतः शायद आपका तर्क उस सन्दर्भ में ठीक हो सकता है .
वैसे एक बात और है जो उचित होगी इस सन्दर्भ में . शायद आप भी भली भांति जानती होंगी कि प्राणी जगत में भी जब किसी विशेष नस्ल को बढ़ाना या बनाना होता है तो पीडी दर पीढ़ी उसी सीमित परिवार में सम्भोग प्रक्रिया दोहराई जाती है .
लेकिन जब हम यौन क्रीड़ा को केवल आनंद के सन्दर्भ में लेतें हैं तो , मित्र , सभी समीकरण बदल जाते हैं !
इन्हें केवल सामाजिक दृष्टि और वैधानिक दृष्टि नहीं देखना चाहिए बल्कि व्यक्तिगत दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए !
एक मजेदार लेकिन अत्यंत आवश्यक तथ्य बताता हूं आपकी व् अन्य सब लोगो की जानकारी के लिए .
आपको शायद पता हो कि हिंदू लौ सन १९५६ में बना . और हिंदू विवाह क़ानून , १९५६ के अंतर्गत ये व्यवथा बनाई गयी कि वैध विवाह के लिए पुरुष ओर से ५ पीढियाँ और स्त्री ओर से ३ पीढ़ियों पहले तक पुरखे एक नहीं होने चाहिए. अधिक समझाने की ज़रूरत नहीं , क्यों कि मैं किसी अन्य बात कि इंगित करना चाहता हूं . क्या आप जानती है कि ये क़ानून पास होने से पहले क़ानून में इससे पहले किस प्रकार की परिपाटी को मान्यता थी ? ये थी पुरुष पक्ष में ७ और स्त्री पक्ष में ५ !!
तो बताइये क्या सही या क्या गलत है ?
और क्या आप और अन्य पाठक बता पायेगे सही-गलत की परिभाषा , जहां कि कई समाजो में प्रजातीय/अंतरजातीय विवाह इतने गलत माने जाते हैं कि विवाह करने वाले जोड़ों की हत्या तक कर दी जाती है ! और अभी तक क़ानून के ‘लंबे हाथ ‘ उन तक नहीं पहुँच पाए हैं .
तो हे रति क्रीड़ा की साम्राज्ञी G-spot ! आभारी होऊंगा यदि आप और आप जैसे कई अन्य अपने विचारों को इस पर्यवेक्ष में भी देखें . आपके G-spot होने का भक्त एवं दास - अनिल

Pooja1990 QUEEN
17-01-2011, 12:33 PM
Ye sutra apni rah se bhatak gaya hai.d

jdrdx
17-01-2011, 12:51 PM
Incest kahaniyan padhna aur use apne jivan me apnana alag alag baten hai, thik filmon ki tarah, jaise hum hero 100 manjhil ki building se khudte dekh khus hote hai par hum sach me ja kar kud nahi jate, isi tarah incest kahaniyon ka majha lijiiye, par use apni life me apply karne ki koshish mat kijiye. rahi baat muslim samaj ki usme sage bhai bahan me ese rishte nahi hote, islam ke mutabit alag alag maa-bap ke bacche bhai bahan nahi hote.

dev b
17-01-2011, 02:49 PM
प्रिय मित्र पूजा कृपया आप सूत्र को सही राह दिखाने में मदद करे .......आप का देव भारद्वाज
Ye sutra apni rah se bhatak gaya hai.d

dev b
17-01-2011, 02:57 PM
हां मित्र रियल लाइफ और कहानियों मे अंतर होता है , रियल में संबंधो में गरिमा बनी रहनी चाहिए
Incest kahaniyan padhna aur use apne jivan me apnana alag alag baten hai, thik filmon ki tarah, jaise hum hero 100 manjhil ki building se khudte dekh khus hote hai par hum sach me ja kar kud nahi jate, isi tarah incest kahaniyon ka majha lijiiye, par use apni life me apply karne ki koshish mat kijiye. rahi baat muslim samaj ki usme sage bhai bahan me ese rishte nahi hote, islam ke mutabit alag alag maa-bap ke bacche bhai bahan nahi hote.

draculla
17-01-2011, 04:17 PM
आप को क्या लगता है की यह सूत्र सही रस्ते पर आ सकता है.जहाँ पर आप सदस्य से उसकी राय पूछते हैं और बाद में जब कोई पारिवारिक सेक्स के पक्ष में अपनी राय रखता है तो आप उसे अपमानित और प्रवचन सुनाने लगते हैं.यदि इस तरह का व्यवहार सदस्यों के साथ करेगें तो जाहिर है की झगडा होगा ही और झगडा होगा तो सूत्र अपने जगह से हट ही जायेगा.यदि आप को ऐसे सदस्यों को सुधारना ही है तो उसके साथ बाचीत करें ना की उसे भला बुरा कहें.कुछ तो हैं की सदस्य को बुरा बोल देते हैं फिर ऐसा कहते हैं की हम तो ऐसा सदस्यों को सुधारने के लिए बोल रहे हैं.अरे भाई इस फोरम पर सभी वयस्क है और मेरे ख्याल से सभी को अपना भला बुरा सोचने का विवेक है.चलिए एक बात बताइए क्या आप ने इस तरह का सूत्र इसीलिए बनाया है की इस प्रकार के सदस्य को ढूंढ कर उसे अपमानित करें?


जहाँ तक मैंने देखा है की इस तरह के सूत्र हमेशा फोरम पर झगडा और सदस्यों के मन मुठाव का करण होते है.हम यहाँ पर मनोरंजन करने आते हैं ना की झगडा करने और ना ही विवाद के पडने के लिए.वैसे भी अब फोरम पर पारिवारिक सेक्स का अलग विभाग बन चूका है तो फिर सदस्यों को खुश होना चाहिए की अब उनके सामने ऐसे सूत्र नहीं आयेगें.यदि यदा कदा आप को ऐसे सूत्र मिल जाये तो आप शिकायत कर के उस सूत्र को उसकी सही जगह पर पंहुचा सकते हैं.


लेकिन मुझे लगत है की अलग जगह बना दे बात नहीं बनने वाली है.क्योकि हमने तो फोरम को सुधारने का बीड़ा उठा रखा है.कृपया बुरा ना मानियेगा.लेकिन कुछ सदस्य ऐसा ही कर रहे हैं.


मेरे इस प्रकार के कथन और मेरे सूत्रों को देखा कर मेरे बारे में अपनी कोई राय मत बनाइयेगा.क्योकि जो दिखता है वह जरुरी नहीं की सत्य ही हो.इसी बात पर आखें फिल्म का वह संवाद याद आता है “सत्य हमेशा कल्पना से विचित्र होता है.”अन्तर्वासना फोरम से मैं इसके कहानियों को ले कर जुड़ा हूँ.जहाँ पर ज्यादातर कहानी पारिवारिक सेक्स पर भी होता है.मुझे लगता है की ज्यादातर सदस्य इसीतरह जुड़े होगे.मैं यहाँ गलत भी हो सकता हूँ.मैं तो हमेशा यहाँ पर सिर्फ मनोरंजन के लिए ही आता हूँ.मनोरंजन करता हूँ और चला जाता हूँ.कुछ दिनों से मैं ऐसे दो सूत्र देख रहा हूँ.आज सोचा की चलो मैं भी अपनी राय रख ही दूँ.संक्षेप मैं बस इतना ही कहूँगा की कृपया जब किसी सदस्य से उसकी राय पूछते हैं तो उसी राय जानकर भला बुरा ना कहें.बस.
यदि आप को उन्हें सुधारने का इतना ही शौख हैं तो आप उसके साथ बातचीत कर के इसके पीछे की घटना जानकर उसे सम्जहने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन आप उस पर दबाब नहीं डाले.


धन्यवाद.

draculla
17-01-2011, 04:46 PM
नहीं मुझे पारिवारिक सेक्स पसंद नहीं है.लेकिन इस विषय पर बनी कहानी और कॉमिक्स पढने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है.
धन्यवाद.

Ranveer
17-01-2011, 10:24 PM
Ye sutra apni rah se bhatak gaya hai.d

आपने ऐसा क्यों कहा की यह सूत्र अपने रस्ते से भटक गया है

Miss Smarty Pants
18-01-2011, 02:52 AM
हे सुंदरी , आपकी बातें से काफी ज्ञान टपकता है . बधाई .
लेकिन कई बातें हैं जिन्हें आपने अनदेखा कर दिया है .
पहले मैं वन्य पशुओं को लेता हूं . उदाहरणार्थ , शेरों को लीजिए. मुखिया शेर यौन सम्बन्ध बनाता है अपनी पत्नि , सालियों और यहाँ तक कि पुत्री के साथ ! और ये तब तक चलता है जब तक कोई अन्य शेर इस मुखिया को अपदस्थ नहीं कर देता .
अब चिम्पांजी का ज़िक्र लें . वहाँ तो सेक्स ही जीने का एकमात्र कारण प्रतीत होता है. और वहाँ भी रिश्तों का कोई विचार नहीं होता.
आपने जिस मुख्य बात पर ध्यान नहीं दिया वो यह है कि यहाँ बात वंश बढ़ाने की नहीं हो रही जो कि अन्य प्राणी जगत के सन्दर्भ में होता है . प्राणी जगत में , शायद चिम्पांजी के सिवाय कोई भी प्राणी आनंद के लिए सेक्स नहीं करता ! और हाँ , सिवाय मानव जाति के !! वे सब संतान उत्पत्ति अथवा वंश बढ़ाने के उद्देश्य से ही सम्भोग करते हैं . इसी लिए मादा भी प्रयास करती है कि वे उस नर का बीज प्राप्त कर सके जो इस मादा को अच्छी से अच्छी संतान दे सके चाहे वो जो भी हो रिश्ते के विचार से !
अतः शायद आपका तर्क उस सन्दर्भ में ठीक हो सकता है .
वैसे एक बात और है जो उचित होगी इस सन्दर्भ में . शायद आप भी भली भांति जानती होंगी कि प्राणी जगत में भी जब किसी विशेष नस्ल को बढ़ाना या बनाना होता है तो पीडी दर पीढ़ी उसी सीमित परिवार में सम्भोग प्रक्रिया दोहराई जाती है .
लेकिन जब हम यौन क्रीड़ा को केवल आनंद के सन्दर्भ में लेतें हैं तो , मित्र , सभी समीकरण बदल जाते हैं !
इन्हें केवल सामाजिक दृष्टि और वैधानिक दृष्टि नहीं देखना चाहिए बल्कि व्यक्तिगत दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए !
एक मजेदार लेकिन अत्यंत आवश्यक तथ्य बताता हूं आपकी व् अन्य सब लोगो की जानकारी के लिए .
आपको शायद पता हो कि हिंदू लौ सन १९५६ में बना . और हिंदू विवाह क़ानून , १९५६ के अंतर्गत ये व्यवथा बनाई गयी कि वैध विवाह के लिए पुरुष ओर से ५ पीढियाँ और स्त्री ओर से ३ पीढ़ियों पहले तक पुरखे एक नहीं होने चाहिए. अधिक समझाने की ज़रूरत नहीं , क्यों कि मैं किसी अन्य बात कि इंगित करना चाहता हूं . क्या आप जानती है कि ये क़ानून पास होने से पहले क़ानून में इससे पहले किस प्रकार की परिपाटी को मान्यता थी ? ये थी पुरुष पक्ष में ७ और स्त्री पक्ष में ५ !!
तो बताइये क्या सही या क्या गलत है ?
और क्या आप और अन्य पाठक बता पायेगे सही-गलत की परिभाषा , जहां कि कई समाजो में प्रजातीय/अंतरजातीय विवाह इतने गलत माने जाते हैं कि विवाह करने वाले जोड़ों की हत्या तक कर दी जाती है ! और अभी तक क़ानून के ‘लंबे हाथ ‘ उन तक नहीं पहुँच पाए हैं .
तो हे रति क्रीड़ा की साम्राज्ञी G-spot ! आभारी होऊंगा यदि आप और आप जैसे कई अन्य अपने विचारों को इस पर्यवेक्ष में भी देखें . आपके G-spot होने का भक्त एवं दास - अनिल


प्रिय अनिल जी, आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ की यहाँ बात वंश बढ़ने की नहीं बल्कि यौनक्रिया द्वारा मिलने वाले आनंद की हो रही है. लेकिन आपने मेरी जिस बात को quote किया है उसमें मैंने इन फॅमिली शादी की बात पर टिप्पणी की थी जिसका बच्चे एक अभिन्न अंग होते है. फिर आपने उदहारण दिया है शेरों का तो आपकी जानकारी के लिए वो भी ऐसा मजबूरी में ही करते है और ये उतना प्रचलित भी नहीं है, नहीं तो इस दुनिया में शेरों का अस्तित्व बचा ही नहीं रहता. मेरी जानकारी में सेक्स फॉर प्लीजर, dolphins , इंसानों में पक्के तौर पर पाया जाता है. बाकि आपने चिमाप्न्जियों की बात की है तो इस बारे में मुझे सर्च करना पड़ेगा. और एक और बात ये जो नस्ल बढाने की प्रक्रिया घोड़ों, कुत्तों और अन्य कुछ जानवरों पे की जाती है क्या वो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है या मनुष्यों ने इसकी शुरुआत की है? क्या ये १०० प्रतिशत सुनिश्चित करता है की उन जानवरों में कोई गुन्सुत्रीय दोष उत्त्पन नहीं होता? क्या उनकी आयु सामान्य होती है? कृपया इसपे थोड़ी रौशनी डाले.

खैर आनंद के पहलू बात पर मैं वापस आती हूँ, जी हाँ, इसपे इससे ज्यादा क्या टिपण्णी की जा सकती है की यदि हम मानते है इस दुनिया का एक मात्र सत्य लिंग और योनी का मिलन है तो आपकी बात सर्वथा सही है और इसे मद्देनज़र रखते हुए रिश्तो के कोई मायने नहीं है. लेकिन जरूरी नहीं की सभी लोग आपके सत्य को अपना भी सत्य माने. मैं तो नहीं मानती. इससे मुझे याद आ रहा है की मान्त्रिक जी द्वारा इन्सेस्ट पे शुरू किये गए एक अन्य सूत्र में मैंने एक टिप्पणी की थी जो शायद आपको impulsive लगी होगी लेकिन वो सिर्फ इस स्थिति पर मेरा reflection मात्र थी. यहाँ मैंने भी किसी को सुधारने या उनके विचार बदलने का ठेका नहीं ले रखा. बस जो मुझे और मेरी आत्मा को सही लगता है वो मैं लिखती हूँ.

हाँ जहाँ तक मेरा सवाल है मुझे अपने निकट रिश्तेदारों की और कभी कोई सेक्सुअल आकर्षण महसूस नहीं होता और फिर से जीवविज्ञान की बात की जाये तो ऐसा पाया गया है की आम तौर पे एक ही परिवार के स्त्री पुरूषों में आपस में इस तरह का आकर्षण पैदा नहीं होता. मुझे आशा है की आप फेरामोंस की कुछ जानकारी रखते होंगे. और इस सन्दर्भ में मनोविज्ञान की भाषा में बात की जाये तो यह सिर्फ एक faulty learning का उदहारण नज़र आता है.

ये कानून जिसकी आप बात कर रहे है वो सदियों पुरानी है जब लोग जींस के बारे में जानते तक नहीं थे. और फिर भी यहाँ कम से कम पीढ़ियों का अंतर तो दीखता है. जहाँ तक आपने खाप पंचायत और उस जैसी कुछ घटनाओं का जिक्र किया है. शायद आप भी इतने बुद्धिमान तो होंगे ही ये समझते होंगे की प्रत्येक समाज और धर्मों में हमेशा से कुछ अतिवादी लोग होते आये हैं और होते रहेंगे. यहाँ हमें ये देखना है उनके दावों में कितना सत्य छुपा है या वे कितनी baseless हैं. इसके लिए फिर हमें विज्ञानं का सहारा लेना पड़ेगा जो या तो उनकी बात गलत साबित करेगा या सही... इससे ज्यादा इसपे क्या कहूं?

पुनःश्च:

अब इतना बोरिंग नाम रखा है तो फिर इसका मतलब तो मैं जानती ही हूँगी. आपको पसंद आया जान के अच्छा लगा..धन्यवाद्

sonie
18-01-2011, 11:42 AM
हां मित्र रियल लाइफ और कहानियों मे अंतर होता है , रियल में संबंधो में गरिमा बनी रहनी चाहिए

और बाकी संबंधो में... ?????

akayemm
18-01-2011, 01:23 PM
प्रिय अनिल जी, आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ की यहाँ बात वंश बढ़ने की नहीं बल्कि यौनक्रिया द्वारा मिलने वाले आनंद की हो रही है. .............. इससे ज्यादा इसपे क्या कहूं?

पुनःश्च:

अब इतना बोरिंग नाम रखा है तो फिर इसका मतलब तो मैं जानती ही हूँगी. आपको पसंद आया जान के अच्छा लगा..धन्यवाद्


हे नारी गुप्तांग की नियंत्रक , जी-स्पौट , :bloom:
सबसे पहले ये समझिये , कि हम अपने कल्पना के संसार और वास्तविक संसार के बीच कितना और किस प्रकार का अंतर या दूरी देखना और रखना चाहते हैं ? और इसी सन्दर्भ में सम्पूर्ण वार्तालाप होना चाहिए. मात्र वार्तालाप , न कि वाद-विवाद अथवा विवाद ! विवेकपूर्ण रूप से , बिना किसे आवेश अथवा पूर्वाग्रह या दुराग्रह . यदि ऐसा होता है , तो हर प्रकार के वार्तालाप में आनंद ही आनंद हैं , बल्कि कहिये परम आनंद है !
अब आपकी टिप्पणी पर क्रमबद्ध रूप से उत्तर देने की चेष्टा कर रहा हूं . कितना सफल और कितना असफल प्रयास है , ये निर्णय आप करें !

विदेशों में , विशेषकर , अमरीका में , अब बहुत से स्पर्म/शुक्राणु बेंक स्थापित हो चुके हैं जहां रक्त/खून की भांति बहुत से पुरुष अपना वीर्य या तो दान करते हैं या बेचतें हैं या जमा करतें हैं . और वहाँ वीर्य देने वाले की कई प्रकार की जानकारी भी संजोयी जाती है . नारिया इच्छा अनुसार जाकर शुक्राणु “चुन” लेती हैं और गर्भाधान करती हैं , कृत्रिम रूप से ! अब तो वैधानिक समस्याएं भी उत्पन्न होने लग गयी है पितृत्व के प्रश्न को लेकर कि इस प्रकार के पिता को संतान पर कितना अधिकार है ? और दूसरा ये कि क्या यह आवश्यक है बेंक के लिए कि वह वीर्य् दाता की पूरी जानकारी विदित कराये या उसे जन पटल पर रखे ! आदि आदि . शायद आप समझ गयी होंगी कि विज्ञान और ज्ञान और यहाँ तक कि ‘अज्ञान’ कहाँ तक उन्नति कर गया है .

तो बताइये , ऐसे हालात में सम्भोग की प्रक्रिया का क्या प्रयोजन रह जाता है या होना चाहिए ? .

और अब तो कई नारिया भी अपने डिम्ब विशेष रूप से स्थापित ‘बैंकों’ में जमा करने लग गयी हैं भविष्य में संतानोत्पत्ति के लिए .

सुधरने और सुधारने के सम्बन्ध में केवल इतना ही कहूँगा कि ये पटल अथवा इसी प्रकार कई अन्य , न तो बने है किसी को सुधारने के लिए और न ही बिगाड़ने के लिए... हम अखबार पढते हैं , टेलेविज़न देखते हैं फ़िल्में देखते है , कितना प्रभाव पडता है इनका हम पर ? कितने हैं जो हत्या की खबर से उत्साहित हो किसी की ह्त्या कर देतें हैं ? या जो सिरफिरा हत्या की योजना बना रहा है , क्या वो इस प्रकार के माध्यम के भरोसे ही योजना बना रहा है ? इसी प्रकार जो कर की चोरी करता है , क्या वो विभिन्न समाचारों को पढ़ कर या अन्यंत्र कई चीज़ों को देख कर कर भरना आरंभ कर देता है और ईमानदार बन जाता है? राम की रावण पर विजय युग युगांतर से देखते और सुनते आ रहे है लेकिन क्या रावण ने जन्म लेना बंद कर दिया ? अच्छा या बुरा बनने के लिए बहुत से आयाम होते हैं , कई कारण होते हैं .

मैं शुरू में ही लिख चुका हूं कि काल्पनिक लोक और यथार्थ में अंतर होता है और होना भी चाहिए . आवश्यक ये है कि हम इन दोनों में दूरी बनाये रखें ... और ये दूरी बनाए रखनी की क्षमता ही आपके सदाचरण या दुराचरण की पहचान दर्शाता है ! अपने अपने व्यक्तिगत जीवन में हम सब बिलकुल भिन्न हैं उस आक्रति या प्रारूप से जो हम यहाँ दर्शाते हैं .

और यही है इस मंच का मनोरथ , प्रयोजन , उद्देश्य .

देवी , जिस क़ानून की बात मैंने लिखी , वो सदियों पुराना क़ानून नहीं है . वर्तमान का है . और आज भी प्रयोग हो रहा है , विशेष रूप से उन झगड़ों में जहां पैतृक संपत्ति के वितरण पर विवाद हो ! इस पटल पर इससे अधिक लिखना व्यर्थ है . जींस की बातें और डी एन ए फैसला कर रहे है न्यायालयों में पितृत्व के प्रश्नों को ! अतः क़ानून एवं न्यायालय पूर्ण रूप से समकालीन हैं .

आपने अपने नाम को विशेषण दिया है “ बोरिंग “. ये बिकुल सही है क्योकि ये ‘बोर’ अर्थात गहरे छिद्र या सुरंग से सम्बंधित है . देवी इस स्पोट के सम्बन्ध में मेरी या किसी अन्य की पसंद या नापसंद का तो प्रश्न ही नहीं उठता..... जो भी व्यक्ति , नर या नारी , यदि किसी नारी को आनंद देना चाहे तो उसे इस “ बोरिंग “ स्पौट की समुचित जानकारी होनी चाहिए . अन्यथा उस नारी द्वारा इस व्यक्ति को भी आनंद नहीं मिल पायेगा प्रत्युत्तर में !

हाँ , एक अन्य स्पोट भी है जो उतना ही आवश्यक एवं संवेदनशील है , लेकिन वो स्थान इस समय हमारे इस वार्तालाप का विषय नहीं है . क्यों ठीक लिखा मैंने ? .

फिर से , मेरी ओर से ..:bloom: - अनिल

पुनश्च – इतनी लंबी टिप्पणी के लिए खेद है . लेकिन शायद ये आवश्यक थी , आपकी ज्ञानभरी बातें के सन्दर्भ में .

kiskunal
18-01-2011, 01:27 PM
तीन तरह का सेक्स वर्जित होना चाहिए

* जबरदस्ती

* पैसा देकर

* और परिवार अथवा रक्त सम्बन्ध से

dev b
18-01-2011, 01:40 PM
प्रिय मित्र सोनी जी , गरिमा तो हर सम्बन्ध की होती है , और सभी संबंधो की गरिमा बनी रहनी चाहिए , परन्तु यंहा बात केवल उन संबंधो की हो रही है , जिन में सेक्स को शामिल करने से संबंद की गरिमा धूमिल होती है ..........आप का देव भारद्वाज
और बाकी संबंधो में... ?????

akayemm
18-01-2011, 01:49 PM
तीन तरह का सेक्स वर्जित होना चाहिए

* ............

* पैसा देकर

* और परिवार अथवा ...........

मित्र , क्षमा करें , पैसा तो पत्नि भी देना पडता है. . हाँ , कारण कई होते हैं. अब देखिये और सोचिये , बेचारे निखट्टू पति को पत्नि सम्भोग या तो करने नहीं देती या फिर इतने ताने मारती है है कि उसका लिंग मात्र मूत्र नलिका बन के रह जाता है ....:pointlol:
और आपका ' परिवार ' से क्या अर्थ है ? वैसे यदि भारतीय परंपरा पर चले तो यहाँ तो " वसुधैव कुटुम्बकम " का नारा लगाया जाता है ! :rofl: .....
मेरी टिपण्णी को अन्यथा ना ले ...ये मात्र हास परिहास है ...
हाँ , कहीं कहीं बहुत सी टिप्पणियों में ज्ञान दर्शन भी होता है लेकिन उसे विवेक की महीन छलनी में से गुजारना आवश्यक होता है ...
मेरी ओर से ....:bloom: - अनिल

dev b
18-01-2011, 01:50 PM
प्रिय मित्र जबरदस्ती सेक्स जिस को बलात्कार कहा जाता है उस के लिए अलग सूत्र है(बलात्कार --समाज का अभिशाप ) कृपया उस पर आप अपने विचार दे . जन्हा तक पैसा दे कर सेक्स की बात है ---हम को किसी की रोजी रोटी को बंद करने का अधिकार नहीं है
अब बात आती है रक्त संबंधो में सेक्स , तो प्रिय मित्र इस तरह के विचार हमारे समाज को अवनति की और ले जा रहे है . में कोई समाज का ठेकेदार नहीं हूँ , जिस को जो करना है , वो करेगा ही . हम तो केवल अपने विचार ही प्रकट कर सकते है और अनुरोध कर सकते है की कृपया संबंधो की मर्यादा को बनाए रखे ........आप का अपना देव भारद्वाज
तीन तरह का सेक्स वर्जित होना चाहिए

* जबरदस्ती

* पैसा देकर

* और परिवार अथवा रक्त सम्बन्ध से

dev b
18-01-2011, 02:03 PM
प्रिय मित्र draculla जी नमस्कार , यंहा हमारा मकसद किसी को अपनी बात जबरदस्ती मनवाने का नहीं है , हम तो अपने विचार रख रहे है , जिन को अछे लगे वो माने , जिन को अछे ना लगे , उन से भी हम को झगड़ा करने की क्या जरुरत है , हर आदमी अपने स्वतंत्र विचारों का मालिक है और अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीता है . फिर भी मित्र किसी को हमारी कोई बात कडवी लगी हो तो हमें खेद है , परन्तु मित्र सच तो कडुवा ही होता है , मेरा सभी मित्रो से अनुरोध है की विचारों में शालीनता बनाए रखे ..........आप का अपना देव भारद्वाज
आप को क्या लगता है की यह सूत्र सही रस्ते पर आ सकता है.जहाँ पर आप सदस्य से उसकी राय पूछते हैं और बाद में जब कोई पारिवारिक सेक्स के पक्ष में अपनी राय रखता है तो आप उसे अपमानित और प्रवचन सुनाने लगते हैं.यदि इस तरह का व्यवहार सदस्यों के साथ करेगें तो जाहिर है की झगडा होगा ही और झगडा होगा तो सूत्र अपने जगह से हट ही जायेगा.यदि आप को ऐसे सदस्यों को सुधारना ही है तो उसके साथ बाचीत करें ना की उसे भला बुरा कहें.कुछ तो हैं की सदस्य को बुरा बोल देते हैं फिर ऐसा कहते हैं की हम तो ऐसा सदस्यों को सुधारने के लिए बोल रहे हैं.अरे भाई इस फोरम पर सभी वयस्क है और मेरे ख्याल से सभी को अपना भला बुरा सोचने का विवेक है.चलिए एक बात बताइए क्या आप ने इस तरह का सूत्र इसीलिए बनाया है की इस प्रकार के सदस्य को ढूंढ कर उसे अपमानित करें?


जहाँ तक मैंने देखा है की इस तरह के सूत्र हमेशा फोरम पर झगडा और सदस्यों के मन मुठाव का करण होते है.हम यहाँ पर मनोरंजन करने आते हैं ना की झगडा करने और ना ही विवाद के पडने के लिए.वैसे भी अब फोरम पर पारिवारिक सेक्स का अलग विभाग बन चूका है तो फिर सदस्यों को खुश होना चाहिए की अब उनके सामने ऐसे सूत्र नहीं आयेगें.यदि यदा कदा आप को ऐसे सूत्र मिल जाये तो आप शिकायत कर के उस सूत्र को उसकी सही जगह पर पंहुचा सकते हैं.


लेकिन मुझे लगत है की अलग जगह बना दे बात नहीं बनने वाली है.क्योकि हमने तो फोरम को सुधारने का बीड़ा उठा रखा है.कृपया बुरा ना मानियेगा.लेकिन कुछ सदस्य ऐसा ही कर रहे हैं.


मेरे इस प्रकार के कथन और मेरे सूत्रों को देखा कर मेरे बारे में अपनी कोई राय मत बनाइयेगा.क्योकि जो दिखता है वह जरुरी नहीं की सत्य ही हो.इसी बात पर आखें फिल्म का वह संवाद याद आता है “सत्य हमेशा कल्पना से विचित्र होता है.”अन्तर्वासना फोरम से मैं इसके कहानियों को ले कर जुड़ा हूँ.जहाँ पर ज्यादातर कहानी पारिवारिक सेक्स पर भी होता है.मुझे लगता है की ज्यादातर सदस्य इसीतरह जुड़े होगे.मैं यहाँ गलत भी हो सकता हूँ.मैं तो हमेशा यहाँ पर सिर्फ मनोरंजन के लिए ही आता हूँ.मनोरंजन करता हूँ और चला जाता हूँ.कुछ दिनों से मैं ऐसे दो सूत्र देख रहा हूँ.आज सोचा की चलो मैं भी अपनी राय रख ही दूँ.संक्षेप मैं बस इतना ही कहूँगा की कृपया जब किसी सदस्य से उसकी राय पूछते हैं तो उसी राय जानकर भला बुरा ना कहें.बस.
यदि आप को उन्हें सुधारने का इतना ही शौख हैं तो आप उसके साथ बातचीत कर के इसके पीछे की घटना जानकर उसे सम्जहने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन आप उस पर दबाब नहीं डाले.


धन्यवाद.

akayemm
18-01-2011, 02:03 PM
प्रिय अनिल जी, .........................
..........................

पुनःश्च:

अब इतना बोरिंग नाम रखा है तो फिर इसका मतलब तो मैं जानती ही हूँगी. आपको पसंद आया जान के अच्छा लगा..धन्यवाद्
हे नारी आनंद की संचालिका , जी स्पौट ,
एक आग्रह है आपसे , या तुमसे ......
इतने आकर्षक नाम के साथ तुम्हारा ये 'अवतार ' न्यायसंगत नहीं लगता.....
इसे बदल डाले तो आभारी होउंगा .....
काफी लंबी चौड़ी सूची बना रखी है मंच वालों ने .....
कई हैं जो इस नामको सार्थक करतें हैं .....
उनका पुनर्वालोकन करें ...... सप्रेम :lips: - अनिल

draculla
18-01-2011, 04:07 PM
प्रिय मित्र draculla जी नमस्कार , यंहा हमारा मकसद किसी को अपनी बात जबरदस्ती मनवाने का नहीं है , हम तो अपने विचार रख रहे है , जिन को अछे लगे वो माने , जिन को अछे ना लगे , उन से भी हम को झगड़ा करने की क्या जरुरत है , हर आदमी अपने स्वतंत्र विचारों का मालिक है और अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीता है . फिर भी मित्र किसी को हमारी कोई बात कडवी लगी हो तो हमें खेद है , परन्तु मित्र सच तो कडुवा ही होता है , मेरा सभी मित्रो से अनुरोध है की विचारों में शालीनता बनाए रखे ..........आप का अपना देव भारद्वाज


धन्यवाद बस मेरा तो यही कहना था की आप की बातों से ये ना लगे की आप उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं बस............

rnold
18-01-2011, 04:36 PM
मैं तो यही कहूँगा की रिस्तो के अपनी एक जगह हैं हमे रिस्तो को समजना होगा !
पारवारिक सेक्स गलत हैं

dev b
18-01-2011, 04:48 PM
धन्यवाद मित्र कृपया आप आगे भी सूत्र पर पधार कर अपने विचार देते रहे .....आप का देव भारद्वाज
धन्यवाद बस मेरा तो यही कहना था की आप की बातों से ये ना लगे की आप उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं बस............

dev b
18-01-2011, 04:49 PM
आप का धन्यवाद दोस्त , अपना विचार रखने के लिए
मैं तो यही कहूँगा की रिस्तो के अपनी एक जगह हैं हमे रिस्तो को समजना होगा !
पारवारिक सेक्स गलत हैं

draculla
18-01-2011, 04:56 PM
धन्यवाद मित्र कृपया आप आगे भी सूत्र पर पधार कर अपने विचार देते रहे .....आप का देव भारद्वाज

अवस्य मेरा तो यही मन है की मतभेद कितने ही क्यूँ ना हो मनभेद नहीं होना चाहिए.
धन्यवाद

dev b
18-01-2011, 05:08 PM
मित्र बिलकुल सही कहा आप ने
अवस्य मेरा तो यही मन है की मतभेद कितने ही क्यूँ ना हो मनभेद नहीं होना चाहिए.
धन्यवाद

Ranveer
18-01-2011, 06:11 PM
मित्रों मेरा एक और मत है की इन्सेस्ट सेक्स का विरोध करना संकीर्ण विचारधारा न होकर एक ससक्त विचारधारा है...आवेश में आकर अपने सगे सम्बन्धियों के साथ सेक्स करना कमजोर व्यक्तित्व को पर्दर्शित करता है..जब कोई यह जानते हुए भी इन्सेस्ट सेक्स करता है की इसे समाज में मान्यता नहीं है तो यह कमजोरी नहीं तो और क्या है...आज इंडिया में लड़कियां अपने घर में ही सुरक्षित नहीं हैं ...उनके साथ सेक्स करने वाले अधिकतर लोग सगे सम्बन्धी ही होतें है ...क्या ये स्वस्थ मानसिकता का परिचायक है ..एक बात और कहना चाहूँगा की हर देश को चलने के लिए एक संविधान की आवश्यकता पड़ती है उसी तरह हर समाज को चलाने के लिए नियम और संस्कार की आवश्यकता पड़ती है ..अगर ऐसा नहीं होता तो अराजकता फैलती है...जो खुद अपने देश और समाज को नष्ट करती है....

dev b
18-01-2011, 08:09 PM
मे आप से सहमत हु मित्र
मित्रों मेरा एक और मत है की इन्सेस्ट सेक्स का विरोध करना संकीर्ण विचारधारा न होकर एक ससक्त विचारधारा है...आवेश में आकर अपने सगे सम्बन्धियों के साथ सेक्स करना कमजोर व्यक्तित्व को पर्दर्शित करता है..जब कोई यह जानते हुए भी इन्सेस्ट सेक्स करता है की इसे समाज में मान्यता नहीं है तो यह कमजोरी नहीं तो और क्या है...आज इंडिया में लड़कियां अपने घर में ही सुरक्षित नहीं हैं ...उनके साथ सेक्स करने वाले अधिकतर लोग सगे सम्बन्धी ही होतें है ...क्या ये स्वस्थ मानसिकता का परिचायक है ..एक बात और कहना चाहूँगा की हर देश को चलने के लिए एक संविधान की आवश्यकता पड़ती है उसी तरह हर समाज को चलाने के लिए नियम और संस्कार की आवश्यकता पड़ती है ..अगर ऐसा नहीं होता तो अराजकता फैलती है...जो खुद अपने देश और समाज को नष्ट करती है....

