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View Full Version : ज़िन्दगी है अनमोल, तू इसमें ज़हर मत घोल.



xxxboy27
26-06-2011, 08:03 PM
152815


पिछले सप्ताह मै अपने टीवी पर एक बहुत ही रोमांचित करने वाली फिल्म देख रहा था जिसमे नायक रजनीकांत जो अपने हाथो से सिगरेट को आसमान में उछालते है और फिर अपनी बन्दूक से उस पर फायर (गोली चलाते है) करते है और वह सिगरेट आसमान में जलजाती है और वापस उनके हाथ में आकर गिरती है. इस सीन को देखते ही मेरे दिमाग में न जाने कितने ही नायक और खलनायक के सीन खुद बे खुद घूमने लगे. कुछ सीन में खलनायक अपने सिगरेट वाली छवि से एक नयी इबारत लिख गए …………… उसके सिगरेट के गोल-गोल छल्ले उनकी नयी पहचान बन गई . मरहूम अजीत (हमीद खान) जिनको दुनिया शेर (LION) के नाम से जानती है उनके हाथ की सिगार और उनके बोलने/सवाद शैली फिल्म इंडस्ट्री में एक अलग पहचान थी .लेकिन क्या इन नायकों और खलनायकों ने अपने जीवन में यह सोचा है की उनकी यह अदा समाज पर कितना और कैसा प्रभाव छोड़ेगी ? शायद नहीं. उनकी हर अदा तो उन्होंने परदे पर तालिया बटोरने के लिया किया था .
स्मोकिंग यानि ध्रूमपान . धुरूम+पान ….अर्थार्त धुँए का पीना. मेरे प्रिये दोस्तों और भाइयो . अब मै आपसे एक सवाल पूछता हूँ.इस संसार में हमारे इश्वर (अल्लाह) ने पीने के लिए हमें नायाब से नायाब चीजे दी है जैसे, पानी, दूध, जूस, लस्सी आदि तो फिर कौन सी वह मजबूरी है जिसमे हम अपनी शरीर को मारने वाला धुंआ पी रहे है. एक मिनट के लिए अपने दिमाग पर ज़रा जोर डाले . बचपन में हमारा घरो में जब गैस नहीं थी, हमारे घरो मे कोयले या बुरादे की भट्टी जला करती थी. हमारे घरो में खाना पकाने के लिए उस भट्टी को हमारे घरो की औरते (माँ, बहिन या और लोग) उसको सुलगती थी तो उसके ज़रा से धुवे को हम बरदाश नहीं कर पाते थे. हमारे आँखों से आसू और आवाज़ में एक जाल सा बन जाता था और हम लोग घर से बाहर चले जाते थे ..
आज हमारा युवा-वर्ग स्मोकिंग (धूम्रपान) के माध्यम से अपनी या अपने पूर्वजो की मेहनत की कमाई को धुँए में उड़ा रहा है…… उसको ऐसा लगता है की वह भी फ़िल्मी हीरो देव-आनंद की तरह है …. जो परदे पर कहते है … की मै फिक्र को धुँए में उडाता चला गया…. लेकिन शायद युवा वर्ग को पता नहीं की वह फ़िक्र को धुवे में नहीं उड़ा रहा है बल की अपनी मेहनत की कमाई और अपने स्वास्थ्य को धुँए में जला रहा (उड़ा).एक सामान्य बुद्धि और एक असामान्य बुद्धि वाले इंसान में अंतर होता है . जिसके कार्य को सामने वाला इंसान तारीफ करता है और एक असामान्य व्यक्ति को सभी लोग मजाक बनाते और बुरी नज़र से देखते है.तो एक असामान्य व्यक्ति ही अपने धन और तन दोनों को जलती हुई आग पर रखेगा और ऐसा करने पर वह गर्व महसूस करता है. वह सोचता है कि उसका कार्य सामाजिक, नैतिक, आर्थिक और धार्मिक दृष्टि (नज़र) से ठीक है पर शायद उसको पता नहीं वह किस तरफ जा रहा है ? कभी एक स्वस्थ मष्तिस्क वाले को अपने धन और तन को आग की भट्टी में डालते हुए देखा है क्या ?….शायद ……………नही . धूम्रपान करने वाला इंसान मानसिक तौर पर स्वस्थ नहीं होता है तभी से वह अपने मानसिक दिवालियेपन का परिचय देता है और एक न दिखने वाले जाल में निरंतर फसता जाता है. ईश्वर(अल्लाह) उनको सही रास्ता दिखाए !
