View Full Version : दिल हूम हूम करे . . .
jaileo
26-12-2010, 01:57 AM
समझाते तो हैँ दिल को यूँ
पर ये गुमसुम ही रहता है
तुम कुछ कोशिश करके देखो
सिर्फ तुम्हारी ही सुनता है
jaileo
13-01-2011, 08:08 AM
दोस्तोँ के दायरे बढ़ने लगे थे जब
मेरा यकीन पुख्ता सा होने लगा था तब
खूब मस्ती हो चुकी है दोस्तोँ के साथ 'जय'
अकेलेपन के आ चुके हैँ दिन बहुत करीब अब
jaileo
02-02-2011, 12:26 AM
तुम भोर की किरण हो तुम चांदनी निशा की
तुम फूल की महक हो गंभीरता धरा की
विस्तार हो गगन का गहराई हो जलधि की
बचपन का भोलापन हो ममता हो जैसे माँ की
यौवन का तुम हो साहस चंचलता जैसे जल की
आभा प्रकाश की हो चितवन हो प्रेयसी की
आया हो प्रेम जैसे रख रूप ज्यों तुम्हारा
गर्वित हूँ मैंने पायी निधि प्रेम गागरी सी
jaileo
02-02-2011, 12:34 AM
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
घृणा आज भी यह करता है द्वेष ईर्ष्या में जलता है
गीता ज्ञान सुनाने वाले अब भी प्यार कहाँ पलता है
अधिकारों के पीछे भागे कर्तव्यों को छोड़ चुका है
दुर्योधन दुशासन का अब भी शासन वैसा ही तो है
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
अर्जुन भीम युधिष्ठिर सारे समा गए इतिहास में
पर शकुनी के पासे अब भी हैं लोगों के हाथ में
फल की इच्छा छोड़ कर्म करने को तुमने धर्म कहा
पर ऐसा क्या हो पाया? सब पहले जैसा ही तो है
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
लाज द्रोपदी की अब भी वैसे ही लूटी जाती है
न्याय की देवी ने अब भी आँखों में पट्टी बांधी है
सत्य अहिंसा धर्म आज भी उतने ही लाचार हैं
सना हुआ अन्याय में जीवन अब भी वैसा ही तो है
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
तुम तो सब कुछ कर सकते हो फिर सब वैसा ही क्यों है ?
बदल क्यों नहीं देते मन को आयी आज विवशता क्यों है ?
अहंकार को मन से मिटा दो मन पथ पर आ जाएगा
आनंदित होगा जग सारा जीवन सुखमय हो जाएगा
Pooja1990 QUEEN
02-02-2011, 06:39 AM
jaileo ji .kaise hai aap. kaha busy ho aaj kal.foram par aapka wait ho raha hai.
jaileo
21-02-2011, 02:06 AM
भोगा हुआ एक अनकहा संत्रास लेकर
लो मर रहा है यह मनुज निश्वास लेकर
तृप्ति का वरदान लेकर क्या करे कोई
जी रहे हैँ सब अतृप्ता प्यास लेकर
मैँ जनम से मस्त फक्कड़ ही रहा
क्या करूँ सम्पन्न यह आवास लेकर
क्या डुबाओगे मुझे तुम इस जलधि मेँ
सौ बार उबरा हूँ सहज अभ्यास लेकर
आप सब से हो विमुख अब मैँ कहाँ जाऊँ
हे 'जय' कहिए आप सा सन्यास लेकर
kiskunal
21-02-2011, 11:30 AM
भोगा हुआ एक अनकहा संत्रास लेकर
लो मर रहा है यह मनुज निश्वास लेकर
तृप्ति का वरदान लेकर क्या करे कोई
जी रहे हैँ सब अतृप्ता प्यास लेकर
मैँ जनम से मस्त फक्कड़ ही रहा
क्या करूँ सम्पन्न यह आवास लेकर
क्या डुबाओगे मुझे तुम इस जलधि मेँ
सौ बार उबरा हूँ सहज अभ्यास लेकर
आप सब से हो विमुख अब मैँ कहाँ जाऊँ
हे 'जय' कहिए आप सा सन्यास लेकर
अति सुन्दर
मनमुग्ध हो गया
jaileo
22-02-2011, 11:24 PM
अनचाहे , अपने आप हमेँ जो मिलता
त्यागे से भी वह मुट्ठी मेँ आ जाता
उजियारे मेँ जिसे कभी मैँने खोया था
वह मिला अंधेरे मेँ निज चमक दिखाता
उसके हित जितना नयन नीर बरसाया
वह उस प्रतिमा के आँचल मेँ सरसाया
हिल डोल रही पारद की बूँदोँ सी छाया
प्रति गीत गीत मेँ पलक पलक मेँ छा जाता
त्यागे से भी वह मुट्ठी मेँ आ जाता ।।
jalwa
22-02-2011, 11:53 PM
जय भैया, आपके काव्य का तो मैं वर्षों से प्रशंसक रहा हूँ. लेकिन आज बहुत दिनों के बाद आपका वोही रंग दोबारा से देख कर मन मंत्रमुग्ध हो गया.