Miss Smarty Pants
19-01-2011, 02:03 AM
मैं शुरू में ही लिख चुका हूं कि काल्पनिक लोक और यथार्थ में अंतर होता है और होना भी चाहिए . आवश्यक ये है कि हम इन दोनों में दूरी बनाये रखें ... और ये दूरी बनाए रखनी की क्षमता ही आपके सदाचरण या दुराचरण की पहचान दर्शाता है ! अपने अपने व्यक्तिगत जीवन में हम सब बिलकुल भिन्न हैं उस आक्रति या प्रारूप से जो हम यहाँ दर्शाते हैं .

प्रिय अनिल जी , मुझे लगता है की यह जो बहस है ये अंतहीन ही रहनेवाली है. आपका कहना है की यथार्थ कल्पना से अलग होता है ... यह जो आपने बात की है , ये एक आदर्श स्थिति है अगर लोग इसे प्राप्त कर सके तो , और यदि आपके सन्दर्भ में ऐसा है तो बधाई हो आपको . सवाल ये है की क्या हर आदमी इतना परिपक्व है की वो काल्पनिकता और यथार्थ में अंतर को समझ पाए खासकर जबकि यहाँ पर दोनों के मध्य बहुत ही पतली सीमा रेखा है ? कोई क्या प्रमाण दे सकता है की ऐसी कहानियों या फिल्मों ने लोगों के दिलो दिमाग में कुंठाएं पैदा नहीं की होंगी ? हमारें दिमाग में बहुत सी बातें अचेतन स्तर पे चलती रहती है .. लोग भले नकारे पर उनके भी दिलोदिमाग में ये बातें कुछ न कुछ स्तर तक असर डाला करती है .. ये एक मौके का फायदा उठाने की प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है . बाहर हो या घर . ऐसी बातों के संपर्क में यदि आप दिन रात रहते हैं तो ये कब आपके व्यक्तित्व को परिवर्तित कर देगी ये आप भी नहीं जान पाएंगे .. अब इसे विकृत या उन्मुक्त परिवर्तन पुकारा जाये , ये बाकि लोगों पे छोड़ते है . आपने एक अच्छा उदहारण दिया है की जैसे लोग television , फिल्मों में दिखाए जाने वाली हिंसा से प्रभावित हो कर हत्यारे नहीं बन जाते वैसे ही ऐसी सामग्रियां पढ़ या देख कर भी corrupt नहीं होते .. वैसे ज्यादातर रिसर्चो में tv का बच्चो और व्यस्को में हिंसक व्यव्हार में योगदान करने की बात सामने आती है . ये सब सामग्रियां एक modeling का काम करती है हमारे लिए. ठीक है ये बात सही है की सभी पे तो इसका असर नहीं होता कुछ लोग ही प्रभावित होते हैं . लेकिन ये कुछ लोगों की संख्या हद से ज्यादा न बढे एक समाज में इसलिए तो लोग इसे control करने के उपाय ढूँढ़ते हैं . इसलिए लोग कुछ चीजों को ban या प्रतिबंधित या सिर्फ वयस्कों के लिए घोषित करते हैं . वैसे मेरी नज़र में व्यसक होने का मतलब सिर्फ 18 से ऊपर हो जाना नहीं होना चाहिए .. और रामायण में भी सब पात्र न तो राम है न रावण . रामायण और महाभारत पुस्तके भी छल और दुष्टता के उदाहरणों से भरी पड़ी हैं और लोग उन्हें notice भी करते है .

कुछ समय पहले भारत में किसी के द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में ये बात आई थी 50 प्रतिशत से भी ज्यादा भारतीय पुरुषों ने स्वीकारा की यदि उनके साथ एक लड़की अकेले कमरे में हो और किसी प्रकार का कोई नुकसान (police) उन्हें नहीं होने वाला तो वो बलात्कार कर सकते है . अब आप ही बताएं क्या ये एक मौके का फायदा उठा लेने वाली प्रवृत्ति की ओर ही इंगित नहीं करता ? परिवार में किसी को फुसला के उसके साथ शारीरिक समबन्ध बनाना भी मेरे ख्याल से इसी तरह की एक प्रवृत्ति का बदला स्वरुप है . दो किशोरों के बीच इस प्रकार की घटना हुई हो तो में इनमे उनका दोष नहीं मानती क्यूंकि इस समय में जो शारीर में परिवर्तन होते हैं सच में उन्हें संभालना मुश्किल होता है . पर इसे जारी क्यूँ रखा जाये ?

एक बात और स्पष्ट करती चलूँ की मुझे खून के रिश्तों में इन्सेस्ट से आपत्ति ज्यादा है बनिस्पत जीजा -साली , देवर -भाभी इत्यादि रिश्तों से . ये रिश्ते जो खून से समबन्धित नहीं होते उन्हें समाज को सुचारू रूप से चलाने हेतु बनाया गया है . मनुष्य स्वाभाव से एक जलनशील और अधिकारवादी प्राणी होता है . कोई व्यक्ति इनका पक्षधर हो इसका ये मतलब नहीं उसका या उसकी जीवनसाथी भी यही सोचे . सभी लोगों के विचार और भावनाए एक सी नहीं होती . अगर ऐसा ही होते रहने को छोड़ दिया जाता तो मुझे नहीं लगता है की मनुष्य कभी आगे बढ़ पता .लोग बस स्त्री पुरुषों को ले कर आपस में झगड़ते/उलझते ही रह जाते .


खैर जो भी ये वो सारी बातें थी जो मुझे कहानी थी और ये टिपण्णी भी काफी लम्बी हो चुकी है . मुझे लगता है कुछ दिनों में ये बहस जो अंतहीन तो है ही boring (नहीं आपकी bore वाली boring नहीं ) भी होती जाएगी . और अब इस रंगीन महफ़िल को मैं संगीन महफ़िल नहीं बनाना चाहती .

rajan.spi
19-01-2011, 02:11 AM
hi i m rajan & i m new on forum but aap sab ki baaton se mai b agree karta hu. kripya krke muje b udate krte rahiyega.

Miss Smarty Pants
19-01-2011, 02:14 AM
हे नारी आनंद की संचालिका , जी स्पौट ,
एक आग्रह है आपसे , या तुमसे ......
इतने आकर्षक नाम के साथ तुम्हारा ये 'अवतार ' न्यायसंगत नहीं लगता.....
इसे बदल डाले तो आभारी होउंगा .....
काफी लंबी चौड़ी सूची बना रखी है मंच वालों ने .....
कई हैं जो इस नामको सार्थक करतें हैं .....
उनका पुनर्वालोकन करें ...... सप्रेम :lips: - अनिल



आपकी सलाह के लिए धन्यवाद. नाम का अर्थ आप जैसे कुछ जानकर लोग समझे वो ही बहुत है. उसके अनुरूप चित्र रख कर में कुछ अवांछित ( मेरे लिए) लोगों को आकर्षित नहीं करना चाहती! lol

dev b
19-01-2011, 04:57 PM
प्रिय मित्र मै आप से सहमत हूँ
आपकी सलाह के लिए धन्यवाद. नाम का अर्थ आप जैसे कुछ जानकर लोग समझे वो ही बहुत है. उसके अनुरूप चित्र रख कर में कुछ अवांछित ( मेरे लिए) लोगों को आकर्षित नहीं करना चाहती! lol

dev b
19-01-2011, 05:00 PM
काम्या जी मै आप से सहमत हूँ कुतर्क करने से सचाई बदल थोड़े ही जायेगी , सच , सच होता है ..
मैं शुरू में ही लिख चुका हूं कि काल्पनिक लोक और यथार्थ में अंतर होता है और होना भी चाहिए . आवश्यक ये है कि हम इन दोनों में दूरी बनाये रखें ... और ये दूरी बनाए रखनी की क्षमता ही आपके सदाचरण या दुराचरण की पहचान दर्शाता है ! अपने अपने व्यक्तिगत जीवन में हम सब बिलकुल भिन्न हैं उस आक्रति या प्रारूप से जो हम यहाँ दर्शाते हैं .

प्रिय अनिल जी , मुझे लगता है की यह जो बहस है ये अंतहीन ही रहनेवाली है. आपका कहना है की यथार्थ कल्पना से अलग होता है ... यह जो आपने बात की है , ये एक आदर्श स्थिति है अगर लोग इसे प्राप्त कर सके तो , और यदि आपके सन्दर्भ में ऐसा है तो बधाई हो आपको . सवाल ये है की क्या हर आदमी इतना परिपक्व है की वो काल्पनिकता और यथार्थ में अंतर को समझ पाए खासकर जबकि यहाँ पर दोनों के मध्य बहुत ही पतली सीमा रेखा है ? कोई क्या प्रमाण दे सकता है की ऐसी कहानियों या फिल्मों ने लोगों के दिलो दिमाग में कुंठाएं पैदा नहीं की होंगी ? हमारें दिमाग में बहुत सी बातें अचेतन स्तर पे चलती रहती है .. लोग भले नकारे पर उनके भी दिलोदिमाग में ये बातें कुछ न कुछ स्तर तक असर डाला करती है .. ये एक मौके का फायदा उठाने की प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है . बाहर हो या घर . ऐसी बातों के संपर्क में यदि आप दिन रात रहते हैं तो ये कब आपके व्यक्तित्व को परिवर्तित कर देगी ये आप भी नहीं जान पाएंगे .. अब इसे विकृत या उन्मुक्त परिवर्तन पुकारा जाये , ये बाकि लोगों पे छोड़ते है . आपने एक अच्छा उदहारण दिया है की जैसे लोग television , फिल्मों में दिखाए जाने वाली हिंसा से प्रभावित हो कर हत्यारे नहीं बन जाते वैसे ही ऐसी सामग्रियां पढ़ या देख कर भी corrupt नहीं होते .. वैसे ज्यादातर रिसर्चो में tv का बच्चो और व्यस्को में हिंसक व्यव्हार में योगदान करने की बात सामने आती है . ये सब सामग्रियां एक modeling का काम करती है हमारे लिए. ठीक है ये बात सही है की सभी पे तो इसका असर नहीं होता कुछ लोग ही प्रभावित होते हैं . लेकिन ये कुछ लोगों की संख्या हद से ज्यादा न बढे एक समाज में इसलिए तो लोग इसे control करने के उपाय ढूँढ़ते हैं . इसलिए लोग कुछ चीजों को ban या प्रतिबंधित या सिर्फ वयस्कों के लिए घोषित करते हैं . वैसे मेरी नज़र में व्यसक होने का मतलब सिर्फ 18 से ऊपर हो जाना नहीं होना चाहिए .. और रामायण में भी सब पात्र न तो राम है न रावण . रामायण और महाभारत पुस्तके भी छल और दुष्टता के उदाहरणों से भरी पड़ी हैं और लोग उन्हें notice भी करते है .

कुछ समय पहले भारत में किसी के द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में ये बात आई थी 50 प्रतिशत से भी ज्यादा भारतीय पुरुषों ने स्वीकारा की यदि उनके साथ एक लड़की अकेले कमरे में हो और किसी प्रकार का कोई नुकसान (police) उन्हें नहीं होने वाला तो वो बलात्कार कर सकते है . अब आप ही बताएं क्या ये एक मौके का फायदा उठा लेने वाली प्रवृत्ति की ओर ही इंगित नहीं करता ? परिवार में किसी को फुसला के उसके साथ शारीरिक समबन्ध बनाना भी मेरे ख्याल से इसी तरह की एक प्रवृत्ति का बदला स्वरुप है . दो किशोरों के बीच इस प्रकार की घटना हुई हो तो में इनमे उनका दोष नहीं मानती क्यूंकि इस समय में जो शारीर में परिवर्तन होते हैं सच में उन्हें संभालना मुश्किल होता है . पर इसे जारी क्यूँ रखा जाये ?

एक बात और स्पष्ट करती चलूँ की मुझे खून के रिश्तों में इन्सेस्ट से आपत्ति ज्यादा है बनिस्पत जीजा -साली , देवर -भाभी इत्यादि रिश्तों से . ये रिश्ते जो खून से समबन्धित नहीं होते उन्हें समाज को सुचारू रूप से चलाने हेतु बनाया गया है . मनुष्य स्वाभाव से एक जलनशील और अधिकारवादी प्राणी होता है . कोई व्यक्ति इनका पक्षधर हो इसका ये मतलब नहीं उसका या उसकी जीवनसाथी भी यही सोचे . सभी लोगों के विचार और भावनाए एक सी नहीं होती . अगर ऐसा ही होते रहने को छोड़ दिया जाता तो मुझे नहीं लगता है की मनुष्य कभी आगे बढ़ पता .लोग बस स्त्री पुरुषों को ले कर आपस में झगड़ते/उलझते ही रह जाते .


खैर जो भी ये वो सारी बातें थी जो मुझे कहानी थी और ये टिपण्णी भी काफी लम्बी हो चुकी है . मुझे लगता है कुछ दिनों में ये बहस जो अंतहीन तो है ही boring (नहीं आपकी bore वाली boring नहीं ) भी होती जाएगी . और अब इस रंगीन महफ़िल को मैं संगीन महफ़िल नहीं बनाना चाहती .

lustyraj
23-01-2011, 01:32 AM
ha per un se jo tumhara khun ka rista na ho per bhabhi shali ko ya cousion ko chodne main kuch galat nahi hai ager wo khud chudwana chahe to

akayemm
23-01-2011, 01:41 PM
काम्या जी मै आप से सहमत हूँ कुतर्क करने से सचाई बदल थोड़े ही जायेगी , सच , सच होता है ..मित्र , मेरी आपसे एक सलाह है कि आप अपने ज्ञान और परिपक्वता का स्तर थोड़ा ऊपर करे ... शब्दों का चयन करना सीखें .... पर्याय एवं विलोम का अंतर समझे .... तभी बौद्धिक विचारों पर टिप्पणियाँ करें ..... केवल इस लिए ना करे कि आप ऐसा कर सकते हैं ..... अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए बहुत से सूत्र हैं ..... नाना प्रकार की निरर्थक प्रविष्टियाँ हैं जहां आप अपनी उपस्थिति दर्शा सकते हैं ..... बौद्धिक वार्तालाप में भाग लेना आप जैसे महानुभावों के बस का नहीं ..... मैं अपने स्तर को जानता हूं इसी लिए ये काफी सोच और समझ कर लिख रहा हूं , क्यों कि मैं जानता हूं कि आपका ज्ञान स्तर कहाँ तक सीमित है . मेरी टिप्पणी आपत्ति जनक हो सकती है लेकिन मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं .... मैं सच को झुटला नहीं सकता .... वैसे बता दूं कि आप जैसे महानुभावों , नर व नारियाँ , की संख्या बढती जा रही है इस फोरम पर ! :BangHead: ... अनिल

akayemm
23-01-2011, 02:11 PM
प्रिय अनिल जी , मुझे लगता है की यह जो बहस है ये अंतहीन ही रहनेवाली है. ........
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कुछ समय पहले भारत में किसी के द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में ये बात आई थी 50 प्रतिशत से भी ज्यादा भारतीय पुरुषों ने स्वीकारा की यदि उनके साथ एक लड़की अकेले कमरे में हो और किसी प्रकार का कोई नुकसान (police) उन्हें नहीं होने वाला तो वो बलात्कार कर सकते है . अब आप ही बताएं क्या ये एक मौके का फायदा उठा लेने वाली प्रवृत्ति की ओर ही इंगित नहीं करता ? परिवार में किसी को फुसला के उसके साथ शारीरिक समबन्ध बनाना भी मेरे ख्याल से इसी तरह की एक प्रवृत्ति का बदला स्वरुप है . दो किशोरों के बीच इस प्रकार की घटना हुई हो तो में इनमे उनका दोष नहीं मानती क्यूंकि इस समय में जो शारीर में परिवर्तन होते हैं सच में उन्हें संभालना मुश्किल होता है . पर इसे जारी क्यूँ रखा जाये ?...........
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खैर जो भी ये वो सारी बातें थी जो मुझे कहानी थी और ये टिपण्णी भी काफी लम्बी हो चुकी है . मुझे लगता है कुछ दिनों में ये बहस जो अंतहीन तो है ही boring (नहीं आपकी bore वाली boring नहीं ) भी होती जाएगी . और अब इस रंगीन महफ़िल को मैं संगीन महफ़िल नहीं बनाना चाहती .

देवी ,:salut:
मैं आपके कई विचारों से सहमत हूं , कईओं से नहीं ....
पहला तो ये समझिये कि हम बहस नहीं कर रहे , जिसमें दो या तीन या अधिक पक्ष अपना अपना विचार एवं तथ्य सामने रखते हैं , अधिकतर सही या गलत का फैसला होने के लिए अथवा फिर किसी प्रकार के लाभ के वितरण के लिए , आदि आदि ....
और ना ही हम वाद विवाद कर रहें हें अपनी बात मनवाने कि लिए....
हम कर रहे हैं विचारों का आदान प्रदान .... और प्राप्त कर रहे हैं ज्ञान एक दूसरे से ! अतः इस प्रक्रिया के अंतहीन होने में ही लाभ है .... सीमित होने में नहीं .... क्योंकि ज्ञान के भण्डार असीमित होते हैं ....
हाँ , बहुत से लोग हैं इस मंच पर जिनके पास क्षमता नहीं है बौद्धिक वार्तालाप में भाग लेने की , लेकिन फिर भी वे ले रहे हैं भाग अपनी सीमित बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए !
दूसरा जो तुमने पुलिस सम्बंदित उदहारण दिया वो तो पूरे विश्व में युग युगान्तरों से व्यापक है.... मान्य है ...... हर जाति में ...प्रजाति में ....हर देश में ...प्रदेश में ....समयानुसार केवल रूप बदलता रहा है क़ानून और व्यवस्था का..... पहले धार्मिक नेता बताते थे सही और गलत की परिभाषा .....फिर कबीले के मुखिया ....फिर राजा ..... और अब कुछ सदियों से लिखित विधान ..... केवल भारत के पुरुषों को दोष देना उचित ना होगा ऐसे सन्दर्भ में ..... यदि सामजिक बंधन ना हों तो क्या भारत की सन्नारिया अनुचित व्यवहार नहीं करेंगी ? ..... सप्रेम :bloom:.... अनिल

Ranveer
23-01-2011, 02:51 PM
मैं शुरू में ही लिख चुका हूं कि काल्पनिक लोक और यथार्थ में अंतर होता है और होना भी चाहिए . आवश्यक ये है कि हम इन दोनों में दूरी बनाये रखें ... और ये दूरी बनाए रखनी की क्षमता ही आपके सदाचरण या दुराचरण की पहचान दर्शाता है ! अपने अपने व्यक्तिगत जीवन में हम सब बिलकुल भिन्न हैं उस आक्रति या प्रारूप से जो हम यहाँ दर्शाते हैं .

प्रिय अनिल जी , मुझे लगता है की यह जो बहस है ये अंतहीन ही रहनेवाली है. आपका कहना है की यथार्थ कल्पना से अलग होता है ... यह जो आपने बात की है , ये एक आदर्श स्थिति है अगर लोग इसे प्राप्त कर सके तो , और यदि आपके सन्दर्भ में ऐसा है तो बधाई हो आपको . सवाल ये है की क्या हर आदमी इतना परिपक्व है की वो काल्पनिकता और यथार्थ में अंतर को समझ पाए खासकर जबकि यहाँ पर दोनों के मध्य बहुत ही पतली सीमा रेखा है ? कोई क्या प्रमाण दे सकता है की ऐसी कहानियों या फिल्मों ने लोगों के दिलो दिमाग में कुंठाएं पैदा नहीं की होंगी ? हमारें दिमाग में बहुत सी बातें अचेतन स्तर पे चलती रहती है .. लोग भले नकारे पर उनके भी दिलोदिमाग में ये बातें कुछ न कुछ स्तर तक असर डाला करती है .. ये एक मौके का फायदा उठाने की प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है . बाहर हो या घर . ऐसी बातों के संपर्क में यदि आप दिन रात रहते हैं तो ये कब आपके व्यक्तित्व को परिवर्तित कर देगी ये आप भी नहीं जान पाएंगे .. अब इसे विकृत या उन्मुक्त परिवर्तन पुकारा जाये , ये बाकि लोगों पे छोड़ते है . आपने एक अच्छा उदहारण दिया है की जैसे लोग television , फिल्मों में दिखाए जाने वाली हिंसा से प्रभावित हो कर हत्यारे नहीं बन जाते वैसे ही ऐसी सामग्रियां पढ़ या देख कर भी corrupt नहीं होते .. वैसे ज्यादातर रिसर्चो में tv का बच्चो और व्यस्को में हिंसक व्यव्हार में योगदान करने की बात सामने आती है . ये सब सामग्रियां एक modeling का काम करती है हमारे लिए. ठीक है ये बात सही है की सभी पे तो इसका असर नहीं होता कुछ लोग ही प्रभावित होते हैं . लेकिन ये कुछ लोगों की संख्या हद से ज्यादा न बढे एक समाज में इसलिए तो लोग इसे control करने के उपाय ढूँढ़ते हैं . इसलिए लोग कुछ चीजों को ban या प्रतिबंधित या सिर्फ वयस्कों के लिए घोषित करते हैं . वैसे मेरी नज़र में व्यसक होने का मतलब सिर्फ 18 से ऊपर हो जाना नहीं होना चाहिए .. और रामायण में भी सब पात्र न तो राम है न रावण . रामायण और महाभारत पुस्तके भी छल और दुष्टता के उदाहरणों से भरी पड़ी हैं और लोग उन्हें notice भी करते है .

कुछ समय पहले भारत में किसी के द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में ये बात आई थी 50 प्रतिशत से भी ज्यादा भारतीय पुरुषों ने स्वीकारा की यदि उनके साथ एक लड़की अकेले कमरे में हो और किसी प्रकार का कोई नुकसान (police) उन्हें नहीं होने वाला तो वो बलात्कार कर सकते है . अब आप ही बताएं क्या ये एक मौके का फायदा उठा लेने वाली प्रवृत्ति की ओर ही इंगित नहीं करता ? परिवार में किसी को फुसला के उसके साथ शारीरिक समबन्ध बनाना भी मेरे ख्याल से इसी तरह की एक प्रवृत्ति का बदला स्वरुप है . दो किशोरों के बीच इस प्रकार की घटना हुई हो तो में इनमे उनका दोष नहीं मानती क्यूंकि इस समय में जो शारीर में परिवर्तन होते हैं सच में उन्हें संभालना मुश्किल होता है . पर इसे जारी क्यूँ रखा जाये ?

एक बात और स्पष्ट करती चलूँ की मुझे खून के रिश्तों में इन्सेस्ट से आपत्ति ज्यादा है बनिस्पत जीजा -साली , देवर -भाभी इत्यादि रिश्तों से . ये रिश्ते जो खून से समबन्धित नहीं होते उन्हें समाज को सुचारू रूप से चलाने हेतु बनाया गया है . मनुष्य स्वाभाव से एक जलनशील और अधिकारवादी प्राणी होता है . कोई व्यक्ति इनका पक्षधर हो इसका ये मतलब नहीं उसका या उसकी जीवनसाथी भी यही सोचे . सभी लोगों के विचार और भावनाए एक सी नहीं होती . अगर ऐसा ही होते रहने को छोड़ दिया जाता तो मुझे नहीं लगता है की मनुष्य कभी आगे बढ़ पता .लोग बस स्त्री पुरुषों को ले कर आपस में झगड़ते/उलझते ही रह जाते .


खैर जो भी ये वो सारी बातें थी जो मुझे कहानी थी और ये टिपण्णी भी काफी लम्बी हो चुकी है . मुझे लगता है कुछ दिनों में ये बहस जो अंतहीन तो है ही boring (नहीं आपकी bore वाली boring नहीं ) भी होती जाएगी . और अब इस रंगीन महफ़िल को मैं संगीन महफ़िल नहीं बनाना चाहती .
आपने जो सवाल किया है मै भी वही पूछना कहता हूँ विद्वानों से .....की आखिर इसे जारी क्यों रखा जाये...

Ranveer
23-01-2011, 03:09 PM
किसी भी विचार को यह कहकर नहीं टाला जा सकता की मेरे पास क्षमता है ..और बाकि के पास नहीं है..विचार के आदान प्रदान में कई तरह के व्यक्ति होतें हैं...और सब का मूल बराबर होता है ..सभी लोगों के मानसिक स्तर भी अलग अलग होतें हैं..फिर भी प्रस्तुति का हक तो सभी को है ..यहाँ विद्वता नहीं देखना है किसी को..अगर कोई सहमत है तो बताये की क्यों सहमत है और उसके क्या विचार हैं ...अधिक तथ्यों का प्रदर्शन करके ..और दुसरे को निचा दिखाकर अपने आप को सबसे ज्यादा समर्थ कोई न समझे ...हम कोई रिसर्च नहीं कर रहें हैं..हम केवल विचारों का आदान प्रदान कर रहें हैं ..और यहाँ सभी तरह के लोगों को बराबर सम्मान मिलाना चाहिए .

draculla
23-01-2011, 04:27 PM
@ranzsa main aap ke baat se bikul sahamat hun.......thanks

akamboj2000
23-01-2011, 04:57 PM
दोस्तो मैं मानता हूँ कि परिवार में यौन सम्बँध ये सब अपनी अपनी सोच के अनुसार सही या गलत है यदि किसी को इसमें कोई बुराई नहीं लगती तो मैं इसे कभी बुरा नही कहूँगा हाँ लेकिन इतना मैं मानता हूँ कि मैं अपने परिवार मे ऐसा नही करूंगा एक नूर ते सब जग उपजिया कौण भला कौ मँदा पर उन पर भला बुरा कहने वाले हम कौन हैं ये गलत कह कर सिर्फ अपने को संस्कारी दिखाना कितना सही है कोई कहता है कि वो समाज पर कलंक है यहाँ पर जो इन्हे गलत कहते है मैं ये कहने पर विवश हूँ कि वे सब निम्न मानसिकता वाले लोग हैं जो खुद सेक्स की खोज मे इधर उधर भटक रहे हैं और दूसरों को चरित्रहीन बता रहे हैं मैं उनसे पूछता हूँ यदि वो इतने चरित्रवान हैं तो फोरम पर ये सब क्यों पढ़ते हैं क्या यहाँ उनके सदचरित्र प्रमाण मिल रहा है

Ranveer
23-01-2011, 05:13 PM
अकिरा जी कृपया सूत्र को पूरा पढ़कर ही कुछ विचार दें ..हम लोगों ने किसी को बुरा भला अभी तक तो नहीं कहा है ..हाँ जहाँ तक अन्तर्वासना जैसे जगह पर आने की बात है तो इसका अर्थ यह कतई न समझें की हम अपने आपको पारिवारिक सेक्स का विरोध करके चरित्रवान साबित करना चाहतें हैं....हमलोग चरित्रवान नहीं हैं यह पहले भी कह चुके हैं..बस हम पारिवारिक सेक्स को अच्छा नहीं समझते ..चलो हम यह भी मान लेतें हैं की हम निम्न मानसिकता वालें लोग हैं....

akamboj2000
23-01-2011, 08:17 PM
अकिरा जी कृपया सूत्र को पूरा पढ़कर ही कुछ विचार दें ..हम लोगों ने किसी को बुरा भला अभी तक तो नहीं कहा है ..हाँ जहाँ तक अन्तर्वासना जैसे जगह पर आने की बात है तो इसका अर्थ यह कतई न समझें की हम अपने आपको पारिवारिक सेक्स का विरोध करके चरित्रवान साबित करना चाहतें हैं....हमलोग चरित्रवान नहीं हैं यह पहले भी कह चुके हैं..बस हम पारिवारिक सेक्स को अच्छा नहीं समझते ..चलो हम यह भी मान लेतें हैं की हम निम्न मानसिकता वालें लोग हैं....

अरे भाई आप ने जो सूत्र बनाया है वैसा सूत्र पहले भी बन चुका है शायद अभी कचरे के डिब्बे या अगम्यगमन सूत्र में है इँसेस्ट में यौन सम्बँध नामक सूत्र मे परिवार मे यौन सम्बँध रखने पर समाज पर कलंक तक की उपाधि दे डाली जो मुझे अच्छा नही लगा और मित्र मेरा से सम्बोधन आपको नही है

Miss Smarty Pants
23-01-2011, 08:46 PM
देवी ,:salut:
मैं आपके कई विचारों से सहमत हूं , कईओं से नहीं ....
पहला तो ये समझिये कि हम बहस नहीं कर रहे , जिसमें दो या तीन या अधिक पक्ष अपना अपना विचार एवं तथ्य सामने रखते हैं , अधिकतर सही या गलत का फैसला होने के लिए अथवा फिर किसी प्रकार के लाभ के वितरण के लिए , आदि आदि ....
और ना ही हम वाद विवाद कर रहें हें अपनी बात मनवाने कि लिए....
हम कर रहे हैं विचारों का आदान प्रदान .... और प्राप्त कर रहे हैं ज्ञान एक दूसरे से ! अतः इस प्रक्रिया के अंतहीन होने में ही लाभ है .... सीमित होने में नहीं .... क्योंकि ज्ञान के भण्डार असीमित होते हैं ....
हाँ , बहुत से लोग हैं इस मंच पर जिनके पास क्षमता नहीं है बौद्धिक वार्तालाप में भाग लेने की , लेकिन फिर भी वे ले रहे हैं भाग अपनी सीमित बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए !
दूसरा जो तुमने पुलिस सम्बंदित उदहारण दिया वो तो पूरे विश्व में युग युगान्तरों से व्यापक है.... मान्य है ...... हर जाति में ...प्रजाति में ....हर देश में ...प्रदेश में ....समयानुसार केवल रूप बदलता रहा है क़ानून और व्यवस्था का..... पहले धार्मिक नेता बताते थे सही और गलत की परिभाषा .....फिर कबीले के मुखिया ....फिर राजा ..... और अब कुछ सदियों से लिखित विधान ..... केवल भारत के पुरुषों को दोष देना उचित ना होगा ऐसे सन्दर्भ में ..... यदि सामजिक बंधन ना हों तो क्या भारत की सन्नारिया अनुचित व्यवहार नहीं करेंगी ? ..... सप्रेम :bloom:.... अनिल


जी हाँ आपकी बात में समझ रही हूँ... :) हरेक बात के कई पहलू होते हैं और किसी भी आदमी को अपना दिमाग उन्हें जानने और और समझने को खुला रखना चाहिए. मैं ये भी मानती हूँ की लोगों को एक दुसरे के दृष्टिकोणों को समझने का प्रयास करना चाहिए. यदि स्वस्थ्य विचारों का आदान प्रदान हो तो ये एक व्यक्ति के रूप में विकास का मौका देता है और उन्हें परिपक्क्व ही बनाता है. व्यक्तिगत रूप से मुझे खुद भी पसंद नहीं की लोग अपने विचारों पे ही अड़े रहे... लेकिन थाली का बैंगन भी मैं नहीं बनना चाहती. हाँ अगर आपके कुछ विचार हैं तो उन्हें सशक्त रूप से व्यक्त करना चाहिए. किसी भी बात पे बस बिना सोचे समझे धारणाएँ या विचार बना लेना अपरिप्पक्वता की ही निशानी है. यदि किसी चीज का समर्थन करते हैं तो क्यूँ करते हैं, नहीं करते हैं तो क्यूँ नहीं करते हैं... अब इन सवालों का जवाब कोई इस रूप में दे की बस मन करता है तो करते हैं, सुविधा है तो करते हैं... तो जाहिर ऐसे मौके पे क्या विचारों का आदान प्रदान होगा? कुछ लोग पलट के आप पे ही कीचड उछालने लग जायेंगे ..इंग्लिश की कहावत याद आ जाती है.. Offense is the best defense . ये सब बड़ा बचकाना सा लगता है. यहाँ भी जो बहस चल रही है इसके भी कई पहलू हैं, अब ये तो लोगो पे डिपेंड करता है की वो इसका wrong or right पहलू देखें या सभी पहलुओं पे गौर फरमाएं.