लेकिन आज के आधुनिकता का दौर में इंसान अपने मौत की तरफ खुद ही भगा चला जा रहा है. स्मोकिंग (धूम्रपान) का इतिहास आज का नहीं है, यह लगभग 5000 BC से हम से और हमारी संस्कृति से सूखे चिंगम की तरह चिपका है ..! पहेले स्मोकिंग का रिवाज़ धार्मिक उत्सव के समय किया जाता था. हुक्क, सिगार, बीडी और चिलम, ओपियम (अफीम), आदि स्मोकिंग के स्वरुप है !
सिगरेट पीते वक़्त इंसान मुँह के द्वारा उसके धुँए को अंदर खीचता है और जो फेफड़ों से होता हुआ हमारे नाक के माध्यम से निकलता है. एक ज़रा से धुंआ जब हमारे आँखों या नाक में जाता है तो हम अपने आप से अपना नियंत्रण खो देते है. वही धुंआ जो हमारे शरीर से (फेफड़ों) से गुज़रेगा तो हमारे कोमल अंगो पर उसका किया प्रभाव होगा. इन्हालिंग द्वारा (धूम्रपान) यह धुवा हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालता है,धूम्रपान के दौरान कार्बन मोनोऑक्साइड हमारे फेफड़ों में प्रवेश करती है और विपरीत एवम् गंभीर स्वास्थ्य खतरों और रोग पैदा करते है जैसे फेफड़ों के कैंसर, फेफड़ों में संक्रमण, स्तन कैंसर, हार्ट अटैक (दिल का दौरा), नपुंसकता, जन्म के समय कम वजन. इस रोग और वेदनाओं कि धूम्रपान से हो संवहनी प्रकार का रोग भी हो सकता है कान, नाक और गला में संक्रमण , संचार प्रणाली , कम दिल दर परिवर्तनशीलता, उच्च हृदय गति,अस्थमा का जोखिम, संज्ञानात्मक हानि, पागलपन, गर्भावस्था, जन्म के समय कम वजन ,सीखना में कठिनाइयों, शारीरिक विकास में देरी है, निमोनिया,दंत रोग-दंतक्षय में वृद्धि, धूम्रपान का एक आम परिणाम चेहरे में परिवर्तन……………………. त्यादि !
युवाओं में धूम्रपान आज एक STATUS SYMBOL यानि उसकी सामाजिक स्तिथि को परिभाषित करती है. आज हमारे युवाओं को साथियों से धूम्रपान मिलता है .क्योंकि किशोरों -वयस्कों की तुलना में अपने साथियों से अधिक प्रभावित होते हैं सिगरेट से रोकने में अभिभावकों, स्कूलों और स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा कोशिश कर रहे लोग अक्सर नाकाम रहे है……………………!
मनोवैज्ञानिकों के राय में धूम्रपान करने के लिए एक व्यक्तित्व ज़यादातर उत्तेजना, अंडर प्रेशर और भय के कारण इसकी ओर आकर्षित होता है.वह अपने मानसिक दर्द को दूर करने और अपने को चिंता मुक्त होने के लिया धूम्रपान का आदी हो जाते है. उनको इसका पता ही नहीं चलता है कि कब वह इस जाल मे कैद हो गया .
धूम्रपान का हमारे स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है लेकिन अगर हम अपने युवा और अपने परिचित लोगो को इसके बारे में जागरूक करते है तो उनको लगता है कि हम उनकी व्यक्तिगत आजादी पर हमला कर रहे है पर उनको इसके विपरीत प्रभाव का पता नहीं है.सिगरेट अक्सर दोस्तों के बीच एक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है या बस एक अच्छा बहाना कई सेटिंग्स में अजनबियों के साथ एक बातचीत के आदान शुरू करने के लिए है काम पर रात क्लब, या सड़क पर एक सिगरेट अक्सर आलस्य या मात्र एकांत और उत्तेजना की उपस्थिति से बचने का एक प्रभावी तरीके के रूप में देखा जाता है.किशोरों के लिए, उसे बचपन से बाहर एक पहला कदम या वयस्क दुनिया के खिलाफ विद्रोह के एक अधिनियम के रूप में के रूप में कार्य कर सकते हैं.मनोरंजन नशीली दवाओं के प्रयोग के अलावा, यह और आत्म का विकास छवि निजी अनुभवों धूम्रपान से जुड़ा है और अपनी पहचान के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