आभार.
draculla
23-02-2011, 05:56 AM
नमस्कार जय भैया
मुझे तो प्रतीत होता था की आप फोरम पर आते ही नहीं है/
लेकिन मेरा यह भ्रम टूट गया है/आपकी कविता हमेशा ही अच्छी होती है/
आप की काव्य रचना से ऐसा लगता है की आप कवि होंगें/
sanjeetspice
23-02-2011, 06:22 AM
ye kya likha gya h kuch ditales me batita to khushi hoti
kyoki meri smaz me kuch nhi aaya
jaileo
25-03-2011, 12:07 AM
नमस्कार जय भैया
मुझे तो प्रतीत होता था की आप फोरम पर आते ही नहीं है/
लेकिन मेरा यह भ्रम टूट गया है/आपकी कविता हमेशा ही अच्छी होती है/
आप की काव्य रचना से ऐसा लगता है की आप कवि होंगें/
भाई ड्रेकुला जी, अभिवादन /
मैं फोरम में कुछ व्यक्तिगत व्यस्तता की कारण नहीं आ पा रहा हूँ / किन्तु ऐसा भी नहीं कि मै फोरम की गतिविधियों से अज्ञान रहता होऊं क्योंकि मेरे कई सुधी मित्र इस विषय में दूरभाष पर आवश्यक सूचनाएं देते रहते हैं /
मित्र मैं कवि नहीं हूँ / एक सरल हृदय अवश्य है मेरे पास जो भावनाओं से ओत प्रोत है / और ये तुकबदियाँ इसी हृदय की देन हैं जो कि भावनाओं के माध्यम से मस्तिष्क को अपने वश में कर के हाथों से मनचाहा लिखा लेने का आदेश प्राप्त कर लेता है ....... बस /
आपके स्नेह के लिए अपार आभार / धन्यवाद /
ye kya likha gya h kuch ditales me batita to khushi hoti
kyoki meri smaz me kuch nhi aaya
संजीत जी, राम राम /यद्यपि ऐसा कुछ भी कठिन नहीं लिखा है जो अस्पष्ट हो और समझ में ना आये / मित्र, जब कोई बात या विषय समझ में ना आये तो कुछ पल ठहर कर पुनः उस बात/विषय पर विचार करें तो हल निकलना संभव है / आप एक बार और प्रयास करें तो ये टूटे फूटे शब्द कुछ ना कुछ तो कर ही देंगे आपके हृदय में ................
कुछ नवीन पंक्तियाँ और प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया अवलोकन करें /
धन्यवाद /
jaileo
25-03-2011, 12:25 AM
जब लगे मतिभ्रम हुआ है,
सोच लो संयोग है /
जब लगे कि छल हुआ है,
सोच लो दुर्योग है /
जब लगे 'जय' शाति सुखकर
आये तब आंधी विनाशक,
हो रहे जब कार्य उत्तम,
दैव का सहयोग है //
jaileo
25-03-2011, 12:27 AM
मैं नज़र से ही फ़लक को, चीथड़ों में बाँट दूँ /
हाल होगा क्या ज़मीं का, सोचकर चुपचाप हूँ //
मैं नज़ीरों के अमल को मानता हरगिज़ नहीं /
पत्थरों पर भी निशां बन जाऊं, वो आवाज़ हूँ //
शाह सी क्या ज़िन्दगी थी, नेकी और ईमान की /
बे-ईमानों का शहर है, इस लिए बरबाद हूँ //
रंजोगम हैं बे-अदब मिल जाएँ तो कर लो सलाम /
इनसे डर कर छिप गया तो कैसा मैं उस्ताद हूँ //
बे-खौफ हो कर जी लो यारो, ज़िन्दगी जिंदादिली से /
मौत को भी मौत दे जो, ऐसा 'जय' जज़्बात हूँ //
jaileo
25-03-2011, 12:29 AM
'जय' मौत माँगता रहा, तो ज़िन्दगी मिली /
जब ज़िदगी जीने लगा, तो मौत आ गयी //
man-vakil
25-03-2011, 01:03 AM
मित्र जलिओ के लिए:-
"कभी भोर सा उज्वल हूँ मैं ..
कभी निशा की कालिमा लिए..
खोज रहा हूँ जीवन के वो सार,
संग तुम्हारी कुछ लालिमा लिए ..
किंचित मन की व्याकुलता हूँ मैं,
भीतर जैसे कोई भारी बोझ लिए...
चेतन अवचेतन का भेद खोजता,
अवसादों का गहरा जैसे बोध लिए...
राहों अब चिन्हित नहीं होती, मेरे क़दमों से
फिर क्यों जाऊं कोई अवरोध लिए..
यदि चाहूँ , जब आकाश को मैं कभी छूना,
धरातल लिपट जाये मुझसे, कोई अनुरोध लिए..
प्रतिबिम्बों को अब मै खोजता, आइनों में,
पर धुंधलाता जाता मै, बिना कोई आयाम लिए,
चेहरे बदल बदल आते, वो सायें बीते कल के ,
भयभीत करते मुझे जाने क्यों, बिना कोई विराम लिए..."