हाँ इस बात पे आपसे सहमत हूँ ज्ञान का भंडार असीमित है और ये एक प्रकार से अंतहीन ही है :)

ये जो बलात्कार वाली बात मैंने कही थी उसका सम्बन्ध जाहिर है सिर्फ भारतियों पुरुषों से नहीं है. यदि ऐसा होता तो तब तो मैं ये मानने की गलती करती हूँ की पारिवारिक सेक्स या बलात्कार सिर्फ भारत मैं होता है और कही नहीं. बस मेरा कहना यह है की हमारी सामाजिक शिक्षा दीक्षा ऐसी नहीं जो हमें एक मजबूत और संयमित होने को प्रेरित करें. हाँ धार्मिक पुस्तके हैं कहानिया हैं लेकिन लोग तो उन्हें ये कह के ख़ारिज कर देते हैं वो तो भगवान थे हम तो अदने से इन्सान है. और परिवार और स्कूल के स्तर पे भी इस दिशा में कोई पहल नहीं की जाती कैसे कोई मनुष्य चारित्रिक रूप से दृढ बने. (यहाँ चरित्र का मतलब इसकी संकीर्ण परिभाषा नहीं है) उन स्थितियों में जब आप में यौन कुंठाएं भी पैदा हो तो फिर विस्फोट की स्तिथि हो जाती है. बस उस बात का इतना ही मतलब था.

यहाँ मसला कुछ और ज्यादा का है. जैसा की मैंने पहले भी कहा की हर समाज मैं ऐसे लोग होते ही हैं और होते रहेंगे बस उनी संख्या न बढे न हम बढ़ाने के उपाय करें खास कर के तब जब हम उसे सँभालने की स्तिथि मैं नहीं हैं.

Ranveer
23-01-2011, 09:02 PM
अरे भाई आप ने जो सूत्र बनाया है वैसा सूत्र पहले भी बन चुका है शायद अभी कचरे के डिब्बे या अगम्यगमन सूत्र में है इँसेस्ट में यौन सम्बँध नामक सूत्र मे परिवार मे यौन सम्बँध रखने पर समाज पर कलंक तक की उपाधि दे डाली जो मुझे अच्छा नही लगा और मित्र मेरा से सम्बोधन आपको नही है
दोस्त मै अभी तक इन्सेस्ट वाले सूत्र में नहीं गया इसीलिए मुझे पता नहीं की वहां क्या बोलतें हैं...पर मुझे यह जरुर लगता है की विचारों के आदान प्रदान में लाचिलता और शालीनता होनी चाहिए...और अगर यह क्रम न टूटे तो मुझे ख़ुशी होगी...खैर जो भी हो मेरी गुज़ारिश होगी की बातचीत को पर्सनल न लें..और बेहूदा कटाक्ष न करें..धन्यवाद्...

Ranveer
23-01-2011, 09:43 PM
मै एक बात ये कहना चाहता हूँ की पारिवारिक सेक्स के अगर किसी पहलू को स्वीकार किया जा सकता है तो वो यह हो सकता है की किशोरावस्था में अनजाने में अगर भूल हो जाती है और व्यक्ति को यह अहसास होता है की उससे भूल हुई है..तो वह भूल माफ़ी के काबिल है ..क्योंकि ऐसा वह अपनी सेक्स की उत्कंठा पूरी करने के लिए करता है..जैसा की gi -spot का कहना है ...पर समस्या तो यहाँ हो जाती है जब व्यक्ति को यह लगता है की बाहर सेक्स करने की बजाये घर में करना ज्यादा सुरक्षित है...यह समस्या इसीलिए आती है क्योंकि हमारे समाज में वैश्यायों के पास जाने या खुलकर एक दुसरे लड़के -लड़किओं के साथ सेक्स करने का विकल्प नहीं है ..अगर विकल्प हो तो इस समस्या का निदान काफी हद तक हो सकता है..जैसा की चीन में हुआ...हमें समाज में धीरे धीरे खुलापन लाना चाहिए ...मेरी नज़र में ये अनैतिक न होगा...

Ranveer
24-01-2011, 02:12 AM
मै यहाँ पर नया आया हूँ ...पर मुझे यह लगता है की पिछले अन्तर्वासना में इस मुद्दे पर काफी लम्बी बहस हो चुकी है ..इसीलिए विचारों में गतिशीलता की कमी है ..

Ranveer
24-01-2011, 02:17 AM
लेकिन मैं फिर भी चाहूँगा की लोग इसके विभिन्न पहलुओं को हमारे सामने रखे...

dev b
25-01-2011, 09:29 AM
प्रिय मित्र नमस्कार , कैसे है आप ?मित्र हो सकता है की आप का बौधिक ज्ञान मुझ से ज्यादा हो, मुझे आप ने लिखा कि --( मुझे पर्याय और विलोम का अंतर पता नहीं है और ना ही मुझे शब्दों का चयन करना करना आता है
और बौधिक वार्तालाप में भाग लेना मेरे बस का नहीं )प्रिय मित्र बिना किसी बौधिक ज्ञान के ही में लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित हो कर आज १ सरकारी इंजिनियर हु . मित्र मै घमंड नहीं कर रहा हु और ना ही आप कि बौधिक क्षमता को मै चुनौती दे रहा हु , प् रंतु मित्र सवाल ये है कि क्या कुतर्क कर के और अपने परिवार में सेक्स सम्बन्ध को उचित ठहरा कर क्या आप वास्तव मै समाज के प्रबुद्ध नागरिक कि श्रेणी मे आते है . निर्णय आप नहीं को करना है मित्र , मे इस बारे मे को टिपण्णी करना नहीं चाहूँगा ,मेने किसी से अपने चरित्रवान होने का प्रमाण पत्र नहीं माँगा है ,ये तो ख़ुशी कि बात है मिय्त्र , कि इस फोरम पर मुझ जैसे लोगो कि संख्या बढती जा रही है ........आप का अपना देव भारद्वाज
मित्र , मेरी आपसे एक सलाह है कि आप अपने ज्ञान और परिपक्वता का स्तर थोड़ा ऊपर करे ... शब्दों का चयन करना सीखें .... पर्याय एवं विलोम का अंतर समझे .... तभी बौद्धिक विचारों पर टिप्पणियाँ करें ..... केवल इस लिए ना करे कि आप ऐसा कर सकते हैं ..... अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए बहुत से सूत्र हैं ..... नाना प्रकार की निरर्थक प्रविष्टियाँ हैं जहां आप अपनी उपस्थिति दर्शा सकते हैं ..... बौद्धिक वार्तालाप में भाग लेना आप जैसे महानुभावों के बस का नहीं ..... मैं अपने स्तर को जानता हूं इसी लिए ये काफी सोच और समझ कर लिख रहा हूं , क्यों कि मैं जानता हूं कि आपका ज्ञान स्तर कहाँ तक सीमित है . मेरी टिप्पणी आपत्ति जनक हो सकती है लेकिन मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं .... मैं सच को झुटला नहीं सकता .... वैसे बता दूं कि आप जैसे महानुभावों , नर व नारियाँ , की संख्या बढती जा रही है इस फोरम पर ! :BangHead: ... अनिल

dev b
25-01-2011, 09:36 AM
प्रिय मित्र मे आप कि बात से सहमत हु , धन्यवाद आप का
किसी भी विचार को यह कहकर नहीं टाला जा सकता की मेरे पास क्षमता है ..और बाकि के पास नहीं है..विचार के आदान प्रदान में कई तरह के व्यक्ति होतें हैं...और सब का मूल बराबर होता है ..सभी लोगों के मानसिक स्तर भी अलग अलग होतें हैं..फिर भी प्रस्तुति का हक तो सभी को है ..यहाँ विद्वता नहीं देखना है किसी को..अगर कोई सहमत है तो बताये की क्यों सहमत है और उसके क्या विचार हैं ...अधिक तथ्यों का प्रदर्शन करके ..और दुसरे को निचा दिखाकर अपने आप को सबसे ज्यादा समर्थ कोई न समझे ...हम कोई रिसर्च नहीं कर रहें हैं..हम केवल विचारों का आदान प्रदान कर रहें हैं ..और यहाँ सभी तरह के लोगों को बराबर सम्मान मिलाना चाहिए .

dev b
25-01-2011, 09:41 AM
प्रिय मित्र मे आप से सहमत हु , दो वयस्कों को आजादी मिलनी चाहिए , तभी अपने परिवार में सेक्स संबंधो कि जो समाज कि बुराई है वहा तभी दूर होगी ...आप का अपना देव भारद्वाज
मै एक बात ये कहना चाहता हूँ की पारिवारिक सेक्स के अगर किसी पहलू को स्वीकार किया जा सकता है तो वो यह हो सकता है की किशोरावस्था में अनजाने में अगर भूल हो जाती है और व्यक्ति को यह अहसास होता है की उससे भूल हुई है..तो वह भूल माफ़ी के काबिल है ..क्योंकि ऐसा वह अपनी सेक्स की उत्कंठा पूरी करने के लिए करता है..जैसा की gi -spot का कहना है ...पर समस्या तो यहाँ हो जाती है जब व्यक्ति को यह लगता है की बाहर सेक्स करने की बजाये घर में करना ज्यादा सुरक्षित है...यह समस्या इसीलिए आती है क्योंकि हमारे समाज में वैश्यायों के पास जाने या खुलकर एक दुसरे लड़के -लड़किओं के साथ सेक्स करने का विकल्प नहीं है ..अगर विकल्प हो तो इस समस्या का निदान काफी हद तक हो सकता है..जैसा की चीन में हुआ...हमें समाज में धीरे धीरे खुलापन लाना चाहिए ...मेरी नज़र में ये अनैतिक न होगा...

dev b
25-01-2011, 09:53 AM
धन्यवाद मित्र अछा लगा कि आप कि अपने परिवार के मर्यादित लोगो से सेक्स संबंधो के खिलाफ है
hi i m rajan & i m new on forum but aap sab ki baaton se mai b agree karta hu. kripya krke muje b udate krte rahiyega.

dev b
25-01-2011, 10:03 AM
प्रिय मित्र . आप को विचारों से सहमत होने या ना होने का पूरा अधिकार है , परन्तु किसी कि बौधिक क्षमता का आकलन करने वाले आप और हम कौन होते है ? आप के पास व्यापक बुधि है , प्रिय मित्र आप से अनुरोध है कि इस बुधि का प्रयोग समाज को उन्नति कि और ले जाने में करे ,,आप का अपना देव भारद्वाज


देवी ,:salut:
मैं आपके कई विचारों से सहमत हूं , कईओं से नहीं ....
पहला तो ये समझिये कि हम बहस नहीं कर रहे , जिसमें दो या तीन या अधिक पक्ष अपना अपना विचार एवं तथ्य सामने रखते हैं , अधिकतर सही या गलत का फैसला होने के लिए अथवा फिर किसी प्रकार के लाभ के वितरण के लिए , आदि आदि ....
और ना ही हम वाद विवाद कर रहें हें अपनी बात मनवाने कि लिए....
हम कर रहे हैं विचारों का आदान प्रदान .... और प्राप्त कर रहे हैं ज्ञान एक दूसरे से ! अतः इस प्रक्रिया के अंतहीन होने में ही लाभ है .... सीमित होने में नहीं .... क्योंकि ज्ञान के भण्डार असीमित होते हैं ....
हाँ , बहुत से लोग हैं इस मंच पर जिनके पास क्षमता नहीं है बौद्धिक वार्तालाप में भाग लेने की , लेकिन फिर भी वे ले रहे हैं भाग अपनी सीमित बुद्धि का प्रदर्शन करने के लिए !
दूसरा जो तुमने पुलिस सम्बंदित उदहारण दिया वो तो पूरे विश्व में युग युगान्तरों से व्यापक है.... मान्य है ...... हर जाति में ...प्रजाति में ....हर देश में ...प्रदेश में ....समयानुसार केवल रूप बदलता रहा है क़ानून और व्यवस्था का..... पहले धार्मिक नेता बताते थे सही और गलत की परिभाषा .....फिर कबीले के मुखिया ....फिर राजा ..... और अब कुछ सदियों से लिखित विधान ..... केवल भारत के पुरुषों को दोष देना उचित ना होगा ऐसे सन्दर्भ में ..... यदि सामजिक बंधन ना हों तो क्या भारत की सन्नारिया अनुचित व्यवहार नहीं करेंगी ? ..... सप्रेम :bloom:.... अनिल

dev b
25-01-2011, 10:06 AM
मे भी सहमत हु मित्र , धन्यवाद
@ranzsa main aap ke baat se bikul sahamat hun.......thanks

akamboj2000
25-01-2011, 10:34 AM
मित्रो आप सभी की बौद्धिक क्षमता काफी विशाल है आप काफी अनुभवी भी लगते हो मुझे एक बात बताएँ अर्जुन कृष्ण की बुआ का लड़का था और उसका विवाह कृष्ण की बहन सुभद्रा से हुआ क्या यह नियति के विरुद्ध नही था यह सम्बँध तो कलयुग मे स्वीकार्य नही है तो द्वापर युग मे कैसे स्वीकार किया गया?

Miss Smarty Pants
25-01-2011, 11:00 AM
मित्रो आप सभी की बौद्धिक क्षमता काफी विशाल है आप काफी अनुभवी भी लगते हो मुझे एक बात बताएँ अर्जुन कृष्ण की बुआ का लड़का था और उसका विवाह कृष्ण की बहन सुभद्रा से हुआ क्या यह नियति के विरुद्ध नही था यह सम्बँध तो कलयुग मे स्वीकार्य नही है तो द्वापर युग मे कैसे स्वीकार किया गया?

इस बात का source जान सकती हूँ? क्यूंकि मैं तो पहली बार अर्जुन और कृष्ण के मध्य खून के रिश्ते की बात सुन रही हूँ.

Ranveer
25-01-2011, 11:12 AM
मित्रो आप सभी की बौद्धिक क्षमता काफी विशाल है आप काफी अनुभवी भी लगते हो मुझे एक बात बताएँ अर्जुन कृष्ण की बुआ का लड़का था और उसका विवाह कृष्ण की बहन सुभद्रा से हुआ क्या यह नियति के विरुद्ध नही था यह सम्बँध तो कलयुग मे स्वीकार्य नही है तो द्वापर युग मे कैसे स्वीकार किया गया?क्या कुंती और वासुदेव भाई बहन थे .....:question:ज़रा विस्तार से बताइए....

akamboj2000
25-01-2011, 11:18 AM
क्या कुंती और वासुदेव भाई बहन थे .....:question:ज़रा विस्तार से बताइए....

मित्र महाभारत मे कृष्ण कुँती को बुआ कहता है

Prince of India
25-01-2011, 01:28 PM
इस बात का source जान सकती हूँ? क्यूंकि मैं तो पहली बार अर्जुन और कृष्ण के मध्य खून के रिश्ते की बात सुन रही हूँ.

अर्जुन और कृष्ण के मध्य खून का रिश्ता नहीं था वो कुंती कृष्ण की दूर की बुआ थी.

akamboj2000
25-01-2011, 01:34 PM
अर्जुन और कृष्ण के मध्य खून का रिश्ता नहीं था वो कुंती कृष्ण की दूर की बुआ थी.

तो उस स्थिति मे भी सुभद्रा अर्जुन की बहन थी तो क्या वो उचित था ?

Miss Smarty Pants
25-01-2011, 02:10 PM
अर्जुन और कृष्ण के मध्य खून का रिश्ता नहीं था वो कुंती कृष्ण की दूर की बुआ थी.
चलिए किसी ने कोई source नहीं दिया तो मुझे खुद ही गूगल करना पड़ा क्यूंकि मैं इस बात से अनजान थी. एक उत्तर मिला इस लिंक पे, देख ले जरा.
http://in.answers.yahoo.com/question/index?qid=20090915084918AAjS8eS

वैसे अपनी दीदी की सास को आंटी बुलाती हूँ तो क्या मेरे जीजाजी रिश्ते में मेरे भाई हो गए?

akamboj2000
25-01-2011, 02:24 PM
चलिए किसी ने कोई source नहीं दिया तो मुझे खुद ही गूगल करना पड़ा क्यूंकि मैं इस बात से अनजान थी. एक उत्तर मिला इस लिंक पे, देख ले जरा.
http://in.answers.yahoo.com/question/index?qid=20090915084918AAjS8eS

वैसे अपनी दीदी की सास को आंटी बुलाती हूँ तो क्या मेरे जीजाजी रिश्ते में मेरे भाई हो गए?

क्या आप अपने बुआ के लड़के से शादी कर सकती है भले ही सगा न हो

arman_10388
25-01-2011, 02:30 PM
ye sahi nhi h ki insan har kisi ke sath sex karne ki soche ya kare kuch yese b hote h jo apni jivan me kafi haymit rakhte h me to iske bilkul khilaf hu

Miss Smarty Pants
25-01-2011, 02:32 PM
क्या आप अपने बुआ के लड़के से शादी कर सकती है भले ही सगा न हो

हाँ यदि मैं उसे राखी नहीं बांधती. आप तो जानते ही होंगे की बंगाल प्रदेश में लड़कियां अपने से बड़े उम्र के लडको को दादा कह के पुकारती हैं जिसका मतलब होता है भैया जैसा. कई बार तो उनकी शादी इन्ही में से किसी "दादा" के साथ भी हो जाती है..

(नहीं मैं बंगाल से नहीं हूँ :) )

Pooja1990 QUEEN
25-01-2011, 02:45 PM
wah majedar topic chal raha tha.

akamboj2000
25-01-2011, 02:57 PM
हाँ यदि मैं उसे राखी नहीं बांधती. आप तो जानते ही होंगे की बंगाल प्रदेश में लड़कियां अपने से बड़े उम्र के लडको को दादा कह के पुकारती हैं जिसका मतलब होता है भैया जैसा. कई बार तो उनकी शादी इन्ही में से किसी "दादा" के साथ भी हो जाती है..

(नहीं मैं बंगाल से नहीं हूँ :) )

काफी अच्छी जानकारी है G spot जी पर बात यह है कि इन सम्बँधोँ मे सेक्स करना उचित है या नही

akamboj2000
25-01-2011, 03:01 PM
wah majedar topic chal raha tha.

आप भी अपने अनमोल विचार व्यक्त करें

dev b
25-01-2011, 03:09 PM
प्रिय मित्र यहाँ पर बात केवल मर्यादित समंधो में सेक्स की हो रही है , ऐसे तो जब आप दूर के रिश्तो को निकालने लगेंगे तो दूर के रिश्तो में तो हो सकता है की पति -पत्नी भाई बहन निकल आये
तो उस स्थिति मे भी सुभद्रा अर्जुन की बहन थी तो क्या वो उचित था ?

gumnamm
25-01-2011, 03:09 PM
मनुष्य और पशु में एक फर्क है = मेघा या बुद्धि का
मनुष्य समाज के बनाए नियम कायदों में चलता है, पशु सिर्फ अपने पेट भरने के लिए जिन्दा रहता है
पशु में सेक्स एवं पेट की लिए भूख शांत करने के अतिरिक्त कोई भाव नहीं होता है
जबकि मनुष्य अपनी बुद्धि बल से पूरा जीवन जीता है.

यदि हम सामाजिक प्राणी हैं तो हमें समाज के नियम कायदों के अनुसार चलना चाहिए.
हमारा समाज जिन रिश्तों को मान्यता प्रदान करता है उनको हमें मानना चाहिए
यही संस्कार एवं परम्परा का तकाजा है.

मनुष्य अपने कुटेव के लिए दुनिया भर के तर्क देता है लेकिन अच्छे कार्य के लिए नहीं.
यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के उदाहरण सेक्स के संदर्भ में दिए जा रहे हैं तो क्या किसी ने भी श्री कृष्ण एवं अर्जुन के अन्य गुण ग्रहण करने की लेशमात्र कोशिश भी की है ??
फिर छिप कर अनैतिक कार्य करने का सीधा मतलब भीरूपन (कायरता) होता है, यदि ऐसा कार्य करते हैं तो फिर उन्ही से विवाह करने का दम भी होना चाहिए, असल मायनो में तो मर्द वही है.
दुनिया में कई धर्म, कई समाज हैं और हरेक के अपने कायदे हैं. सभी को अपने धर्म एवं अपने समाज का सम्मान करना चाहिए.

यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के ही उदाहरण दिए जा रहे हैं तो द्रौपदी के उदाहरण क्यों ना दिए जाएँ जिनके पांच पति थे. क्या कोई है ऐसा मर्द जो अपनी पत्नी के लिए इस प्रकार से सोच सकता है.....!!!!....????

dev b
25-01-2011, 03:10 PM
काफी अच्छी जानकारी है G spot जी पर बात यह है कि इन सम्बँधोँ मे सेक्स करना उचित है या नही

प्रिय मित्र यहाँ पर बात केवल मर्यादित समंधो में सेक्स की हो रही है , ऐसे तो जब आप दूर के रिश्तो को निकालने लगेंगे तो दूर के रिश्तो में तो हो सकता है की पति -पत्नी भाई बहन निकल आये

dev b
25-01-2011, 03:14 PM
दादा भाई मई आप से सहमत हु . मनुष्य और पशु मई १ सब से बड़ा अंतर यही है
मनुष्य और पशु में एक फर्क है = मेघा या बुद्धि का
मनुष्य समाज के बनाए नियम कायदों में चलता है, पशु सिर्फ अपने पेट भरने के लिए जिन्दा रहता है
पशु में सेक्स एवं पेट की लिए भूख शांत करने के अतिरिक्त कोई भाव नहीं होता है
जबकि मनुष्य अपनी बुद्धि बल से पूरा जीवन जीता है.

यदि हम सामाजिक प्राणी हैं तो हमें समाज के नियम कायदों के अनुसार चलना चाहिए.
हमारा समाज जिन रिश्तों को मान्यता प्रदान करता है उनको हमें मानना चाहिए
यही संस्कार एवं परम्परा का तकाजा है.

मनुष्य अपने कुटेव के लिए दुनिया भर के तर्क देता है लेकिन अच्छे कार्य के लिए नहीं.
यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के उदाहरण सेक्स के संदर्भ में दिए जा रहे हैं तो क्या किसी ने भी श्री कृष्ण एवं अर्जुन के अन्य गुण ग्रहण करने की लेशमात्र कोशिश भी की है ??
फिर छिप कर अनैतिक कार्य करने का सीधा मतलब भीरूपन (कायरता) होता है, यदि ऐसा कार्य करते हैं तो फिर उन्ही से विवाह करने का दम भी होना चाहिए, असल मायनो में तो मर्द वही है.
दुनिया में कई धर्म, कई समाज हैं और हरेक के अपने कायदे हैं. सभी को अपने धर्म एवं अपने समाज का सम्मान करना चाहिए.

यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के ही उदाहरण दिए जा रहे हैं तो द्रौपदी के उदाहरण क्यों ना दिए जाएँ जिनके पांच पति थे. क्या कोई है ऐसा मर्द जो अपनी पत्नी के लिए इस प्रकार से सोच सकता है.....!!!!....????

dev b
25-01-2011, 03:18 PM
दादा भाई सूत्र में पधार क्र अपने अमूल्य विचार देना के लिए आप का धन्यवाद
मनुष्य और पशु में एक फर्क है = मेघा या बुद्धि का
मनुष्य समाज के बनाए नियम कायदों में चलता है, पशु सिर्फ अपने पेट भरने के लिए जिन्दा रहता है
पशु में सेक्स एवं पेट की लिए भूख शांत करने के अतिरिक्त कोई भाव नहीं होता है
जबकि मनुष्य अपनी बुद्धि बल से पूरा जीवन जीता है.

यदि हम सामाजिक प्राणी हैं तो हमें समाज के नियम कायदों के अनुसार चलना चाहिए.
हमारा समाज जिन रिश्तों को मान्यता प्रदान करता है उनको हमें मानना चाहिए
यही संस्कार एवं परम्परा का तकाजा है.

मनुष्य अपने कुटेव के लिए दुनिया भर के तर्क देता है लेकिन अच्छे कार्य के लिए नहीं.
यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के उदाहरण सेक्स के संदर्भ में दिए जा रहे हैं तो क्या किसी ने भी श्री कृष्ण एवं अर्जुन के अन्य गुण ग्रहण करने की लेशमात्र कोशिश भी की है ??
फिर छिप कर अनैतिक कार्य करने का सीधा मतलब भीरूपन (कायरता) होता है, यदि ऐसा कार्य करते हैं तो फिर उन्ही से विवाह करने का दम भी होना चाहिए, असल मायनो में तो मर्द वही है.
दुनिया में कई धर्म, कई समाज हैं और हरेक के अपने कायदे हैं. सभी को अपने धर्म एवं अपने समाज का सम्मान करना चाहिए.

यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के ही उदाहरण दिए जा रहे हैं तो द्रौपदी के उदाहरण क्यों ना दिए जाएँ जिनके पांच पति थे. क्या कोई है ऐसा मर्द जो अपनी पत्नी के लिए इस प्रकार से सोच सकता है.....!!!!....????

Miss Smarty Pants
25-01-2011, 03:24 PM
काफी अच्छी जानकारी है G spot जी पर बात यह है कि इन सम्बँधोँ मे सेक्स करना उचित है या नही

उचित और अनुचित के प्रश्नों पे मैं पहले भी अपने विचार यहाँ प्रस्तुत कर चुकी हूँ. यदि आप इस सूत्र को follow करते आये है तो शायद पढ़ा होगा :)

gumnamm
25-01-2011, 03:30 PM
अर्जुन और कृष्ण के मध्य खून का रिश्ता नहीं था वो कुंती कृष्ण की दूर की बुआ थी.


तो उस स्थिति मे भी सुभद्रा अर्जुन की बहन थी तो क्या वो उचित था ?


चलिए किसी ने कोई source नहीं दिया तो मुझे खुद ही गूगल करना पड़ा क्यूंकि मैं इस बात से अनजान थी. एक उत्तर मिला इस लिंक पे, देख ले जरा.
http://in.answers.yahoo.com/question/index?qid=20090915084918AAjS8eS

वैसे अपनी दीदी की सास को आंटी बुलाती हूँ तो क्या मेरे जीजाजी रिश्ते में मेरे भाई हो गए?


क्या आप अपने बुआ के लड़के से शादी कर सकती है भले ही सगा न हो
जी हाँ सत्य यही है कि कुंती श्री कृष्ण की मुह बोली बुआ थी ना कि सगी.

फिर भी हम अपनी ओछी मानसिकता के लिए इस प्रकार की बहस नहीं कर सकते जहां धर्म को बेवजह बीच में लाया जाये.
हमें कोई हक़ नहीं बनता कि हम अधूरे ज्ञान के आधार पर अपनी मान्यताओं/परम्पराओं का अपमान करें.

यदि घर के रिश्ते छोड़ भी दिए जाएँ तो मनुष्य के पास जो ऑप्शन शेष रहते हैं वो लाखों गुना ज्यादा हैं. तो इन रिश्तो को अमर्यादित क्यों करें ???

gumnamm
25-01-2011, 03:39 PM
क्या आप अपने बुआ के लड़के से शादी कर सकती है भले ही सगा न हो
कालरा जी
पहली बात तो यहाँ दूर और पास के रिश्ते की कोई बात है ही नहीं. क्योंकि कुंती श्री कृष्ण की मुह बोली बुआ थी ना कि सगी
फिर मै थोडा सा ज्ञान वर्धन कर दूं, बहुत दूर के रिश्तों में कई जगह हिन्दू परिवारों में भी शादियाँ होती है.
एक समाज (जो हिन्दू धर्म का माना जाता है) जिसका मैं नाम यहाँ नही लिखना चाहता, उनके पूरे भारत में कुल ५,५०० ही आबादी है. अब यदि उनके यहाँ नाता प्रथा से विवाह का चलन हो तो क्या बड़ी बात है और उनके यहाँ नाता प्रथा से विवाह को बुरा भी नहीं माना जाता है.
(इनके यहाँ यदि महिला अपने पति से खुश नहीं है तो किसी भी अन्य मर्द के साथ चली जाती है जो उसे धन-धान्य से भरपूर सुख दे, अक्सर इसके लिए वो महिलायें जाने से पहले ही धन ले लेती हैं)
मेरे कथन का तात्पर्य ये है कि हम समाज मै रहते हैं तो हमें सामाजिक मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए.

akamboj2000
25-01-2011, 03:51 PM
मनुष्य और पशु में एक फर्क है = मेघा या बुद्धि का
मनुष्य समाज के बनाए नियम कायदों में चलता है, पशु सिर्फ अपने पेट भरने के लिए जिन्दा रहता है
पशु में सेक्स एवं पेट की लिए भूख शांत करने के अतिरिक्त कोई भाव नहीं होता है
जबकि मनुष्य अपनी बुद्धि बल से पूरा जीवन जीता है.

यदि हम सामाजिक प्राणी हैं तो हमें समाज के नियम कायदों के अनुसार चलना चाहिए.
हमारा समाज जिन रिश्तों को मान्यता प्रदान करता है उनको हमें मानना चाहिए
यही संस्कार एवं परम्परा का तकाजा है.

मनुष्य अपने कुटेव के लिए दुनिया भर के तर्क देता है लेकिन अच्छे कार्य के लिए नहीं.
यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के उदाहरण सेक्स के संदर्भ में दिए जा रहे हैं तो क्या किसी ने भी श्री कृष्ण एवं अर्जुन के अन्य गुण ग्रहण करने की लेशमात्र कोशिश भी की है ??
फिर छिप कर अनैतिक कार्य करने का सीधा मतलब भीरूपन (कायरता) होता है, यदि ऐसा कार्य करते हैं तो फिर उन्ही से विवाह करने का दम भी होना चाहिए, असल मायनो में तो मर्द वही है.
दुनिया में कई धर्म, कई समाज हैं और हरेक के अपने कायदे हैं. सभी को अपने धर्म एवं अपने समाज का सम्मान करना चाहिए.

यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के ही उदाहरण दिए जा रहे हैं तो द्रौपदी के उदाहरण क्यों ना दिए जाएँ जिनके पांच पति थे. क्या कोई है ऐसा मर्द जो अपनी पत्नी के लिए इस प्रकार से सोच सकता है.....!!!!....????

