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View Full Version : ज्योतिष : मंगल दोष : विवाह के समय कितना विचारणीय



guruji
08-08-2011, 07:32 PM
विभिन्न स्थानों से एकत्रित सामग्री(मुझे ज्योतिष का तनिक भी ज्ञान नहीं है।)
मंगली दोष और दोष परिहार
मंगली दोष का नाम सुनते ही वर और कन्या के अभिभावक सतर्क हो जाते है,विवाह सम्बन्धो के लिये मंगलिक शब्द एक प्रकार से भय अथा अमंगल का सूचक बन गया है,परन्तु प्रत्येक मंगली जातक विवाह के अयोग्य नही होता है,सामान्यत: मंगलीक दिखाई पडने वाली जन्म पत्रियां भी ग्रहों की स्थिति तथा द्रिष्टि के कारण दोष रहित हो जाती है,यहां मंगली दोष विचार तथा मंगली दोष परिहार विषयक आवश्यक वैदिक जानकारियां प्रस्तुत की जा रही है.
मंगली दोष का विचार

यदि जातक की जन्म कुण्डली में लग्न यानी प्रथम भाव बारहवें भाव,पाताल चतुर्थ भाव,जामित्र यानी सप्तम भाव, तथा अष्टम में मंगल बैठा हो,तो कन्या अपने पति के लिये तथा पति कन्या के लिये घातक होता है,इसे मंगली दोष कहते है,यदि वर की कुन्डली में धन यानी दूसरे सुत यानी पंचम, सप्तम यानी पत्नी भाव,अष्टम यानी मृत्यु भाव और व्यय यानी बारहवें भाव में मंगल विराजमान हो तो वह उसकी स्त्री का विनाश करता है,और यदि स्त्री की कुन्डली में इन्ही स्थानों में मंगल विराजमान हो तो वह विधवा योग का कारक होता है,मंगल की इस प्रकार की स्थिति के कारण वर और कन्या का विवाह वर्जित है,आचार्यों ने एकादस भाव स्थित मंगल को भी मंगली की उपाधि दी है.
मंगली दोष परिहार


जन्म कुन्डली के प्रथम द्वितीय चतुर्थ सप्तम अष्टम एकादस और द्वादस भावों में किसी में भी मंगल विराजमान हो तो वह विवाह को विघटन में बदल देता है,यदि इन भावों में विराजमान मंगल यदि स्वक्षेत्री हो,उच्च राशि में स्थिति हो,अथवा मित्र क्षेत्री हो,तो दोषकारक नही होता है.

यदि जन्म कुन्डली के प्रथम भाव में मंगल मेष राशि का हो,द्वादस भाव में धनु राशि का हो,चौथे भाव में वृश्चिक का हो,सप्तम भाव में मीन राशि का हो,और आठवें भाव में कुम्भ राशि का हो,तो मंगली दोष नही होता है.

यदि जन्म कुन्डली के सप्तम,लगन,चौथे,नौव ं,और बारहवें भाव में शनि विराजमान हो तो मंगली दोष नही होता है.

यदि जन्म कुन्डली में मंगल गुरु अथवा चन्द्रमा के साथ हो,अथवा चन्द्रमा केन्द्र में विराजमान हो,तो मंगली दोष नही होता है.

यदि मंगल चौथे,सातवें भाव में मेष,कर्क,वृश्चिक,अ वा मकर राशि का हो,तो स्वराशि एवं उच्च राशि के योग से वह दोष रहित हो जाता है,अर्थात मंगल अगर इन राशियों में हो तो मंगली दोष का प्रभाव नही होता है,कर्क का मंगल नीच का माना जाता है,लेकिन अपनी राशि का होने के कारण चौथे में माता को पराक्रमी बनाता है,दसवें में पिता को पराक्रमी बनाता है,लगन में खुद को जुबान का पक्का बनाता है,और सप्तम में पत्नी या पति को कार्य में जल्दबाज बनाता है,लेकिन किसी प्रकार का अहित नही करता है.

केन्द्र और त्रिकोण भावों में यदि शुभ ग्रह हो,तथा तृतीय षष्ठ एवं एकादस भावों में पापग्रह तथा सप्तम भाव का स्वामी सप्तम में विराजमान हो,तो भी मंगली दोष का प्रभाव नही होता है.

वर अथवा कन्या की कुन्डली में मंगल शनि या अन्य कोई पाप ग्रह एक जैसी स्थिति में विराजमान हो तो भी मंगली दोष नही लगता है.

यदि वर कन्या दोनो की जन्म कुन्डली के समान भावों में मंगल अथवा वैसे ही कोई अन्य पापग्रह बैठे हों तो मंगली दोष नही लगता,ऐसा विवाह शुभप्रद दीर्घायु देने वाला और पुत्र पौत्र आदि को प्रदान करने वाला माना जाता है.