धूम्रपान का सबसे बुरा प्रभाव हमारे परिवार के सदस्यों (माँ-बाप, बीवी-बच्चे) जो एक ही स्थान पर हमारे करीब होते है .हमारे शरीर में दाखिल होने वाला ज़हर जितना नुक्सान हमारे शरीर को करता है उतना ही उनके कोमल शरीर को करता है.यहाँ मै एक बिंदु की तरफ इशारा करना चाहता हूँ . भाइयो और दोस्तों हम दिन रात जान-तोड़ मेहनत किसके लिए करते है , निश्चित अपने और अपने परिवार के लिए.शायद इस संसार में कुछ ही लोग होगे जो सिर्फ अपने लिए जीते है !हम अपने परिवार विशेष कर अपने बच्चो के भविष्य के लिए ही निरंतर काम करते है और उनके लिए हे जीते और मरते है.एक माँ-बाप अपने बच्चो को अच्छे से अच्छा भोजन,कपडे और शिक्षा के लिए हमेशा संघर्ष करते है.उनका प्रयास होता है की नाश्ते में उनको ब्रेड के साथ दूध, मक्खन और जाम मिले, दोपहर में स्वादिस्ट सब्जी, दाल या उनकी इक्छा के अनुसार भोजन मिले और शाम को वह सब के साथ बैठ कर चटपटे वयंजन और कुछ मिष्टान आदी के साथ भोजन करे और कभी-कभी वह उनको बहार घूमने के लिया ले जाये ताकि वह भी उनको कुछ नया और अच्छा खाने को मिले………यानि उसका पूरा ध्यान उनकी सेहत और स्वाद पर होता है. जो माँ-बाप अपने बच्चो को इतना प्यार करते है तो वह इतने निर्दयी और लापरवाह कैसे हो जाते है कि वह परिवार के सामने और परिवार के बीच में रह कर धूम्रपान करते है और उसको अप्रत्याश रूप से प्रोतसाहित करते है. हम अपने बच्चो को जब दूध और मक्खन देते है तो बोलते है कि बच्चो यह तुम्हारे स्वस्थ के लिया अच्छा है . हमारे बच्चे उसपर अमल करते है और उसे अपनी आदत में लेते है …जब हम धूम्रपान करते है तो उनके कोमल दिमाग पर भी उस सिगरेट का उतना ही प्रभाव पड़ता है.वह समझते है की यह भी हमारे लिया ठीक है और वह इसे भी अपनी भोजन-जीवन शैली में शामिल कर लेते है. जब हम उनको वही करते देखते है तब उनपर अपना गुस्सा निकलते है. यह ठीक है ?नहीं . क्योंकि हर बड़ा अपने छोटो का मार्गदर्शक….रास्त दिखाने वाला होता है. बच्चे भी वैसा अनुसरण करते है………हमारे ही गलत कार्य शैली – जीवन शैली हमारे माध्यम से उन तक जाती है यानि हमही उनके जीवन में ज़हर घोल ने के लिए उत्तरदायी (जिम्मेदार) है. हम उस कुम्हार की तरह है जो अपनी मिटटी (बच्चो) को जिस रूप में चाहे ढाल सकता है उसे अच्छा बुरा स्वरुप दे सकता है.
धूम्रपान से लोगो को होने वाली हानियों के लिए धूम्रपान अभियान और मास मीडिया के माध्यम से जागरूक करने के लिए जागरूकता अभियान चलाये जाते है सार्वजनिक स्थानों में धूम्रपान करने पर रोक लगाई गयी है आज धूम्रपान एक आम चिंता का विषय है और नाबालिगों के बीच धूम्रपान को हतोत्साहित करने के लिए कई राज्यों अंडर-एज ग्राहकों को तंबाकू उत्पादों की बिक्री के खिलाफ कानून पारित किया है.धूम्रपान अभियान और शिक्षा के द्वारा नकारात्मक प्रभावों (पर्यावरण तम्बाकू धुआँ) की व्याख्या के लिए कुछ प्रमुख विरोधी नीतियों को अपनाया गया है.व्यापक तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के कारण सिगरेट पर काफी गिरावट आई है धूम्रपान और पर्यावरण एक दूसरे से अछूते नहीं है.हमारे धूम्रपान का हमारे आस-पास के माहौल को और धूम्रपान की वजह से ही घरो में आग लगजाती और जान और माल का काफी नुकसान हर साल होता है . तो क्या आप यह सब जानने के बाद जागेंगे ? क्या अपने साथ औरों को भी शामिल करेंगे इस व्यसनमुक्ति अभियान में जहाँ हम एक स्वस्थ और युवा विश्व की कल्पना करते हैं ?
जय भारत… ..जय भारत वासी