मेरे प्रश्न का ये कोई संतोषजनक उत्तर नही है सवाल उनके गुणों का नहीं उनके कृत्योँ का है

gumnamm
25-01-2011, 03:55 PM
मेरे प्रश्न का ये कोई संतोषजनक उत्तर नही है सवाल उनके गुणों का नहीं उनके कृत्योँ का है
ठीक है
मेरी बात का जवाब दीजिये
उन्होंने पहले गुण सीखे या पहले शादी की ?????

akamboj2000
25-01-2011, 04:10 PM
गुणों मे आज कोई भी परिपूर्ण नही हो सकता यहाँ बात अर्जुन और सुभद्रा के विवाह और सम्बँधोँ मे यौन सम्बँध की है यदि वह सही था तो आज के समय मे क्या उचित है क्या अनुचित है क्या आप ये बता सकते है मुझे परिवार मे सम्बँध अनुचित लगते हैं पर अगर मैं किसी और को ऐसा करने पर चरित्र की दुहाई दूँ ये कितना उचित है

gumnamm
25-01-2011, 04:28 PM
गुणों मे आज कोई भी परिपूर्ण नही हो सकता यहाँ बात अर्जुन और सुभद्रा के विवाह और सम्बँधोँ मे यौन सम्बँध की है यदि वह सही था तो आज के समय मे क्या उचित है क्या अनुचित है क्या आप ये बता सकते है मुझे परिवार मे सम्बँध अनुचित लगते हैं पर अगर मैं किसी और को ऐसा करने पर चरित्र की दुहाई दूँ ये कितना उचित है
प्रिय अनुज
आपने सिर्फ एक बात पर ध्यान दिया कि कृष्ण कुंती को बुआ कहते थे, ये ध्यान नहीं दिया कि वो उनकी मुह बोली बुआ थी ना कि सगी. पहले आप मनोयोग से महाभारत का अध्ययन करो.
फिर श्री कृष्ण जैसे के लिए यह कहना कि उन्होंने परम्परा तोड़ी....
जो खुद नियम से चलने के पक्षधर थे....

dev b
25-01-2011, 05:43 PM
दादा भाई आप ने बिलकुल ठीक कहा इस प्रकार अगर दूर के रिश्ते को देखने लगे तो पति - पत्नी ही आपस मै भाई बहन निकल आयेंगे किसी न किसी बहुत दूर के रिश्ते से . परन्तु नजदीकी रिश्ता देखा जाता है, और नजदीकी मर्यादित संबंधो में सेक्स उचित नहीं है ..
कालरा जी
पहली बात तो यहाँ दूर और पास के रिश्ते की कोई बात है ही नहीं. क्योंकि कुंती श्री कृष्ण की मुह बोली बुआ थी ना कि सगी
फिर मै थोडा सा ज्ञान वर्धन कर दूं, बहुत दूर के रिश्तों में कई जगह हिन्दू परिवारों में भी शादियाँ होती है.
एक समाज (जो हिन्दू धर्म का माना जाता है) जिसका मैं नाम यहाँ नही लिखना चाहता, उनके पूरे भारत में कुल ५,५०० ही आबादी है. अब यदि उनके यहाँ नाता प्रथा से विवाह का चलन हो तो क्या बड़ी बात है और उनके यहाँ नाता प्रथा से विवाह को बुरा भी नहीं माना जाता है.
(इनके यहाँ यदि महिला अपने पति से खुश नहीं है तो किसी भी अन्य मर्द के साथ चली जाती है जो उसे धन-धान्य से भरपूर सुख दे, अक्सर इसके लिए वो महिलायें जाने से पहले ही धन ले लेती हैं)
मेरे कथन का तात्पर्य ये है कि हम समाज मै रहते हैं तो हमें सामाजिक मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए.

gumnamm
25-01-2011, 05:50 PM
गुणों मे आज कोई भी परिपूर्ण नही हो सकता यहाँ बात अर्जुन और सुभद्रा के विवाह और सम्बँधोँ मे यौन सम्बँध की है यदि वह सही था तो आज के समय मे क्या उचित है क्या अनुचित है क्या आप ये बता सकते है मुझे परिवार मे सम्बँध अनुचित लगते हैं पर अगर मैं किसी और को ऐसा करने पर चरित्र की दुहाई दूँ ये कितना उचित है
यदि आप मेरी पूरी प्रविष्टियाँ पढेंगे तो आप पाएंगे कि मैंने एक कथन कहा है
यदि दम है तो सिर्फ शारीरिक रिश्ता ही नहीं विवाह भी करना चाहिए.
अर्थात किसी रिश्ते को कलंकित करके मत छोडिये.
यदि किसी ने विवाह करके निर्वाह भी किया है तो वह पूर्ण गलत नहीं है.
हालाँकि सामाजिक मान्यता से यह गलत होगा....

dev b
25-01-2011, 05:58 PM
दादा भाई में आप से सहमत हु , हम को अपने इतिहास से अछि चीजो को अंगीकार कर के अपनाना चाहिए . और बुराई को सुधारने का प्रयास करना चाहिए , परन्तु यंहा पर कुछ लोग ऐसे है जो कुतर्क कर के अपनी बात मनवाना चाहते है ......कम से कम अपने परिवार के मर्यादित संबंधो को तो सेक्स के लिए छोड़ ही देना चाहिए , बाकी सारी दुनिया पड़ी है .....
मनुष्य और पशु में एक फर्क है = मेघा या बुद्धि का
मनुष्य समाज के बनाए नियम कायदों में चलता है, पशु सिर्फ अपने पेट भरने के लिए जिन्दा रहता है
पशु में सेक्स एवं पेट की लिए भूख शांत करने के अतिरिक्त कोई भाव नहीं होता है
जबकि मनुष्य अपनी बुद्धि बल से पूरा जीवन जीता है.

यदि हम सामाजिक प्राणी हैं तो हमें समाज के नियम कायदों के अनुसार चलना चाहिए.
हमारा समाज जिन रिश्तों को मान्यता प्रदान करता है उनको हमें मानना चाहिए
यही संस्कार एवं परम्परा का तकाजा है.

मनुष्य अपने कुटेव के लिए दुनिया भर के तर्क देता है लेकिन अच्छे कार्य के लिए नहीं.
यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के उदाहरण सेक्स के संदर्भ में दिए जा रहे हैं तो क्या किसी ने भी श्री कृष्ण एवं अर्जुन के अन्य गुण ग्रहण करने की लेशमात्र कोशिश भी की है ??
फिर छिप कर अनैतिक कार्य करने का सीधा मतलब भीरूपन (कायरता) होता है, यदि ऐसा कार्य करते हैं तो फिर उन्ही से विवाह करने का दम भी होना चाहिए, असल मायनो में तो मर्द वही है.
दुनिया में कई धर्म, कई समाज हैं और हरेक के अपने कायदे हैं. सभी को अपने धर्म एवं अपने समाज का सम्मान करना चाहिए.

यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के ही उदाहरण दिए जा रहे हैं तो द्रौपदी के उदाहरण क्यों ना दिए जाएँ जिनके पांच पति थे. क्या कोई है ऐसा मर्द जो अपनी पत्नी के लिए इस प्रकार से सोच सकता है.....!!!!....????

akamboj2000
25-01-2011, 06:05 PM
यदि आप मेरी पूरी प्रविष्टियाँ पढेंगे तो आप पाएंगे कि मैंने एक कथन कहा है
यदि दम है तो सिर्फ शारीरिक रिश्ता ही नहीं विवाह भी करना चाहिए.
अर्थात किसी रिश्ते को कलंकित करके मत छोडिये.
यदि किसी ने विवाह करके निर्वाह भी किया है तो वह पूर्ण गलत नहीं है.
हालाँकि सामाजिक मान्यता से यह गलत होगा....

मैं आपकी बात से सहमत हूँ आपके कहने का मतलब की यदि सेक्स करो तो शादी भी जरूर करो

man-vakil
25-01-2011, 06:05 PM
तर्कों के आड़ में कुतर्क ही रचता रहा... स्वादों की चाह में प्रयोग करता रहा..
ये ना सोच पाया कभी भी नियमों के अहसास को... केवल चिंतन या मनन या फिर कृत्यों के सहवास को..
शायद कुछ थे नियम जो मानने जरुरी होते... शायद यही सोच हरदम हर किसी के साथ नहीं सोते...
कही तो प्रकृति ने भी दिए होंगे कुछ सिद्धांत ...तभी तो गुणसूत्रों को दिखा रचित बनाया नितांत...

dev b
25-01-2011, 06:06 PM
बिलकुल , दादा, लोगो में से अगर किसी १ के भी विचार अगर मेरे इस सूत्र से बदले तो मेरा इस सूत्र को बनाना सार्थक हो जाएगा ......लोग अपने परिवार से सेक्स के बारे में सोच भी कैसे सकते है , जब की सारी दुनिया पड़ी है ... कृपया निरंतर इस सूत्र को दिशा देते रहे दादा भाई ...आप का देव भारद्वाज
मनुष्य और पशु में एक फर्क है = मेघा या बुद्धि का
मनुष्य समाज के बनाए नियम कायदों में चलता है, पशु सिर्फ अपने पेट भरने के लिए जिन्दा रहता है
पशु में सेक्स एवं पेट की लिए भूख शांत करने के अतिरिक्त कोई भाव नहीं होता है
जबकि मनुष्य अपनी बुद्धि बल से पूरा जीवन जीता है.

यदि हम सामाजिक प्राणी हैं तो हमें समाज के नियम कायदों के अनुसार चलना चाहिए.
हमारा समाज जिन रिश्तों को मान्यता प्रदान करता है उनको हमें मानना चाहिए
यही संस्कार एवं परम्परा का तकाजा है.

मनुष्य अपने कुटेव के लिए दुनिया भर के तर्क देता है लेकिन अच्छे कार्य के लिए नहीं.
यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के उदाहरण सेक्स के संदर्भ में दिए जा रहे हैं तो क्या किसी ने भी श्री कृष्ण एवं अर्जुन के अन्य गुण ग्रहण करने की लेशमात्र कोशिश भी की है ??
फिर छिप कर अनैतिक कार्य करने का सीधा मतलब भीरूपन (कायरता) होता है, यदि ऐसा कार्य करते हैं तो फिर उन्ही से विवाह करने का दम भी होना चाहिए, असल मायनो में तो मर्द वही है.
दुनिया में कई धर्म, कई समाज हैं और हरेक के अपने कायदे हैं. सभी को अपने धर्म एवं अपने समाज का सम्मान करना चाहिए.

यदि श्री कृष्ण एवं अर्जुन के ही उदाहरण दिए जा रहे हैं तो द्रौपदी के उदाहरण क्यों ना दिए जाएँ जिनके पांच पति थे. क्या कोई है ऐसा मर्द जो अपनी पत्नी के लिए इस प्रकार से सोच सकता है.....!!!!....????

dev b
25-01-2011, 06:09 PM
आप बिलकुल ठीक बोल रहे हो मित्र
तर्कों के आड़ में कुतर्क ही रचता रहा... स्वादों की चाह में प्रयोग करता रहा..
ये ना सोच पाया कभी भी नियमों के अहसास को... केवल चिंतन या मनन या फिर कृत्यों के सहवास को..
शायद कुछ थे नियम जो मानने जरुरी होते... शायद यही सोच हरदम हर किसी के साथ नहीं सोते...
कही तो प्रकृति ने भी दिए होंगे कुछ सिद्धांत ...तभी तो गुणसूत्रों को दिखा रचित बनाया नितांत...

akamboj2000
25-01-2011, 06:13 PM
प्रिय अनुज
आपने सिर्फ एक बात पर ध्यान दिया कि कृष्ण कुंती को बुआ कहते थे, ये ध्यान नहीं दिया कि वो उनकी मुह बोली बुआ थी ना कि सगी. पहले आप मनोयोग से महाभारत का अध्ययन करो.
फिर श्री कृष्ण जैसे के लिए यह कहना कि उन्होंने परम्परा तोड़ी....
जो खुद नियम से चलने के पक्षधर थे....

भ्राता यदि महाभारत काल की सभी कथाएँ पढ़ी जाएँ तो कुछ झूठी भी लगती है उदाहरणतया कृष्ण जी ने गोपियोँ के साथ रास रचाया(जिसमे सेक्स किया गया) था परंतु ऐसा संभव नही है उस समय कृष्ण केवल 8 वर्ष के थे मुझे आपसे संतोषजनक उत्तर की आशा है

dev b
25-01-2011, 06:20 PM
प्रिय मित्र , राधा -- कृष्ण का पवित्र प्रेम , कृपया आप इस पवित्र प्रेम को सेक्स के साथ जोड़ कर ना देखे
भ्राता यदि महाभारत काल की सभी कथाएँ पढ़ी जाएँ तो कुछ झूठी भी लगती है उदाहरणतया कृष्ण जी ने गोपियोँ के साथ रास रचाया(जिसमे सेक्स किया गया) था परंतु ऐसा संभव नही है उस समय कृष्ण केवल 8 वर्ष के थे मुझे आपसे संतोषजनक उत्तर की आशा है

gumnamm
26-01-2011, 02:24 PM
भ्राता यदि महाभारत काल की सभी कथाएँ पढ़ी जाएँ तो कुछ झूठी भी लगती है उदाहरणतया कृष्ण जी ने गोपियोँ के साथ रास रचाया(जिसमे सेक्स किया गया) था परंतु ऐसा संभव नही है उस समय कृष्ण केवल 8 वर्ष के थे मुझे आपसे संतोषजनक उत्तर की आशा है
प्रिय अनुज
१. सेक्स के बारे में मेरी राय एकदम भिन्न है
२. सेक्स उम्र का मोहताज नहीं है, आठ वर्ष की उम्र में सेक्स के लिए इश्वर प्रदत्त शक्ति प्राप्त हो सकती है, मुझे ऐसे व्यक्ति का पता है जो इस उम्र से हस्तमैथुन करता रहा है
३. रास का मतलब सेक्स नहीं है, आज भी मंदिरों में रास लीलाएं होती हैं लेकिन उनमे भी सेक्स का समावेश कहीं नहीं दिखाया जाता. रास का मतलब गहन प्रेम अनुभूति से है.
४. मैंने महाभारत का अध्ययन मेरी शिक्षा के काल में ही किया था, रामायण का भी..... मुझे कुछ तथ्य पुनः यादाश्त में लाने के लिए मेहनत करनी होती है.
५. मैं कोशिश करूँगा कि सेक्स के वृहद ज्ञान के लिए शीघ्र ही एक सूत्र की रचना करूँ.
६. नियम, कायदे, कानून समय के अनुसार बदलते रहते हैं, हमें हमारे धर्म, समाज एवं मान्यताओं और परम्पराओं का सम्मान करके जीना चाहिए, ना कि अपनी हवस (इसमें तम्बाकू, दारु, चोरी, बलात्कार, हत्या आदि सभी कुटेव शामिल हैं) के लिए कुतर्क का सहारा लेना चाहिए
७. इश्वर ८० लाख योनियों के बाद मनुष्य योनि देते हैं, मनुष्य ही एकमात्र जीव है जो बुद्धि का सहारा लेते हुए जीवन जीता है. हमें नाम कमाने के लिए कर्म करने चाहियें ना कि गंवाने के लिए. हमारे नाम के साथ हमारे पुरखे तक भी सदनाम या बदनाम होते हैं.

dev b
24-04-2011, 09:45 PM
आप ने ठीक कहा दादा ..मै आप से सहमत हू
प्रिय अनुज
१. सेक्स के बारे में मेरी राय एकदम भिन्न है
२. सेक्स उम्र का मोहताज नहीं है, आठ वर्ष की उम्र में सेक्स के लिए इश्वर प्रदत्त शक्ति प्राप्त हो सकती है, मुझे ऐसे व्यक्ति का पता है जो इस उम्र से हस्तमैथुन करता रहा है
३. रास का मतलब सेक्स नहीं है, आज भी मंदिरों में रास लीलाएं होती हैं लेकिन उनमे भी सेक्स का समावेश कहीं नहीं दिखाया जाता. रास का मतलब गहन प्रेम अनुभूति से है.
४. मैंने महाभारत का अध्ययन मेरी शिक्षा के काल में ही किया था, रामायण का भी..... मुझे कुछ तथ्य पुनः यादाश्त में लाने के लिए मेहनत करनी होती है.
५. मैं कोशिश करूँगा कि सेक्स के वृहद ज्ञान के लिए शीघ्र ही एक सूत्र की रचना करूँ.
६. नियम, कायदे, कानून समय के अनुसार बदलते रहते हैं, हमें हमारे धर्म, समाज एवं मान्यताओं और परम्पराओं का सम्मान करके जीना चाहिए, ना कि अपनी हवस (इसमें तम्बाकू, दारु, चोरी, बलात्कार, हत्या आदि सभी कुटेव शामिल हैं) के लिए कुतर्क का सहारा लेना चाहिए
७. इश्वर ८० लाख योनियों के बाद मनुष्य योनि देते हैं, मनुष्य ही एकमात्र जीव है जो बुद्धि का सहारा लेते हुए जीवन जीता है. हमें नाम कमाने के लिए कर्म करने चाहियें ना कि गंवाने के लिए. हमारे नाम के साथ हमारे पुरखे तक भी सदनाम या बदनाम होते हैं.

Ranveer
24-04-2011, 09:54 PM
आप ने ठीक कहा दादा ..मै आप से सहमत हू

देव जी
लगता है की ये सूत्र रंगीन महफ़िल से यहाँ भेजा गया है
मै जानना चाहता हूँ की आपने डिमांड की थी या स्वम प्रबंधन के द्वारा ऐसा किया गया है ?

dev b
24-04-2011, 10:02 PM
मित्र ..मै इस सूत्र पर स्वस्थ्य चर्चा करना चाहता हू ...इस लिए मैंने ही डिमांड की थी मित्र ......मुझे इस सूत्र पर आप का सपोर्ट चाहिए मित्र ????????
देव जी
लगता है की ये सूत्र रंगीन महफ़िल से यहाँ भेजा गया है
मै जानना चाहता हूँ की आपने डिमांड की थी या स्वम प्रबंधन के द्वारा ऐसा किया गया है ?

Ranveer
24-04-2011, 10:06 PM
मित्र ..मै इस सूत्र पर स्वस्थ्य चर्चा करना चाहता हू ...इस लिए मैंने ही डिमांड की थी मित्र ......मुझे इस सूत्र पर आप का सपोर्ट चाहिए मित्र ????????



ठीक है महाराज ...:cool:

dev b
24-04-2011, 10:15 PM
ठीक है महाराज ...:cool:

आप का धन्यवाद मित्र

Ranveer
24-04-2011, 10:29 PM
देव जी
एक दो बातें हैं जो स्पष्ट होनी चाहिए -
अगर हम यहाँ पारिवारिक संबंधों का विरोध करतें हैं जो हमें जवाब मिलेगा की आपलोग इस विभाग में क्यूँ आयें हैं ?
नियम है की यहाँ इसके विरोधियों को आना ही नहीं है /
इस स्थिति में विरोध ही करना बेमानी हो जाएगा /
मेरी राय में इसे रंगीन महफ़िल में ही रहना चाहिए ताकि वहाँ दोनों पक्षों को बराबर सम्मान मिले /
यह बहुत संवेदनशील मामला है /

dev b
24-04-2011, 10:38 PM
आप ठीक कह रहे है मित्र ....कृपया आप ये सन्देश नियामक जी को भेजे ...
देव जी
एक दो बातें हैं जो स्पष्ट होनी चाहिए -
अगर हम यहाँ पारिवारिक संबंधों का विरोध करतें हैं जो हमें जवाब मिलेगा की आपलोग इस विभाग में क्यूँ आयें हैं ?
नियम है की यहाँ इसके विरोधियों को आना ही नहीं है /
इस स्थिति में विरोध ही करना बेमानी हो जाएगा /
मेरी राय में इसे रंगीन महफ़िल में ही रहना चाहिए ताकि वहाँ दोनों पक्षों को बराबर सम्मान मिले /
यह बहुत संवेदनशील मामला है /

jalwa
24-04-2011, 11:33 PM
मित्रों, क्योंकि यह सूत्र पारिवारिक अवैध संबंधों के विषय पर बना हुआ है इसलिए इसे किसी अन्य विभाग में नहीं रखा जा सकता. रहा सवाल अवैध संबंधों के विरोध करने का.. तो मित्रों, विरोध करने का भी एक उचित तरीका होता है. यदि आप संयमित भाषा में सही तरीके से किसी विषय में विचार विमर्श करते हैं तो वह अनुचित नहीं ठहराई जा सकती. हाँ... आप गाली गलौच ना करें और किसी को भला बुरा ना कहें .
क्योंकि यह एक बहुत संवेदनशील विषय है इस लिए सदस्य की मांग पर सूत्र को पुनः शुरू किया गया है. लेकिन अनैतिक संबंधों पर आधारित होने के कारण यहाँ स्थानांतरित किया गया है. वैसे तो यह विभाग केवल इन्सेस्ट पसंद करने वालों के लिए ही है परन्तु आप सभी भाषा में यहाँ अपनी बात भी रख सकते हैं. आगे यदि कोई परेशानी आती है तो उसका हल भी निकला जाएगा.

सभी इन्सेस्ट प्रेमियों से निवेदन है की इस सूत्र की मर्यादा बनाए रखते हुए केवल उचित विचार विमर्श ही करें. किसी को भला बुरा कहने का किसी को कोई अधिकार नहीं है. यदि कोई सदस्य मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया गया तो उचित कार्यवाही होगी.

Ranveer
24-04-2011, 11:41 PM
मित्रों, क्योंकि यह सूत्र पारिवारिक अवैध संबंधों के विषय पर बना हुआ है इसलिए इसे किसी अन्य विभाग में नहीं रखा जा सकता. रहा सवाल अवैध संबंधों के विरोध करने का.. तो मित्रों, विरोध करने का भी एक उचित तरीका होता है. यदि आप संयमित भाषा में सही तरीके से किसी विषय में विचार विमर्श करते हैं तो वह अनुचित नहीं ठहराई जा सकती. हाँ... आप गाली गलौच ना करें और किसी को भला बुरा ना कहें .
क्योंकि यह एक बहुत संवेदनशील विषय है इस लिए सदस्य की मांग पर सूत्र को पुनः शुरू किया गया है. लेकिन अनैतिक संबंधों पर आधारित होने के कारण यहाँ स्थानांतरित किया गया है. वैसे तो यह विभाग केवल इन्सेस्ट पसंद करने वालों के लिए ही है परन्तु आप सभी भाषा में यहाँ अपनी बात भी रख सकते हैं. आगे यदि कोई परेशानी आती है तो उसका हल भी निकला जाएगा.

सभी इन्सेस्ट प्रेमियों से निवेदन है की इस सूत्र की मर्यादा बनाए रखते हुए केवल उचित विचार विमर्श ही करें. किसी को भला बुरा कहने का किसी को कोई अधिकार नहीं है. यदि कोई सदस्य मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया गया तो उचित कार्यवाही होगी.

जलवा जी क्षमा करें
आपका जवाब संतोषजनक नहीं है
आपकी बातें और इस फोरम के नियम परस्पर विरोधी हैं
वैसे मेरी नज़र में यह सूत्र रंगीन महफ़िल विभाग में हो तो कोई नियमभंग नहीं होता
मैंने ये प्रश्न गुरूजी के समक्ष रख दिया है
आशा करता हूँ की कुछ तार्किक हल निकाला जाएगा

jalwa
24-04-2011, 11:46 PM
जलवा जी क्षमा करें
आपका जवाब संतोषजनक नहीं है
आपकी बातें और इस फोरम के नियम परस्पर विरोधी हैं
वैसे मेरी नज़र में यह सूत्र रंगीन महफ़िल विभाग में हो तो कोई नियमभंग नहीं होता
मैंने ये प्रश्न गुरूजी के समक्ष रख दिया है
आशा करता हूँ की कुछ तार्किक हल निकाला जाएगा

मित्र रणवीर जी, मैंने अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार जितना कर सकता था उतना किया. अब गुरूजी जो उचित समझेंगे वो कर देंगे. वैसे ये बहुत पेचीदा मामला है आशा है प्रशासक गण और वरिष्ठ नियामक जी इस मामले को यथाशीघ्र सुलझा लेंगे. तब तक आप अपने विचार रखना जारी रख सकते हैं.
धन्यवाद.

dev b
24-04-2011, 11:53 PM
प्रिय मित्र नमस्कार मै ऐसे पारिवारिक सदस्य , जिन के बीच मै सेक्स संबंधो को पसंद नहीं करता ,...इस सूत्र में इस की चर्चा कर के यदि मेने एक भी सदस्य के के विचारो को बदल दिया तो मेरा इस सूत्र को बनाना सार्थक हो जाएगा ,,,,प्रिय मित्र आप मुझ से ज्यादा जानते है , ..फिर भी मै १ बात बोलना चाहूँगा की ...इस विभाग में आने से पहले का ये नियम है की जिन को इस तरह का सेक्स पसंद ना हो वो इस विभाग में ना आये ........आप से मेरा अनुरोध है की कृपया आप पुरे सूत्र को पढ़ कर निर्णय ले ......मुझे पूरा विश्वाश है की सूत्र को पढने के बाद आप का जो भी निर्णय होगा , वो उचित ही होगा ...आप का अभिन्न मित्र .......देव बी
मित्रों, क्योंकि यह सूत्र पारिवारिक अवैध संबंधों के विषय पर बना हुआ है इसलिए इसे किसी अन्य विभाग में नहीं रखा जा सकता. रहा सवाल अवैध संबंधों के विरोध करने का.. तो मित्रों, विरोध करने का भी एक उचित तरीका होता है. यदि आप संयमित भाषा में सही तरीके से किसी विषय में विचार विमर्श करते हैं तो वह अनुचित नहीं ठहराई जा सकती. हाँ... आप गाली गलौच ना करें और किसी को भला बुरा ना कहें .
क्योंकि यह एक बहुत संवेदनशील विषय है इस लिए सदस्य की मांग पर सूत्र को पुनः शुरू किया गया है. लेकिन अनैतिक संबंधों पर आधारित होने के कारण यहाँ स्थानांतरित किया गया है. वैसे तो यह विभाग केवल इन्सेस्ट पसंद करने वालों के लिए ही है परन्तु आप सभी भाषा में यहाँ अपनी बात भी रख सकते हैं. आगे यदि कोई परेशानी आती है तो उसका हल भी निकला जाएगा.

सभी इन्सेस्ट प्रेमियों से निवेदन है की इस सूत्र की मर्यादा बनाए रखते हुए केवल उचित विचार विमर्श ही करें. किसी को भला बुरा कहने का किसी को कोई अधिकार नहीं है. यदि कोई सदस्य मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया गया तो उचित कार्यवाही होगी.

guruji
25-04-2011, 05:49 AM
अगमयगमन का शाब्दिक अर्थ है ना जाने योग्य स्थान पर जाना।
मामूली रूढ़ अर्थ निकालने पर इसका अर्थ है वर्जित स्थान पर जाना।
थोड़ा अधिक रूढ़ होने पर इसका मतलब निकलता है- ऐसे काम करना जिन्हें करने से मना किया गया हो।
पूर्ण रूढ़ अर्थ जो हम अपनी साईट पर निकालते हैं- वर्जित यौन सम्बन्ध
हिन्दू अथवा भारतीय संस्कृति में अपनी ब्याहता पत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों से यौन सम्बन्ध वर्जित है। शायद विश्व में प्रचलित सभी धर्म ऐसा ही कहते हैं।
लेकिन समाज के तौर तरीके धर्म से थोड़ा हट कर हो सकते हैं।
इसी कारण पूरे विश्व में वेश्या गमन प्रचलित है। कोई धर्म या समाज वेश्या गमन को मान्यता नहीं देता।(अपवाद हर स्थान पर होते हैं।)
भारतीय समाज में एक हद तक जीजा-साली और देवर-भाभी की यौन विषय चर्चा को मान्यता दी गई है। लेकिन इसमें यौन सम्बन्धों का कोई स्थान नहीं है, यह केवल स्वस्थ यौन मजाक तक या यौन शिक्षा तक सीमित है।
समय के साथ साथ जीजा-साली और देवर-भाभी के रिश्ते शक के दायरे में आने लगे क्योंकि वास्तविक जीवन में कहीं कहीं समाज द्वारा निर्धारित सीमा की उल्लंघना हो जाती थी।
लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में समाज द्वारा निर्धारित सीमा रेखा को और कानून को तोड़ना एक शौक और फ़ैशन बन गया है।
इसी कारण आज हम समाज में अगमयागमन देखते हैं।

guruji
25-04-2011, 05:55 AM
इस विषय के पक्ष में या विपक्ष में आप अपने विचार अभिवयक्त करने के लिए स्वतन्त्र हैं लेकिन किसी का नाम लेकर या बिना नाम लिए किसी से गाली गलौच करना, इस विषय के पक्षकारों को बुरा भला कहन, कोसना वर्जित है।
आप अपने निर्भीक विचार विषय के पक्ष या विपक्ष में रखें !

Ranveer
25-04-2011, 08:17 AM
अगमयगमन का शाब्दिक अर्थ है ना जाने योग्य स्थान पर जाना।
मामूली रूढ़ अर्थ निकालने पर इसका अर्थ है वर्जित स्थान पर जाना।
थोड़ा अधिक रूढ़ होने पर इसका मतलब निकलता है- ऐसे काम करना जिन्हें करने से मना किया गया हो।
पूर्ण रूढ़ अर्थ जो हम अपनी साईट पर निकालते हैं- वर्जित यौन सम्बन्ध
हिन्दू अथवा भारतीय संस्कृति में अपनी ब्याहता पत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों से यौन सम्बन्ध वर्जित है। शायद विश्व में प्रचलित सभी धर्म ऐसा ही कहते हैं।
लेकिन समाज के तौर तरीके धर्म से थोड़ा हट कर हो सकते हैं।
इसी कारण पूरे विश्व में वेश्या गमन प्रचलित है। कोई धर्म या समाज वेश्या गमन को मान्यता नहीं देता।(अपवाद हर स्थान पर होते हैं।)
भारतीय समाज में एक हद तक जीजा-साली और देवर-भाभी की यौन विषय चर्चा को मान्यता दी गई है। लेकिन इसमें यौन सम्बन्धों का कोई स्थान नहीं है, यह केवल स्वस्थ यौन मजाक तक या यौन शिक्षा तक सीमित है।
समय के साथ साथ जीजा-साली और देवर-भाभी के रिश्ते शक के दायरे में आने लगे क्योंकि वास्तविक जीवन में कहीं कहीं समाज द्वारा निर्धारित सीमा की उल्लंघना हो जाती थी।
लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में समाज द्वारा निर्धारित सीमा रेखा को और कानून को तोड़ना एक शौक और फ़ैशन बन गया है।
इसी कारण आज हम समाज में अगमयागमन देखते हैं।


इस विषय के पक्ष में या विपक्ष में आप अपने विचार अभिवयक्त करने के लिए स्वतन्त्र हैं लेकिन किसी का नाम लेकर या बिना नाम लिए किसी से गाली गलौच करना, इस विषय के पक्षकारों को बुरा भला कहन, कोसना वर्जित है।
आप अपने निर्भीक विचार विषय के पक्ष या विपक्ष में रखें !

गुरूजी
मेरे अन्दर अभी भी कुछ प्रश्न रह गएँ हैं कृपया निवारण करें -
प्रथम -
समाज में वेश्यागमन कोई विकृति नहीं है और न रही है ...प्राचीन काल से ही यह विश्व से अधिकाँश देशों में मौजूद रहा है
परन्तु अगमयागमन एक विकृति है जिसे कभी भी किसी भी समाज में मान्यता नहीं मिली और इसमें आपको कोई अपवाद भी नहीं मिल पायेगा /
पूर्व में मै कभी ये शब्द अगमयागमन से कभी परिचित नहीं हुआ था सिर्फ इसी साईट पर इस शब्द का अर्थ मुझे पता चला था
समाज में हमेशा वैसे लोग मौजूद रहें है जो कभी नियम को नहीं मानते न मानने की कोशिश करतें हैं
तो इस स्तिथि में उनके लिए दंड निर्धारित की जाती है केवल और केवल इसीलिए की ये समाज सकात्मक दिशा में आगे बढ़ता रहे
अगर समाज नकारात्मक दिशा में जाने लगता है तो नियम भंग होते हैं तब उस स्तिथि में संख्या देखी जाती है की कितने लोग किस पक्ष में हैं
अभी तक अगमयागमन को सही ठहराने वाले लोगों की संख्या इतनी नहीं हुई है की वो इसे समाज के नियम बदलने पर मजबूर कर दें
तब तक उनलोगों को जो इन्हें समाज के लिए घातक मानतें हैं , का ये कर्तव्य है की वे नियम संस्कारों को सुचारू रूप से चलने में मदद करें

द्वितीय -
मै एक कम्युनिस्ट विचारधारा का व्यक्ति होने के कारण सिर्फ धर्म के अनुसार नैतिकता का मानदंड तैयार करना ठीक नहीं समझता
धर्म किसी ख़ास वर्गों के हितों की रक्षा करता है इस स्तिथि में धर्म के अनुसार इनकी व्याख्या करने का मै समर्थन नहीं कर सकता
धर्म वाले और बिना धर्म वाले दोनों समाज में ये मान्य नहीं है
ये भौतिकता की चरम सीमा है जहां पर व्यक्ति इंसान कम जानवर अधिक हो जाता है
तृतीय -
इस सूत्र की दिशा अभी तक स्वच्छ रही है
परन्तु इस विभाग में आने के बाद यहाँ मौजूद अन्य सूत्रों की तरह लोग अपने माँ बहन के साथ संबंधों की चर्चा कहानियों के रूप में करना शुरू कर देंगें
इस स्तिथि में हमारा आपा खो देना लाज़मी होगा
मै इस विभाग में अब तक न के बराबर आता रहा इसीलिए की शुरू से कहा गया है की यहाँ वे लोग न आयें जो इसे पसंद नहीं करते
अब मुझे ये नहीं समझ में आ रहा की यदि हम इस विभाग में आ सकतें हैं तो इसका अर्थ है की क्या यहाँ मौजूद सभी सूत्रों पर अपना विरोध भी प्रकट कर सकतें हैं ?
अगर आपका कहना है की हाँ कर सकतें हैं तो फिर उस वाक्य का क्या अर्थ है जिसमे ये कहा गया है की यहाँ इसके विरोधी न जाएँ //
चतुर्थ -
यह सूत्र यदि रंगीन महफ़िल में हो तो हर्ज़ क्या है ?
जैसा की आप देख सकतें हैं की यह सूत्र शुरू से ही इस प्रकार के अन्य सूत्रों से अलग रहा है
और इसमें वैसी घटिया बातें नहीं की गयीं हैं जैसी इस विषय पर बने सूत्रों पर अब तक की जाती रही है

कृपया स्पष्ट करें
आपका अनुज

gumnamm
25-04-2011, 12:29 PM
मित्रों, क्योंकि यह सूत्र पारिवारिक अवैध संबंधों के विषय पर बना हुआ है इसलिए इसे किसी अन्य विभाग में नहीं रखा जा सकता. रहा सवाल अवैध संबंधों के विरोध करने का.. तो मित्रों, विरोध करने का भी एक उचित तरीका होता है. यदि आप संयमित भाषा में सही तरीके से किसी विषय में विचार विमर्श करते हैं तो वह अनुचित नहीं ठहराई जा सकती. हाँ... आप गाली गलौच ना करें और किसी को भला बुरा ना कहें .
क्योंकि यह एक बहुत संवेदनशील विषय है इस लिए सदस्य की मांग पर सूत्र को पुनः शुरू किया गया है. लेकिन अनैतिक संबंधों पर आधारित होने के कारण यहाँ स्थानांतरित किया गया है. वैसे तो यह विभाग केवल इन्सेस्ट पसंद करने वालों के लिए ही है परन्तु आप सभी भाषा में यहाँ अपनी बात भी रख सकते हैं. आगे यदि कोई परेशानी आती है तो उसका हल भी निकला जाएगा.

