View Full Version : वैराग्य -मुँशी प्रेमचँद
Raman46
02-07-2011, 04:29 AM
दोस्तों ! मुंशी प्रेमचंद के बारें में आप सब जानतें ही होंगे ,हिंदी जगत में उनका अपना एक खाश स्थान प्राप्त है / उन्हीं की कुछ रचनाएँ पेश कर रहा हूँ / ये सब जानकारी नेट से ली गयी है / हम तो सिर्फ एक सूत्र में जोड़ने की प्रयाश मात्र कर रहे है /जहाँ से भी जो जानकारी प्राप्त हो पा रही है .आप के समुख रखने की कोशिश है / यह हमारे देश की धरोहर है / इसे संयोये रखना हम देशवासिओं का कर्तव्य भी बनता है /दोस्तों प्रस्तुत है इनकी कुछ रचनाये / सबसे पहले इन से ही शुरू करता हूँ कुछ विशेष जानकारी के साथ /
Raman46
02-07-2011, 04:32 AM
वैराग्य -मुँशी प्रेमचँद
मुँशी शालिग्राम बनारस के पुराने रईस थे। जीवन-वृति वकालत थी और पैतृक सम्पत्ति भी अधिक थी। दशाश्वमेध घाट पर उनका वैभवान्वित गृह आकाश को स्पर्श करता था। उदार ऐसे कि पचीस-तीस हजार की वाषिर्क आय भी व्यय को पूरी न होती थी। साधु-ब्राहमणों के बड़े श्रद्वावान थे। वे जो कुछ कमाते, वह स्वयं ब्रह्रमभोज और साधुओं के भंडारे एवं सत्यकार्य में व्यय हो जाता। नगर में कोई साधु-महात्मा आ जाये, वह मुंशी जी का अतिथि। संस्कृत के ऐसे विद्वान कि बड़े-बड़े पंडित उनका लोहा मानते थे वेदान्तीय सिद्वान्तों के वे अनुयायी थे। उनके चित्त की प्रवृति वैराग्य की ओर थी।
Raman46
02-07-2011, 04:33 AM
मुंशीजी को स्वभावत: बच्चों से बहुत प्रेम था। मुहल्ले-भर के बच्चे उनके प्रेम-वारि से अभिसिंचित होते रहते थे। जब वे घर से निकलते थे तब बालाकों का एक दल उसके साथ होता था। एक दिन कोई पाषाण-हृदय माता अपने बच्वे को मार थी। लड़का बिलख-बिलखकर रो रहा था। मुंशी जी से न रहा गया। दौड़े, बच्चे को गोद में उठा लिया और स्त्री के सम्मुख अपना सिर झुक दिया। स्त्री ने उस दिन से अपने लड़के को न मारने की शपथ खा ली जो मनुष्य दूसरो के बालकों का ऐसा स्नेही हो, वह अपने बालक को कितना प्यार करेगा, सो अनुमान से बाहर है। जब से पुत्र पैदा हुआ, मुंशी जी संसार के सब कार्यो से अलग हो गये। कहीं वे लड़के को हिंडोल में झुला रहे हैं और प्रसन्न हो रहे हैं। कहीं वे उसे एक सुन्दर सैरगाड़ी में बैठाकर स्वयं खींच रहे हैं। एक क्षण के लिए भी उसे अपने पास से दूर नहीं करते थे। वे बच्चे के स्नेह में अपने को भूल गये थे।
Raman46
02-07-2011, 04:34 AM
सुवामा ने लड़के का नाम प्रतापचन्द्र रखा था। जैसा नाम था वैसे ही उसमें गुण भी थे। वह अत्यन्त प्रतिभाशाली और रुपवान था। जब वह बातें करता, सुनने वाले मुग्ध हो जाते। भव्य ललाट दमक-दमक करता था। अंग ऐसे पुष्ट कि द्विगुण डीलवाले लड़कों को भी वह कुछ न समझता था। इस अल्प आयु ही में उसका मुख-मण्डल ऐसा दिव्य और ज्ञानमय था कि यदि वह अचानक किसी अपरिचित मनुष्य के सामने आकर खड़ा हो जाता तो वह विस्मय से ताकने लगता था।
Raman46
02-07-2011, 04:34 AM
इस प्रकार हंसते-खेलते छ: वर्ष व्यतीत हो गये। आनंद के दिन पवन की भांति सन्न-से निकल जाते हैं और पता भी नहीं चलता। वे दुर्भाग्य के दिन और विपत्ति की रातें हैं, जो काटे नहीं कटतीं। प्रताप को पैदा हुए अभी कितने दिन हुए। बधाई की मनोहारिणी ध्वनि कानों मे गूंज रही थी छठी वर्षगांठ आ पहुंची। छठे वर्ष का अंत दुर्दिनों का श्रीगणेश था। मुंशी शालिग्राम का सांसारिक सम्बन्ध केवल दिखावटी था। वह निष्काम और निस्सम्बद्व जीवन व्यतीत करते थे। यद्यपि प्रकट वह सामान्य संसारी मनुष्यों की भांति संसार के क्लेशों से क्लेशित और सुखों से हर्षित दृष्टिगोचर होते थे, तथापि उनका मन सर्वथा उस महान और आनन्दपूर्व शांति का सुख-भोग करता था, जिस पर दु:ख के झोंकों और सुख की थपकियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
Raman46
02-07-2011, 04:35 AM
माघ का महीना था। प्रयाग में कुम्भ का मेला लगा हुआ था। रेलगाड़ियों में यात्री रुई की भांति भर-भरकर प्रयाग पहुंचाये जाते थे। अस्सी-अस्सी बरस के वृद्व-जिनके लिए वर्षो से उठना कठिन हो रहा था- लंगड़ाते, लाठियां टेकते मंजिल तै करके प्रयागराज को जा रहे थे। बड़े-बड़े साधु-महात्मा, जिनके दर्शनो की इच्छा लोगों को हिमालय की अंधेरी गुफाओं में खींच ले जाती थी, उस समय गंगाजी की पवित्र तरंगों से गले मिलने के लिए आये हुए थे। मुंशी शालिग्राम का भी मन ललचाया। सुवाम से बोले- कल स्नान है।
सुवामा - सारा मुहल्ला सूना हो गया। कोई मनुष्य नहीं दीखता।
मुंशी - तुम चलना स्वीकार नहीं करती, नहीं तो बड़ा आनंद होता। ऐसा मेला तुमने कभी नहीं देखा होगा।
सुवामा - ऐसे मेला से मेरा जी घबराता है।
मुंशी - मेरा जी तो नहीं मानता। जब से सुना कि स्वामी परमानन्द जी आये हैं तब से उनके दर्शन के लिए चित्त उद्विग्न हो रहा है।
Raman46
02-07-2011, 04:36 AM
सुवामा पहले तो उनके जाने पर सहमत न हुई, पर जब देखा कि यह रोके न रुकेंगे, तब विवश होकर मान गयी। उसी दिन मुंशी जी ग्यारह बजे रात को प्रयागराज चले गये। चलते समय उन्होंने प्रताप के मुख का चुम्बन किया और स्त्री को प्रेम से गले लगा लिया। सुवामा ने उस समय देखा कि उनके नेञ सजल हैं। उसका कलेजा धक से हो गया। जैसे चैत्र मास में काली घटाओं को देखकर कृषक का हृदय कॉंपने लगता है, उसी भाती मुंशीजी ने नेत्रों का अश्रुपूर्ण देखकर सुवामा कम्पित हुई। अश्रु की वे बूंदें वैराग्य और त्याग का अगाघ समुद्र थीं। देखने में वे जैसे नन्हे जल के कण थीं, पर थीं वे कितनी गंभीर और विस्तीर्ण।
Raman46
02-07-2011, 04:37 AM
उधर मुंशी जी घर के बाहर निकले और इधर सुवामा ने एक ठंडी श्वास ली। किसी ने उसके हृदय में यह कहा कि अब तुझे अपने पति के दर्शन न होंगे। एक दिन बीता, दो दिन बीते, चौथा दिन आया और रात हो गयी, यहा तक कि पूरा सप्ताह बीत गया, पर मुंशी जी न आये। तब तो सुवामा को आकुलता होने लगी। तार दिये, आदमी दौड़ाये, पर कुछ पता न चला। दूसरा सप्ताह भी इसी प्रयत्न में समाप्त हो गया। मुंशी जी के लौटने की जो कुछ आशा शेष थी, वह सब मिट्टी में मिल गयी। मुंशी जी का अदृश्य होना उनके कुटुम्ब मात्र के लिए ही नहीं, वरन सारे नगर के लिए एक शोकपूर्ण घटना थी। हाटों में दुकानों पर, हथाइयो में अर्थात चारों और यही वार्तालाप होता था। जो सुनता, वही शोक करता- क्या धनी, क्या निर्धन। यह शौक सबको था। उसके कारण चारों और उत्साह फैला रहता था। अब एक उदासी छा गयी। जिन गलियों से वे बालकों का झुण्ड लेकर निकलते थे, वहां अब धूल उड़ रही थी। बच्चे बराबर उनके पास आने के लिए रोते और हठ करते थे। उन बेचारों को यह सुध कहां थी कि अब प्रमोद सभा भंग हो गयी है। उनकी माताएं ऑंचल से मुख ढांप-ढांपकर रोतीं मानों उनका सगा प्रेमी मर गया है।
Raman46
02-07-2011, 04:37 AM
वैसे तो मुंशी जी के गुप्त हो जाने का रोना सभी रोते थे। परन्तु सब से गाढ़े आंसू, उन आढतियों और महाजनों के नेत्रों से गिरते थे, जिनके लेने-देने का लेखा अभी नहीं हुआ था। उन्होंने दस-बारह दिन जैसे-जैसे करके काटे, पश्चात एक-एक करके लेखा के पत्र दिखाने लगे। किसी ब्रहृनभोज मे सौ रुपये का घी आया है और मूल्य नहीं दिया गया। कही से दो-सौ का मैदा आया हुआ है। बजाज का सहस्रों का लेखा है। मन्दिर बनवाते समय एक महाजन के बीस सहस्र ऋण लिया था, वह अभी वैसे ही पड़ा हुआ है लेखा की तो यह दशा थी। सामग्री की यह दशा कि एक उत्तम गृह और तत्सम्बन्धिनी सामग्रियों के अतिरिक्त कोई वस्त न थी, जिससे कोई बड़ी रकम खड़ी हो सके। भू-सम्पत्ति बेचने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न था, जिससे धन प्राप्त करके ऋण चुकाया जाए।
Raman46
02-07-2011, 04:38 AM
बेचारी सुवामा सिर नीचा किए हुए चटाई पर बैठी थी और प्रतापचन्द्र अपने लकड़ी के घोड़े पर सवार आंगन में टख-टख कर रहा था कि पण्डित मोटेराम शास्त्री - जो कुल के पुरोहित थे - मुस्कराते हुए भीतर आये। उन्हें प्रसन्न देखकर निराश सुवामा चौंककर उठ बैठी कि शायद यह कोई शुभ समाचार लाये हैं। उनके लिए आसन बिछा दिया और आशा-भरी दृष्टि से देखने लगी। पण्डितजी आसान पर बैठे और सुंघनी सूंघते हुए बोले तुमने महाजनों का लेखा देखा?