xxxboy27
01-07-2011, 05:15 PM
रहमत

रहमत क़ुदरत की एक ऐसी बख़्शीश है जो सदा सब पर समान रूप से बरसती है. हां यह बात और है कि हासिल सभी को अलग-अलग वक़्त व अंदाज़ से होती है, किसी को कम तो किसी को ज़्यादा और किसी को बिलकुल भी नहीं, शायद इसलिये कि हम अपनी अपनी झोलियों में अपनी छोटी छोटी ख़्वाहिशों के इतने छेद भर लेते हैं कि रहमत उनमें चाहे कितनी भी क्यों न बरसे, झोली ख़ाली की ख़ाली ही रहती है. संतुष्टी से शायद कुछ छेद भर जांय तो फिर रहमतों की तो कोई कमी नहीं है.

xxxboy27
01-07-2011, 05:15 PM
निश्चय

निश्चय, विशवास की एक ऐसी कड़ी है जो वक़्त के थपेड़े खाकर ढीली तो पड़ जाती है , पर टूटने से पहले, न टूटने की समझ आ जाय तो निश्चय सकारात्मक हो जाती है. पीड़ पुख़्ता हो तो इमारत फिर से खड़ी हो सकती है, यह भरोसे की जीत है और साथ ही साथ आत्मविश्वास के आधार पर टिका मनोबल भी मज़बूत हो जाता है.

xxxboy27
01-07-2011, 05:16 PM
प्यासी ज़िंदगी

जीवन की राहों पर कभी ऐसे इन्सान मिलता है जिन्हें देखकर महसूस होता है कि वह जिंदा तो है पर ज़िंदगी नहीं जी रहा है, बल्कि ज़िंदगी उसे जी रही है. वह मौत के लिये बिलखता है, तड़पता है, पर मौत गर मांगकर मिलने वाली चीज़ होती तो ज़रूर पा लेता. वह तो किसी की ग़ुलाम नहीं, हुकुमरानी है. आदमी दुनियां के समंदर के किनारे ख़ुश्क रेत पर अपने सपनों का टीला बनाए हुए है, और तिश्नगी उसकी ज़िंदगी के लबों पर साफ़ नज़र आती है. एक कतरा अगर ओस का उसमें थाह पा ले तो यकीनन उसमें समाकर वह एक मोती बन जाता.