सभी इन्सेस्ट प्रेमियों से निवेदन है की इस सूत्र की मर्यादा बनाए रखते हुए केवल उचित विचार विमर्श ही करें. किसी को भला बुरा कहने का किसी को कोई अधिकार नहीं है. यदि कोई सदस्य मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया गया तो उचित कार्यवाही होगी.


जलवा जी क्षमा करें
आपका जवाब संतोषजनक नहीं है
आपकी बातें और इस फोरम के नियम परस्पर विरोधी हैं
वैसे मेरी नज़र में यह सूत्र रंगीन महफ़िल विभाग में हो तो कोई नियमभंग नहीं होता
मैंने ये प्रश्न गुरूजी के समक्ष रख दिया है
आशा करता हूँ की कुछ तार्किक हल निकाला जाएगा
नियमों के भावार्थ वही हैं जो जलवा जी ने स्पष्ट किये हैं. जो सदस्य इन्सेस्ट पसंद नहीं करते हैं वे भी यहाँ अपनी राय दे सकते हैं लेकिन संयम से, मैं खुद इन्सेस्ट पसंद नहीं करता हूँ लेकिन ऊपर मैंने भी उत्तर दिया है.
यहाँ आने के लिए मना उन्ही को किया गया है जो खुद पर नियंत्रण नहीं रखते हुए अनर्गल टिप्पणी करते हैं.

Ranveer
25-04-2011, 12:50 PM
नियमों के भावार्थ वही हैं जो जलवा जी ने स्पष्ट किये हैं. जो सदस्य इन्सेस्ट पसंद नहीं करते हैं वे भी यहाँ अपनी राय दे सकते हैं लेकिन संयम से, मैं खुद इन्सेस्ट पसंद नहीं करता हूँ लेकिन ऊपर मैंने भी उत्तर दिया है.
यहाँ आने के लिए मना उन्ही को किया गया है जो खुद पर नियंत्रण नहीं रखते हुए अनर्गल टिप्पणी करते हैं.

http://antarvasna.com/forum/showthread.php?t=502&page=14
http://antarvasna.com/forum/showthread.php?t=631&page=16

बड़े भैया
नमस्कार
उपरोक्त दोनों सूत्रों पर नज़र डालें
एक सूत्र है जिसमे स्वस्थ चर्चा है और दुसरा सूत्र है जो गाली गलौज से भरा है -
कृपया स्पष्ट करें की रंगीन महफ़िल में इस सूत्र को रखने से क्या समस्या हो सकती है ?
क्या इस विभाग के ऊपर ये लिखा होना की "" यहाँ पर वही जाए जो इसे पसंद करतें हैं "" सही है ?
इस उत्तर के बाद शायद मेरी शंका दूर हो जाए
अनुरोधपूर्वक
आपका अनुज

gumnamm
25-04-2011, 01:44 PM
http://antarvasna.com/forum/showthread.php?t=502&page=14
http://antarvasna.com/forum/showthread.php?t=631&page=16

बड़े भैया
नमस्कार
उपरोक्त दोनों सूत्रों पर नज़र डालें
एक सूत्र है जिसमे स्वस्थ चर्चा है और दुसरा सूत्र है जो गाली गलौज से भरा है -
कृपया स्पष्ट करें की रंगीन महफ़िल में इस सूत्र को रखने से क्या समस्या हो सकती है ?
क्या इस विभाग के ऊपर ये लिखा होना की "" यहाँ पर वही जाए जो इसे पसंद करतें हैं "" सही है ?
इस उत्तर के बाद शायद मेरी शंका दूर हो जाए
अनुरोधपूर्वक
आपका अनुज
मैं आपकी प्रविष्टि क्रमांक १५५ का उत्तर लिख ही रहा था कि नेट में व्यवधान उत्पन्न हो गया.
अनुज
मैं यहाँ उपरोक्त सभी बिन्दुओं पर चर्चा कर रहा हूँ, ये मेरे निजी विचार हैं इसलिए अन्य किसी से इनका मिलाप नहीं करें.
१. सेक्स एक प्राकृतिक एवं अत्यंत आवश्यक जीवन अंग हैं. शायद हम सभी इस से सहमत होंगे.
२. प्राकृतिक यौन सम्बन्ध सिर्फ लिंग और योनी द्वारा ही होता है.

अ) अन्य सभी प्रकार के सेक्स मनुष्य के दिमाग की उपज हैं यथा मुख मैथुन, गुदा मैथुन एवं हस्त मैथुन. इसके अतिरितिक कुछ गंदे किस्म के मैथुन हैं जैसे पशु एवं बाल सेक्स. मेरे अनुसार ये सभी अप्राकृतिक सेक्स हैं. मुख, गुदा और हस्त मैथुन का कई जगह पर विवरण किया गया है इसलिए लोग अक्सर इन्हें प्राकृतिक से ही मान लेते हैं लेकिन मैं नहीं मानता. कमोबेश ये सेक्स संतुष्टि के साधन मान लिए जाते हैं लेकिन पशु, बाल सेक्स और बलात्कार पूर्ण रूप से मनो-विकृति हैं.
ब) हस्त मैथुन क्योंकि किसी और के शामिल हुए बिना भी किया जा सकता हैं इसलिए यह निरापद मान लिया जाये तो कोई हर्ज नहीं.
स) सेक्स में बिना संतुष्टि के दिमाग असंतुलित हो जाता है और क्रोध, चिडचिडापन व् बेचैनी का बना रहना इसका लक्षण है. पुराने जमाने में इसके लिए एक साधन माना गया वेश्यागमन. उस समय तक इसके ज्यादा गलत नहीं माना जाता था और बहुत से उच्च वर्ग के व्यक्ति भी वेश्यागमन किया करते थे. क्योंकि भारतीय सभ्यता के अनुसार स्त्रियाँ सेक्स में रूचि नहीं लेती थी इसलिए पुरुष अपनी संतुष्टि के लिए वेश्यागमन कर लिया करते थे. मैं जहां तक मानता हूँ और मैंने जितने पुराने इतिहास का अध्ययन किया है, इस से अधिक रहस्य मैंने वेश्यागमन के लिए नहीं जाना है.
द) आज जब समय बहुत बदल गया है तो वेश्यागमन को अच्छा नहीं माना जाता, इसके कई प्रकार के कमजोर बिंदु हैं. एक तो यह सुरक्षित नहीं है इस से कई बीमारियों का जन्म होने की सम्भावना रहती है जो जानलेवा तक हैं. दूसरे यह पारिवारिक दृष्टि से ठीक नहीं है पुरुष अपनी ब्याहता को नेगलेक्ट कर देता है, तीसरी बात यह आर्थिक दृष्टि से भी ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार के संबंधों में अनाप-शनाप खर्चा होता है. चौथे यह पुरुष के अहम की मानसिकता के अतिरिक्त कुछ नहीं है, यह पुरुष प्रधान है और स्त्रियों की इच्छा यहाँ कोई मायने नहीं रखती है. पांचवें पुरुष ने तो अपनी संतुष्टि के लिए वेश्यागमन कर लिया लेकिन कोई असंतुष्ट स्त्री अपनी संतुष्टि के लिए परपुरुष गमन नहीं कर सकती.
३. अधिकतर समाज में अपने माता और पिता से सम्बंधित रिश्तों को आदर की दृष्टि से देखा जाता है और इनमे सेक्स संबंधों को मान्यता नहीं दी जाती है. यह परंपरा के रूप में आगे बढ़ता रहा है.
४. जो व्यक्ति इन रिश्तों में सेक्स सम्बन्ध रखते हैं और चोरी छिपे इस प्रकार के संबंधों में लिप्त रहकर इनको मान्यता देते हैं तो वे कायर हैं. उनको समाज के सामने पूरे हक़ के साथ अपने संबंधो को स्वीकार करके उनको निभाने की हिम्मत रखनी चाहिए.
५. यहाँ फोरम पर नियम है कि "यदि पसंद नहीं करते हैं तो"......... लेकिन यदि आप संयत रूप से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना चाहें तो पूरे फोरम पर भ्रमण कही भी करने के लिए आप स्वतंत्र हैं. नियम की पहली ही पंक्ति "यदि एक वाक्य में नियम देखा जाये तो इस प्रकार से है = संयमित भाषा में उचित विभाग में प्रविष्टि करें." है.
क्योंकि यह सूत्र स्पष्ट रूप से इन्सेस्ट से सम्बंधित है इसलिए इसे यहाँ इन्सेस्ट सेक्शन में रखा गया है.
लेकिन यदि कुछ प्रबुद्ध सदस्य इसे रंगीन महफ़िल में लेजाने के उपयुक्त कारण स्पष्ट करेंगे तो प्रबंधन को कोई एतराज नहीं होगा.
इसके अतिरिक्त आपकी किसी भी शंका समाधान की मैं पूर्ण कोशिश करूँगा.
आपके संयत व्यवहार में प्रविष्टियों के लिए धन्यवाद

Ranveer
25-04-2011, 02:08 PM
मैं आपकी प्रविष्टि क्रमांक १५५ का उत्तर लिख ही रहा था कि नेट में व्यवधान उत्पन्न हो गया.
अनुज
मैं यहाँ उपरोक्त सभी बिन्दुओं पर चर्चा कर रहा हूँ, ये मेरे निजी विचार हैं इसलिए अन्य किसी से इनका मिलाप नहीं करें.
१. सेक्स एक प्राकृतिक एवं अत्यंत आवश्यक जीवन अंग हैं. शायद हम सभी इस से सहमत होंगे.
२. प्राकृतिक यौन सम्बन्ध सिर्फ लिंग और योनी द्वारा ही होता है.

अ) अन्य सभी प्रकार के सेक्स मनुष्य के दिमाग की उपज हैं यथा मुख मैथुन, गुदा मैथुन एवं हस्त मैथुन. इसके अतिरितिक कुछ गंदे किस्म के मैथुन हैं जैसे पशु एवं बाल सेक्स. मेरे अनुसार ये सभी अप्राकृतिक सेक्स हैं. मुख, गुदा और हस्त मैथुन का कई जगह पर विवरण किया गया है इसलिए लोग अक्सर इन्हें प्राकृतिक से ही मान लेते हैं लेकिन मैं नहीं मानता. कमोबेश ये सेक्स संतुष्टि के साधन मान लिए जाते हैं लेकिन पशु, बाल सेक्स और बलात्कार पूर्ण रूप से मनो-विकृति हैं.
ब) हस्त मैथुन क्योंकि किसी और के शामिल हुए बिना भी किया जा सकता हैं इसलिए यह निरापद मान लिया जाये तो कोई हर्ज नहीं.
स) सेक्स में बिना संतुष्टि के दिमाग असंतुलित हो जाता है और क्रोध, चिडचिडापन व् बेचैनी का बना रहना इसका लक्षण है. पुराने जमाने में इसके लिए एक साधन माना गया वेश्यागमन. उस समय तक इसके ज्यादा गलत नहीं माना जाता था और बहुत से उच्च वर्ग के व्यक्ति भी वेश्यागमन किया करते थे. क्योंकि भारतीय सभ्यता के अनुसार स्त्रियाँ सेक्स में रूचि नहीं लेती थी इसलिए पुरुष अपनी संतुष्टि के लिए वेश्यागमन कर लिया करते थे. मैं जहां तक मानता हूँ और मैंने जितने पुराने इतिहास का अध्ययन किया है, इस से अधिक रहस्य मैंने वेश्यागमन के लिए नहीं जाना है.
द) आज जब समय बहुत बदल गया है तो वेश्यागमन को अच्छा नहीं माना जाता, इसके कई प्रकार के कमजोर बिंदु हैं. एक तो यह सुरक्षित नहीं है इस से कई बीमारियों का जन्म होने की सम्भावना रहती है जो जानलेवा तक हैं. दूसरे यह पारिवारिक दृष्टि से ठीक नहीं है पुरुष अपनी ब्याहता को नेगलेक्ट कर देता है, तीसरी बात यह आर्थिक दृष्टि से भी ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार के संबंधों में अनाप-शनाप खर्चा होता है. चौथे यह पुरुष के अहम की मानसिकता के अतिरिक्त कुछ नहीं है, यह पुरुष प्रधान है और स्त्रियों की इच्छा यहाँ कोई मायने नहीं रखती है. पांचवें पुरुष ने तो अपनी संतुष्टि के लिए वेश्यागमन कर लिया लेकिन कोई असंतुष्ट स्त्री अपनी संतुष्टि के लिए परपुरुष गमन नहीं कर सकती.
३. अधिकतर समाज में अपने माता और पिता से सम्बंधित रिश्तों में सेक्स संबंधों को आदर की दृष्टि से देखा जाता है और इनमे सेक्स संबंधों को मान्यता नहीं दी जाती है. यह परंपरा के रूप में आगे बढ़ता रहा है.
४. जो व्यक्ति इन रिश्तों में सेक्स सम्बन्ध रखते हैं और चोरी छिपे इस प्रकार के संबंधों में लिप्त रहकर इनको मान्यता देते हैं तो वे कायर हैं. उनको समाज के सामने पूरे हक़ के साथ अपने संबंधो को स्वीकार करके उनको निभाने की हिम्मत रखनी चाहिए.
५. यहाँ फोरम पर नियम है कि "यदि पसंद नहीं करते हैं तो"......... लेकिन यदि आप संयत रूप से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना चाहें तो पूरे फोरम पर भ्रमण कही भी करने के लिए आप स्वतंत्र हैं. नियम की पहली ही पंक्ति "यदि एक वाक्य में नियम देखा जाये तो इस प्रकार से है = संयमित भाषा में उचित विभाग में प्रविष्टि करें." है.
क्योंकि यह सूत्र स्पष्ट रूप से इन्सेस्ट से सम्बंधित है इसलिए इसे यहाँ इन्सेस्ट सेक्शन में रखा गया है.
लेकिन यदि कुछ प्रबुद्ध सदस्य इसे रंगीन महफ़िल में लेजाने के उपयुक्त कारण स्पष्ट करेंगे तो प्रबंधन को कोई एतराज नहीं होगा.
इसके अतिरिक्त आपकी किसी भी शंका समाधान की मैं पूर्ण कोशिश करूँगा.
आपके संयत व्यवहार में प्रविष्टियों के लिए धन्यवाद

बड़े भैया
पहले तो मै आपका आभार व्यक्त करना चाहूँगा की आपने मेरे संयमित व्यवहार की प्रशंशा की //
दूसरी बात केवल इतना ही कहना चाहता हूँ की मै ये सूत्र उन पूर्व के सारे सूत्रों से श्रेष्ठ बनाना चाहता हूँ जिसमे निम्न मानसिकता की झलक न मिलकर विभिन्न तार्किक विचारों के समावेश के रूप में सामने आये
यही कारण था मेरा इस बात की और इशारा करने का की इसे रंगीन महफ़िल में भेज दिया जाए
सबसे बड़ी वजह यह है की मुझे डर है की यह सूत्र उन सूत्रों की भाँती न हो जाए जो यहाँ पर पूर्व से ही मौजूद है
पर जैसा की आपने कहा की ये सूत्र इन्सिस्ट से ही सम्बंधित है इसीलिए इसे यहीं पर होना उपयुक्त है तो आपकी बात स्वीकार करूंगा //
आपके लगभग सभी तर्क मुझे बहुत अच्छे लगे //

धन्यवाद आपका

gumnamm
25-04-2011, 02:13 PM
http://antarvasna.com/forum/showthread.php?t=502&page=14
http://antarvasna.com/forum/showthread.php?t=631&page=16

बड़े भैया
नमस्कार
उपरोक्त दोनों सूत्रों पर नज़र डालें
एक सूत्र है जिसमे स्वस्थ चर्चा है और दुसरा सूत्र है जो गाली गलौज से भरा है -
कृपया स्पष्ट करें की रंगीन महफ़िल में इस सूत्र को रखने से क्या समस्या हो सकती है ?
क्या इस विभाग के ऊपर ये लिखा होना की "" यहाँ पर वही जाए जो इसे पसंद करतें हैं "" सही है ?
इस उत्तर के बाद शायद मेरी शंका दूर हो जाए
अनुरोधपूर्वक
आपका अनुज
आज आपकी शिकायत के कारण नियम विरुद्ध प्रविष्टियों के लिए कार्यवाही की जाएगी.

gumnamm
25-04-2011, 02:20 PM
बड़े भैया
यही कारण था मेरा इस बात की और इशारा करने का की इसे रंगीन महफ़िल में भेज दिया जाए
सबसे बड़ी वजह यह है की मुझे डर है की यह सूत्र उन सूत्रों की भाँती न हो जाए जो यहाँ पर पूर्व से ही मौजूद है
पर जैसा की आपने कहा की ये सूत्र इन्सिस्ट से ही सम्बंधित है इसीलिए इसे यहीं पर होना उपयुक्त है तो आपकी बात स्वीकार करूंगा //

प्रिय अनुज,
आप जैसे सदस्यों की निगाह में रहते हुए किसी भी सूत्र का विषय से भटक जाना असम्भव है
हमें ही यह कोशिश करनी होगी कि फोरम के सूत्र एक स्तर से नीचे नहीं आ जाएँ.
जब कभी और जहां आपको लगे कि स्तरहीन संवाद या प्रविष्टि है तो मुझे/किसी भी नियामक या प्रबन्धन सदस्य को सूचित कर दें अथवा शिकायत कर दें, तो फोरम के प्रति आप अपने कर्तव्य का निर्वाह करते रहेंगे.
पुनः धन्यवाद

Ranveer
25-04-2011, 02:23 PM
आज आपकी शिकायत के कारण नियम विरुद्ध प्रविष्टियों के लिए कार्यवाही की जाएगी.

धन्यवाद ....
मेरी नज़र में नियम वही होना चाहिए जो सर्वमान्य हो
और तोड़ने वाला भी स्वीकार करने पर विवश हो

dev b
25-04-2011, 11:06 PM
मित्र कृपया बताये की क्या.... जीजा साली और देवर भाभी के सेक्स सम्बन्ध ...आप के विचार से उचित है ?????????????????
धन्यवाद ....
मेरी नज़र में नियम वही होना चाहिए जो सर्वमान्य हो
और तोड़ने वाला भी स्वीकार करने पर विवश हो

Ranveer
26-04-2011, 03:24 PM
सबसे पहले मै आभार व्यक्त करता हूँ गुरूजी का
जिन्होंने इस विभाग में आने के लिए वो कंडीशन हटा ली है जिस पर लिखा था की "" केवल वही प्रवेश करें जो अगम्यागमन पसंद करतें है ''






मित्र कृपया बताये की क्या.... जीजा साली और देवर भाभी के सेक्स सम्बन्ध ...आप के विचार से उचित है ?????????????????


परिवार की जान आत्मीय सम्बन्ध है
किसी भी समाज में संबंधों की एक सीमा निर्धारित की गयी है
भारतीय हिन्दू समाज में भी अलग अलग सामाजिक संबंधों में स्पष्ट सीमा रेखा निर्धारित की गयी है /
परिवारों में देवर-भाभी और जीजा-साली के बीच हास-परिहास का रिश्ता सहज स्वीकार्य है
परन्तु इसकी मर्यादा भी वहीँ तक समित है
ये मर्यादा इसीलिए रखी गयी है पारिवारिक संबंधों में स्वच्छता और संतोष बना रहे और परिवार की नींव मज़बूत रहे
अतः नैतिक रूप से इनके बीच यौन सम्बन्ध सही नहीं है
अगर समाज मिलकर इन संबंधों पर सहमति प्रकट करता है तो ये नैतिक हो सकता है
क्या आप ऐसा चाहेंगे की समाज इसे मान्यता दे दे ?
अगर हाँ तो ठीक है /

आगे -
अन्य लोगों को आमंत्रित करें जो अपने विचार यहाँ रखें /

ravi chacha
26-04-2011, 07:19 PM
दोस्तों मेरे विचार से सेक्स अपने परिवार में या समंधिन्यो में , उन लोगो के साथ सेक्स नहीं करना चाहिए , जिस के किये समाज अनुमति नाहे देता..

दोस्तों, यह सूत्र परिवार में अनैतिक संबंधों के विषय में स्वस्थ चर्चा करने के उद्देश्य से बनाया गया है. कृपया कोई किसी पर छींटाकसी ना करें. और केवल तर्कपूर्ण तरीके से अपने विचार यहाँ रखें.
आप सभी से अनुरोध है की इस सूत्र में कोई वाद विवाद ना करें अन्यथा यह सूत्र प्रबंधन द्वारा बंद कर दिया जाएगा.पूरी दुनिया है इस काम के लिए अपना परिवार नहीं...
मेरे तरफ से ++रेपो स्वीकार करें रवि चाचा

ravi chacha
26-04-2011, 07:32 PM
आज इंसान पर भौतिक सुखों की चाहत इतनी हावी दिखाई देती है कि वह सही और गलत का फर्क समझकर भी नजरअंदाज कर देता है। यही विवेकहीनता भविष्य में जीवन में अशांति घोल देती है। जबकि सुखी और सफल जीवन बनाने में मात्र धन या सुविधाएं ही अहम नहीं होती, बल्कि वह सारे रिश्ते, भावनाएं व अदृश्य देव कृपा भी महत्व रखती हैं, जिनके बीच या साथ कोई व्यक्ति पनपता और जुड़ा रहता है।

हिन्दू धर्म ग्रंथ रामचरितमानस भी व्यावहारिक जीवन से जुड़े संदेश देता है। सुन्दरकाण्ड में लिखी चौपाई में इंसानी जीवन में रिश्तों के सही प्रबंधन के ऐसे सूत्र बताए गए हैं, जिनको समझ और अपनाकर भौतिक सुखों के साथ आध्यात्मिक सुख भी पाए जा सकते हैं। जानते हैं वह चौपाई और उसका अर्थ, जो श्रीराम और शरणागत विभीषण से संवाद के दौरान आई है -

जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बॉंध बरि डोरी।।

शाब्दिक सरल अर्थ जानें तो इस चौपाई में श्रीराम ने स्वयं बताया है कि उनको वह प्रिय है जो माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार के ममताभरे धागों को एक सूत्र में बांधकर उनके साथ मन को मेरे चरणों में बांध देता है।

संकेत यही है कि हर इंसान के जीवन में यहां बताए 10 रिश्तें अहम है। जिनके बिना जीवन संपूर्ण नहीं माना जाता। इनसे सही तालमेल और संतुलन होने पर ही हर इंसान चिंता, डर और दु:खों से दूर होता है। किंतु इनके साथ थोड़ा भी असंतुलन अशांति लाता है। इसलिए इन सुखों को स्थायी बनाने के लिए इन रिश्तों और खुशियों के साथ रहकर ईश्वर का स्मरण और भक्ति की जाए तो इंसान सुख-दु:ख में समान रहना सीख हर तरह से मजबूत भी बना रहता है। सार यही है कि गृहस्थ जीवन में सही संतुलन बनाने पर आध्यात्मिक जीवन और देव कृपा भी संभव है।

SHASWAT_BHARDWAJ
26-04-2011, 08:10 PM
पूरी दुनिया है इस काम के लिए अपना परिवार नहीं...
मेरे तरफ से ++रेपो स्वीकार करें रवि चाचा
सही कहा सर जी ! कह ते हैं की:- एक घर डायन भी छोर देती है. अब सभी अपनी रेंकिंग कर सकते हैं.

kusumrani
28-04-2011, 09:50 AM
एक समय था की जवान लड़कियां बाप के सामने नहीं पड़ती थी |तब उसे मर्यादा कहा जाता था ---आज बिकनी पहन कर टी वी पर आना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती है |---मर्यादाएं बदलती रहती हैं |---बेटी बाप भाई बहन के किस्से अब बड़े शहरों से निकल कर छोटे शहर होते हुए कस्बों और गाँव तक पंहुंच चुके है |ए तो मन बाप का कर्त्तव्य है की जवान होते हुए बच्चों के सेक्स का इंतजाम करें ---जहाँ तक हो सके बहरी दुनिया से बचना चाहिए ---इससे धोखा खाने की गुन्जाईस कम रहती है |जब घर में इंतजाम हो सकता है तो बाहर क्यूँ भटकना ?
धीरे धीरे आपसी रिश्तों में सेक्स भी मान्य हो जायेगा |बदलाव के शुरुआती दौर में जो लोग आगे आते हैं उन्हें आलोचना उठानी ही पडती है|

Ranveer
28-04-2011, 12:33 PM
एक समय था की जवान लड़कियां बाप के सामने नहीं पड़ती थी |तब उसे मर्यादा कहा जाता था ---आज बिकनी पहन कर टी वी पर आना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती है |---मर्यादाएं बदलती रहती हैं |---बेटी बाप भाई बहन के किस्से अब बड़े शहरों से निकल कर छोटे शहर होते हुए कस्बों और गाँव तक पंहुंच चुके है |ए तो मन बाप का कर्त्तव्य है की जवान होते हुए बच्चों के सेक्स का इंतजाम करें ---जहाँ तक हो सके बहरी दुनिया से बचना चाहिए ---इससे धोखा खाने की गुन्जाईस कम रहती है |जब घर में इंतजाम हो सकता है तो बाहर क्यूँ भटकना ?
धीरे धीरे आपसी रिश्तों में सेक्स भी मान्य हो जायेगा |बदलाव के शुरुआती दौर में जो लोग आगे आते हैं उन्हें आलोचना उठानी ही पडती है|
बदलाव या बिखराव ;-
हर रिश्ते का अपना एक मर्म है / जैसे -
" माँ " शब्द दया ...ममता ...त्याग ..करूणा ..सहनशीलता को प्रदर्शित करता है
अगर माँ का अर्थ एक घर में सभी को भोग लगाने वाली वेश्या के रूप में कर दें तो ..?
वो किसके लिए और क्यूँ भावना दिखा पाएगी ?
एक स्त्री के लिए माँ बनाना ,पत्नी बनाना ,बहन बनना, पुतोहू बनना .आदि आदि में क्या कोई अंतर नहीं है ?
उसका जीवन सेक्स संतुष्ट प्राप्त तो कर लेगा पर जीवन संतुष्टि मिलेगी कभी ?

जवानों के सेक्स के लिए शादी की व्यवस्था की गयी है
अगर उसका अपना परिवार ही सेक्स संतुष्टि देता है तो शादी की आवश्यकता ही नहीं है फिर क्यूँ शादी करतें हैं ये ?
अगर ये बदलाव चाहतें हैं तो समाज में खुलकर स्वीकार क्यूँ नहीं करते ? नहीं करते तो क्या साबित होता है -सिर्फ स्वार्थ और पाशविक इच्छा की पूर्ती /
ये लोग मुंह छिपाए क्यूँ रहते हैं ?
जब सब चेहरे छिपे हों तो कैसे कहा जा सकता है की ये समाज में मान्य हो जाएगा ?
अगर आपको कहा जाए समाज के सामने सहर्ष स्वीकार करने को तो कर पाओगी ?
कहाँ मर्यादा भंग हुई है सिर्फ चंद लोगों को छोड़कर जिन्हें सारी दुनिया अपने जैसी लगती है /

ए तो मन बाप का कर्त्तव्य है की जवान होते हुए बच्चों के सेक्स का इंतजाम करें ---जहाँ तक हो सके बहरी दुनिया से बचना चाहिए ---इससे धोखा खाने की गुन्जाईस कम रहती है |जब घर में इंतजाम हो सकता है तो बाहर क्यूँ भटकना ?
वही पुराना तर्क
" कर्तव्य " का क्या अर्थ है -सिर्फ सेक्स की पूर्ति करा देना ?

Ranveer
28-04-2011, 04:25 PM
मै बिलकुल साधारण शब्दों में कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ -

सूत्रधार ,मुझे या अधिकतर लोगों को किसी के पारिवारिक सेक्स की कल्पना करने पर कोई आपति नहीं है
इसी वजह से इस सूत्र को छोड़कर दुसरे किसी भी सूत्र में इसका विरोध नहीं किया जा रहा है
कोई भी सदस्य इस विभाग के अन्य सूत्रों में जाकर खुलकर मज़ा ले सकतें हैं
पर किसी को यदि तार्किक और विश्लेष्णात्मक सवाल जवाब करना हो तो वो इस सूत्र में आ सकता है
हमलोगों का उद्देश्य अपने आपको चरित्रवान साबित करना नहीं है
बस ये समझतें हैं की हर चीज़ की एक सीमा निर्धारित होनी चाहिए /

gumnamm
28-04-2011, 06:33 PM
एक समय था की जवान लड़कियां बाप के सामने नहीं पड़ती थी |तब उसे मर्यादा कहा जाता था ---आज बिकनी पहन कर टी वी पर आना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती है |---मर्यादाएं बदलती रहती हैं |---बेटी बाप भाई बहन के किस्से अब बड़े शहरों से निकल कर छोटे शहर होते हुए कस्बों और गाँव तक पंहुंच चुके है |ए तो मन बाप का कर्त्तव्य है की जवान होते हुए बच्चों के सेक्स का इंतजाम करें ---जहाँ तक हो सके बहरी दुनिया से बचना चाहिए ---इससे धोखा खाने की गुन्जाईस कम रहती है |जब घर में इंतजाम हो सकता है तो बाहर क्यूँ भटकना ?
धीरे धीरे आपसी रिश्तों में सेक्स भी मान्य हो जायेगा |बदलाव के शुरुआती दौर में जो लोग आगे आते हैं उन्हें आलोचना उठानी ही पडती है|

तो फिर चोरी छिपे क्यों ?
खम ठोंक कर पूरे समाज के सामने कहकर करना चाहिए
शादी भी कर लेनी चाहिए
फिर शादी से एतराज कैसा
जब मर्यादाएं ही बदलनी हैं तो खुल कर शुरुआत कीजिये

किसी जमाने में लोग बाग़ अपने घर के सदस्यों को बेच तक दिया करते थे
तो अब भी वैसा ही करने लगें
जंगली लोग कच्चा मांस खा लेते थे तो आज कौन जंगलीपन से दूर जा रहे हैं
सब उसी तरफ दौड़ लगा रहे हैं.
पहले जंगली कच्चा मांस खाते थे आज के लोग पूरा मनुष्य निगल लेते हैं.
पूरा समाज, मर्यादाएं और संस्कृति खा चुके हैं....
धन्य हैं ऐसे लोग...