Raman46
02-07-2011, 04:40 AM
सुवामा ने निराशापूर्ण शब्दों में कहा-हां, देखा तो।
मोटेराम-रकम बड़ी गहरी है। मुंशीजी ने आगा-पीछा कुछ न सोचा, अपने यहां कुछ हिसाब-किताब न रखा।
सुवामा-हां अब तो यह रकम गहरी है, नहीं तो इतने रुपये क्या, एक-एक भोज में उठ गये हैं।
मोटेराम-सब दिन समान नहीं बीतते।
सुवामा-अब तो जो ईश्वर करेगा सो होगा, क्या कर सकती हूं।
मोटेराम- हां ईश्वर की इच्छा तो मूल ही है, मगर तुमने भी कुछ सोचा है ?
सुवामा-हां गांव बेच डालूंगी।
मोटेराम-राम-राम। यह क्या कहती हो ? भूमि बिक गयी, तो फिर बात क्या रह जायेगी?
मोटेराम- भला, पृथ्वी हाथ से निकल गयी, तो तुम लोगों का जीवन निर्वाह कैसे होगा?
सुवामा-हमारा ईश्वर मालिक है। वही बेड़ा पार करेगा।
मोटेराम यह तो बड़े अफसोस की बात होगी कि ऐसे उपकारी पुरुष के लड़के-बाले दु:ख भोगें।
सुवामा-ईश्वर की यही इच्छा है, तो किसी का क्या बस?
मोटेराम-भला, मैं एक युक्ति बता दूं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
सुवामा- हां, बतलाइए बड़ा उपकार होगा।
मोटेराम-पहले तो एक दरख्वास्त लिखवाकर कलक्टर साहिब को दे दो कि मालगुलारी माफ की जाये। बाकी रुपये का बन्दोबस्त हमारे ऊपर छोड दो। हम जो चाहेंगे करेंगे, परन्तु इलाके पर आंच ना आने पायेगी।
सुवामा-कुछ प्रकट भी तो हो, आप इतने रुपये कहां से लायेंगी?
मोटेराम- तुम्हारे लिए रुपये की क्या कमी है? मुंशी जी के नाम पर बिना लिखा-पढ़ी के पचास हजार रुपये का बन्दोस्त हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। सच तो यह है कि रुपया रखा हुआ है, तुम्हारे मुंह से ‘हां’ निकलने की देरी है।
सुवामा- नगर के भद्र-पुरुषों ने एकत्र किया होगा?
मोटेराम- हां, बात-की-बात में रुपया एकत्र हो गया। साहब का इशारा बहुत था।
Raman46
02-07-2011, 04:41 AM
सुवामा-कर-मुक्ति के लिए प्रार्थना-पञ मुझसे न लिखवाया जाएगा और मैं अपने स्वामी के नाम ऋण ही लेना चाहती हूं। मैं सबका एक-एक पैसा अपने गांवों ही से चुका दूंगी।
यह कहकर सुवामा ने रुखाई से मुंह फेर लिया और उसके पीले तथा शोकान्वित बदन पर क्रोध-सा झलकने लगा। मोटेराम ने देखा कि बात बिगड़ना चाहती है, तो संभलकर बोले- अच्छा, जैसे तुम्हारी इच्छा। इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है। मगर यदि हमने तुमको किसी प्रकार का दु:ख उठाते देखा, तो उस दिन प्रलय हो जायेगा। बस, इतना समझ लो।
सुवामा-तो आप क्या यह चाहते हैं कि मैं अपने पति के नाम पर दूसरों की कृतज्ञता का भार रखूं? मैं इसी घर में जल मरुंगी, अनशन करते-करते मर जाऊंगी, पर किसी की उपकृत न बनूंगी।
Raman46
02-07-2011, 04:41 AM
मोटेराम-छि:छि:। तुम्हारे ऊपर निहोरा कौन कर सकता है? कैसी बात मुख से निकालती है? ऋण लेने में कोई लाज नहीं है। कौन रईस है जिस पर लाख दो-लाख का ऋण न हो?
सुवामा- मुझे विश्वास नहीं होता कि इस ऋण में निहोरा है।
मोटेराम- सुवामा, तुम्हारी बुद्वि कहां गयी? भला, सब प्रकार के दु:ख उठा लोगी पर क्या तुम्हें इस बालक पर दया नहीं आती?
Raman46
02-07-2011, 04:42 AM
मोटेराम की यह चोट बहुत कड़ी लगी। सुवामा सजलनयना हो गई। उसने पुत्र की ओर करुणा-भरी दृष्टि से देखा। इस बच्चे के लिए मैंने कौन-कौन सी तपस्या नहीं की? क्या उसके भाग्य में दु:ख ही बदा है। जो अमोला जलवायु के प्रखर झोंकों से बचाता जाता था, जिस पर सूर्य की प्रचण्ड किरणें न पड़ने पाती थीं, जो स्नेह-सुधा से अभी सिंचित रहता था, क्या वह आज इस जलती हुई धूप और इस आग की लपट में मुरझायेगा? सुवामा कई मिनट तक इसी चिन्ता में बैठी रही। मोटेराम मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि अब सफलीभूत हुआ। इतने में सुवामा ने सिर उठाकर कहा-जिसके पिता ने लाखों को जिलाया-खिलाया, वह दूसरों का आश्रित नहीं बन सकता। यदि पिता का धर्म उसका सहायक होगा, तो स्वयं दस को खिलाकर खायेगा। लड़के को बुलाते हुए ‘बेटा। तनिक यहां आओ। कल से तुम्हारी मिठाई, दूध, घी सब बन्द हो जायेंगे। रोओगे तो नहीं?’ यह कहकर उसने बेटे को प्यार से बैठा लिया और उसके गुलाबी गालों का पसीना पोंछकर चुम्बन कर लिया।
Raman46
02-07-2011, 04:43 AM
प्रताप- क्या कहा? कल से मिठाई बन्द होगी? क्यों क्या हलवाई की दुकान पर मिठाई नहीं है?
सुवामा-मिठाई तो है, पर उसका रुपया कौन देगा?