-----------------मन वकील/////////
jaileo
25-03-2011, 02:00 AM
चल पड़े लक्ष्य की ओर मित्र तुम
यद्यपि 'जय' राह नहीं मतवाली /
इस सुदृढ़ मंच पे अंतरमन से
मन-वलील की थाह निकाली //
धन्यवाद मित्र /
man-vakil
25-03-2011, 02:18 AM
देखो मेरे भीतर मेरे भीतर,ऐसे कोई दस्तक क्यों अब देता है..
जब सोने लगता है मेरा अंतर्मन ,तो फिर क्यों जगा अब देता है//
निंद्रा मुझे ले जायेगी यहाँ से , वहां परम मिलन की ओर,
तो फिर कोई आगे बढ बढ कर , मेरी राहें क्यों अब रोक देता है,
मै जड़ नहीं न ही चेतन , न मैं चिंतन या हास्य विश्लेषण,
तो फिर कोई मुझसे आ आ कर,मेरी गतिमनसा क्यों अब टोक देता है ..
Ranveer
29-04-2011, 11:04 PM
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
घृणा आज भी यह करता है द्वेष ईर्ष्या में जलता है
गीता ज्ञान सुनाने वाले अब भी प्यार कहाँ पलता है
अधिकारों के पीछे भागे कर्तव्यों को छोड़ चुका है
दुर्योधन दुशासन का अब भी शासन वैसा ही तो है
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
अर्जुन भीम युधिष्ठिर सारे समा गए इतिहास में
पर शकुनी के पासे अब भी हैं लोगों के हाथ में
फल की इच्छा छोड़ कर्म करने को तुमने धर्म कहा
पर ऐसा क्या हो पाया? सब पहले जैसा ही तो है
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
लाज द्रोपदी की अब भी वैसे ही लूटी जाती है
न्याय की देवी ने अब भी आँखों में पट्टी बांधी है
सत्य अहिंसा धर्म आज भी उतने ही लाचार हैं
सना हुआ अन्याय में जीवन अब भी वैसा ही तो है
सदियाँ बीती पर अब भी मानव मन वैसा ही तो है
तुम तो सब कुछ कर सकते हो फिर सब वैसा ही क्यों है ?
बदल क्यों नहीं देते मन को आयी आज विवशता क्यों है ?
अहंकार को मन से मिटा दो मन पथ पर आ जाएगा
आनंदित होगा जग सारा जीवन सुखमय हो जाएगा
जैलियो जी
कविता के माध्यम से मानव मन की सुन्दर व्याख्या की है आपने ...
आगे इसमें चार लाइन मै जोड़ना चाहूँगा ;
आनंद की तालाश में दिन रात ये भटकता ही तो है
आकाश की ऊँचाइयों को छूने की कल्पना करता ही तो है
कोई थाह नहीं लगा पाया इस मन रुपी पंछी की
संसार की भीड़ में खोकर खुद को बस बहलाता ही तो है
sukhveer
30-04-2011, 07:59 AM
जो कहा मैंने,की प्यार आता है तुम पर। हस कर कहने लगे,और आपको आता ही क्या है।
sukhveer
30-04-2011, 08:33 AM
खामोश आँखों से बह कर जब आसू आते हैं,आप क्या जानो कितना आप हमे याद आते है,आज भी उसी मोड पे खड़े है हम ,जहां आपने कहा था ......ठहरो हम अभी आते है।
jaileo
03-06-2011, 11:35 PM
खामोश आँखों से बह कर जब आसू आते हैं,आप क्या जानो कितना आप हमे याद आते है,आज भी उसी मोड पे खड़े है हम ,जहां आपने कहा था ......ठहरो हम अभी आते है।
हमें एक मोड़ पर रुकना है, यह तय तो था लेकिन
हमें किस मोड़ पे रुकना, नतीजा ना हुआ मुमकिन
तुम आगे अब बढे जाओ, हमें पीछे न पाओगे
बिछुड़ कर ही जियेंगे 'जय' नई रातें नए से दिन //
jaileo
04-06-2011, 11:16 PM
हाय ! कैसे ये नज़ारे, सामने आने लगे
मेमनों को देखकर, अब शेर थर्राने लगे
वक्त की चारागरी ने, जब दिया धोखा मुझे
क्या करें हम जख्म अपने खुद ही सहलाने लगे
हमने बख्शी थी जिन्हें कल बादशाहत बाखुशी
वे भी हमको धूल की, मानिदं ठुकराने लगे
जो चले थे जिन्दगी भर थाम कर उंगली मेरी
है ताज्जुब रास्ता वे मुझको दिखलाने लगे
हमने अपने घर को फूँका कुछ तमाशा ही किया
गम नहीं है शहर भर को हम जो दीवाने लगे
आँधियों में गुलमोहर का पेड़ अपना ढह गया
हम तभी से दोस्तों को सख्त बेगाने लगे //
136624:pointlol::rofl:
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