xxxboy27
01-07-2011, 05:17 PM
तन्हाई

कभी इन्सान की जिँदगी में कुछ ऐसे लोग आते हैं जो हवा के झोंके, बारिश की बूँद, फूल के रँग, सइरा में पानी के बगैर रेत के ज़र्रे, दरख़त के किसी सूखे पते और फूल की आखिरी पती की तरह होते हैं.
लेकिन जब यह हवा का झोंका गुजर जाये, बारिश की बूँद बरस जाये, फूल का रँग फ़ीका पड जाये, सइरा में पानी के बगैर रेत का ज़र्रा ज़र्रा उड़ जाए, दरख़त का आखिरी सूखता पता मौसमे-खिजाँ में गिर जाए तो उस वक़्त इन्सान को एहसास होता है सच्चाई यही कि जिंदगी में साथ देने वाली सिर्फ तन्हाई है और वह पतों के बगैर एक तन्हा पेड़ की तरह है जिसे अकेलेपन के साथ रहना है

xxxboy27
01-07-2011, 05:18 PM
उम्र का दरिया

धरती दिन में एक बार अपने चारों और घूम आती है और साल में एक बार सूरज की परिक्रमा पूर्ण करती है ..निरंतर धारावाहिक प्रवाह इसका ज़ारी रहता है.
हम सब इसके साथ यूं ही फिरते रहते हैं तब तक जब तक हमारी नियति की ओर से दी हुई उम्र, सांसें सम्पूर्ण नहीं होती. जारी रहता है सफ़र चाहे हम चलते फिरते रहे या रूककर एक स्थान पर ठहराव पा लें. सांसों का सफ़र अपनी मंजिल की ओर एक ही लय, एक ही ताल में आगे की ओर तब तक बढ़ता है जब तक उम्र के दरिया का प्रवाह थम नहीं जाता. सांसों की बूँदें समुद्र में घुलमिलकर लीन होकर विलीन हो जाती है. पर धरती का चलन वही, कायम दायम रहता है, अपने और सूरज के चारों ओर घूमकर इस मंथन में प्रकृति का साथ देना.

xxxboy27
01-07-2011, 05:18 PM
उम्र का दरिया

धरती दिन में एक बार अपने चारों और घूम आती है और साल में एक बार सूरज की परिक्रमा पूर्ण करती है ..निरंतर धारावाहिक प्रवाह इसका ज़ारी रहता है.
हम सब इसके साथ यूं ही फिरते रहते हैं तब तक जब तक हमारी नियति की ओर से दी हुई उम्र, सांसें सम्पूर्ण नहीं होती. जारी रहता है सफ़र चाहे हम चलते फिरते रहे या रूककर एक स्थान पर ठहराव पा लें. सांसों का सफ़र अपनी मंजिल की ओर एक ही लय, एक ही ताल में आगे की ओर तब तक बढ़ता है जब तक उम्र के दरिया का प्रवाह थम नहीं जाता. सांसों की बूँदें समुद्र में घुलमिलकर लीन होकर विलीन हो जाती है. पर धरती का चलन वही, कायम दायम रहता है, अपने और सूरज के चारों ओर घूमकर इस मंथन में प्रकृति का साथ देना.

xxxboy27
01-07-2011, 05:19 PM
मान्यता

रिश्तों का मतलब अब हर कोण से बदलता जा रहा है, आधुनिक सोच और पुरानी पीढ़ी में एक पुल की ज़रूरत है. कौन ये सेतू बाँधेगा? कौन रिश्तों के महत्व को उजगार करेगा? कौन इस बात से परिचित करायेगा कि सूरज की किरणें लुप्त होकर सूरज में समा जाती है और हर लहर वहीं से उपज कर, दिन में पनपकर शाम को उसी में समा जाती है. मानना न मानना जिस तरह सत्य में बदलाव नहीं ला सकता, उसी तरह रिश्तों का अस्तित्व भी वही है, वही था, वही रहेगा. पर मानने से रिश्तों का महत्व सन्मान के स्तर को छूकर मानव मन की फुलवारी महका देता है.