प्रताप- हम बड़े होंगे, तो उसको बहुत-सा रुपया देंगे। चल, टख। टख। देख मां, कैसा तेज घोड़ा है।
सुवामा की आंखों में फिर जल भर आया। ‘हा हन्त। इस सौन्दर्य और सुकुमारता की मूर्ति पर अभी से दरिद्रता की आपत्तियां आ जायेंगी। नहीं नहीं, मैं स्वयं सब भोग लूंगी। परन्तु अपने प्राण-प्यारे बच्चे के ऊपर आपत्ति की परछाहीं तक न आने दूंगी।’ माता तो यह सोच रही थी और प्रताप अपने हठी और मुंहजोर घोड़े पर चढ़ने में पूर्ण शक्ति से लीन हो रहा था। बच्चे मन के राजा होते हैं।
Raman46
02-07-2011, 04:44 AM
अभिप्राय यह कि मोटेराम ने बहुत जाल फैलाया। विविध प्रकार का वाक्चातुर्य दिखलाया, परन्तु सुवामा ने एक बार ‘नहीं करके ‘हां’ न की। उसकी इस आत्मरक्षा का समाचार जिसने सुना, धन्य-धन्य कहा। लोगों के मन में उसकी प्रतिष्टा दूनी हो गयी। उसने वही किया, जो ऐसे संतोषपूर्ण और उदार-हृदय मनुष्य की स्त्री को करना उचित था।
इसके पन्द्रहवें दिन इलाका नीलामा पर चढ़ा। पचास सहस्र रुपये प्राप्त हुए कुल ऋण चुका दिया गया। घर का अनावश्यक सामान बेच दिया गया। मकान में भी सुवामा ने भीतर से ऊंची-ऊंची दीवारें खिंचवा कर दो अलग-अलग खण्ड कर दिये। एक में आप रहने लगी और दूसरा भाड़े पर उठा दिया।
aawara
02-07-2011, 08:04 AM
उतम कहानी ,साथ में अच्छी तरह से प्रस्तुतीकरण
Raman46
02-07-2011, 10:17 AM
उतम कहानी ,साथ में अच्छी तरह से प्रस्तुतीकरण
शुक्रिया दोस्त
अब मुंसी जी के कुछ कहानीय पेश करूँगा दोस्त
Raman46
02-07-2011, 10:22 AM
उतम कहानी ,साथ में अच्छी तरह से प्रस्तुतीकरण
बहुत बहुत शुक्रिया दोस्त
aawara
02-07-2011, 10:54 AM
समय मिलने पर या जब क्रम आए "नमक का दारोगा" भी डाला जाए
Raman46
02-07-2011, 11:02 AM
समय मिलने पर या जब क्रम आए "नमक का दारोगा" भी डाला जाए
जी दोस्त पूरा किया जायेगा
Raman46
02-07-2011, 12:10 PM
पत्थर के आँसू
ब्रह्मदेव
जब हवा में कुछ मंथर गति आ जाती है वह कुछ ठंडी हो चलती है तो उस ठंडी–ठंडी हवा में बिना दाएँ–बाएँ देखे चहचहाते पक्षी उत्साहपूर्वक अपने बसेरे की ओर उड़ान भरते हैं। और जब किसी क्षुद्र नदी के किनारे के खेतों में धूल उड़ाते हुए पशु मस्तानी चाल से घँटी बजाते अपने घरों की ओर लौट पड़ते हैं उस समय बग़ल में फ़ाइलों का पुलिन्दा दबाए, हाथ में सब्जी. का थैला लिए, लड़खड़ाते क़दमों के सहारे, अपने झुके कंधों पर दुखते हुए सिर को जैसे–तैसे लादे एक व्यक्ति तंग बाज़ारों में से घर की ओर जा रहा होता है।
Raman46
02-07-2011, 12:11 PM
'अरे एक बात तो भूल ही गई,’ क़लम ने फिर कहा। ‘उन्होंने पत्र के अंत में हम सब को भी याद किया था।'
'अरे कैसे?' सब ने आश्चर्य से पूछा।
‘उन्होंने लिखा कि काश मैं पेपरवेट होता, मेज़–कुर्सी की तरह फ़र्नीचर होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता। चाहें जो होता पर मैं इनसान न होता।’
‘ओह, तभी तो मुझे उठा कर अपने गालों से सहला रहे थे।’ पत्थर के पेपरवेट की ठस्स आवाज़ गीली हो उठी, उसके आँसू झिलमिला उठे।
Raman46
02-07-2011, 12:12 PM
अधपकी झब्बेदार बेतरतीब मूँछें, चेहरे पर कुछ रेखाएँ–जिन की गहराइयों में न जाने कितने अरमान, आशाएँ और अतृप्त साधें सदा के लिए दफ़न हैं और जिन्हें संसार के सबसे क्रूर कलाकार चिन्ता ने अपने कठोर हाथों से बनाया है। घिसा हुआ कोट जो कि दो साल पहले बड़ी लड़की की शादी पर बनवाया था, पहने और अपनी सूखी टाँगों पर अति प्रयोग के कारण पायजामा बन चुकी पतलून से ढँके कठपुतली की तरह निर्जीव चाल से चला जा रहा यह व्यक्ति मानव समाज का सब से दयनीय प्राणी दफ़्तर का बाबू है। नाम छोटा बाबू - क्योंकि बड़े साहब के बाद इन्हीं का नंबर है, पर काम है बड़े साहब से भी अधिक। दफ़्तर बंद हो गया है, घर जा रहे हैं। इन के बाद दफ़्तर में क्या होता है– शायद इन्हें पता नहीं। शायद इन जैसे जो अन्य लाखों बाबू हैं, उन्हें भी पता नहीं।
Raman46
02-07-2011, 12:14 PM
बंद हो गया, चौकीदार सब दरवाजे पर ताले टटोल कर देख चुका था। धूप लाजवंती वधू की तरह सिमट कर क्षितिज के पीछे जा छिपी। अंधकार चोर की तरह चुपके–से दफ़्तर के कमरों में से गुज़रता हुआ सड़क, मैदान और खेतों पर पाले की तरह छा गया। छोटे बाबू के कमरे में घुप्प अँधेरा और सन्नाटा था। जान पड़ता था जैसे बरसों से इस कमरे में कोई नहीं आया। तभी इस सन्नाटे में किसी की क्षीण–सी आह सुनाई दी - दबी हुई ठंडी साँस भी उस के साथ मिली थी… ‘कौन है यह?’ बड़े साहब की कुर्सी ने सहानुभूति पूर्ण स्वर में पूछा। दफ़्तर बंद होने के बाद कमरे के शासन में वह कठोरता नहीं थी जो मीठी–मीठी पॉलिश की हुई बातें करने वाले बड़े साहब में थी।
Raman46
02-07-2011, 12:14 PM
यह मैं हूँ ।’ छोटे बाबू की मेज़ पर रखी क़लम ने पतली आवाज़ में कहा। कमरे के अन्य सदस्य बड़े साहब की कुर्सी, दवात, पेपरवेट, रद्दी की टोकरी आदि पर बच्चों का–सा स्नेह रखते थे क्योंकि यह अभी नई ही आई थी। इस के स्थान पर जो पुरानी कलम थी उस की आकस्मिक मृत्यु एक एक्सीडेंट में हो गई थी।
‘यह मैं हूँ, छोटे बाबू की कलम ने फिर कहा, जिसे सुन कमरे के सदस्यगण चिन्तित हो उठे। परिवार में आई नव-वधू के मुख पर आह क्यों? अभी तो उस के खेलने–खाने के दिन हैं!'
‘क्या बात है, किस बात का दुख है?' बड़े साहब की कुर्सी ने फिर पूछा।
Raman46
02-07-2011, 12:15 PM
‘कुछ नहीं, कुछ नहीं, यूँ ही मुख से आवाज़ निकल गई थी।’ छोटे बाबू की क़लम ने हँसने का बहाना करते हुए कहा। ‘नहीं जी, कुछ बात ज़रूर है। आज जब से दफ़्तर बंद हुआ है तभी से मैं तुम्हें बेचैन देख रहा हूँ। क्या बात है बोलो?’ छोटे बाबू की दवात ने ज़रा रौब जमाते हुए खोखली आवाज़ में कहा। इस रौब का असर हुआ, कमसिन क़लम सहमी हुई बोली, ‘बड़ी भयानक बात है जीजी, पर आज नहीं बताऊँगी, कल बताऊँगी।’
‘अजी मियाँ, हटाओ भी, किस चक्कर में पड़े हो?’ अचानक ही कोई भारी ठस्स आवाज़ बोली, ‘यहाँ हम अपने ही चक्कर में पड़े हैं। खुदा की कसम आज दोपहर से इतना गुस्सा आ रह है इस मरदूद बड़े साहब पर कि कुछ पूछो मत। बेचारे छोटे बाबू को इतना डाँटा कि उन का मुँह उतर गया। अगर मैं होता न छोटे बाबू की जगह तो सब साहबी एक ही झापड़ में निकाल देता।’ कमरे में अंधकार स्वयं इधर–उधर भटक रहा था, दिखाई कहाँ से देता। हाँ, आवाज़ से मालूम होता था कि छोटे बाबू की मेज़ पर रखे पेपरवेट महाशय बोल रहे हैं।
Raman46
02-07-2011, 12:16 PM
छोटे बाबू से इस कमरे के सब निवासियों की सहानुभूति थी, बड़े साहब की हरकत पर सब को असंतोष था, पर अभी तक प्रकट किसी ने नहीं किया था। पेपरवेट की बात सुन कर सब ने अपना–अपना असंतोष प्रकट करना आरंभ कर दिया। कमरे में शोर होने लगा। सभी अपनी–अपनी हाँक रहे थे। ख़ूब गुलगपाड़ा मचा हुआ था। तभी सहसा दरवाजे. पर टँगे पर्दे की सरसराती हुई आवाज़ आई, ‘दुश्मन!’ और सब एकदम चुप हो गए मानो किसी ने बड़बड़ाता रेडियो एकदम बंद कर दिया हो। बाहर बरामदे में चौकीदार खटखट करता गुज़र गया। कमरे में फिर से बड़े साहब की आलोचना होने लगी। तभी खटखटाती हुई आवाज़ में टाइपराइटर ने कहा, ‘भई ग़लती तो असल में मेरी थी, छोटे बाबू ने तो अपनी तरफ़ से ठीक ही टाइप किया था। क्या बताऊँ जब से इस पक्के फ़र्श पर गिर कर चोट लगी है, मुझ से ठीक से काम नहीं होता। दर्द बहुत होता है। मुझे अफ़सोस है कि मेरे कारण बेचारे छोटे बाबू को अपमानित होना पड़ा।’