क्या शिक्षा देंगे ऐसे लोग आने वाली पीढ़ी को ?
क्या संस्कृति रहेगी ?
क्या देश की पहचान होगी ?
क्या रिश्ते रह जायेंगे ?
एक ही जवाब है = निल (शून्य)

जरा सोचियेगा कि जब कोई बाप और बेटी मिलकर किसी सन्तान को जन्म देंगे तो उनकी औलाद अपने बाप को क्या कहेगी
नाना, दादा या पापा ?
वो बाप की असली बीवी को क्या बोलेगा = दादी या नानी ?
लड़की के भाई को वो संतान क्या बोलेगी = मामा या भाई ?

guruji
28-04-2011, 08:11 PM
इस विभाग के प्रवेश पर लिखा गया कथन सिर्फ़ इस लिए था कि जो लोग अगमयागमन पसंद नहीं करते वे यहाँ आकर व्यर्थ के विवाद उत्पन्न ना करें !

guruji
28-04-2011, 08:14 PM
जीजा-साली और देवर-भाभी के रिश्ते में खुलापन भी अपनी एक मर्यादा लिए हुए है।
इन रिश्तों में भारतीय समाज ने खुलापन सिर्फ़ शैक्षणिक दृष्टि से रखा है।
साली अपने मन की शंकाएँ अपने जीजा से बात करके दूर कर सके और देवर अपनी भाभी से बात करके अपनी जिज्ञासा शांत कर सके।

dev b
28-04-2011, 08:59 PM
बिलकुल ठीक कहा आप ने मित्र ......
मै बिलकुल साधारण शब्दों में कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ -

सूत्रधार ,मुझे या अधिकतर लोगों को किसी के पारिवारिक सेक्स की कल्पना करने पर कोई आपति नहीं है
इसी वजह से इस सूत्र को छोड़कर दुसरे किसी भी सूत्र में इसका विरोध नहीं किया जा रहा है
कोई भी सदस्य इस विभाग के अन्य सूत्रों में जाकर खुलकर मज़ा ले सकतें हैं
पर किसी को यदि तार्किक और विश्लेष्णात्मक सवाल जवाब करना हो तो वो इस सूत्र में आ सकता है
हमलोगों का उद्देश्य अपने आपको चरित्रवान साबित करना नहीं है
बस ये समझतें हैं की हर चीज़ की एक सीमा निर्धारित होनी चाहिए /

dev b
28-04-2011, 09:11 PM
मित्र विज्ञान ने भी लड़की का १८ साल और लड़का का २१ साल से कम उम्र में सेक्स को वर्जित बताया है इसी लिए विवाह की ये आयु सरकार द्वारा निर्धारित की गयी है .....माँ बाप अपने बच्चे की हर तरह से भलाई चाहते है ....आप माँ बाप से सेक्स की डिमांड कर के क्या सावित करना चाहती है ....क्या आप को समाज में परिवार के ढाचे पर विश्वास नहीं है ?/ ,,अगर मित्र ऐसा हो गया , जैसा की आप ने कहा ,तो हमारे समाज के परिवार का ढाचा चरमरा कर बिखर जाएगा
एक समय था की जवान लड़कियां बाप के सामने नहीं पड़ती थी |तब उसे मर्यादा कहा जाता था ---आज बिकनी पहन कर टी वी पर आना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती है |---मर्यादाएं बदलती रहती हैं |---बेटी बाप भाई बहन के किस्से अब बड़े शहरों से निकल कर छोटे शहर होते हुए कस्बों और गाँव तक पंहुंच चुके है |ए तो मन बाप का कर्त्तव्य है की जवान होते हुए बच्चों के सेक्स का इंतजाम करें ---जहाँ तक हो सके बहरी दुनिया से बचना चाहिए ---इससे धोखा खाने की गुन्जाईस कम रहती है |जब घर में इंतजाम हो सकता है तो बाहर क्यूँ भटकना ?
धीरे धीरे आपसी रिश्तों में सेक्स भी मान्य हो जायेगा |बदलाव के शुरुआती दौर में जो लोग आगे आते हैं उन्हें आलोचना उठानी ही पडती है|

dev b
28-04-2011, 09:17 PM
गुरु जी सादर नमस्कार ....देवर -भाभी और जीजा साली के बीच समाज में थोड़ा खुला पन इसी लिए था की देवर को अपनी भाभी से और साली को अपने जीजा से सेक्स की शिक्षा मिल सके
जीजा-साली और देवर-भाभी के रिश्ते में खुलापन भी अपनी एक मर्यादा लिए हुए है।
इन रिश्तों में भारतीय समाज ने खुलापन सिर्फ़ शैक्षणिक दृष्टि से रखा है।
साली अपने मन की शंकाएँ अपने जीजा से बात करके दूर कर सके और देवर अपनी भाभी से बात करके अपनी जिज्ञासा शांत कर सके।

dev b
28-04-2011, 09:23 PM
बिलकुल दादा आप ने ठीक कहा परिवार में संबंधो जो स्वरूप है ,,,,,अगर अगर पारिवारिक सेक्स पनपने लगा समाज में , तो परिवार का सारा ढाचा ही चरमरा जाएगा
तो फिर चोरी छिपे क्यों ?
खम ठोंक कर पूरे समाज के सामने कहकर करना चाहिए
शादी भी कर लेनी चाहिए
फिर शादी से एतराज कैसा
जब मर्यादाएं ही बदलनी हैं तो खुल कर शुरुआत कीजिये

किसी जमाने में लोग बाग़ अपने घर के सदस्यों को बेच तक दिया करते थे
तो अब भी वैसा ही करने लगें
जंगली लोग कच्चा मांस खा लेते थे तो आज कौन जंगलीपन से दूर जा रहे हैं
सब उसी तरफ दौड़ लगा रहे हैं.
पहले जंगली कच्चा मांस खाते थे आज के लोग पूरा मनुष्य निगल लेते हैं.
पूरा समाज, मर्यादाएं और संस्कृति खा चुके हैं....
धन्य हैं ऐसे लोग...

क्या शिक्षा देंगे ऐसे लोग आने वाली पीढ़ी को ?
क्या संस्कृति रहेगी ?
क्या देश की पहचान होगी ?
क्या रिश्ते रह जायेंगे ?
एक ही जवाब है = निल (शून्य)

जरा सोचियेगा कि जब कोई बाप और बेटी मिलकर किसी सन्तान को जन्म देंगे तो उनकी औलाद अपने बाप को क्या कहेगी
नाना, दादा या पापा ?
वो बाप की असली बीवी को क्या बोलेगा = दादी या नानी ?
लड़की के भाई को वो संतान क्या बोलेगी = मामा या भाई ?

Mr. laddi
30-04-2011, 02:43 PM
भाई चाहे जितने मर्ज़ी तर्क दो जो ये करता है या जो करना चाहता है उसे हम न तो रोक सकते है और ना ही वोह रुकेगा किसी के कहने से
ये वोह आग है ग़ालिब जो लगाये न लगे ,और बुझाये न बने
चाहे ये शेर इश्क के लिए लिखा गया है पर आज के पदार्थ वादी युग में इश्क और सेक्स का मतलब एक सा हो गया है शुरुआत चाहे इश्क से होती है पर कहानी का अगला मोड सेक्स ही होता है और जब सेक्स का उन्मांद चड़ता है तो वोह रिश्ते नहीं देखता
अब ये तो है नहीं के कोई अपनी किसी रिश्तेदार से चाहे वोह कोई भी हो ये जा के कहेगा या कहेगी मेरा आपसे सेक्स करने का दिल कर रहा है और वोह मान जाये
हर इस तरह के रिश्ते की कोई न कोई कहानी जरूर होती है ये तो है नहीं की भूख लगी और रोटी खा ली किसी न किसी की कोई न कोई मजबूरी या फिर हालात ही इस तरह के हो जाते है की आदमी जब तक कुछ सोच पाता है काम हो चूका होता है अब ये तो बाद की बात है की ये रिश्ता वो आगे किस तरह चलाते है कुछ तो संभल जाते हैं पर कई इसे अपना हक मान लेते है की एकांत मिला और हो गए शुरू
बस बहुत हो गया चाहे जितना भी लिख दो कम ही है
मैं समर्थन नहीं करता पर जिस के साथ ये होता है हम उसकी कल्पना नहीं कर सकते उसने उस वक्त क्या सोचा होगा करूँ या न ???????????

dev b
01-05-2011, 07:12 PM
आप का कहना सही है मित्र ...परन्तु इंसान और जानवर में कुछ तो फर्क होना चाहिए
भाई चाहे जितने मर्ज़ी तर्क दो जो ये करता है या जो करना चाहता है उसे हम न तो रोक सकते है और ना ही वोह रुकेगा किसी के कहने से
ये वोह आग है ग़ालिब जो लगाये न लगे ,और बुझाये न बने
चाहे ये शेर इश्क के लिए लिखा गया है पर आज के पदार्थ वादी युग में इश्क और सेक्स का मतलब एक सा हो गया है शुरुआत चाहे इश्क से होती है पर कहानी का अगला मोड सेक्स ही होता है और जब सेक्स का उन्मांद चड़ता है तो वोह रिश्ते नहीं देखता
अब ये तो है नहीं के कोई अपनी किसी रिश्तेदार से चाहे वोह कोई भी हो ये जा के कहेगा या कहेगी मेरा आपसे सेक्स करने का दिल कर रहा है और वोह मान जाये
हर इस तरह के रिश्ते की कोई न कोई कहानी जरूर होती है ये तो है नहीं की भूख लगी और रोटी खा ली किसी न किसी की कोई न कोई मजबूरी या फिर हालात ही इस तरह के हो जाते है की आदमी जब तक कुछ सोच पाता है काम हो चूका होता है अब ये तो बाद की बात है की ये रिश्ता वो आगे किस तरह चलाते है कुछ तो संभल जाते हैं पर कई इसे अपना हक मान लेते है की एकांत मिला और हो गए शुरू
बस बहुत हो गया चाहे जितना भी लिख दो कम ही है
मैं समर्थन नहीं करता पर जिस के साथ ये होता है हम उसकी कल्पना नहीं कर सकते उसने उस वक्त क्या सोचा होगा करूँ या न ???????????

kelvin_sinha
18-06-2011, 11:05 AM
दोस्तों हमारे समाज के नियम कानून यूँ ही नहीं बनाये गए हैं इसके पीछे बहोत ही गहरा विज्ञान है | बहोत सी ऐसी बातें हैं जिनके पीछे के विज्ञान को हम नहीं जानते इन्ही में से एक इन्सेस्ट भी है इन्सेस्ट सिर्फ इसलिए बुरा नहीं है क्योकि समाज इसकी अनुमति नहीं देता बल्कि इन्सेस्ट की वजह से जेनेटिक डिसऑड॔र हो सकता है जिससे भविष्य में आने वाली पीढ़िया कमजोर हो सकती हैं और ये बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी है| हमारे समाज में तो एक गोत्र में भी विवाह की मनाही है क्योकि ऐसा माना जाता है की सामान गोत्र के लोगों के पूर्वज आपस में सगे सम्बन्धी रहे होंगे किन्तु ये बात विज्ञान गलत साबित कर चूका है| इसलिए सामान गोत्र में विवाह करना कोई गलत बात नहीं है है लेकिन अपने सगे भाई बहिन या अन्य सगे रिश्तेदारों से यौन सम्बन्ध बनाना हर तरह से गलत है| कुछ लोग इस बारे में आदम और हव्वा का तर्क देते है की उनके बच्चों की शादी कैसी हुयी तो इस बारे में मैं आपको बता दूं की ये सिर्फ एक कहानी है और इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है| मैं ये मानता हूँ की पूर्व में यानि आदिमानव काल में इन्सेस्ट सम्बन्ध होते थे लेकिन बाद में जब हमारा विकास हुआ तो हम अलग अलग प्रजातियों में बाँट गए और सभ्यता के विकास होने के बाद हम में ज्ञान - विज्ञान की समझ आयी | तब के वैज्ञानिको ने पाया की जिन लोगो की संताने अपने ही परिवार में यौन संबंधो से प्राप्त हुयी हैं वो अन्य संतानों से कमजोर है | इस प्रकार लोग ये मानने लगे की ये इश्वर का आदेश है की परिवार में यौन सम्बन्ध न बनाये जाएँ| कालांतर में ऐसी बहोत सी बातें धर्म के नियम के रूप में बना दी गयी अगर परिवार में यौन सम्बन्ध गलत नहीं होते तो दुनिया के तमाम धर्मो में ये एक ही बात सामान रूप निषिद्ध नहीं होती| इसलिए दोस्तों मेरा ये कहना है की सबके लिए कोई न कोई होता जरूर है बस उसको ढूढने की जरूरत है सेक्स हमारी जरूरत है लेकिन इसको अपने ऊपर हावी न होने दे इसपर नियंत्रण रखे तभी मन जयेगा की आप असली मर्द हैं वरना सेक्स के गुलाम जानवर हैं.

VIDROHI NAYAK
18-06-2011, 07:16 PM
आज आधुनिकता की ओड़ में हम नैतिक मूल्यों का ह्राश करते जा रहे हैं...कल तक तो जिनके विषय में सोचने की हमारी हिम्मत नहीं थी आज हम उसकी खुलेआम चर्चा कर सकते हैं, तर्कवादी इससे सही भी ठहराते हैं और गलत भी ... सच तो यह है की ऐसे सम्बन्ध बनाने वाले लोगो को अगर अतीत में जाने का मौका दिया जाए तो यकीनन ९० प्रतिशत लोग इस कर्म को दुबारा नहीं करना चाहेंगे...फिर इसकी तरफदारी क्यों करते है वो? क्यों इसे सही ठहराते हैं? क्या इसलिए की वो खींचना चाहते हैं सभी को इस दलदल में या शर्म को बेशर्मी से छुपाते हैं ! क्या ऐसा परिवार अपनी भावी पीढ़ी को इन हरकतों में लिप्त देखना चाहता है? अगर हाँ तो खुल कर उन्हें सामने आना चाहिए , इस तरह छदम नामो के सहारे नहीं...! आखिर हम भी तो देखें की वो कितने मजबूत हैं अपने कुकर्मो के लेकर...

dev b
22-06-2011, 07:53 PM
आप ने बिलकुल ठीक कहा मित्र
दोस्तों हमारे समाज के नियम कानून यूँ ही नहीं बनाये गए हैं इसके पीछे बहोत ही गहरा विज्ञान है | बहोत सी ऐसी बातें हैं जिनके पीछे के विज्ञान को हम नहीं जानते इन्ही में से एक इन्सेस्ट भी है इन्सेस्ट सिर्फ इसलिए बुरा नहीं है क्योकि समाज इसकी अनुमति नहीं देता बल्कि इन्सेस्ट की वजह से जेनेटिक डिसऑड॔र हो सकता है जिससे भविष्य में आने वाली पीढ़िया कमजोर हो सकती हैं और ये बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी है| हमारे समाज में तो एक गोत्र में भी विवाह की मनाही है क्योकि ऐसा माना जाता है की सामान गोत्र के लोगों के पूर्वज आपस में सगे सम्बन्धी रहे होंगे किन्तु ये बात विज्ञान गलत साबित कर चूका है| इसलिए सामान गोत्र में विवाह करना कोई गलत बात नहीं है है लेकिन अपने सगे भाई बहिन या अन्य सगे रिश्तेदारों से यौन सम्बन्ध बनाना हर तरह से गलत है| कुछ लोग इस बारे में आदम और हव्वा का तर्क देते है की उनके बच्चों की शादी कैसी हुयी तो इस बारे में मैं आपको बता दूं की ये सिर्फ एक कहानी है और इसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है| मैं ये मानता हूँ की पूर्व में यानि आदिमानव काल में इन्सेस्ट सम्बन्ध होते थे लेकिन बाद में जब हमारा विकास हुआ तो हम अलग अलग प्रजातियों में बाँट गए और सभ्यता के विकास होने के बाद हम में ज्ञान - विज्ञान की समझ आयी | तब के वैज्ञानिको ने पाया की जिन लोगो की संताने अपने ही परिवार में यौन संबंधो से प्राप्त हुयी हैं वो अन्य संतानों से कमजोर है | इस प्रकार लोग ये मानने लगे की ये इश्वर का आदेश है की परिवार में यौन सम्बन्ध न बनाये जाएँ| कालांतर में ऐसी बहोत सी बातें धर्म के नियम के रूप में बना दी गयी अगर परिवार में यौन सम्बन्ध गलत नहीं होते तो दुनिया के तमाम धर्मो में ये एक ही बात सामान रूप निषिद्ध नहीं होती| इसलिए दोस्तों मेरा ये कहना है की सबके लिए कोई न कोई होता जरूर है बस उसको ढूढने की जरूरत है सेक्स हमारी जरूरत है लेकिन इसको अपने ऊपर हावी न होने दे इसपर नियंत्रण रखे तभी मन जयेगा की आप असली मर्द हैं वरना सेक्स के गुलाम जानवर हैं.

dev b
22-06-2011, 07:53 PM
आप ने बिलकुल ठीक कहा मित्र
आज आधुनिकता की ओड़ में हम नैतिक मूल्यों का ह्राश करते जा रहे हैं...कल तक तो जिनके विषय में सोचने की हमारी हिम्मत नहीं थी आज हम उसकी खुलेआम चर्चा कर सकते हैं, तर्कवादी इससे सही भी ठहराते हैं और गलत भी ... सच तो यह है की ऐसे सम्बन्ध बनाने वाले लोगो को अगर अतीत में जाने का मौका दिया जाए तो यकीनन ९० प्रतिशत लोग इस कर्म को दुबारा नहीं करना चाहेंगे...फिर इसकी तरफदारी क्यों करते है वो? क्यों इसे सही ठहराते हैं? क्या इसलिए की वो खींचना चाहते हैं सभी को इस दलदल में या शर्म को बेशर्मी से छुपाते हैं ! क्या ऐसा परिवार अपनी भावी पीढ़ी को इन हरकतों में लिप्त देखना चाहता है? अगर हाँ तो खुल कर उन्हें सामने आना चाहिए , इस तरह छदम नामो के सहारे नहीं...! आखिर हम भी तो देखें की वो कितने मजबूत हैं अपने कुकर्मो के लेकर...

Anjali_Trivedi
11-08-2011, 12:17 PM
इस विषय के पक्ष में या विपक्ष में आप अपने विचार अभिवयक्त करने के लिए स्वतन्त्र हैं लेकिन किसी का नाम लेकर या बिना नाम लिए किसी से गाली गलौच करना, इस विषय के पक्षकारों को बुरा भला कहन, कोसना वर्जित है।
आप अपने निर्भीक विचार विषय के पक्ष या विपक्ष में रखें !

"इस विषय के पक्षकारों को बुरा भला कहना, कोसना वर्जित है", इसका क्या मतलब है? incest के पक्षधर भी जानते हैं कि वह सम्माज का एक बहुत छोटा हिस्सा हैं, इसके बावजूद अगर वे समाज के बड़े हिस्से के जीवन मूल्यों का मजाक उड़ाएँ, उनको ढोंगी कहे, दकियानूसी कहें तो वह सब आपको स्वीकार है, परन्तु incest के विरोधियों को इसके पक्षकारों को बुरा भला कहना, कोसना वर्जित है! यह दोहरे मापदंड क्यों? यही सलाह आप incest के पक्षधरों को क्यों नहीं देते?

sonie
11-08-2011, 03:10 PM
आप ने बिलकुल ठीक कहा मित्र


Originally Posted by VIDROHI NAYAK
आज आधुनिकता की ओड़ में हम नैतिक मूल्यों का ह्राश करते जा रहे हैं...कल तक तो जिनके विषय में सोचने की हमारी हिम्मत नहीं थी आज हम उसकी खुलेआम चर्चा कर सकते हैं, तर्कवादी इससे सही भी ठहराते हैं और गलत भी ... सच तो यह है की ऐसे सम्बन्ध बनाने वाले लोगो को अगर अतीत में जाने का मौका दिया जाए तो यकीनन ९० प्रतिशत लोग इस कर्म को दुबारा नहीं करना चाहेंगे...फिर इसकी तरफदारी क्यों करते है वो? क्यों इसे सही ठहराते हैं? क्या इसलिए की वो खींचना चाहते हैं सभी को इस दलदल में या शर्म को बेशर्मी से छुपाते हैं ! क्या ऐसा परिवार अपनी भावी पीढ़ी को इन हरकतों में लिप्त देखना चाहता है? अगर हाँ तो खुल कर उन्हें सामने आना चाहिए , इस तरह छदम नामो के सहारे नहीं...! आखिर हम भी तो देखें की वो कितने मजबूत हैं अपने कुकर्मो के लेकर...

मित्रवर, जिस समाज के नियमों की आप दुहाई दे रहे हैं क्या वो समाज आपको खुले आप पोर्न साईट पर आने की इजाजत देता है... क्या वे सब जो इन्सेस्ट के विरोधी हैं मगर खुले आप छद्म नाम से इन साइटों पर आते हैं और परिवार के बाहर (ये मान कर कि परिवार में कभी सपने में भी उनके मन में यौन भावना पल भर के लिए भी नहीं जगी), की हर लड़की को चोदने के लिए आतुर रहते हैं, नंगी और चुदाई की तस्वीरें देख कर मुठ मारते हैं... शायद समाज पर बहुत बड़ा अहसान कर रहे हैं....
क्या इन्हें खुल कर सामने नहीं आना चाहिए... शायद दूसरों का ही दम देखना चाहते हैं... खुद में दम न हो चाहे... हमाम में सब नंगे हैं...

MASTRAAM
11-08-2011, 08:19 PM
मित्रवर, जिस समाज के नियमों की आप दुहाई दे रहे हैं क्या वो समाज आपको खुले आप पोर्न साईट पर आने की इजाजत देता है... क्या वे सब जो इन्सेस्ट के विरोधी हैं मगर खुले आप छद्म नाम से इन साइटों पर आते हैं और परिवार के बाहर (ये मान कर कि परिवार में कभी सपने में भी उनके मन में यौन भावना पल भर के लिए भी नहीं जगी), की हर लड़की को चोदने के लिए आतुर रहते हैं, नंगी और चुदाई की तस्वीरें देख कर मुठ मारते हैं... शायद समाज पर बहुत बड़ा अहसान कर रहे हैं....
क्या इन्हें खुल कर सामने नहीं आना चाहिए... शायद दूसरों का ही दम देखना चाहते हैं... खुद में दम न हो चाहे... हमाम में सब नंगे हैं...

शायद आपको पता नहीं है या जानबूझकर अन्धकार में रहना पसंद करतीं हैं .हर पोर्न साईट व्यस्क लोगों के लिए होता है और कोई भी व्यस्क वहाँ जा सकता है इसके लिए समाज की इजाज़त की आवश्यकता नहीं है
मै या मेरे जैसे कई लोग दोस्तों के बिच खुलकर कहतें है की मै इस पोर्न साईट को देखता हूँ ,ये बात समाज में खुलकर भी कही जाती है , लेकिन इन्सिस्ट सेक्स करने के लिए कितन लोग खुलकर सामने आतें हैं ???
मैंने अपने कम से कम २५ करीबी लोगों को ये बताया है की मै पोर्न साईट देखकर मूठ मारता हूँ .
तो आप या आप जैसे लोग ये बताइये की कितने करीबी लोगों को आपने ये बताया है की मैंने अपने घर के लोगों के साथ सेक्स किया है |

जहां फोटो देखकर मूठ मारने की बात हैं न ..तो मूठ ही मार रहें हैं ..अपनी माँ बहन को तो चोद नहीं रहे |
कोई असामाजिक काम तो नहीं कर रहें ???

kharghar
12-08-2011, 01:07 PM
पिछले लगभग १ महीने से मैं अन्तर्वासना के मंच पर विभिन्न सूत्रों को पढ़ रहा हूँ और जिस तरह की बातें और तर्क incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों में लिप्त (या लिप्त होने के काल्पनिक दावे करने वाले) लोग उसके बचाव में दे रहें हैं वे पढ़ कर हैरान हूँ. incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों का विरोध करने वालों को मुख्यतः तीन प्रश्न पूछे जातें हैं:
१) क्या आप sexual fantensies नहीं करते और रक्त्सम्बंधियों या/ और पारिवारिक सम्बन्धियों के साथ यौन सम्बन्ध बनाने की कल्पना नहीं करते?
२) आप अन्तर्वासना जैसी व्यस्क और पोर्न साईट पर क्यों आते हो, क्या करने आते हो? इसी प्रशन को कुछ लोग इस तरह पूछतें हैं कि आप अन्तर्वासना पर अपने किस रिश्तेदार को ढूंढ़ रहे हो?
३) क्या आप पोर्न साईट पर जा कर, पोर्न साहित्य पढ़ कर या पोर्न चलचित्र देख कर हस्तमैथुन नहीं करते?

मैं अपनी समझ के अनुसार इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न कर रहा हूँ:
१) जब से मानव जाती का पशु जाती के अन्य जीवों को पीछे छोड़ कर बोद्धिक विकास शुरू हुआ और विकास के लिए मानव जाती ने समाज की व्यवस्था को चुना, तब से आर्थिक रूप से, सामाजिक ओहदे के अनुसार, शक्ति/बुद्धि/योग्यता/ सुन्दरता के आधार पर समाज में बड़े छोटे में भेदभाव होने लगा; स्वयं मानव जाती ने समाज के लिए बनाए कानूनों के अनुसार यौन संबंधों पर प्रतिबंध लगे. मानव के बोद्धिक स्तर, महत्त्वाकांक्षा और अधूरी इच्छाओं ने कल्पनाओं को जन्म दिया. कल्पनाएँ करना, जिनमें sexual fantensies भी शामिल हैं, बहुत सामान्य बात हैं; मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, शिक्षाविद सभी इसे न केवल स्वीकार करतें हैं अपितु इसे जरुरी भी समझतें हैं. इस तरह की कल्पनाएँ करना ना तो दुश्चरित्रता का प्रमाण है और ना छुपाने या शर्म करने की बात है. incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के हिमायती इस मुद्दे को उठा कर क्या साबित करना चाहतें हैं यह मेरी समझ मैं नहीं आता.
२) समय के साथ, औध्योगिक विकास के साथ, परिवहरण और संचार के साधनों के विकास के कारण सामाजिक व्यवस्था, मान्याताओं और मापदंडों में बदलाव आना प्राकृतिक भी और जरुरी भी है. आज के युग में किसी भी व्यस्क का घर की चारदिवारी में पोर्न साईट पर जाना, पोर्न साहित्य पढ़ना या पोर्न चलचित्र देखना गलत नहीं समझा जाता. गलत तब होता है जब वह व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो दे, अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण ना रख सके, विवाह के पहले यौन सम्बन्ध अपनी यौन इच्छाओं को पूरी करने के लिए बनाए, क्योंकि आज भी भारत में तो समाज लडके या लड़की के विवाह के पहले यौन सम्बन्ध उचित नहीं समझता, या फिर विवाह के बाद जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य से यौन सम्बन्ध बनाए. आज कोई भी sex expert पुरुष/स्त्री या युगल को उनकी sexual life को अधिक आनंदित, सक्रिय और उसमे विविधता लाने के लिए pornographic literature, pornographic photographs and फिल्म्स का उपयोग करने के लिए, sexual fantasies के लिए प्रोत्साहित करतें हैं. परन्तु ना कोई sex expert, ना कोई दार्शनिक और ना कोई डॉक्टर किसी भी व्यक्ति को व्यभिचारी बनने की या extra marital sexual affairs की सलाह देता है, incest और पारिवारिक यौन सम्बन्ध तो बिल्कुल अलग बात है. incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के हिमायती इस मुद्दे को भी उठा कर क्या साबित करना चाहतें हैं यह भी मेरी समझ मैं नहीं आता.
३) हस्तमैथुन को भी आज बिलकुल सामान्य, सुरक्षित माना जाता है. आज के २५ साल पहले जब इन्टरनेट नही था तब क्या लोग हस्तमैथुन नहीं करते थे? incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के विरोधियों को अगर तब इन्टरनेट पर जाकर incest की ९९% काल्पनिक और १% सच्ची कयानियाँ पढ़ने की जरुरत हस्तमैथुन के लिए नहीं पड़ी तो अब उनकी ऐसी कौनसी मज़बूरी हो जाएगी? आजसे १०० साल पहले जब pornographic photographs और फिल्म्स नही थे तब जब उन्हें हस्तमैथुन के लिए इसकी जरुरत नहीं पड़ी तो अब उनकी ऐसी कौनसी मज़बूरी हो जाएगी? incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के हिमायती क्या हस्तमैथुन नहीं करते? हस्तमैथुन के लिए क्या वे सभी इन सभी का उपयोग नहीं करते?
क्योंकि समाज का बहुत बड़ा हिस्सा जो incest को और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों को सही नहीं मानता उसके द्वारा उठाए सवालों का कोई उत्तर नहीं मिलने पर, कोई तर्क नहीं मिलने पर आप लोग इस तरह के बेहुदे और भोंडे सवालों पर क्यों उतर आते हो? आप लोग यह कैसे समझ लेते हो की अन्तर्वासना के मंच पर विभिन्न सूत्रों को पढ़ने वाले यहाँ मनोरंजन के लिए या कहानियाँ पढ़ने के उद्देश्य से ही आतें हैं? पहली बात तो यह है की मंच पर कहानियाँ लिखी ही क्यों जानी चाहिए? मैं और मेरे जैसे अनेक यहाँ यह समझ कर आए थे कि मंच पर और सूत्रों पर गंभीर चर्चा पढ़ने को मिलेगी, यहाँ आ कर जिस तरह कि गलत बातें और अश्लील बातें पढ़ने को मिली तो यह निश्चय कर लिया कि इसका विरोध होना चाहिए, आप चाहे जितना भी छटपटाएं, विरोध तो होगा ही, उसे आप कोई रोक नहीं सकते.

मैं विरोध करते हुए भी भाषा के स्तर को गिराना नही चाहता, परन्तु बहुत सारे सदस्यों (पुरुष और महिला दोनों) ने "आप यहाँ अपने किस सम्बन्धी को ढूंढ़ने आए हो" इस प्रश्न को जिस तरह की अश्लील और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करके पूछा है तो मैं उन्हें उन्ही की भाषा में जवाब देना चाहता हूँ:

महोदयों/ देवियों, हम यहाँ अपना कोई रिश्तेदार ढूंढ़ने नहीं आते. हम तो आपके माँ-बाप और आपके भाई-बहन और रिश्तेदारों को ढूंढ़ने आतें हैं जिससे हम जान सके कि कौनसे वे अभागे माँ-बाप हैं जिन्होंने आपके जैसी संतानों को जन्म दिया, कौनसे वे माँ-बाप, भाई-बहन और रिश्तेदारों हैं जिन्होंने आपको न तो ढंग के संस्कार दिए, न चरित्र दिया और समाज में गन्दगी फैलाने के लिए छोड़ दिया.

gitaa0
15-08-2011, 04:01 PM
परिबार सेक्स स्टोरी इस बेस्ट

kaamdevgoyal
15-08-2011, 07:05 PM
wish u all the best,, i m new here, pls guide me

thanks

vickky681
15-08-2011, 09:07 PM
kalyug hai bhai kuch bhi ho sakta hai

dev b
20-08-2011, 10:38 PM
क्या बात कही है मित्र ...वाह वाह वाह
पिछले लगभग १ महीने से मैं अन्तर्वासना के मंच पर विभिन्न सूत्रों को पढ़ रहा हूँ और जिस तरह की बातें और तर्क incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों में लिप्त (या लिप्त होने के काल्पनिक दावे करने वाले) लोग उसके बचाव में दे रहें हैं वे पढ़ कर हैरान हूँ. incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों का विरोध करने वालों को मुख्यतः तीन प्रश्न पूछे जातें हैं:
१) क्या आप sexual fantensies नहीं करते और रक्त्सम्बंधियों या/ और पारिवारिक सम्बन्धियों के साथ यौन सम्बन्ध बनाने की कल्पना नहीं करते?
२) आप अन्तर्वासना जैसी व्यस्क और पोर्न साईट पर क्यों आते हो, क्या करने आते हो? इसी प्रशन को कुछ लोग इस तरह पूछतें हैं कि आप अन्तर्वासना पर अपने किस रिश्तेदार को ढूंढ़ रहे हो?
३) क्या आप पोर्न साईट पर जा कर, पोर्न साहित्य पढ़ कर या पोर्न चलचित्र देख कर हस्तमैथुन नहीं करते?