xxxboy27
01-07-2011, 05:21 PM
मेरी सोच के अधर

मेरी सोच के अधर भोर के मधुर सुर-ताल में खोकर कभी गुनगुनाते हैं, तो कभी यह मन मयूर अनायास ही उस अनसुनी सी लय पर मचल उठते हैं, जो कई गुफ़ा ओं से आती जान पड़ती है. कभी तो ये अधर शायद आवाज़ के पहले की बेआवाज़ी के अगाज़ पर थरथराते है. क्यों ऐसा क्यों होता है आख़िर? क्या सोच पर भी ताले है, किसी क़ुदरत की शक्ति का पहरा है. यही सोच हमारे जीवन का आधार है, बुनियाद है, जिसकी क्रिया इतनी प्रबल है कि कभी तो यह अंतर्मन में निंद्रा के समय भी सजीव हो जाती है, तभी तो हम सपनों को देखते है, आधी रात को उठते है तो कोई न कोई सोच का साज़ छिड़ा हुआ होता है. शायद इसीलिये तो कोई न कोई मंज़र पल भर में मंज़र आँखो के आगे खड़ा हो जाता है. कोई भूला बिसरा अनुभव भले ही उसका आधार दुख हो या सुख, कड़वा हो या मीठा, दिल के किसी कोने में उभर कर सजीव सा बनकर सामने सपने में ही सही सामने आ जाता है.
इसी सत्य को मानते हुए और ध्यान में रखते हुए अगर हम अपनी सोच पर थोड़ा गौर करें तो लगेगा यह किसी उर्जा से कम नहीं है, जिसके संचालन से हम ऐसे काम कर सकते है जो आम तरह से बहुत मेहनत के बाद भी शायद न कर पाते हों. ‘सोच कई ऐसे दरवाज़ों को खोलती है जो इंसान को ‘सकारात्मक ‘और ‘नकारात्मक ‘ दिशाओं मे ले जाती है.
यह इन्सान की व्यक्तिगत जिंदगी पर निर्भर करता है कि वह किस ढाँचे में ज़िंदगी को जीता है और जीना चाहता है. एक बार संकल्प दृढ़ हो जाए तो फिर सोच का बहाव धीरे धीरे अनुकूल होता जाता है. यह एक सफ़ल क्रिया है , लघु समय की नहीं, पर एक दीर्घ काल का रोज का चलन है. जैसे हम कुछ काम करते है-क़लम हाथ में थामकर लंबा अरसा लिखते जाते है, प्रयास ज़ारी रहता है और तब यह ध्यान नहीं रहता की हम कब साँस लेते है, छोड़ते है, पता ही नहीं पड़ता, क्योंकि ह्रदय अपना कार्य एक निश्चित गति से करता रहता है. उसका यह स्वाभाव बन जाता है, वैसे ही सोच को धारावाही बनाकर उसे भी स्वाभाविक क्रिया में ढाला जा सकता है. इस नींव का पहला पत्थर ख़ुद को रखना पड़ता है. यह प्रयास नहीं, एक निश्चय है, एक द्रढ़ संकल्प है. एक बात और! सोच कोई ऐसी पूंजी नहीं जो इस्तेमाल की, ख़तम हुई और एहसास समाप्त हो जाए. नहीं! यह तो धारा है जिसका बहता रहना ज़रूरी है, कल-कल करती, उछलती-कूदती, छनछनाती ऊंचाइयों से गहराइयों की तरफ़ बहती धारा की तरह. तब उसे यह सोचने का अवसर नहीं मिलता की वह किस स्तर से बहकर किसी और स्तर की ओर जा रही है. यहीं आकर हमारी सोच का दख़ल ख़त्म हो जाता है, बस रह जाता है बहना और बहते रहना.