बड़े साहब की मेज़ के नीचे कुछ झन–झन की अवाज़ हुई, बड़े साहब की मेज़ ने जोर से चिल्ला कर कहा, ‘ठहरो, माँजी कुछ कर रही हैं।’
sushilnkt
02-07-2011, 12:16 PM
बहुत ही मस्त हे आप की कहानी वो भी आप की जुबानी तो आप को ++ कबूल करे
Raman46
02-07-2011, 12:17 PM
रद्दी की टोकरी इस कमरे के निवासियों में सब से बूढ़ी थी। दफ़्तर पहले किसी और स्थान पर था परन्तु जब यह नया भवन बना तब यही एक थीं जो वहाँ से बच कर यहाँ आ गई थी। इस के साथ के कई साथी गंदे नाले के रमणीय तट पर बसे कबाड़ी आश्रम में अब भगवत भजन में शेष जीवन बिता रहे हैं। कमरे के अन्य निवासी इन्हें बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे और माँजी कह कर पुकारते थे। माँजी अब बहुत वृद्ध हो गई थीं। अब और तब का सवाल था। आवाज़ भी काफ़ी मद्धम पड़ गई थी। वह छनछनाती आवाज़ में बोली, ‘क्या बताऊँ। उस दिन मुझ से ग़लती हो गई, वरना बड़े साहब तो बँधे–बँधे फिरते।’
Raman46
02-07-2011, 12:18 PM
वह जो उस दिन सरकारी सर्कुलर आया था, वह बड़े साहब ने जल्दी में भूल से मेरे हवाले कर दिया। चपरासी जब रद्दी को बाहर जमादार के डोल में डालने लगा तो वह सर्कुलर मैंने अपनी गोद में बच्चे की तरह छिपा लिया। अगले दिन जब उसके बारे में सारे दफ़्तर में कोहराम मचा तो मैंने निकाल कर दे दिया। जो कहीं उस दिन वह काग़ज मैं जाने देती तो बड़े साहब को भी पता चल जाता कि साहबी कितनी महँगी है। भैया, जो बुड्ढे कर देते हैं, वह आजकल की छोकरियाँ क्या करेंगी? इन्हें तो अपनी सिंगार–पटार से ही फुरसत नहीं। कोई चीज़ कहीं पड़ी है, कोई कहीं, किसी बात का ध्यान ही नहीं। बस मैं सँभालूँ। जिन्हें सब दुत्कारते हैं उन्हें मैं सँभालती हूँ। अपनी गोद में उनको जगह देती हूँ, जिन्हें दुनिया किसी काम का नहीं कहती। इस पर नाम मेरा रखा है– रद्दी की टोकरी। खैर, इसका मुझे मलाल नहीं क्योंकि इतनी उम्र तक दुनिया देखी है। यह देखा है कि जिस का भला करो उसी से बुराई मिलती है। पर छोड़ो इन बातों को। अब हमें क्या लेना–देना है? उमर ही कितनी रह गई है? खाट से चिपकी बुढ़िया हूँ अब गई तब गई की बात है और फिर…...!’ न जाने यह बुढ़िया-पुराण कब तक चलता यदि मुर्गे की बाँग भिनसार की ठंडी हवा की अँगुली पकड़े रोशनदान के रास्ते से कमरे में न घुस जाती।
Raman46
02-07-2011, 12:19 PM
आज दफ़्तर खुलते ही जो बेचैनी नज़र आई वह इस दफ़्तर के लिए नई थी। बेचारा दफ़्तर परेशान था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज इन सब को क्या हो गया है? बड़े साहब से ले कर चपरासी तक सब बेचैन, उदास घबराए–से क्यों हैं? उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। आख़िर हारकर उस ने आँगन में खड़े आम के पुराने पेड़ से पूछा। शायद उसे कुछ पता हो–पर वह इन नए छोकरों की अजीब बातों से परेशान था। उसने भी अपना सिर खुजलाया जिस का मतलब था कि इस बेचैनी का कारण उसे भी पता नहीं। किस से पूछा जाए? शायद फ़ाटक को पता हो, पर तभी आँगन से कुछ बातचीत की आवाज़ें आने लगीं… 'पर आख़िर छोटे बाबू ने आत्महत्या की क्यों?’ कोई पूछ रहा था।
‘अच्छा तो यह बात थी, बहुत बुरा हुआ।’ दफ़्तर ने सोचा और बात–बात में यह खबर दीवारों, दरवाज़ों, चिकों, पर्दों से होती हुई दफ़्तर में चारों ओर फैल गई। छोटे बाबू की आकस्मिक और करूणाजनक मृत्यु के कारण शोक छाया हुआ था। प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार उनकी आत्महत्या का कारण बता रहा था। बड़े साहब कह रहे थे, ‘अगर ऐसी बात थी तो उन्होंने मुझे कहा क्यों नहीं? मैं उनकी तनख्वाह ज़रूर बढ़ा देता।’ सुनने वाले एक वही ठेकेदार साहब थे जो अपने किसी ठेके के सिलसिले में दफ़्तर में आए थे। बोले, ‘साहब यह रूपए–पैसे की तंगी बुरी चीज़ है, पर उन्होंने तो किसी से कुछ कहा ही नहीं, मुझे ही कह देते तो दो–चार हज़ार का इंतजाम तो मैं ही कर देता।’
Raman46
02-07-2011, 12:21 PM
‘कहो भाई, क्या ख़बर लाए?’ बड़े साहब ने फ़ाटक में से आते हुए एक आदमी से पूछा। ‘बहुत बुरा हाल है, बेचारी छोटे बाबू की वाइफ़ ने तो रो–रो कर बुरा हाल कर रखा है, घर में जमा पूँजी भी नहीं है जो क्रिया–कर्म का प्रबंध किया जाए। यह चूड़ियाँ दी हैं, बेचने के लिए!’ उस आदमी ने कहा।
‘अजी, अब रोने–धोने से क्या होता है? उम्र भर तो छोटे बाबू के कान खाती रही– यह ला दो, वह ला दो और सच तो यह है…’ पास खड़े एक अन्य व्यक्ति ने कहा, पर बीच में ही आने वाले व्यक्ति ने टोका।
‘पता नहीं साहब, वह तो मुझसे कह रही थीं कि इतने सीधे आदमी थे कि ख़ुद ही सब सामान ला दिया करते थे, मुझे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं होती थी। खैर, जो भी हो अब बेचारी का दुख नहीं देखा जाता, आज दफ़्तर तो बंद ही रहेगा, हम सब को वहीं जाना चाहिए।’
SUNIL1107
02-07-2011, 01:34 PM
बेहद उम्दा किस्म का साहित्य लेकर आये हो छोटे भाई skp
Raman46
02-07-2011, 01:44 PM
बेहद उम्दा किस्म का साहित्य लेकर आये हो छोटे भाई skp
बड़े भाई जी को धन्यबाद .आप sab ki ही दया हे भाई ..............कोई त्रुटी हो तो batane ki कृपा करेंगे दोस्त
SUNIL1107
02-07-2011, 01:46 PM
बड़े भाई जी को धन्यबाद .आप sab ki ही दया हे भाई ..............कोई त्रुटी हो तो batane ki कृपा करेंगे दोस्त
अवश्य मित्र अवश्य
Raman46
02-07-2011, 07:17 PM
अवश्य मित्र अवश्य
मुंशी जी की नई kahani शीघ्र आने ही बाली है दोस्तों .............
Raman46
02-07-2011, 07:51 PM
जी दोस्त पूरा किया जायेगा
वापसी - उषा प्रियंवदा
गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई - दो बक्स, डोलची, बाल्टी। ''यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?'' उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ लज्जा से बोला, ''घरवाली ने साथ में कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसन्द थे, अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।'' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था।
पूरी कहानी पढ़ें (http://www.bharatdarshan.co.nz/stories/usha-priyavanda-vaapsi.html)
Raman46
02-07-2011, 09:36 PM
बहुत ही मस्त हे आप की कहानी वो भी आप की जुबानी तो आप को ++ कबूल करे
धन्यबाद शुशील भाई ...उत्साह बर्धन के लिए एक बार पुनः आप का तहे दिल से शुक्रिया दोस्त
Raman46
06-07-2011, 08:22 AM
आप सभी दोस्तों को हार्दिक स्वागतम
मिली नहीं दिल की मंजिल आज -तक ,
क्यूंकि दर्द ही दर्द लिखे है इन हाथों में ..