मैं अपनी समझ के अनुसार इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न कर रहा हूँ:
१) जब से मानव जाती का पशु जाती के अन्य जीवों को पीछे छोड़ कर बोद्धिक विकास शुरू हुआ और विकास के लिए मानव जाती ने समाज की व्यवस्था को चुना, तब से आर्थिक रूप से, सामाजिक ओहदे के अनुसार, शक्ति/बुद्धि/योग्यता/ सुन्दरता के आधार पर समाज में बड़े छोटे में भेदभाव होने लगा; स्वयं मानव जाती ने समाज के लिए बनाए कानूनों के अनुसार यौन संबंधों पर प्रतिबंध लगे. मानव के बोद्धिक स्तर, महत्त्वाकांक्षा और अधूरी इच्छाओं ने कल्पनाओं को जन्म दिया. कल्पनाएँ करना, जिनमें sexual fantensies भी शामिल हैं, बहुत सामान्य बात हैं; मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, शिक्षाविद सभी इसे न केवल स्वीकार करतें हैं अपितु इसे जरुरी भी समझतें हैं. इस तरह की कल्पनाएँ करना ना तो दुश्चरित्रता का प्रमाण है और ना छुपाने या शर्म करने की बात है. incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के हिमायती इस मुद्दे को उठा कर क्या साबित करना चाहतें हैं यह मेरी समझ मैं नहीं आता.
२) समय के साथ, औध्योगिक विकास के साथ, परिवहरण और संचार के साधनों के विकास के कारण सामाजिक व्यवस्था, मान्याताओं और मापदंडों में बदलाव आना प्राकृतिक भी और जरुरी भी है. आज के युग में किसी भी व्यस्क का घर की चारदिवारी में पोर्न साईट पर जाना, पोर्न साहित्य पढ़ना या पोर्न चलचित्र देखना गलत नहीं समझा जाता. गलत तब होता है जब वह व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो दे, अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण ना रख सके, विवाह के पहले यौन सम्बन्ध अपनी यौन इच्छाओं को पूरी करने के लिए बनाए, क्योंकि आज भी भारत में तो समाज लडके या लड़की के विवाह के पहले यौन सम्बन्ध उचित नहीं समझता, या फिर विवाह के बाद जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य से यौन सम्बन्ध बनाए. आज कोई भी sex expert पुरुष/स्त्री या युगल को उनकी sexual life को अधिक आनंदित, सक्रिय और उसमे विविधता लाने के लिए pornographic literature, pornographic photographs and फिल्म्स का उपयोग करने के लिए, sexual fantasies के लिए प्रोत्साहित करतें हैं. परन्तु ना कोई sex expert, ना कोई दार्शनिक और ना कोई डॉक्टर किसी भी व्यक्ति को व्यभिचारी बनने की या extra marital sexual affairs की सलाह देता है, incest और पारिवारिक यौन सम्बन्ध तो बिल्कुल अलग बात है. incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के हिमायती इस मुद्दे को भी उठा कर क्या साबित करना चाहतें हैं यह भी मेरी समझ मैं नहीं आता.
३) हस्तमैथुन को भी आज बिलकुल सामान्य, सुरक्षित माना जाता है. आज के २५ साल पहले जब इन्टरनेट नही था तब क्या लोग हस्तमैथुन नहीं करते थे? incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के विरोधियों को अगर तब इन्टरनेट पर जाकर incest की ९९% काल्पनिक और १% सच्ची कयानियाँ पढ़ने की जरुरत हस्तमैथुन के लिए नहीं पड़ी तो अब उनकी ऐसी कौनसी मज़बूरी हो जाएगी? आजसे १०० साल पहले जब pornographic photographs और फिल्म्स नही थे तब जब उन्हें हस्तमैथुन के लिए इसकी जरुरत नहीं पड़ी तो अब उनकी ऐसी कौनसी मज़बूरी हो जाएगी? incest और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों के हिमायती क्या हस्तमैथुन नहीं करते? हस्तमैथुन के लिए क्या वे सभी इन सभी का उपयोग नहीं करते?
क्योंकि समाज का बहुत बड़ा हिस्सा जो incest को और पारिवारिक सेक्सुअल संबंधों को सही नहीं मानता उसके द्वारा उठाए सवालों का कोई उत्तर नहीं मिलने पर, कोई तर्क नहीं मिलने पर आप लोग इस तरह के बेहुदे और भोंडे सवालों पर क्यों उतर आते हो? आप लोग यह कैसे समझ लेते हो की अन्तर्वासना के मंच पर विभिन्न सूत्रों को पढ़ने वाले यहाँ मनोरंजन के लिए या कहानियाँ पढ़ने के उद्देश्य से ही आतें हैं? पहली बात तो यह है की मंच पर कहानियाँ लिखी ही क्यों जानी चाहिए? मैं और मेरे जैसे अनेक यहाँ यह समझ कर आए थे कि मंच पर और सूत्रों पर गंभीर चर्चा पढ़ने को मिलेगी, यहाँ आ कर जिस तरह कि गलत बातें और अश्लील बातें पढ़ने को मिली तो यह निश्चय कर लिया कि इसका विरोध होना चाहिए, आप चाहे जितना भी छटपटाएं, विरोध तो होगा ही, उसे आप कोई रोक नहीं सकते.

मैं विरोध करते हुए भी भाषा के स्तर को गिराना नही चाहता, परन्तु बहुत सारे सदस्यों (पुरुष और महिला दोनों) ने "आप यहाँ अपने किस सम्बन्धी को ढूंढ़ने आए हो" इस प्रश्न को जिस तरह की अश्लील और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करके पूछा है तो मैं उन्हें उन्ही की भाषा में जवाब देना चाहता हूँ:

महोदयों/ देवियों, हम यहाँ अपना कोई रिश्तेदार ढूंढ़ने नहीं आते. हम तो आपके माँ-बाप और आपके भाई-बहन और रिश्तेदारों को ढूंढ़ने आतें हैं जिससे हम जान सके कि कौनसे वे अभागे माँ-बाप हैं जिन्होंने आपके जैसी संतानों को जन्म दिया, कौनसे वे माँ-बाप, भाई-बहन और रिश्तेदारों हैं जिन्होंने आपको न तो ढंग के संस्कार दिए, न चरित्र दिया और समाज में गन्दगी फैलाने के लिए छोड़ दिया.

kharghar
21-08-2011, 10:46 PM
क्या बात कही है मित्र ...वाह वाह वाह

प्रिय मित्र देव भारद्वाजजी नमस्ते. आपने मेरे पोस्ट को सहारा उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.

dev b
21-08-2011, 10:50 PM
आप ने तो गागर में सागर भर दिया मित्र
प्रिय मित्र देव भारद्वाजजी नमस्ते. आपने मेरे पोस्ट को सहारा उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.

johnpal
18-10-2011, 11:50 AM
shandaaaaarrrrrrrrrrrr

singhjkn
27-10-2011, 11:35 PM
ghar ko chod ke duniya padi hai

av_26
28-10-2011, 04:50 PM
KAISI BAATEN KARTE HO YAAR GHAR KA MAAL DUSRO KE BHAROSE CHHOD DE AUR BAHAR KI CHUTE TALASHTE PHIRE. BADE LOG KAH GAYE KI HER ACCHHE KAAM KI SHURUWAT KHUD SE AUR GHAR SE KARNI CHAHIYE, IS LIYE CHUDAI JAISA SHUB KAAM BHI GHAR SE HI PRARABH KIYA JANA CHAHIYE. DUSRO KA TO MERE KO PATA NAHI PER MENE TO YEHI KIYA HE.

akpkaptan
05-11-2011, 07:25 PM
poja rani jo kare sharm uske phutekaram

Jayeshh
24-11-2011, 06:18 PM
पारिवारिक संबंधो के बारे में पढके भी शर्म महशूस हो रही है.....

mohanjee
24-11-2011, 07:08 PM
KAISI BAATEN KARTE HO YAAR GHAR KA MAAL DUSRO KE BHAROSE CHHOD DE AUR BAHAR KI CHUTE TALASHTE PHIRE. BADE LOG KAH GAYE KI HER ACCHHE KAAM KI SHURUWAT KHUD SE AUR GHAR SE KARNI CHAHIYE, IS LIYE CHUDAI JAISA SHUB KAAM BHI GHAR SE HI PRARABH KIYA JANA CHAHIYE. DUSRO KA TO MERE KO PATA NAHI PER MENE TO YEHI KIYA HE.


bhai tumhare ghar me koi jagah mil sakti hai kya

mangaldev
05-12-2011, 09:05 PM
मेरा तो स्पष्ट मानना है सेक्स केवल पति-पत्नि (अथार्त दम्पति) के बीच ही सामाजिक रूप से मान्य होता है और यही व्यवस्था दुनिया के लगभग सभी परिवारों-समाजो में प्रचलित है| क्योकि यही व्यवस्था स्वस्थ मानवीय मूल्यों का निर्माण करती है जो भी इस व्यवस्था को दरकिनार करता है वह सही सामाजिक जीवन नही जी कर जंगलीपन की कल्पना करता है| सेक्स की मान्यता ही पति-पत्नि के रिश्ते को परिभाषित करती है| अन्य सभी रिश्ते इस इसी रिश्ते से उत्पन होते है| यदि अन्य रिश्तो में भी सेक्स होने लगेगा तो सभी रिश्तो की परिभाषा ही नही उनकी मान्यता, मर्यादा आदि भी ख़त्म हो जायेगी| यानि रिश्तो से विहीन किसी परिवार व समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है? क्या सबके बीच एक ही रिश्ता संभव है सेक्स का रिश्ता? माता-पुत्र, भाई-बहन, पिता-पुत्री, दादा-पोत्री, दादी-पोत्र, काका-भतीजी, मामा-भान्जी, काकी-भतीजा, मामी-भान्जा, क्या इन जैसे रिश्तो को ख़त्म करके एक ही रिश्ता "सेक्स का रिश्ता" कायम करके लोग किस प्रकार के परिवार व समाज की कल्पना करते है?
मुझे इस प्रकार की कल्पना या विचार अपरिपक्व मानसिकता की उपज ही नही बल्की मानसिक बीमारी की तरह लगता है| ऐसे बीमारों का इलाज जरूरी है|

mangaldev
05-12-2011, 09:32 PM
एक स्त्री-पुरुष के विवाह के पश्चात ही वे पति-पत्नि(दम्पति) कहलाते है| इनके मध्य ही सेक्स (योन-सम्बन्ध) को सामाजिक व पारिवारिक मान्यता प्राप्त होती है| अन्य स्त्री-पुरुष चाहे वह आपस में किसी प्रकार के रिश्तेदार (संबंधी) हो या ना हो, उनके बीच पति-पत्नि का सम्बन्ध नही है तो उनके द्वारा आपस में बनाया गया (किया गया सेक्स) योन-सम्बन्ध चरित्रहीनता की श्रेणी में आता है| सामाजिक वा पारिवारिक मान्यताओं को भंग करने वाला होता है| इसे हर धर्म/मजहब में पाप/हराम कहा गया है| हर समाज में असहनीय अपराध माना गया है| परिवार में ऐसे सम्बन्ध "मरने-मारने" का प्रश्न बनते है जो ऐसे स्त्री-पुरुषो के परिवारों को ही नही उनके अन्य संबंधियों को भी तबाही की और धकेल देते है|

kharghar
08-12-2011, 02:44 PM
मेरा तो स्पष्ट मानना है सेक्स केवल पति-पत्नि (अथार्त दम्पति) के बीच ही सामाजिक रूप से मान्य होता है और यही व्यवस्था दुनिया के लगभग सभी परिवारों-समाजो में प्रचलित है| क्योकि यही व्यवस्था स्वस्थ मानवीय मूल्यों का निर्माण करती है जो भी इस व्यवस्था को दरकिनार करता है वह सही सामाजिक जीवन नही जी कर जंगलीपन की कल्पना करता है| सेक्स की मान्यता ही पति-पत्नि के रिश्ते को परिभाषित करती है| अन्य सभी रिश्ते इस इसी रिश्ते से उत्पन होते है| यदि अन्य रिश्तो में भी सेक्स होने लगेगा तो सभी रिश्तो की परिभाषा ही नही उनकी मान्यता, मर्यादा आदि भी ख़त्म हो जायेगी| यानि रिश्तो से विहीन किसी परिवार व समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है? क्या सबके बीच एक ही रिश्ता संभव है सेक्स का रिश्ता? माता-पुत्र, भाई-बहन, पिता-पुत्री, दादा-पोत्री, दादी-पोत्र, काका-भतीजी, मामा-भान्जी, काकी-भतीजा, मामी-भान्जा, क्या इन जैसे रिश्तो को ख़त्म करके एक ही रिश्ता "सेक्स का रिश्ता" कायम करके लोग किस प्रकार के परिवार व समाज की कल्पना करते है? मुझे इस प्रकार की कल्पना या विचार अपरिपक्व मानसिकता की उपज ही नही बल्की मानसिक बीमारी की तरह लगता है| ऐसे बीमारों का इलाज जरूरी है| श्री mangaldev आप वास्तव में तारीफ़ के लायक हैं. इतना अच्छा पोस्ट लिखने के लिए धन्यवाद. आपके विचार बहुत उमदा हैं. मैं आपसे पूर्ण रूप से सहमत हूँ.

lotus1782
08-12-2011, 03:34 PM
मेरे ख्याल से पारिवारिक सेक्स बिलकुल गलत है

usha chauhan
19-12-2011, 04:32 PM
ये सब कभी कभी अनजाने में हो जाता हे इसे रिपीट करना ठीक नहीं हे

kharghar
21-12-2011, 03:46 PM
ये सब कभी कभी अनजाने में हो जाता हे इसे रिपीट करना ठीक नहीं हे उषाजी, अनजाने में कुछ हो जाने की आपकी परिभाषा क्या है? शब्दकोष की परिभाषा से अनजाने में कुछ होने का अर्थ होता है "without knowledge or intention". कुछ ऐसे दुर्लभ किस्से जरूर पढ़े हैं जिनके अनुसार भाई-बहन, माता-पुत्र, पिता-पुत्री या अन्य पारिवारिक रिश्तेदारों के बिच यौन सम्बन्ध अनजाने में इसलिए बने क्योंकि एक या दोनों सम्बंधित व्यक्ति बचपन से किसी कारण बिछड़ गए थे और बाद में जब उनके बिच यौन सम्बन्ध बने तब उन्हें उनके बिच के संबंधों की जानकारी नहीं थी. आपसी सम्बन्ध की जानकारी रखने वाले दो वयस्क व्यक्तियों के बिच "अनजाने" में यौन सम्बन्ध कैसे बन सकते हैं? यौन इच्छाओं पर नियंत्रण के अभाव को, क्षणिक भावनाओं में बह कर रिश्तों की मर्यादाओं को कुचल देने की कमजोरी को आप अनजाने में किया काम कैसे बता सकती हैं? यदि आप इन्सेस्ट की समर्थक हैं तो खुलकर उसकी समर्थक बनिए, इस तरह के अतार्किक वक्तव्य नहीं दीजिए. For heaven's sake believe in calling a spade a spade.

DEVengg
21-12-2011, 11:45 PM
ha bhai i agreed with you,

maddy_sharma124
22-12-2011, 11:30 AM
Mujhe to aisa lagta hai ki aaj kal Rishton ka koi mahatav nahi raha. sex sabke sar chadkar bol raha hai

jaggajat
22-12-2011, 07:18 PM
एक आदमी के पास एक दिन में २४ घंटे होते है उसमे से वह प्रतिदिन सेक्स (प्रक्टिकल-सेक्स) को कितना समय दे पाता है| २५-३० वर्ष की उम्र तक मुश्किल से एक घंटा, उसके बाद ४०-४५ वर्ष की उम्र तक एक सप्ताह में मुस्किल से दो-तीन बार आधे घंटे से एक घंटा, उसके बाद ६० की उम्र तक महीने में एक दो बार लगभग इतना या फिर इससे भी कम समय|
शेष समय आदमी-ओरत सेक्स (प्रक्टिकल-सेक्स) नही करते वो केवल सेक्स की चर्चा करते है| सेक्स साहित्य पढ़ते है सेक्सी फिल्म-चित्र आदि देखते है| इसे प्रक्टिकल-सेक्स नही कहा जा सकता| यह सेक्स की कल्पना है या इसे काल्पनिक सेक्स ही कहा जा सकता है|
इन्टर-नेट पर सेक्स भी सेक्स की कल्पना करना चर्चा करना सेक्सी चित्र-फिल्म आदि देखना, मनोरंजन करने के हिसाब से तो उच्चित कहे जा सकते है लेकिन समय जाया करने या कल्पनाओं में ही जीने की आदत डालने के हिसाब से अनुचित ही कहा जाएगा|
रिश्ते मनोरंजन का साधन नही है रिश्ते जीवन जीने की एक व्यवस्था है जो मानव (स्त्री-पुरुष) अपने योन-व्यवहार को नियंत्रित व मर्यादित करके ही करा सकता है| पति-पत्नि का रिश्ता ही मर्यादित योन-व्यवहार की छुट प्रदान कर, आपस में आपस में योन-सम्बन्ध बनाने की अथार्त दाम्पत्य जीवन विर्वाह की मान्यता प्रदान करता है| जो लोग इस व्यवस्था को नकार कर स्वच्छंद योन-व्यवहार की वकालत करते है उनकी नियत में खोट है मेरे विचार से उनमे से अधिकतर लोग विशेषकर पुरुष शाररिक रूप से तो मुझे प्रक्टिकल-सेक्स में अक्षसम (नपुंसक) मालुम होते है| क्योकि जो सक्षम होते है वे अपना काम प्रचलित व्यवस्था से ही बना लेते है| अथार्त मर्यादित-ढंग से ही सेक्स कर लेते है| और अक्षसम लोग अपनी कमजोरी को छुपा कर दुनिया के सामने अपने आप को वास्तविकता से कही जादा साबित करने के लिए बनी बनाई व्यवस्था को तोड़ने की बाते बनाते है|
पारिवारिक-सेक्स, समलेंगिक-सेक्स, विवाहेत्तर-सेक्स ये सब इन्ही अक्षसम (नपुन्सको) लोगो की करतूत है| मेरे विचार से ये सब मानसिक-हिंजड़े के सिवा कुच्छ नही है| ये सब भी हिजड़ो की तरह ही अमर्यादित हरकते करते स्पष्ट देखे जा सकते है| सामान्य (स्त्री-पुरुष) लोग ऐसी हरकते नही करते है|

Jayeshh
22-12-2011, 07:48 PM
बिलकुल सत्य वचन कहा जात जी......

kharghar
23-12-2011, 12:53 PM
एक आदमी के पास एक दिन में २४ घंटे होते है उसमे से वह प्रतिदिन सेक्स (प्रक्टिकल-सेक्स) को कितना समय दे पाता है| २५-३० वर्ष की उम्र तक मुश्किल से एक घंटा, उसके बाद ४०-४५ वर्ष की उम्र तक एक सप्ताह में मुस्किल से दो-तीन बार आधे घंटे से एक घंटा, उसके बाद ६० की उम्र तक महीने में एक दो बार लगभग इतना या फिर इससे भी कम समय| शेष समय आदमी-ओरत सेक्स (प्रक्टिकल-सेक्स) नही करते वो केवल सेक्स की चर्चा करते है| सेक्स साहित्य पढ़ते है सेक्सी फिल्म-चित्र आदि देखते है| इसे प्रक्टिकल-सेक्स नही कहा जा सकता| यह सेक्स की कल्पना है या इसे काल्पनिक सेक्स ही कहा जा सकता है| इन्टर-नेट पर सेक्स भी सेक्स की कल्पना करना चर्चा करना सेक्सी चित्र-फिल्म आदि देखना, मनोरंजन करने के हिसाब से तो उच्चित कहे जा सकते है लेकिन समय जाया करने या कल्पनाओं में ही जीने की आदत डालने के हिसाब से अनुचित ही कहा जाएगा| रिश्ते मनोरंजन का साधन नही है रिश्ते जीवन जीने की एक व्यवस्था है जो मानव (स्त्री-पुरुष) अपने योन-व्यवहार को नियंत्रित व मर्यादित करके ही करा सकता है| पति-पत्नि का रिश्ता ही मर्यादित योन-व्यवहार की छुट प्रदान कर, आपस में आपस में योन-सम्बन्ध बनाने की अथार्त दाम्पत्य जीवन विर्वाह की मान्यता प्रदान करता है| जो लोग इस व्यवस्था को नकार कर स्वच्छंद योन-व्यवहार की वकालत करते है उनकी नियत में खोट है मेरे विचार से उनमे से अधिकतर लोग विशेषकर पुरुष शाररिक रूप से तो मुझे प्रक्टिकल-सेक्स में अक्षसम (नपुंसक) मालुम होते है| क्योकि जो सक्षम होते है वे अपना काम प्रचलित व्यवस्था से ही बना लेते है| अथार्त मर्यादित-ढंग से ही सेक्स कर लेते है| और अक्षसम लोग अपनी कमजोरी को छुपा कर दुनिया के सामने अपने आप को वास्तविकता से कही जादा साबित करने के लिए बनी बनाई व्यवस्था को तोड़ने की बाते बनाते है| पारिवारिक-सेक्स, समलेंगिक-सेक्स, विवाहेत्तर-सेक्स ये सब इन्ही अक्षसम (नपुन्सको) लोगो की करतूत है| मेरे विचार से ये सब मानसिक-हिंजड़े के सिवा कुच्छ नही है| ये सब भी हिजड़ो की तरह ही अमर्यादित हरकते करते स्पष्ट देखे जा सकते है| सामान्य (स्त्री-पुरुष) लोग ऐसी हरकते नही करते है| प्रिय जग्गाजटजी, इस मंच पर आने के बाद बहुत दिनों बाद एक ऐसा पोस्ट पढ़ा जिसे पढ़ कर मन खुश हो गया. इतनी बेबाकी से अपनी बात को इतने खुबसूरत ढंग से लिखने के लिए आपका बहुत धन्यवाद, आप सही माएनों में प्रसंशा के लायक हैं.

VINODBISHT
23-12-2011, 01:38 PM
ये तो बहुत शर्म की बात हैं जो लोग एसा करते हैं वो इन्सान नहीं जानवर हैं क्यूंकि एक जानवर ही एसा कर सकता हैं इन्शान नहीं

dev b
23-12-2011, 11:18 PM
आप के विचारों का स्वागत है मित्र
मेरा तो स्पष्ट मानना है सेक्स केवल पति-पत्नि (अथार्त दम्पति) के बीच ही सामाजिक रूप से मान्य होता है और यही व्यवस्था दुनिया के लगभग सभी परिवारों-समाजो में प्रचलित है| क्योकि यही व्यवस्था स्वस्थ मानवीय मूल्यों का निर्माण करती है जो भी इस व्यवस्था को दरकिनार करता है वह सही सामाजिक जीवन नही जी कर जंगलीपन की कल्पना करता है| सेक्स की मान्यता ही पति-पत्नि के रिश्ते को परिभाषित करती है| अन्य सभी रिश्ते इस इसी रिश्ते से उत्पन होते है| यदि अन्य रिश्तो में भी सेक्स होने लगेगा तो सभी रिश्तो की परिभाषा ही नही उनकी मान्यता, मर्यादा आदि भी ख़त्म हो जायेगी| यानि रिश्तो से विहीन किसी परिवार व समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है? क्या सबके बीच एक ही रिश्ता संभव है सेक्स का रिश्ता? माता-पुत्र, भाई-बहन, पिता-पुत्री, दादा-पोत्री, दादी-पोत्र, काका-भतीजी, मामा-भान्जी, काकी-भतीजा, मामी-भान्जा, क्या इन जैसे रिश्तो को ख़त्म करके एक ही रिश्ता "सेक्स का रिश्ता" कायम करके लोग किस प्रकार के परिवार व समाज की कल्पना करते है?
मुझे इस प्रकार की कल्पना या विचार अपरिपक्व मानसिकता की उपज ही नही बल्की मानसिक बीमारी की तरह लगता है| ऐसे बीमारों का इलाज जरूरी है|

dev b
23-12-2011, 11:19 PM
मै आप से सहमत हु मित्र
ये तो बहुत शर्म की बात हैं जो लोग एसा करते हैं वो इन्सान नहीं जानवर हैं क्यूंकि एक जानवर ही एसा कर सकता हैं इन्शान नहीं

dev b
23-12-2011, 11:20 PM
अनजाने में की गयी गलती तो माफ़ी के लायक होती ही है मित्र
ये सब कभी कभी अनजाने में हो जाता हे इसे रिपीट करना ठीक नहीं हे

dev b
23-12-2011, 11:26 PM
आप के विचारों का स्वागत है मित्र ....
एक आदमी के पास एक दिन में २४ घंटे होते है उसमे से वह प्रतिदिन सेक्स (प्रक्टिकल-सेक्स) को कितना समय दे पाता है| २५-३० वर्ष की उम्र तक मुश्किल से एक घंटा, उसके बाद ४०-४५ वर्ष की उम्र तक एक सप्ताह में मुस्किल से दो-तीन बार आधे घंटे से एक घंटा, उसके बाद ६० की उम्र तक महीने में एक दो बार लगभग इतना या फिर इससे भी कम समय|
शेष समय आदमी-ओरत सेक्स (प्रक्टिकल-सेक्स) नही करते वो केवल सेक्स की चर्चा करते है| सेक्स साहित्य पढ़ते है सेक्सी फिल्म-चित्र आदि देखते है| इसे प्रक्टिकल-सेक्स नही कहा जा सकता| यह सेक्स की कल्पना है या इसे काल्पनिक सेक्स ही कहा जा सकता है|
इन्टर-नेट पर सेक्स भी सेक्स की कल्पना करना चर्चा करना सेक्सी चित्र-फिल्म आदि देखना, मनोरंजन करने के हिसाब से तो उच्चित कहे जा सकते है लेकिन समय जाया करने या कल्पनाओं में ही जीने की आदत डालने के हिसाब से अनुचित ही कहा जाएगा|
रिश्ते मनोरंजन का साधन नही है रिश्ते जीवन जीने की एक व्यवस्था है जो मानव (स्त्री-पुरुष) अपने योन-व्यवहार को नियंत्रित व मर्यादित करके ही करा सकता है| पति-पत्नि का रिश्ता ही मर्यादित योन-व्यवहार की छुट प्रदान कर, आपस में आपस में योन-सम्बन्ध बनाने की अथार्त दाम्पत्य जीवन विर्वाह की मान्यता प्रदान करता है| जो लोग इस व्यवस्था को नकार कर स्वच्छंद योन-व्यवहार की वकालत करते है उनकी नियत में खोट है मेरे विचार से उनमे से अधिकतर लोग विशेषकर पुरुष शाररिक रूप से तो मुझे प्रक्टिकल-सेक्स में अक्षसम (नपुंसक) मालुम होते है| क्योकि जो सक्षम होते है वे अपना काम प्रचलित व्यवस्था से ही बना लेते है| अथार्त मर्यादित-ढंग से ही सेक्स कर लेते है| और अक्षसम लोग अपनी कमजोरी को छुपा कर दुनिया के सामने अपने आप को वास्तविकता से कही जादा साबित करने के लिए बनी बनाई व्यवस्था को तोड़ने की बाते बनाते है|
पारिवारिक-सेक्स, समलेंगिक-सेक्स, विवाहेत्तर-सेक्स ये सब इन्ही अक्षसम (नपुन्सको) लोगो की करतूत है| मेरे विचार से ये सब मानसिक-हिंजड़े के सिवा कुच्छ नही है| ये सब भी हिजड़ो की तरह ही अमर्यादित हरकते करते स्पष्ट देखे जा सकते है| सामान्य (स्त्री-पुरुष) लोग ऐसी हरकते नही करते है|

indiandesire786
25-01-2012, 12:00 PM
अद्भुत सूत्र, सभी का योगदान सराहनीय है, गति जारी रखें

meet6301
27-01-2012, 03:46 PM
Aisa kaise kar dete hai log. aisa tabi hota hoga jab ladka or ladki dono raji hote hoge. .kuch to sharm aani chahiye.


Mai bhi Pooja ji ki baat se Sehmat hu...............

Par mujhe bhi apne andar se kabhi-kabhi aisa lagta hai ke me apni choti behan ke sath sex karu..........

or maaf karna pooja ji

aaj-kal ki ladkiya apne kapde or apni chal se aisa mahol bana deti hai ki bas PAPPU DANCE karne lag jata hai...

uthte-baithe apne kapdo ka dhyan nhi rakhti or apne andarooni ango ka pradarshan karti hai...


mera ghar ke samne bhi ek ladki rehti hai jo meri behan ki umra ki hai, uski bhi chal-dhal aisi hai ke bas.... use bhi dekh ke mera khada ho jata hai................

Wanderer
29-01-2012, 10:56 AM
दोस्तों मेरे विचार से सेक्स अपने परिवार में या समंधिन्यो में , उन लोगो के साथ सेक्स नहीं करना चाहिए , जिस के किये समाज अनुमति नाहे देता..



अगर इस तर्क को माने तो फिर भारतीय समाज तो अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी भी अन्य स्त्री के साथ सेक्स की अनुमति नहीं देता .... ऐसे में कुंवारे लोग क्या सिर्फ मुठ मारें ? :BangHead:

abhi.dude
29-01-2012, 02:42 PM
jab men me aise icha dono ladka and ladki me hoti h to raha nahi jata

Coolncute
18-02-2012, 05:27 PM
मुझे तो इसमें कोई बुराई नहीं लगती ये तो आपसी सोच और अंडरस्तेडिंग पर डिपेंड करता है वैसे मैंने कभी ऐसा किया तो नहीं है पर मौका मिलने पर शायद कर भी दू . बस दोनों राज़ी होने चाहिए

Coolncute
18-02-2012, 05:31 PM
आखिर इसमें घिन वाली बात ही क्या है? दोनों राज़ी है किसी को कोई एतराज नहीं तो क्या चाहिए

Coolncute
18-02-2012, 05:34 PM
ऐसा नहीं है मेरे यार दोनों की इच्छा से हे ये सब हो सकता है आप मै या कोई भी अकेले तो ये सब कर ही नहीं सकता ना? और बाकी सब तो अपनी अपनी सोच पर निर्भर करता है.

dkgdkg
28-02-2012, 06:41 PM
Neera[M]/Nirmala[H] (Apte) is trapped into marrying the old widower Kakasaheb (Date). He is a progressive lawyer with a son and a daughter of Neeras age. She refuses to consummate the union, claiming repeatedly that while suffering can be borne, injustice cannot. After facing many hurdles including an aunt (Vasishta), her mother-in-law, and a lascivious stepson Pandit[M]/Jugal[H] (Nene), her husband has a change of heart and magnanimously commits suicide, enjoining Neera to marry someone more suitable. The change occurs mainly through his widowed daughter Chitra [M]/Sushila[H] (Paranjpye, a noted social worker off screen) who provides a forcefully feminist moment in a speech to the young bride. Apte sings the combative song In the worlds broad field of battle.....Be not like dumb, driven cattle written by Longfellow. The original novel was a landmark in Maharashtras social reform movement denouncing arranged and venal marriages that ignore womens rights. Shantarams version stresses melodramatic overtones while indugling in some bravura visual stylisations, e.g. in the editing (he edited his own films) of the brief marriage sequence or the shattered mirror scene returning multiple laughnign faces to the distraught old man gazing into the mirror, the leitmotif of the ticking clock, etc., many of these stylised images referring obliquely to the old mans sexual impotence. Aptes performance in her first leading role displays a modern freshness ahead of its time which established her as Indias foremost singing star of the 30s. The veterans Fattelal and Damle did the art direction and the sound respectively. The Hindi title translates literally as The world will not accept... while the Marathi title refers to the vermilion mark adoring the forehead of a married woman.

dev b
04-03-2012, 07:53 PM
माफ़ करना मित्र...मै परिवार में समाज द्वारा की सेक्स की अनुमति की बात कर रहा हु
अगर इस तर्क को माने तो फिर भारतीय समाज तो अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी भी अन्य स्त्री के साथ सेक्स की अनुमति नहीं देता .... ऐसे में कुंवारे लोग क्या सिर्फ मुठ मारें ? :BangHead:

deepa rai
05-03-2012, 04:17 AM
बहुत अच्छा सूत्र है लगे रहिये

deepa rai
05-03-2012, 04:18 AM
sahi kaha aapne.....
ऐसा नहीं है मेरे यार दोनों की इच्छा से हे ये सब हो सकता है आप मै या कोई भी अकेले तो ये सब कर ही नहीं सकता ना? और बाकी सब तो अपनी अपनी सोच पर निर्भर करता है.

deepa rai
05-03-2012, 04:20 AM
पारिवारिक सेक्स संबंधों पर स्वस्थ चर्चा. होनी हे चाहिए

deepa rai
05-03-2012, 04:21 AM
आज कल के जम्माने में सब चलता है

deepa rai
05-03-2012, 04:23 AM
आज कल के जम्माने में सब चलता है पारिवारिक सेक्स संबंधों तो हो हे जाते है आज कल

dkgdkg
05-03-2012, 11:53 AM
387167Mahesh Bhatt makes no distinction between wife Soni Razdan, daughter Pooja Bhatt and actresses who are not his own

“Somebody said, how could he cast his daughter as a young girl who’s brought into the flesh market? So if I bring somebody else’s daughter it’s fine, but not my daughter?”

MAHESH BHATT sharply questions the narrow male stance of the film industry

Long before Kalki was even born, an erudite, articulate filmmaker with the wide Ganesha forehead, had shed the sexist speak of most men from his fraternity and blithely established that what’s sauce for the goose is sauce for the gander too.

The turning point in Mahesh Bhatt’s life that made him never make a distinction between his wife (Soni Razdan), his daughter (Pooja Bhatt) and actresses who were not his own, had plenty to do with his friend, philosopher, guide, “the breath of my life”, UG Krishnamurthy. Mahesh even authored a book on UG who passed away in 2007.

Years ago, UG’s son who was still in his tender thirties, had contracted cancer. His son was the brilliant copywriter who had come up with the line, ‘Happy days are here again’ and ironically, just after he’d coined that he was diagnosed with the terminal disease. He had a Christian girlfriend and one day Mahesh had gone with UG to fetch her when her father, flustered about what to say to a man whose son had cancer, said with much empathy, “God is not fair. Why should your son, why out of so many people in this world should your son die of cancer?”

http://www.thefilmstreetjournal.com/images/mahes2.jpgAt this, UG replied, “Who else’s son should die if not mine? Do I want someone else’s son to die of cancer? He is a very fair God.”

“And that hit me, hit me really hard,” says Mahesh Bhatt, quite the philosopher-thinker himself. He finds an echo to UG’s provocative reply in, “The old story that when death comes to a building and says we want one person, everybody says, go to the neighbour, go to the neighbour. We always say, ‘the other,’” Mahesh makes his point succinctly.

He remarks, “Yes, there is no denying that in every area of our lives there is a dichotomy. There is an unbridgeable gap between what we say and what we do. That is the affliction of our culture, our postures and our real selves. Even people who belong to the performing arts, whose families have been in this business, are very, very strange when it comes to their daughters or their wives performing certain scenes. They have a different yardstick, those liberal values go out of the window.”