xxxboy27
01-07-2011, 05:22 PM
मेरी सोच के अधर

मेरी सोच के अधर भोर के मधुर सुर-ताल में खोकर कभी गुनगुनाते हैं, तो कभी यह मन मयूर अनायास ही उस अनसुनी सी लय पर मचल उठते हैं, जो कई गुफ़ा ओं से आती जान पड़ती है. कभी तो ये अधर शायद आवाज़ के पहले की बेआवाज़ी के अगाज़ पर थरथराते है. क्यों ऐसा क्यों होता है आख़िर? क्या सोच पर भी ताले है, किसी क़ुदरत की शक्ति का पहरा है. यही सोच हमारे जीवन का आधार है, बुनियाद है, जिसकी क्रिया इतनी प्रबल है कि कभी तो यह अंतर्मन में निंद्रा के समय भी सजीव हो जाती है, तभी तो हम सपनों को देखते है, आधी रात को उठते है तो कोई न कोई सोच का साज़ छिड़ा हुआ होता है. शायद इसीलिये तो कोई न कोई मंज़र पल भर में मंज़र आँखो के आगे खड़ा हो जाता है. कोई भूला बिसरा अनुभव भले ही उसका आधार दुख हो या सुख, कड़वा हो या मीठा, दिल के किसी कोने में उभर कर सजीव सा बनकर सामने सपने में ही सही सामने आ जाता है.
इसी सत्य को मानते हुए और ध्यान में रखते हुए अगर हम अपनी सोच पर थोड़ा गौर करें तो लगेगा यह किसी उर्जा से कम नहीं है, जिसके संचालन से हम ऐसे काम कर सकते है जो आम तरह से बहुत मेहनत के बाद भी शायद न कर पाते हों. ‘सोच कई ऐसे दरवाज़ों को खोलती है जो इंसान को ‘सकारात्मक ‘और ‘नकारात्मक ‘ दिशाओं मे ले जाती है.
यह इन्सान की व्यक्तिगत जिंदगी पर निर्भर करता है कि वह किस ढाँचे में ज़िंदगी को जीता है और जीना चाहता है. एक बार संकल्प दृढ़ हो जाए तो फिर सोच का बहाव धीरे धीरे अनुकूल होता जाता है. यह एक सफ़ल क्रिया है , लघु समय की नहीं, पर एक दीर्घ काल का रोज का चलन है. जैसे हम कुछ काम करते है-क़लम हाथ में थामकर लंबा अरसा लिखते जाते है, प्रयास ज़ारी रहता है और तब यह ध्यान नहीं रहता की हम कब साँस लेते है, छोड़ते है, पता ही नहीं पड़ता, क्योंकि ह्रदय अपना कार्य एक निश्चित गति से करता रहता है. उसका यह स्वाभाव बन जाता है, वैसे ही सोच को धारावाही बनाकर उसे भी स्वाभाविक क्रिया में ढाला जा सकता है. इस नींव का पहला पत्थर ख़ुद को रखना पड़ता है. यह प्रयास नहीं, एक निश्चय है, एक द्रढ़ संकल्प है. एक बात और! सोच कोई ऐसी पूंजी नहीं जो इस्तेमाल की, ख़तम हुई और एहसास समाप्त हो जाए. नहीं! यह तो धारा है जिसका बहता रहना ज़रूरी है, कल-कल करती, उछलती-कूदती, छनछनाती ऊंचाइयों से गहराइयों की तरफ़ बहती धारा की तरह. तब उसे यह सोचने का अवसर नहीं मिलता की वह किस स्तर से बहकर किसी और स्तर की ओर जा रही है. यहीं आकर हमारी सोच का दख़ल ख़त्म हो जाता है, बस रह जाता है बहना और बहते रहना.