Raman46
06-07-2011, 08:27 AM
वापसी - उषा प्रियंवदा
गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई - दो बक्स, डोलची, बाल्टी। ''यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?'' उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ लज्जा से बोला, ''घरवाली ने साथ में कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसन्द थे, अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।'' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था।
''कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।'' गनेशी बिस्तर में रस्सी बाँधता हुआ बोला।
''कभी कुछ ज़रूरत हो तो लिखना गनेशी, इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।''
गनेशी ने अंगोछे के छोर से आँखे पोछी, ''अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा। आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।''
गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेलवे क्वार्टर का वह कमरा जिसमें उन्होंने कितने वर्ष बिताए थे, उनका सामान हट जाने से कुरूप और नग्न लग रहा था। आँगन में रोपे पौधे भी जान-पहचान के लोग ले गए थे और जगह-जगह मिट्टी बिखरी हुई थी। पर पत्नी, बाल-बच्चों के साथ रहने की कल्पना में यह बिछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठ कर विलीन हो गया।
Raman46
06-07-2011, 08:30 AM
गजाधर बाबू खुश थे¸ पैंतीस साल की नौकरी के बाद वह रिटायर हो कर जा रहे थे। इन वर्षों में अधिकांश समय उन्होंने अकेले रह कर काटा था। उन अकेले क्षणों में उन्होंने इसी समय की कल्पना की थी¸ जब वह अपने परिवार के साथ रह सकेंगे। इसी आशा के सहारे वह अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे। संसार की दृष्टि से उनका जीवन सफल कहा जा सकता था। उन्होंने शहर में एक मकान बनवा लिया था¸ बड़े लड़के अमर और लडकी कान्ति की शादियाँ कर दी थीं¸ दो बच्चे ऊँची कक्षाओं में पढ़ रहे थे। गजाधर बाबू नौकरी के कारण प्राय: छोटे स्टेशनों पर रहे, और उनके बच्चे तथा पत्नी शहर में¸ जिससे पढ़ाई में बाधा न हो। गजाधर बाबू स्वभाव से बहुत स्नेही व्यक्ति थे और स्नेह के आकांक्षी भी। जब परिवार साथ था¸ डयूटी से लौट कर बच्चों से हँसते-बोलते, पत्नी से कुछ मनोविनोद करते। उन सबके चले जाने से उनके जीवन में गहन सूनापन भर उठा। खाली क्षणों में उनसे घर में टिका न जाता। कवि प्रकृति के न होने पर भी उन्हें पत्नी की स्नेहपूर्ण बातें याद आती रहतीं। दोपहर में गर्मी होने पर भी, दो बजे तक आग जलाए रहती और उनके स्टेशन से वापस आने पर गर्म-गर्म रोटियाँ सेकती, उनके खा चुकने और मना करने पर भी थोड़ा-सा कुछ और थाली में परोस देती और बड़े प्यार से आग्रह करती। जब वह थके–हारे बाहर से आते¸ तो उनकी आहट पा वह रसोई के द्वार पर निकल आती, और उनकी सलज्ज आँखें मुस्करा उठतीं। गजाधर बाबू को तब हर छोटी बात भी याद आती और उदास हो उठते ...... अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था जब वह फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे।
टोपी उतार कर गजाधर बाबू ने चारपाई पर रख दी¸ जूते खोल कर नीचे खिसका दिए¸ अन्दर से रह–रह कर कहकहों की आवाज़ आ रही थी¸ इतवार का दिन था और उनके सब बच्चे इकट्ठे होकर नाश्ता कर रहे थे। गजाधर बाबू के सूखे होठों पर स्निग्ध मुस्कान आ गई। उसी तरह मुस्काते हुए, वह बिना खाँसे हुए अन्दर चले गए। उन्होंने देखा कि नरेन्द्र कमर पर हाथ रखे शायद रात की फिल्म में देखे गए किसी नृत्य की नकल कर रहा था, और बसन्ती हँस-हँस कर दुहरी हो रही थी। अमर की बहू को अपने तन–बदन¸ आँचल या घूंघट का कोई होश न था और वह उन्मुक्त रूप से हँस रही थी। गजाधर बाबू को देखते ही नरेंद्र धप से बैठ गया और चाय का प्याला उठा कर मुँह से लगा लिया। बहू को होश आया और उसने झट से माथा ढँक लिया¸ केवल बसन्ती का शरीर रह–रह कर हँसी दबाने के प्रयत्न में हिलता रहा।
गजाधर बाबू ने मुसकुराते हुए उन लोगों को देखा। फिर कहा¸ "क्यों नरेन्द्र¸ क्या नकल हो रही थी? "
"कुछ नहीं, बाबूजी।" नरेन्द्र ने सिटपिटा कर कहा। गजाधर बाबू ने चाहा था कि वह भी इस मनोविनोद में भाग लेते¸ पर उनके आते ही जैसे सब कुण्ठित हो चुप हो गए¸ इससे उनके मन में थोड़ी-सी खिन्नता उपज आई।
बैठते हुए बोले¸ "बसन्ती¸ चाय मुझे भी देना। तुम्हारी अम्मा की पूजा अभी चल रही है क्या?"
बसन्ती ने माँ की कोठरी की ओर देखा¸ अभी आती ही होंगी, और प्याले में उनके लिए चाय छानने लगी। बहू चुपचाप पहले ही चली गई थी¸ अब नरेन्द्र भी चाय का आखिरी घूँट पी कर उठ खड़ा हुआ। केवल बसन्ती, पिता के लिहाज में¸ चौके में बैठी माँ की राह देखने लगी। गजाधर बाबू ने एक घूँट चाय पी¸ फिर कहा¸ "बेटी – चाय तो फीकी है।"
"लाइए¸ चीनी और डाल दूँ।" बसन्ती बोली।
"रहने दो¸ तुम्हारी अम्मा जब आएगी¸ तभी पी लूँगा।"
थोड़ी देर में उनकी पत्नी हाथ में अर्घ्य का लोटा लिए निकली और अशुद्ध स्तुति कहते हुए तुलसी में डाल दिया। उन्हें देखते ही बसन्ती भी उठ गई। पत्नी ने आकर गजाधर बाबू को देखा और कहा¸ "अरे, आप अकेले बैंठें हैं। ये सब कहाँ गए?" गजाधर बाबू के मन में फाँस-सी कसक उठी¸ "अपने–अपने काम में लग गए हैं – आखिर बच्चे ही हैं।"
पत्नी आकर चौके में बैठ गई। उन्होंने नाक–भौं चढ़ाकर चारों ओर जूठे बर्तनों को देखा। फिर कहा¸ "सारे जूठे बर्तन पड़े हैं। इस घर में धरम–करम कुछ नहीं। पूजा करके सीधे चौके में घुसो।" फिर उन्होंने नौकर को पुकारा¸ जब उत्तर न मिला तो एक बार और उच्च स्वर में पुकारा, फिर पति की ओर देखकर बोली¸ "बहू ने भेजा होगा बाज़ार।" और एक लम्बी साँस ले कर चुप हो रहीं।
Raman46
06-07-2011, 08:32 AM
गजाधर बाबू बैठ कर चाय और नाश्ते का इन्तजार करते रहे। उन्हें अचानक ही गनेशी की याद आ गई। रोज सुबह¸ पॅसेंजर आने से पहले यह गरम–गरम पूरियां और जलेबियां और चाय लाकर रख देता था। चाय भी कितनी बढ़िया¸ कांच के गिलास में उपर तक भरी लबालब¸ पूरे ढ़ाई चम्मच चीनी और गाढ़ी मलाई। पैसेंजर भले ही रानीपुर लेट पहुँचे¸ गनेशी ने चाय पहुँचाने में कभी देर नहीं की। क्या मज़ाल कि कभी उससे कुछ कहना पड़े।
पत्नी का शिकायत भरा स्वर सुन उनके विचारों में व्याघात पहुँचा। वह कह रही थी¸ "सारा दिन इसी खिच–खिच में निकल जाता है। इस गृहस्थी का धन्धा पीटते–पीटते उम्र बीत गई। कोई जरा हाथ भी नहीं बटाता।"
"बहू क्या किया करती हैं?" गजाधर बाबू ने पूछा।
"पड़ी रहती है। बसन्ती को तो¸ कहेगी कि कॉलेज जाना होता हैं।"
गजाधर बाबू ने जोश में आकर बसन्ती को आवाज दी। बसन्ती भाभी के कमरे से निकली तो गजाधर बाबू ने कहा¸ "बसन्ती¸ आज से शाम का खाना बनाने की ज़िम्मेदारी तुम पर है। सुबह का भोजन तुम्हारी भाभी बनाएगी।" बसन्ती मुँह लटका कर बोली¸ "बाबूजी¸ पढ़ना भी तो होता है।"