Guided by UG’s stark philosophy, Mahesh Bhatt himself never distinguished between his wife/daughter and “other heroines”.

http://www.thefilmstreetjournal.com/images/mahes3.jpg“I remember shooting a scene with Pooja and Sanjay Dutt in Sadak,” he recalls with amusement. “While staging the scene there came a moment when Sanju kisses Pooja...and there was a hush on the set. I’m talking about 1993. She was an actor, it was a scene that was naturally demanding that moment and we shot that scene. And somebody said, how could he cast his daughter as a young girl who’s brought into the flesh market? So what do you want me to do? If I bring somebody else’s daughter it’s fine, but not my daughter? This is a make-believe world, we’re actors.”

Even costar Sanjay Dutt, nonchalant about kissing an Urmila or any other heroine, was inhibited about kissing his director’s daughter.

“Sanju was very odd and uneasy,” chuckles Mahesh. “There is a cultural inhibition around us. You respect that. Maybe those yardsticks by which they live are different from yours. We don’t impose on that but let’s be candid. What’s so blasphemous and so shocking that we actually do in Hindi films?” he demands. “In fact those covert ways of expressing repressed sexuality by way of those dances which are being seen in every home are so gross, I’d rather have a straight kiss!

“I knew of filmmakers who didn’t want their daughters to be a part of the movie business. Why? Because they knew what they were, how they looked at women who came to their offices. Suddenly they saw their daughters walking into the same offices. But look at the world outside. Look at the thousands of girls who go out to work in local trains or come to your homes to make a living. What’s so special about your own?”

If Mahesh Bhatt handled his daughter Pooja Bhatt without inhibition as an actor on the set, he did the same with wife Soni Razdan too.

“In Sir there was a kiss between Soni and Naseer that I shot. It was in silhouette. She was a little embarrassed to do it but I said, do the shot. What could I do? I needed a scene in flashback, I needed an image of a child and the father and mother and I couldn’t do it with dialogue. So we shot it with a kiss in silhouette.

“In Saaransh too, yes, there was a quick one between Soni and Madan Jain. At that time we were not married.”

But even with the clinical approach of the Bhatts, it was never a cakewalk shooting sexual intimacy with “your own”.

“There is a natural anxiety which is there on the set when you’re shooting with your own and you’re doing a scene expressing sensuality or sexuality,” he laughs. “They asked me to go away when they were shooting a romantic sensuous song in Sir between Atul Agnihotri and Pooja,” he recalls. “Raju Khan the choreographer told me, the actors feel a little uncomfortable. I can understand that, the comfort of an actor but it is not my inhibition which is reining me.”

Even nephew Emraan Hashmi who became the serial kisser, had his initial squirm-moments. Mahesh Bhatt narrates, “The director asked me to go out of the set when they were shooting Murder with Emraan and Mallika Sherawat. I was told in a very roundabout way. Anurag (Basu) himself was feeling inhibited giving those instructions in front of me and Imi was feeling a little conscious. I could understand that. Even while shooting Jism, Pooja asked me to stay away when they were shooting those scenes with John and Bipasha. She said, ‘We can’t have you here. People don’t feel comfortable, they feel inhibited because you are an elderly figure.’ So I said, fine.”

http://www.thefilmstreetjournal.com/images/mahes4.jpgOn his part, Mahesh Bhatt is clear that what works for other actors must work for the women of his family too. “If I want an actor to do a particular scene, I must see if it’s okay by my own standards, by my own children, my own son, my own daughter. I cannot say, ‘no’, my son or my daughter cannot do it, a different morality will apply to them.”

Besides not drawing a line between his own and the outsiders, as a filmmaker too, Mahesh Bhatt believes that a kiss is often more straightforward than, “Those middle-class, behind-the-doors veiled kind of sexual nuances which are more dangerous. The problem that governs Hindi cinema is that good people fall in love, bad people have sex, bas!”

Mahesh has much to observe about the syndrome of “others” versus “our own” that seizes most of us. “The greatest thing about the Vedas is where they say, what’s the miracle of all miracles?” he expounds. “The miracle of all miracles is that on the battlefield man sees death all around and still feels it happens to others. ‘Others’. The same mind says that it is the other who should be the object of desire, not your own. Because you have always looked at men and women in a particular way, you fear that your own will be subjected to a similar gaze and that is too much for you to take.”

Bring up Sanjay Dutt’s statement about not allowing the grown-up Trishala to become an actor and Mahesh Bhatt smiles, “It’s strange how you reveal yourself in moments like this because that’s the way you’ve looked at every woman. Otherwise why would you say this?” That repartee marks the grand finale to our cover story.

– Bharathi S Pradhan

kshatrapati
08-03-2012, 01:45 PM
किसी भी बात को केवल एक ही दृष्टिकोण से देखना सही नहीं होता. उदाहरण के लिए कोई हत्यारा सम्माननीय नहीं हो सकता लेकिन सीमा पर १०० दुश्मनों कि हत्या करने वाले को हम परमवीर चक्र देते हैं. इसलिए जब बात परिवार में यौन संबंधों कि हो तो भी केवल एक दृष्टिकोण से देखना गलत होगा. यहाँ मैं कुछ विभिन्न प्रकार से इस विषय पर दृष्टि डालना चाहूँगा.

वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
विज्ञान के अनुसार पूरी मानव जति एक ही परिवार (Homo sapiens) है. कोई भी किसी के भी साथ यौन सम्बन्ध बना सकता है लेकिन जब बात प्रजनन कि आती है तो स्त्री-पुरुष जितने दूर के सम्बन्धी होंगे, संतति उतनी ही विकसित होगी. निकट सम्बन्धियों के साथ प्रजनन में विकास रुक जाता है. यहाँ तक कि ऐसा बार बार करने पर संतति में terminator gene बन जाता है और ऐसे लोग प्रजनन करने में सक्षम नहीं होते. कुल मिला कर वैज्ञानिक तौर पर देखें तो परिवार (निकट सम्बन्धियों) में यौन संबंध में कोई अंतर नहीं पड़ता जब तक कि उस से बच्चे पैदा न हों.

नैतिक दृष्टिकोण:
नैतिक रूप से यदि आप किसी को कोई कष्ट न पहुंचा रहे हों तो कोई काम गलत नहीं है. यदि परिवार के सदस्य आपसी सहमति से यौन सम्बन्ध बनाएँ और इसमें कोई दबाव या हिंसा न हो तो कोई बुरे नहीं है. उल्टा सहमति होने पर वो एक दुसरे को खुशी ही देंगे जो अच्छी बात है. लेकिन यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बाद में कोई अपराध बोध जन्म न ले पाए क्योंकि कई बार पोल खुलने के बाद अपराध बोध होता है. यदि यौन सम्बन्ध रखने वाले सदस्य इतने परिपक्व हैं कि इन सभी परिस्थितियों को सम्हाल सकें तो इसमें नैतिक तौर पर कोई बुराइ नहीं है.

सामाजिक दृष्टिकोण:
समाज के नियम किसी व्यक्ति विशेष के अधर पर नहीं बनाए जाते हैं. ये मन कि कई नियम लोगों ने स्वार्थपूर्ति के लिए बना लिए हैं लेकिन परिवार में यौन संबंधों का निषेध सर्वसाधारण के हित में ही बनाया गया है. कारन यह है कि सभी लोग इतने परिपक्व नहीं होते कि इस प्रकार के संबंधों से सम्बंधित जटिलताओं को समझ सकें. ऐसे में परिवार में यौन संबंधों कि छूट देने से कई प्रकार कि समस्याएं जन्म ले सकती हैं. इसलिए यदि पारिवारिक युगल स्वयं को इतना परिपक्व समझे तो आपसी सहमति से यौन सम्बन्ध बना सकते हैं कितु इसे समाज से छिपा कर रखना आवश्यक है क्योकि हर व्यक्ति इसे समझ नहीं सकता और समाज में इसका प्रचार होने से अपरिपक्व लोगों को भी ऐसे सम्बन्ध बनाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा जो आगे जा कर समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा.

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण:
ये वह दृष्टिकोण है जो मुझे परिवार में यौन सम्बन्ध बनाने से रोकता है लेकिन ये भी सब पर लागू नहीं होता. मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है कि हमारी सभी भावनाये संतुलित रहें. प्रेम का एक रूप यदि श्रृंगार रस (काम, sex) है तो दूसरा रूप वात्सल्य भी है. यदि हम अपने परिजनों के साथ वात्सल्य का प्रेम नहीं रख सकते तो किसी और के साथ तो ये संभव न हो सकेगा और फिर हमारे मन में असंतुलन पैदा हो जाएगा जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है. इसलिए जहाँ तक हो सके इस प्रकार के संबंधों से दूर रहें. लेकिन यदि परिवार में कोई युगल एक दुसरे के लिए केवल कामुक भाव ही रखता है तो ऐसे में मानसिक रूप से तो संतुलन पहले ही खो चूका है तो यौन संबंधों से दूर रहकर कोई मनोवैज्ञानिक लाभ नहीं होने वाला. ऐसे में यदि पहले चर्चित साडी परिस्थितियां अनुकूल होने पर यौन सम्बन्ध स्थापित करने में कोई बुराइ नहीं है.

मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण:
मुझे दुसरे लोगों के पारिवारिक यौन संबंधों से उत्तेजना मिलती है लेकिन अपने स्वयं के परिवार के साथ मेरा वात्सल्य प्रेम का संबंध है और मैं उसे बर्बाद करना उचित नहीं समझता. मेरी आप सभी को भी यही सलाह है कि जहाँ तक हो सके इस बारे में न सोचें और अपने परिजनों को इस दिशा में आकर्षित करने कि कोशिश भी न करें. ऐसे सम्बन्ध केवल उस अवस्था में बनाएँ जब आपको १००% विश्वास हो कि आपका कोई परिजन आपको सिर्फ कामुक दृष्टि से ही देखता है और आपके मन में भी उसके लिए केवल कामुक विचार ही हैं. इतना होने पर भी वो सारी बातें सुनिश्चित कर लें जो हमने पहले लिखी हुईं हैं.

अगर आप पहले से ही पारिवारिक यौन संबंधों में लिप्त हैं या आपको पगत है कि यहाँ वर्णित साडी परिस्थितियाँ आपके अनुकूल ही तो अपने अनिभव मेरे साथ अवश्य बांटें, मुझे अच्छा लगेगा. मेरा mail-id है < robin.robby@gmail.com >

आपका Robin. :salut:

abcl42
08-03-2012, 04:53 PM
अच्छा विश्लेषण किया है

dkgdkg
14-03-2012, 01:29 PM
PLEASE WATCH MOVIE BHAROSA 1940 ANSWER OF YOUR QUESTIONS ARE HERE PLEASE TRANLATE THE STORY IN HINDY Bharosa

# Release Date
: 0000-00-00
# Language
: Hindi
# Genre
: Social
# Cast & Crew
: Close Movie Crew Data
Star Cast
# Chandramohan
# Sardar Akhter
# Mazhar Khan (Old)
# Sheela
# Maya Devi
# Eruch Tarapor
# Gulab
# Menaka
# Abu Bakar
# Ram Apte
# Gulam Hussain
Crew
# Director Sohrab Modi
# Producer Sohrab Modi
# Cinematographer Y.D. Sarpotdar
Music
# Music Director G.P. Kapoor
# Lyricist Lalchand Bismil" Peshavari"
Writers
# Story Writer Lalchand Bismil" Peshavari"
# Screen Play Writer Lalchand Bismil" Peshavari"
Banner
# Banner Minerva Movietone
# Movie Synopsis
: Close Movie Synopsis
"BHAROSA" is a tale of a sin both hideous and charming. When man is strong, sin is hideous. When he is weak, it becomes charming. When he is defeated, it burdens his soul with its crushing weight. And that is not all. Some times such far-reaching are the poisonous effects of sin that they stagger human imagination. And yet man sins because he is human and prone to err. . The hero of our story is too just human and no more. Goaded by circumstances and unable to resist temptation he sins. And then a thousand repentances, millions of tears, innumerable penances, but they are of no avail. Once the seed of sin is sown, he must reap the fruit, is the Law of Destiny. Nay, more. His children must also suffer according to the Biblical Maximum:- "Sins of fathers shall be visited on their children". . Gyan and Rasik were great friends. They trusted each other with uncommon faith. That is why no one was surprised when Gyan, leaving for Africa on some business, decided to leave his young and beautiful wife, Shobha with Rasik. He didnot want Shobha to return to the unhealthy climate of Africa, which was patricularly damaging to her health. Rambha, Rasiks wife and Shobhas friend, agreed with Gyan and insisted on Shobha remaining with them. Rasik saw danger in this. He could not tell them that it was too dangerous. How could he ? from the day he had seen Shobha, he admired her silently but with rare devotion and consuming passion. It was only the presence of Gyan and the thought of the tremendous faith-bharosa-he had in him which had kept him steady. He was afraid that in his absence he might stumble and fall and thus prove unfaithful. . But the course of Destiny was set. A tragic struggle and a grim trial waited him. He steeled himself and with all the strength at his command resisted. It was a desperate struggle and his strength of resistance was put to greater trial when one day his wife Rambha left for her parents home. Now with the absence of his wife the path to the intoxicated passion lay open and unguarded. Lonely, tired and overwhelmed with the weight of continous struggle, his emotions growing wilder, he allowed himself to be dragged to the path of least resistance and gave the struggle. Little did he know that hidden in the dark future lay a deadendwhence there would be no turning back. Poor Rasik! He could not stand up to the trial any more and in one fateful moment of a terrible nightmare he sinned dragging with him unfortunate Shobha. Then followed the dawn of biting and remorseful concciousness. But they were helpless. Past is immortal. The terrible seed of sin was sown and the harvest must be raped at its proper time. . Days, weeks and months passed. Their moment of sin flowered into an innocent and tender child-Indira. In the meantime Gyan returned from Africa. Good-natured and unsuspecting he showered all his love on the little child, caressing her as a loving father least knowing what had happened behing his back. He had unflinching faith-bharosa- in Rasik and loved him passionately. Noticing a growing attachment between Indira and Madan, Rasiks son, he announced his intention of marrying them when grown-up thus cementing their friendship with ties relationship. Rasik and Shobha, were dumb-founded. How can it happen the marriage of Madan with Indira? But how to prevent it? Unable to bear the pangs of sin any longer Shobha in a mad moment decided to strangle little Indira. [Source: Booklet]

dkgdkg
14-03-2012, 01:30 PM
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devendrasoni
15-03-2012, 02:37 PM
किसी भी बात को केवल एक ही दृष्टिकोण से देखना सही नहीं होता. उदाहरण के लिए कोई हत्यारा सम्माननीय नहीं हो सकता लेकिन सीमा पर १०० दुश्मनों कि हत्या करने वाले को हम परमवीर चक्र देते हैं. इसलिए जब बात परिवार में यौन संबंधों कि हो तो भी केवल एक दृष्टिकोण से देखना गलत होगा. यहाँ मैं कुछ विभिन्न प्रकार से इस विषय पर दृष्टि डालना चाहूँगा.

वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
विज्ञान के अनुसार पूरी मानव जति एक ही परिवार (Homo sapiens) है. कोई भी किसी के भी साथ यौन सम्बन्ध बना सकता है लेकिन जब बात प्रजनन कि आती है तो स्त्री-पुरुष जितने दूर के सम्बन्धी होंगे, संतति उतनी ही विकसित होगी. निकट सम्बन्धियों के साथ प्रजनन में विकास रुक जाता है. यहाँ तक कि ऐसा बार बार करने पर संतति में terminator gene बन जाता है और ऐसे लोग प्रजनन करने में सक्षम नहीं होते. कुल मिला कर वैज्ञानिक तौर पर देखें तो परिवार (निकट सम्बन्धियों) में यौन संबंध में कोई अंतर नहीं पड़ता जब तक कि उस से बच्चे पैदा न हों.

नैतिक दृष्टिकोण:
नैतिक रूप से यदि आप किसी को कोई कष्ट न पहुंचा रहे हों तो कोई काम गलत नहीं है. यदि परिवार के सदस्य आपसी सहमति से यौन सम्बन्ध बनाएँ और इसमें कोई दबाव या हिंसा न हो तो कोई बुरे नहीं है. उल्टा सहमति होने पर वो एक दुसरे को खुशी ही देंगे जो अच्छी बात है. लेकिन यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बाद में कोई अपराध बोध जन्म न ले पाए क्योंकि कई बार पोल खुलने के बाद अपराध बोध होता है. यदि यौन सम्बन्ध रखने वाले सदस्य इतने परिपक्व हैं कि इन सभी परिस्थितियों को सम्हाल सकें तो इसमें नैतिक तौर पर कोई बुराइ नहीं है.

सामाजिक दृष्टिकोण:
समाज के नियम किसी व्यक्ति विशेष के अधर पर नहीं बनाए जाते हैं. ये मन कि कई नियम लोगों ने स्वार्थपूर्ति के लिए बना लिए हैं लेकिन परिवार में यौन संबंधों का निषेध सर्वसाधारण के हित में ही बनाया गया है. कारन यह है कि सभी लोग इतने परिपक्व नहीं होते कि इस प्रकार के संबंधों से सम्बंधित जटिलताओं को समझ सकें. ऐसे में परिवार में यौन संबंधों कि छूट देने से कई प्रकार कि समस्याएं जन्म ले सकती हैं. इसलिए यदि पारिवारिक युगल स्वयं को इतना परिपक्व समझे तो आपसी सहमति से यौन सम्बन्ध बना सकते हैं कितु इसे समाज से छिपा कर रखना आवश्यक है क्योकि हर व्यक्ति इसे समझ नहीं सकता और समाज में इसका प्रचार होने से अपरिपक्व लोगों को भी ऐसे सम्बन्ध बनाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा जो आगे जा कर समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा.

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण:
ये वह दृष्टिकोण है जो मुझे परिवार में यौन सम्बन्ध बनाने से रोकता है लेकिन ये भी सब पर लागू नहीं होता. मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है कि हमारी सभी भावनाये संतुलित रहें. प्रेम का एक रूप यदि श्रृंगार रस (काम, sex) है तो दूसरा रूप वात्सल्य भी है. यदि हम अपने परिजनों के साथ वात्सल्य का प्रेम नहीं रख सकते तो किसी और के साथ तो ये संभव न हो सकेगा और फिर हमारे मन में असंतुलन पैदा हो जाएगा जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए सही नहीं है. इसलिए जहाँ तक हो सके इस प्रकार के संबंधों से दूर रहें. लेकिन यदि परिवार में कोई युगल एक दुसरे के लिए केवल कामुक भाव ही रखता है तो ऐसे में मानसिक रूप से तो संतुलन पहले ही खो चूका है तो यौन संबंधों से दूर रहकर कोई मनोवैज्ञानिक लाभ नहीं होने वाला. ऐसे में यदि पहले चर्चित साडी परिस्थितियां अनुकूल होने पर यौन सम्बन्ध स्थापित करने में कोई बुराइ नहीं है.

मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण:
मुझे दुसरे लोगों के पारिवारिक यौन संबंधों से उत्तेजना मिलती है लेकिन अपने स्वयं के परिवार के साथ मेरा वात्सल्य प्रेम का संबंध है और मैं उसे बर्बाद करना उचित नहीं समझता. मेरी आप सभी को भी यही सलाह है कि जहाँ तक हो सके इस बारे में न सोचें और अपने परिजनों को इस दिशा में आकर्षित करने कि कोशिश भी न करें. ऐसे सम्बन्ध केवल उस अवस्था में बनाएँ जब आपको १००% विश्वास हो कि आपका कोई परिजन आपको सिर्फ कामुक दृष्टि से ही देखता है और आपके मन में भी उसके लिए केवल कामुक विचार ही हैं. इतना होने पर भी वो सारी बातें सुनिश्चित कर लें जो हमने पहले लिखी हुईं हैं.

अगर आप पहले से ही पारिवारिक यौन संबंधों में लिप्त हैं या आपको पगत है कि यहाँ वर्णित साडी परिस्थितियाँ आपके अनुकूल ही तो अपने अनिभव मेरे साथ अवश्य बांटें, मुझे अच्छा लगेगा. मेरा mail-id है < robin.robby@gmail.com >

आपका Robin. :salut:
Very Nice and true comments Robin Ji . I absolutely agree.

RaniSingh111
17-03-2012, 02:08 PM
Very Nice and true comments Robin Ji . I absolutely agree.

छत्रपति जी के इस लेख पर, इसी विभाग के निम्नलिखित सूत्र पर चर्चा व बहस हो चुकी है कृपया इस सूत्र को पढ़े,
ये किताबी ज्ञान है जिसने व्यवहारिकता नहीं है विज्ञान की घालघुसेड कर विश्लेषण की टांग उची रखने का प्रयास बखूबी से किया गया है| स्वछन्दता को बढ़ावा देने के लिए सामाजिकता व व्यवहारिक सत्यता को नकारने का प्रयास भी अच्छे तरीके से किया गया है|
http://antarvasna.com/forum/showthread.php?t=340&page=21

anjoogupta
17-03-2012, 07:45 PM
मैं और मेरी दीदी बहुत सुन्दर हैं. मैं, मेरे पति और मेरी दीदी व जीजाजी. कहने को तो दो परिवार हैं. पर हम दो पति और दो पत्नियों की तरह रहते हैं. मैं कभी पति के साथ सोती हूँ और कभी जीजाजी के साथ. यही बात दीदी के साथ होती है. वो अपने पति के साथ साथ मेरे पति से भी चुदाई करवाती है. हम चारों के बीच दाम्पत्य जीवन का कोई दुराव छिपाव नहीं है. हम लोगों का जीवन आनंद पूर्वक बीत रहा है. हम लोग कभी कभी ग्रुप सेक्स भी करते हैं. चूंकि दोनों पति इसमें शामिल रहते हैं, इसलिए हम दोनों बहनों को कोई तनाव नहीं रहता. दरअसल शादी के पहले कालेज के एक स्थानीय सजीले सहपाठी युवक से मेरे सेक्स-अफेयर थे, प्यार करते करते उसके साथ मैंने जवानी को भोगा. और उसने मेरी सील तोडी, पर संयोगवश, उस युवक से मेरी दीदी की शादी हो गई. (पूरी परिस्थती फिर कभी लिखूंगी.)
अब शादी के बाद जब दीदी को मेरे अफेयर का पता लगा तो उन्हें दुःख हुआ, पर कुछ नहीं हो सकता था. हमने परिस्थिती से समझौता कर लिया था. पर हम तीनों जब भी मिलते बड़ी अजीब सी हालत हो जाती थी. फिर करीब ३-४ महीने बाद, दीदी ने मुझे मेरे जीजाजी से कभी कभी मिलने की परमीसन दे दी थी. मुझे नहीं मालूम उस समय उनके दिमाग में वो क्या सोच रही थी ? मैं तो अपने जीजा के प्यार में मस्त थी. बाद में दीदी ने मुझे बताया कि वो भी एक लड़के से प्यार करती थी पर उस से शादी नहीं हो पायी. इसलिए वो मेरा दर्द समझती है. वो लड़का जीजाजी के दूर का रिश्तेदार था. मेरे दिमाग में एक बात आई और मैंने दीदी को बताया तो वो बोली कि यदि मैं राजी हो जाऊं तो वे भी एसा ही सोच रही हैं. मैंने जीजाजी से पूरी चर्चा करके हाँ कर दी और दीदी ने अपने प्रेमी से सहमती लेकर शादी कि बात चलाकर अपने उस प्रेमी से ही मेरी शादी करवा दी. अब हम चारों मिलकर रहते हैं. मेरे पति, पति होने के
नाते मुझे भोगते हैं. और जीजाजी प्रेमी होने के नाते मुझसे प्यार करते हैं. दीदी भी दोनों से सम्भोग करती है. दो दो पतियों के बीच हमारी जिन्दगी बहुत मज़े और सुखमय कट रही है. हम नहीं जानते जी दुनिया के रीति रिवाजों के अनुसार हम सही कर रहे हैं या गलत. पर जो कर रहे हैं अपने ख़ुशी और बिना किसी अपराध बोध के कर रहे हैं. हम सभी इस बात पर सहमत हैं जिस समय हम लोगों को कुछ उबाउपन लगेगा या गलत
महसूस होगा हम लोग अलग अलग होकर अपने अपने पति के साथ सामान्य जिन्दगी गुजारने लगेंगे. हम सब एक दुसरे कि बहुत रिस्पेक्ट करते हैं.

dmaharaja007
17-03-2012, 08:39 PM
मैं और मेरी दीदी बहुत सुन्दर हैं. मैं, मेरे पति और मेरी दीदी व जीजाजी. कहने को तो दो परिवार हैं. पर हम दो पति और दो पत्नियों की तरह रहते हैं. मैं कभी पति के साथ सोती हूँ और कभी जीजाजी के साथ. यही बात दीदी के साथ होती है. वो अपने पति के साथ साथ मेरे पति से भी चुदाई करवाती है. हम चारों के बीच दाम्पत्य जीवन का कोई दुराव छिपाव नहीं है. हम लोगों का जीवन आनंद पूर्वक बीत रहा है. हम लोग कभी कभी ग्रुप सेक्स भी करते हैं. चूंकि दोनों पति इसमें शामिल रहते हैं, इसलिए हम दोनों बहनों को कोई तनाव नहीं रहता. दरअसल शादी के पहले कालेज के एक स्थानीय सजीले सहपाठी युवक से मेरे सेक्स-अफेयर थे, प्यार करते करते उसके साथ मैंने जवानी को भोगा. और उसने मेरी सील तोडी, पर संयोगवश, उस युवक से मेरी दीदी की शादी हो गई. (पूरी परिस्थती फिर कभी लिखूंगी.)
अब शादी के बाद जब दीदी को मेरे अफेयर का पता लगा तो उन्हें दुःख हुआ, पर कुछ नहीं हो सकता था. हमने परिस्थिती से समझौता कर लिया था. पर हम तीनों जब भी मिलते बड़ी अजीब सी हालत हो जाती थी. फिर करीब ३-४ महीने बाद, दीदी ने मुझे मेरे जीजाजी से कभी कभी मिलने की परमीसन दे दी थी. मुझे नहीं मालूम उस समय उनके दिमाग में वो क्या सोच रही थी ? मैं तो अपने जीजा के प्यार में मस्त थी. बाद में दीदी ने मुझे बताया कि वो भी एक लड़के से प्यार करती थी पर उस से शादी नहीं हो पायी. इसलिए वो मेरा दर्द समझती है. वो लड़का जीजाजी के दूर का रिश्तेदार था. मेरे दिमाग में एक बात आई और मैंने दीदी को बताया तो वो बोली कि यदि मैं राजी हो जाऊं तो वे भी एसा ही सोच रही हैं. मैंने जीजाजी से पूरी चर्चा करके हाँ कर दी और दीदी ने अपने प्रेमी से सहमती लेकर शादी कि बात चलाकर अपने उस प्रेमी से ही मेरी शादी करवा दी. अब हम चारों मिलकर रहते हैं. मेरे पति, पति होने के
नाते मुझे भोगते हैं. और जीजाजी प्रेमी होने के नाते मुझसे प्यार करते हैं. दीदी भी दोनों से सम्भोग करती है. दो दो पतियों के बीच हमारी जिन्दगी बहुत मज़े और सुखमय कट रही है. हम नहीं जानते जी दुनिया के रीति रिवाजों के अनुसार हम सही कर रहे हैं या गलत. पर जो कर रहे हैं अपने ख़ुशी और बिना किसी अपराध बोध के कर रहे हैं. हम सभी इस बात पर सहमत हैं जिस समय हम लोगों को कुछ उबाउपन लगेगा या गलत
महसूस होगा हम लोग अलग अलग होकर अपने अपने पति के साथ सामान्य जिन्दगी गुजारने लगेंगे. हम सब एक दुसरे कि बहुत रिस्पेक्ट करते हैं.

वाह मैडम वाह , पति और प्रेमी दोनों साथ साथ ......किस्मत हो तो आप जैसी
ग्रुप सेक्स का मजा अलग है. मुझे भी पसंद है पर ........... कुछ नहीं हो सकता.

RaniSingh111
18-03-2012, 09:41 PM
मैं और मेरी दीदी.............................. गुजारने लगेंगे. हम सब एक दुसरे कि बहुत रिस्पेक्ट करते हैं.
पूरी की पूरी कहानी सरासर झूट का पुलंदा है|
ये(anjooputa) कोई लड़का है जो लड़की बन कर लोगो का मनोरंजन कर रहा है|
भारतीय समाज में केवल जीजी और जीजाजी ही रिश्तेदार या बंधुजन नही होते है
और भी कई रिश्ते-नाते होते है
माता-पिता
सास-ससुर
देवर-देवरानी, जेठ-जिठानी
भाई-भाभी
ना जाने कितने ही रिश्तेदार
क्या ये सब इसे कृत्य को सही मान सकते है?

Raja44
19-03-2012, 09:51 AM
पूरी की पूरी कहानी सरासर झूट का पुलंदा है|
ये(anjooputa) कोई लड़का है जो लड़की बन कर लोगो का मनोरंजन कर रहा है|
भारतीय समाज में केवल जीजी और जीजाजी ही रिश्तेदार या बंधुजन नही होते है
और भी कई रिश्ते-नाते होते है
माता-पिता
सास-ससुर
देवर-देवरानी, जेठ-जिठानी
भाई-भाभी
ना जाने कितने ही रिश्तेदार
क्या ये सब इसे कृत्य को सही मान सकते है?

आप बिलकुल सत्य फरमाते हैँ मुझे भी यही लगता है

abcl42
19-03-2012, 10:10 PM
पूरी की पूरी कहानी सरासर झूट का पुलंदा है|
ये(anjooputa) कोई लड़का है जो लड़की बन कर लोगो का मनोरंजन कर रहा है|
भारतीय समाज में केवल जीजी और जीजाजी ही रिश्तेदार या बंधुजन नही होते है
और भी कई रिश्ते-नाते होते है
माता-पिता
सास-ससुर
देवर-देवरानी, जेठ-जिठानी
भाई-भाभी
ना जाने कितने ही रिश्तेदार
क्या ये सब इसे कृत्य को सही मान सकते है?

सत्य वचन / ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है /

anjoogupta
22-03-2012, 11:15 PM
पूरी की पूरी कहानी सरासर झूट का पुलंदा है|
ये(anjooputa) कोई लड़का है जो लड़की बन कर लोगो का मनोरंजन कर रहा है|
भारतीय समाज में केवल जीजी और जीजाजी ही रिश्तेदार या बंधुजन नही होते है
और भी कई रिश्ते-नाते होते है
माता-पिता
सास-ससुर
देवर-देवरानी, जेठ-जिठानी
भाई-भाभी
ना जाने कितने ही रिश्तेदार
क्या ये सब इसे कृत्य को सही मान सकते है?


आप विस्वास करें न करें आपकी इच्छा .
पर आपकी ये बात बिलकुल गलत है की में लड़की नहीं हूँ.
क्या सबूत दूं आपको?

harimuradganj
29-03-2012, 01:35 PM
ye galat hai par chachere risto mai log ye sab nahi mante.:speaker::speaker::nono::nono:

deepa rai
30-03-2012, 06:01 PM
पारिवारिक सेक्स संबंधों पर स्वस्थ चर्चा. होनी हे चाहिए

abcl42
31-03-2012, 10:48 PM
मित्र dkgdkg आपने ये वायफ स्वप्पिंग की कहानी इस सूत्र पर क्यूँ डाल दी इसे उचित सूत्र पर हिंदी में लिखते और जादा मजा आता

Lookmaan
01-04-2012, 09:53 AM
क्या कुंती और वासुदेव भाई बहन थे .....:question:ज़रा विस्तार से बताइए....हाँ मै भि जाना जाहता हुँ यिस बारेमेँ

abcl42
01-04-2012, 10:11 AM
हाँ मै भि जाना जाहता हुँ यिस बारेमेँ

कुंती राजा शूरसेन की पुत्री थी और वासदेव की सगी बहिन थी ( वासदेव राजा शूरसेन के पुत्र थे ). इनका असली नाम पृथा था / संतान विहीन राजा कुन्तिभोज ने बचपन में इन्हें गोद ले लिया था और तब इनका नाम कुंती पड़ा / कुंती को गोद लेने के बाद राजा कुन्तिभोज के और संताने भी हुई / राजा कुन्तिभोज ने ही अपनी इस दत्तक पुत्री का विवाह महाराज पांडु से किया था / वासदेव के पुत्र कृष्ण इनके भतीजे (भाई वासदेव के पुत्र थे) / यह पौराणिक कथा महाभारत में है /

Lookmaan
01-04-2012, 07:27 PM
यार कोई अपनी मा बाहेँ ना चोदो|यार मेँ भी अकेला हूँ अपनी बाहने exchange कर सकते हैँ

asif_naidunia@yahoo.com
12-04-2012, 03:13 PM
अगर पत्नी सेक्स मैं साथ न दे तो क्या करना चाहिए?

aarti verma
13-04-2012, 01:01 PM
mere cousin brother n real brother ne mujhe jabardasti se choda....par majaa aaya tha..maine kuch din unse baat nahi ki..par baad me khud khujli hone lagi to...chudwane lagi