गजाधर बाबू ने प्यार से समझाया¸ "तुम सुबह पढ़ लिया करो। तुम्हारी माँ बूढ़ी हुई¸ अब वह शक्ति नहीं बची है। तुम हो¸ तुम्हारी भाभी हैं¸ दोनों को मिलकर काम में हाथ बंटाना चाहिए।"
बसन्ती चुप रह गई। उसके जाने के बाद उसकी माँ ने धीरे से कहा¸ "पढ़ने का तो बहाना है। कभी जी ही नहीं लगता¸ लगे कैसे? शीला से ही फुरसत नहीं। बड़े-बड़े लड़के है उस घर में¸ हर वक्त वहाँ घुसा रहना मुझे नहीं सुहाता। मना करुँ तो सुनती नहीं।"
घर में गजाधर बाबू के रहने के लिए कोई स्थान न बचा था। जैसे किसी मेहमान के लिए कुछ अस्थायी प्रबन्ध कर दिया जाता है¸ उसी प्रकार बैठक में कुर्सियों को दीवार से सटाकर बीच में गजाधर बाबू के लिए पतली–सी चारपाई डाल दी गई थी। गजाधर बाबू उस कमरे में पड़े पड़े कभी–कभी अनायास ही, इस अस्थायित्व का अनुभव करने लगते। उन्हें याद आती उन रेलगाडियों की जो आती और थोड़ी देर रूक कर किसी और लक्ष्य की ओर चली जाती।
Raman46
06-07-2011, 08:33 AM
घर छोटा होने के कारण बैठक में ही अब वह प्रबन्ध किया गया था। उनकी पत्नी के पास अन्दर एक छोटा कमरा अवश्य था¸ पर वह एक ओर अचारों के मर्तबान¸ दाल¸ चावल के कनस्तर और घी के डिब्बों से घिरा था - दूसरी ओर पुरानी रजाइयाँ¸ दरियों में लिपटी और रस्सी से बंधी रखी थी, उनके पास एक बड़े से टीन के बक्स में घर–भर के गर्म कपड़े थे। बींच में एक अलगनी बंधी हुई थी¸ जिस पर प्राय: बसन्ती के कपड़े लापरवाही से पड़े रहते थे। वह अकसर उस कमरे में नहीं जाते थे। घर का दूसरा कमरा अमर और उसकी बहू के पास था। तीसरा कमरा¸ जो सामने की ओर था, बैठक था। गजाधर बाबू के आने से पहले उसमें अमर के ससुराल से आया बेंत का तीन कुरसियों का सेट पड़ा था। कुर्सियों पर नीली गद्दियां और बहू के हाथों के कढ़े कुशन थे।
जब कभी उनकी पत्नी को कोई लम्बी शिकायत करनी होती¸ तो अपनी चटाई बैठक में डाल पड़ जाती थीं। वह एक दिन चटाई ले कर आ गई तो गजाधर बाबू ने घर–गृहस्थी की बातें छेड़ी, वह घर का रवैया देख रहे थे। बहुत हलके से उन्होंने कहा कि अब हाथ में पैसा कम रहेगा¸ कुछ खर्चा कम करना चाहिए।
"सभी खर्च तो वाजिब–वाजिब है¸ न मन का पहना¸ न ओढ़ा।"
गजाधर बाबू ने आहत¸ विस्मित दृष्टि से पत्नी को देखा। उनसे अपनी हैसियत छिपी न थी। उनकी पत्नी तंगी का अनुभव कर उसका उल्लेख करतीं। यह स्वाभाविक था¸ लेकिन उनमें सहानुभूति का पूर्ण अभाव गजाधर बाबू को बहुत खतका। उनसे य्दि राय–बात की जाती कि प्रबन्ध कैसे हो¸ तो उनहें चिन्ता कम¸ संतोष अधिक होता लेकिन उनसे तो केवल शिकायत की जाती थी¸ जैसे परिवार की सब परेशानियों के लिए वही जिम्मेदार थे।
"तुम्हे कमी किस बात की है अमर की माँ – घर में बहू है¸ लड़के–बच्चे हैं¸ सिर्फ रूपये से ही आदमी अमीर नहीं होता।" गजाधर बाबू ने कहा और कहने के साथ ही अनुभव किया। यह उनकी आन्तरिक अभिव्यक्ति थी – ऐसी कि उनकी पत्नी नहीं समझ सकती।
"हाँ ¸ बड़ा सुख है न बहू से। आज रसोई करने गई है¸ देखो क्या होता हैं?" कहकार पत्नी ने आंखे मूंदी और सो गई। गजाधर बाबू बैठे हुए पत्नी को देखते रह गए। यही थी क्या उनकी पत्नी¸ जिसके हाथों के कोमल स्पर्श¸ जिसकी मुस्कान की याद में उन्होंने सम्पूर्ण जीवन काट दिया था? उन्हें लगा कि वह लावण्यमयी युवती जीवन की राह में कहीं खो गई और उसकी जगह आज जो स्त्री है¸ वह उनके मन और प्राणों के लिए नितान्त अपरिचिता है। गाढ़ी नींद में डूबी उनकी पत्नी का भारी शरीर बहुत बेडौल और कुरूप लग रहा था¸ श्रीहीन और रूखा था। गजाधर बाबू देर तक निस्वंग दृष्टि से पत्नी को देखते रहें और फिर लेट कर छत की ओर ताकने लगे।
Raman46
06-07-2011, 08:34 AM
अन्दर कुछ गिरा और उनकी पत्नी हड़बड़ा कर उठ बैठी, "लो बिल्ली ने कुछ गिरा दिया शायद," और कह अंदर भागी। थोड़ी देर में लौट कर आई तो उनका मुँह फूला हुआ था। "देखा बहू को¸ चौका खुला छोड़ आई¸ बिल्ली ने दाल की पतीली गिरा दी। सभी खाने को है¸ अब क्या सिखाऊंगी?" वह सांस लेने को रूकी और बोली¸ "एक तरकारी और चार पराठे बनाने में सारा डिब्बा घी उंडेलकर रख दिया। जरा-सा दर्द नहीं हैं¸ कमानेवाला हाड़ तोड़े, और यहाँ चीजें लुटें। मुझे तो मालूम था कि यह सब काम किसी के बस का नहीं हैं।"
गजाधर बाबू को लगा कि पत्नी कुछ और बोलेंगी तो उनके कान झनझना उठेंगे। ओंठ भींच, करवट ले कर उन्होंने पत्नी की ओेर पीठ कर ली।
रात का भोजन बसन्ती ने जान-बूझकर ऐसा बनाया था कि कौर तक निगला न जा सके। गजाधर बाबू चुपचाप खा कर उठ गये, पर नरेन्द्र थाली सरका कर उठ खड़ा हुआ और बोला¸ "मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता।"
बसन्ती तुनककर बोली¸ "तो न खाओ¸ कौन तुम्हारी खुशामद कर रहा है।"
"तुमसे खाना बनाने को किसने कहा था?" नरेंद्र चिल्लाया।
"बाबूजी ने"
"बाबू जी को बैठे बैठे यही सूझता है।"
बसन्ती को उठा कर माँ ने नरेंद्र को मनाया और अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाया। गजाधर बाबू ने बाद में पत्नी से कहा¸ "इतनी बड़ी लड़की हो गई और उसे खाना बनाने तक का सहूर नहीं आया?"
"अरे आता सब कुछ है¸ करना नहीं चाहती।" पत्नी ने उत्तर दिया। अगली शाम माँ को रसोई में देख कपड़े बदल कर बसन्ती बाहर आई तो बैठक में गजाधर बाबू ने टोंक दिया¸ " कहाँ जा रही हो?"
"पड़ोस में शीला के घर।" बसन्ती ने कहा।
"कोई जरूरत नहीं हैं¸ अन्दर जा कर पढ़ो।" गजाधर बाबू ने कड़े स्वर में कहा। कुछ देर अनिश्चित खड़े रह कर बसन्ती अन्दर चली गई। गजाधर बाबू शाम को रोज टहलने चले जाते थे¸ लौट कर आये तो पत्नी ने कहा¸ "क्या कह दिया बसन्ती से? शाम से मुँह लपेटे पड़ी है। खाना भी नहीं खाया।"
गजाधर बाबू खिन्न हो आए। पत्नी की बात का उन्होंने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने मन में निश्चय कर लिया कि बसन्ती की शादी जल्दी ही कर देनी है। उस दिन के बाद बसन्ती पिता से बची–बची रहने लगी। जाना हो तो पिछवाड़े से जाती। गजाधर बाबू ने दो–एक बार पत्नी से पूछा तो उत्तर मिला¸ "रूठी हुई हैं।" गजाधर बाबू को और रोष हुआ। लड़की के इतने मिज़ाज¸ जाने को रोक दिया तो पिता से बोलेगी नहीं। फिर उनकी पत्नी ने ही सूचना दी कि अमर अलग होने की सोच रहा हैं।
Raman46
06-07-2011, 08:35 AM
क्यों?" गजाधर बाबू ने चकित हो कर पूछा।
पत्नी ने साफ–साफ उत्तर नहीं दिया। अमर और उसकी बहू की शिकायतें बहुत थी। उनका कहना था कि गजाधर बाबू हमेशा बैठक में ही पड़े रहते हैं¸ कोई आने–जानेवाला हो तो कहीं बिठाने की जगह नहीं। अमर को अब भी वह छोटा सा समझते थे और मौके–बेमौके टोक देते थे। बहू को काम करना पड़ता था और सास जब–तब फूहड़पन पर ताने देती रहती थीं। "हमारे आने के पहले भी कभी ऐसी बात हुई थी?" गजाधर बाबू ने पूछा। पत्नी ने सिर हिलाकर जताया, "नहीं!" पहले अमर घर का मालिक बन कर रहता था¸ बहू को कोई रोक–टोक न थी¸ अमर के दोस्तों का प्राय: यहीं अड्डा जमा रहता था और अन्दर से चाय नाश्ता तैयार हो कर जाता था। बसन्ती को भी वही अच्छा लगता था।
गजाधर बाबू ने बहुत धीरे से कहा¸ "अमर से कहो¸ जल्दबाज़ी की कोई जरूरत नहीं है।"
अगले दिन सुबह घूम कर लौटे तो उन्होंने पाया कि बैठक में उनकी चारपाई नहीं हैं। अन्दर आकर पूछने वाले ही थे कि उनकी दृष्टि रसोई के अन्दर बैठी पत्नी पर पड़ी। उन्होंने यह कहने को मुँह खोला कि बहू कहाँ है; पर कुछ याद कर चुप हो गए। पत्नी की कोठरी में झांका तो अचार¸ रजाइयों और कनस्तरों के मध्य अपनी चारपाई लगी पाई। गजाधर बाबू ने कोट उतारा और कहीं टांगने के लिए दीवार पर नज़र दौड़ाई। फिर उसपर मोड़ कर अलगनी के कुछ कपड़े खिसका कर एक किनारे टांग दिया। कुछ खाए बिना ही अपनी चारपाई पर लेट गए। कुछ भी हो¸ तन आखिरकार बूढ़ा ही था। सुबह शाम कुछ दूर टहलने अवश्य चले जाते¸ पर आते आते थक उठते थे। गजाधर बाबू को अपना बड़ा सा¸ खुला हुआ क्वार्टर याद आ गया। निश्चित जीवन – सुबह पॅसेंजर ट्रेन आने पर स्टेशन पर की चहल–पहल¸ चिर–परिचित चेहरे और पटरी पर रेल के पहियों की खट्*–खट्* जो उनके लिए मधुर संगीत की तरह था। तूफान और डाक गाडी के इंजिनों की चिंघाड उनकी अकेली रातों की साथी थी। सेठ रामजीमल की मिल के कुछ लोग कभी कभी पास आ बैठते¸ वह उनका दायरा था¸ वही उनके साथी। वह जीवन अब उन्हें खोई विधि–सा प्रतीत हुआ। उन्हें लगा कि वह जिन्दगी द्वारा ठगे गए हैं। उन्होंने जो कुछ चाहा उसमें से उन्हें एक बूंद भी न मिली।
Raman46
06-07-2011, 08:37 AM
लेटे हुए वह घर के अन्दर से आते विविध स्वरों को सुनते रहे। बहू और सास की छोटी–सी झड़प¸ बाल्टी पर खुले नल की आवाज¸ रसोई के बर्तनों की खटपट और उसी में गौरैयों का वार्तालाप – और अचानक ही उन्होंने निश्चय कर लिया कि अब घर की किसी बात में दखल न देंगे। यदि गृहस्वामी के लिए पूरे घर में एक चारपाई की जगह यहीं हैं¸ तो यहीं पड़े रहेंगे। अगर कहीं और डाल दी गई तो वहाँ चले जाएंगे। यदि बच्चों के जीवन में उनके लिए कहीं स्थान नहीं¸ तो अपने ही घर में परदेसी की तरह पड़े रहेंगे। और उस दिन के बाद सचमुच गजाधर बाबू कुछ नहीं बोले। नरेंद्र माँगने आया तो उसे बिना कारण पूछे रूपये दे दिये बसन्ती काफी अंधेरा हो जाने के बाद भी पड़ोस में रही तो भी उन्होंने कुछ नहीं कहा – पर उन्हें सबसे बड़ा ग़म यह था कि उनकी पत्नी ने भी उनमें कुछ परिवर्तन लक्ष्य नहीं किया। वह मन ही मन कितना भार ढो रहे हैं¸ इससे वह अनजान बनी रहीं। बल्कि उन्हें पति के घर के मामले में हस्तक्षेप न करने के कारण शान्ति ही थी। कभी–कभी कह भी उठती¸ "ठीक ही हैं¸ आप बीच में न पड़ा कीजिए¸ बच्चे बड़े हो गए हैं¸ हमारा जो कर्तव्य था¸ कर रहें हैं। पढ़ा रहें हैं¸ शादी कर देंगे।"
गजाधर बाबू ने आहत दृष्टि से पत्नी को देखा। उन्होंने अनुभव किया कि वह पत्नी व बच्चों के लिए केवल धनोपार्जन के निमित्तमात्र हैं। जिस व्यक्ति के अस्तित्व से पत्नी माँग में सिन्दूर डालने की अधिकारी हैं¸ समाज में उसकी प्रतिष्ठा है¸ उसके सामने वह दो वक्त का भोजन की थाली रख देने से सारे कर्तव्यों से छुट्टी पा जाती हैं। वह घी और चीनी के डब्बों में इतना रमी हुई हैं कि अब वही उनकी सम्पूर्ण दुनिया बन गई हैं। गजाधर बाबू उनके जीवन के केंद्र नहीं हो सकते¸ उन्हें तो अब बेटी की शादी के लिए भी उत्साह बुझ गया। किसी बात में हस्तक्षेप न करने के निश्चय के बाद भी उनका अस्तित्व उस वातावरण का एक भाग न बन सका। उनकी उपस्थिति उस घर में ऐसी असंगत लगने लगी थी¸ जैसे सजी हुई बैठक में उनकी चारपाई थी। उनकी सारी खुशी एक गहरी उदासीनता में डूब गई।
इतने सब निश्चयों के बावजूद भी गजाधर बाबू एक दिन बीच में दखल दे बैठे। पत्नी स्वभावानुसार नौकर की शिकायत कर रही थी¸ "कितना कामचोर है¸ बाज़ार की हर चीज में पैसा बनाता है¸ खाना खाने बैठता है तो खाता ही चला जाता हैं। "गजाधर बाबू को बराबर यह महसूस होता रहता था कि उनके रहन सहन और खर्च उनकी हैसियत से कहीं ज्यादा हैं। पत्नी की बात सुन कर लगा कि नौकर का खर्च बिलकुल बेकार हैं। छोटा–मोटा काम हैं¸ घर में तीन मर्द हैं¸ कोई–न–कोई कर ही देगा। उन्होंने उसी दिन नौकर का हिसाब कर दिया। अमर दफ्तर से आया तो नौकर को पुकारने लगा। अमर की बहू बोली¸ "बाबूजी ने नौकर छुड़ा दिया हैं।"
"क्यों?"
"कहते हैं¸ खर्च बहुत है।"
यह वार्तालाप बहुत सीधा–सा था¸ पर जिस टोन में बहू बोली¸ गजाधर बाबू को खटक गया। उस दिन जी भारी होने के कारण गजाधर बाबू टहलने नहीं गये थे। आलस्य में उठ कर बत्ती भी नहीं जलाई – इस बात से बेखबर नरेंद्र माँ से कहने लगा¸ "अम्मां¸ तुम बाबूजी से कहती क्यों नहीं? बैठे–बिठाये कुछ नहीं तो नौकर ही छुड़ा दिया। अगर बाबूजी यह समझें कि मैं साइकिल पर गेंहूं रख आटा पिसाने जाऊंगा तो मुझसे यह नहीं होगा।"
"हाँ अम्मा¸" बसन्ती का स्वर था¸ " मैं कॉलेज भी जाऊं और लौट कर घर में झाडू भी लगाऊं¸ यह मेरे बस की बात नहीं है।"
"बूढ़े आदमी हैं" अमर भुनभुनाया¸ "चुपचाप पड़े रहें। हर चीज में दखल क्यों देते हैं?" पत्नी ने बड़े व्यंग से कहा¸ "और कुछ नहीं सूझा तो तुम्हारी बहू को ही चौके में भेज दिया। वह गई तो पंद्रह दिन का राशन पांच दिन में बना कर रख दिया।" बहू कुछ कहे¸ इससे पहले वह चौके में घुस गई। कुछ देर में अपनी कोठरी में आई और बिजली जलाई तो गजाधर बाबू को लेटे देख बड़ी सिटपिटाई। गजाधर बाबू की मुखमुद्रा से वह उनके भावों का अनुमान न लगा सकी। वह चुप¸ आंखे बंद किये लेटे रहे।
गजाधर बाबू चिठ्ठी हाथ में लिए अन्दर आये और पत्नी को पुकारा। वह भीगे हााथ लिये निकलीं और आंचल से पोंछती हुई पास आ खड़ी हुई। गजाधर बाबू ने बिना किसी भूमिका के कहा¸ "मुझे सेठ रामजीमल की चीनी मिल में नौकरी मिल गई हैं। खाली बैठे रहने से तो चार पैसे घर में आएं¸ वहीं अच्छा हैं। उन्होंने तो पहले ही कहा था¸ मैंने मना कर दिया था।" फिर कुछ रूक कर¸ जैसी बुझी हुई आग में एक चिनगारी चमक उठे¸ उन्होंने धीमे स्वर में कहा¸ "मैंने सोचा था¸ बरसों तुम सबसे अलग रहने के बाद¸ अवकाश पा कर परिवार के साथ रहूंगा। खैर¸ परसों जाना हैं। तुम भी चलोगी?"
Raman46
06-07-2011, 08:38 AM
"मैं?" पत्नी ने सकपकाकर कहा¸ "मैं चलूंगी तो यहाँ क्या होगा? इतनी बड़ी गृहस्थी¸ फिर सयानी लड़की . . . .."
बात बीच में काट कर गजाधर बाबू ने हताश स्वर में कहा¸ "ठीक हैं¸ तुम यहीं रहो। मैंने तो ऐसे ही कहा था।" और गहरे मौन में डूब गए।
नरेंद्र ने बड़ी तत्परता से बिस्तर बांधा और रिक्शा बुला लाया। गजाधर बाबू का टीन का बक्स और पतला सा बिस्तर उस पर रख दिया गया। नाश्ते के लिए लड्*डू और मठरी की डलिया हाथ में लिए गजाधर बाबू रिक्शे में बैठ गए। एक दृष्टि उन्होंने अपने परिवार पर डाली और फिर दूसरी ओर देखने लगे और रिक्शा चल पड़ा। उनके जाने के बाद सब अन्दर लौट आये¸ बहू ने अमर से पूछा¸ "सिनेमा चलिएगा न?"
बसन्ती ने उछल कर कहा¸ "भैया¸ हमें भी।"
गजाधर बाबू की पत्नी सीधे चौके में चली गई। बची हुई मठरियों को कटोरदान में रखकर अपने कमरे में लाई और कनस्तरों के पास रख दिया। फिर बाहर आ कर कहा¸ "अरे नरेन्द्र¸ बाबूजी की चारपाई कमरे से निकाल दे¸ उसमें चलने तक को जगह नहीं है।"
Raman46
06-07-2011, 08:43 AM
वापसी - उषा प्रियंवदा कहानी यही समाप्त हुआ दोस्त .......अगली कहानी .................... ही पेश करूँगा
साभार - हिंदी कथा-लेखिकाओं की प्रतिनिधि
Raman46
07-07-2011, 08:30 AM
दोस्तों आज एक नई कहानी लेकर आ रहा हूँ जल्द ही ...............skp
Raman46
18-07-2011, 01:01 PM
वरदानमुँशी प्रेमचँद की कहानी
विन्घ्याचल पर्वत मध्यरात्रि के निविड़ अन्धकार में काल देव की भांति खड़ा था। उस पर उगे हुए छोटे-छोटे वृक्ष इस प्रकार दष्टिगोचर होते थे, मानो ये उसकी जटाएं है और अष्टभुजा देवी का मन्दिर जिसके कलश पर श्वेत पताकाएं वायु की मन्द-मन्द तरंगों में लहरा रही थीं, उस देव का मस्तक है मंदिर में एक झिलमिलाता हुआ दीपक था, जिसे देखकर किसी धुंधले तारे का मान हो जाता था।
अर्धरात्रि व्यतीत हो चुकी थी। चारों और भयावह सन्नाटा छाया हुआ था। गंगाजी की काली तरंगें पर्वत के नीचे सुखद प्रवाह से बह रही थीं। उनके बहाव से एक मनोरंजक राग की ध्वनि निकल रही थी। ठौर-ठौर नावों पर और किनारों के आस-पास मल्लाहों के चूल्हों की आंच दिखायी देती थी। ऐसे समय में एक श्वेत वस्त्रधारिणी स्त्री अष्टभुजा देवी के सम्मुख हाथ बांधे बैठी हुई थी। उसका प्रौढ़ मुखमण्डल पीला था और भावों से कुलीनता प्रकट होती थी। उसने देर तक सिर झुकाये रहने के पश्चात कहा।
‘माता! आज बीस वर्ष से कोई मंगलवार ऐसा नहीं गया जबकि मैंने तुम्हारे चरणो पर सिर न झुकाया हो। एक दिन भी ऐसा नहीं गया जबकि मैंने तुम्हारे चरणों का ध्यान न किया हो। तुम जगतारिणी महारानी हो। तुम्हारी इतनी सेवा करने पर भी मेरे मन की अभिलाषा पूरी न हुई। मैं तुम्हें छोड़कर कहां जाऊ?’
‘माता! मैंने सैकड़ों व्रत रखे, देवताओं की उपासनाएं की’, तीर्थयाञाएं की, परन्तु मनोरथ पूरा न हुआ। तब तुम्हारी शरण आयी। अब तुम्हें छोड़कर कहां जाऊं? तुमने सदा अपने भक्तो की इच्छाएं पूरी की है। क्या मैं तुम्हारे दरबार से निराश हो जाऊं?’
सुवामा इसी प्रकार देर तक विनती करती रही। अकस्मात उसके चित्त पर अचेत करने वाले अनुराग का आक्रमण हुआ। उसकी आंखें बन्द हो गयीं और कान में ध्वनि आयी।
‘सुवामा! मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूं। मांग, क्या मांगती है?
सुवामा रोमांचित हो गयी। उसका हृदय धड़कने लगा। आज बीस वर्ष के पश्चात महारानी ने उसे दर्शन दिये। वह कांपती हुई बोली ‘जो कुछ मांगूंगी, वह महारानी देंगी’ ?
‘हां, मिलेगा।’
‘मैंने बड़ी तपस्या की है अतएव बड़ा भारी वरदान मांगूगी।’
‘क्या लेगी कुबेर का धन’?
‘नहीं।’
‘इन्द का बल।’
‘नहीं।’
‘सरस्वती की विद्या?’
‘नहीं।’
‘फिर क्या लेगी?’
‘संसार का सबसे उत्तम पदार्थ।’
‘वह क्या है?’
‘सपूत बेटा।’
‘जो कुल का नाम रोशन करे?’
‘नहीं।’
‘जो माता-पिता की सेवा करे?’
‘नहीं।’
‘जो विद्वान और बलवान हो?’
‘नहीं।’
‘फिर सपूत बेटा किसे कहते हैं?’
‘जो अपने देश का उपकार करे।’
‘तेरी बुद्वि को धन्य है। जा, तेरी इच्छा पूरी होगी।’
Raman46
25-10-2011, 12:12 PM
अन्तर्वासना के सभी सदस्यों को दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएँ
आप सभी के जीवन में उजाला ही उजाला हो तथा घर आंगन खुशियों से भर जाए
Raman46
26-10-2011, 05:10 PM
दीपाली की हार्दिक शुभ कामनाएँ
Raman46
28-11-2011, 08:33 AM
वरदानमुँशी प्रेमचँद की कहानी
विन्घ्याचल पर्वत मध्यरात्रि के निविड़ अन्धकार में काल देव की भांति खड़ा था। उस पर उगे हुए छोटे-छोटे वृक्ष इस प्रकार दष्टिगोचर होते थे, मानो ये उसकी जटाएं है और अष्टभुजा देवी का मन्दिर जिसके कलश पर श्वेत पताकाएं वायु की मन्द-मन्द तरंगों में लहरा रही थीं, उस देव का मस्तक है मंदिर में एक झिलमिलाता हुआ दीपक था, जिसे देखकर किसी धुंधले तारे का मान हो जाता था।
अर्धरात्रि व्यतीत हो चुकी थी। चारों और भयावह सन्नाटा छाया हुआ था। गंगाजी की काली तरंगें पर्वत के नीचे सुखद प्रवाह से बह रही थीं। उनके बहाव से एक मनोरंजक राग की ध्वनि निकल रही थी। ठौर-ठौर नावों पर और किनारों के आस-पास मल्लाहों के चूल्हों की आंच दिखायी देती थी। ऐसे समय में एक श्वेत वस्त्रधारिणी स्त्री अष्टभुजा देवी के सम्मुख हाथ बांधे बैठी हुई थी। उसका प्रौढ़ मुखमण्डल पीला था और भावों से कुलीनता प्रकट होती थी। उसने देर तक सिर झुकाये रहने के पश्चात कहा।
‘माता! आज बीस वर्ष से कोई मंगलवार ऐसा नहीं गया जबकि मैंने तुम्हारे चरणो पर सिर न झुकाया हो। एक दिन भी ऐसा नहीं गया जबकि मैंने तुम्हारे चरणों का ध्यान न किया हो। तुम जगतारिणी महारानी हो। तुम्हारी इतनी सेवा करने पर भी मेरे मन की अभिलाषा पूरी न हुई। मैं तुम्हें छोड़कर कहां जाऊ?’
‘माता! मैंने सैकड़ों व्रत रखे, देवताओं की उपासनाएं की’, तीर्थयाञाएं की, परन्तु मनोरथ पूरा न हुआ। तब तुम्हारी शरण आयी। अब तुम्हें छोड़कर कहां जाऊं? तुमने सदा अपने भक्तो की इच्छाएं पूरी की है। क्या मैं तुम्हारे दरबार से निराश हो जाऊं?’
सुवामा इसी प्रकार देर तक विनती करती रही। अकस्मात उसके चित्त पर अचेत करने वाले अनुराग का आक्रमण हुआ। उसकी आंखें बन्द हो गयीं और कान में ध्वनि आयी।
‘सुवामा! मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूं। मांग, क्या मांगती है?
सुवामा रोमांचित हो गयी। उसका हृदय धड़कने लगा। आज बीस वर्ष के पश्चात महारानी ने उसे दर्शन दिये। वह कांपती हुई बोली ‘जो कुछ मांगूंगी, वह महारानी देंगी’ ?
‘हां, मिलेगा।’
‘मैंने बड़ी तपस्या की है अतएव बड़ा भारी वरदान मांगूगी।’
‘क्या लेगी कुबेर का धन’?
‘नहीं।’
‘इन्द का बल।’
‘नहीं।’
‘सरस्वती की विद्या?’
‘नहीं।’
‘फिर क्या लेगी?’
‘संसार का सबसे उत्तम पदार्थ।’
‘वह क्या है?’
‘सपूत बेटा।’
‘जो कुल का नाम रोशन करे?’
‘नहीं।’
‘जो माता-पिता की सेवा करे?’
‘नहीं।’
‘जो विद्वान और बलवान हो?’
‘नहीं।’
‘फिर सपूत बेटा किसे कहते हैं?’
‘जो अपने देश का उपकार करे।’
‘तेरी बुद्वि को धन्य है। जा, तेरी इच्छा पूरी होगी।’
एक बार अवश्य देखें दोस्तों
Raman46
14-01-2012, 06:16 PM
इस सूत्र पर आप सभी सादर आमंत्रित हैं
Raman46
12-02-2012, 11:25 AM
इस सूत्र पर आप सभी सादर आमंत्रित हैं
मुँशी प्रेमचँद जी कहानियों का आनंद ले सकते है साथियों
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