यदि अनुष्ठ भाव में मंगल वक्री,नीच (कर्क राशि में) अथवा शत्रु क्षेत्री (मिथुन अथवा कन्या ) अथवा अस्त हो तो वह खराब होने की वजाय अच्छा होता है.

जन्म कुन्डली में मंगल यदि द्वितीय भाव में मिथुन अथवा कन्या राशि का हो,द्वादस भाव में वृष अथवा कर्क का हो,चौथे भाव में मेष अथवा वृश्चिक राशि का हो,सप्तम भाव में मकर अथवा कर्क राशि का हो,और आठवें भाव में धनु और मीन का हो,अथवा किसी भी त्रिक भाव में कुम्भ या सिंह का हो,तो भी मंगल दोष नही होता है.

जिसकी जन्म कुन्डली में पंचम चतुर्थ सप्तम अष्टम अथवा द्वादस स्थान में मंगल विराजमान हो,तो उसके साथ विवाह नही करना चाहिये,यदि वह मंगल बुध और गुरु से युक्त हो, अथवा इन ग्रहों से देखा जा रहा हो,तो वह मंगल फ़लदायी होता है,और विवाह जरूर करना चाहिये.

शुभ ग्रहों से युक्त मंगल अशुभ नही माना जाता है,कर्क लगन में मंगल कभी दोष कारक नही होता है,यदि मंगल अपनी नीच राशि कर्क का अथवा शत्रु राशि तीसरे या छठवें भाव में विराजमान हो तो भी दोष कारक नही होता है.

यदि वर कन्या दोनो की जन्म कुन्डली में लग्न चन्द्रमा अथवा शुक्र से प्रथम द्वितीय चतुर्थ सप्तम अष्टम अथवा द्वादस स्थानों के अन्दर किसी भी स्थान पर मंगल एक जैसी स्थिति में बैठा हो,अर्थात वर की कुन्डली में जहां पर विराजमान हो उसी स्थान पर वधू की कुन्डली में विराजमान हो तो मंगली दोष नही रहता है.

परन्तु यदि वर कन्या में से केवल किसी एक की जन्म कुन्डली में ही उक्त प्रकार का मंगल विराजमान हो,दूसरे की कुन्डली में नही हो तो इसका सर्वथा विपरीत प्रभाव ही समझना चाहिये,अथवा वह स्थिति दोषपूर्ण ही होती है,यदि मंगल अशुभ भावों में हो तो भी विवाह नही करना चाहिये,परन्तु यदि गुण अधिक मिलते हो,तथा वर कन्या दोनो ही मंगली हो,तो विवाह करना शुभ होता है.

guruji
08-08-2011, 07:34 PM
क्यों जरूरी है मंगली का मंगली से *विवाह
जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं। जैसे उपरोक्त कुंडली में दर्शाया है।

गोलिया मंगल 'पगड़ी मंगल' तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हो तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।

मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हो तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।

मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हो तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोषरहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।

शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहाँ तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। *िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार अपने पारिवारिक संबंध के कारण पूर्ण संतुष्ट हो, तब भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए।

ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो 'पीपल' विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें।

मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या*दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं।

guruji
08-08-2011, 07:35 PM
कुण्डली में जब प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल होता है तब मंगलिक दोष लगता है

कुण्डली में चतुर्थ और सप्तम भाव में मंगल मेष अथवा कर्क राशि के साथ योग बनाता है तो मंगली दोष लगता है

अगर कुण्डली में मंगल दोष का निवारण ग्रहों के मेल से नहीं होता है तो व्रत और अनुष्ठान द्वारा इसका उपचार करना चाहिए. मंगला गौरी और वट सावित्री का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला है. अगर जाने अनजाने मंगली कन्या का विवाह इस दोष से रहित वर से होता है तो दोष निवारण हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करना लाभदायी होता है.

जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है.

प्राण प्रतिष्ठित विष्णु प्रतिमा से विवाह के पश्चात अगर कन्या विवाह करती है तब भी इस दोष का परिहार हो जाता है.

मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है.

कार्तिकेय जी की पूजा से भी इस दोष में लाभ मिलता है.

महामृत्युजय मंत्र का जप सर्व बाधा का नाश करने वाला है. इस मंत्र से मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक जीवन में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है.

लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है.

मंगल भी निम्न लिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा :



चतुर्थ और सप्तम भाव में मंगल मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि में हो और उसपर क्रूर ग्रहों की दृष्टि नहीं हो

मंगल राहु की युति होने से मंगल दोष का निवारण हो जाता है

लग्न स्थान में बुध व शुक्र की युति होने से इस दोष का परिहार हो जाता है.

कर्क और सिंह लग्न में लगनस्थ मंगल अगर केन्द्र व त्रिकोण का स्वामी हो तो यह राजयोग बनाता है जिससे मंगल का अशुभ प्रभाव कम हो जाता है.

वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है.

जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व ,उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का ,वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा

यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो

guruji
08-08-2011, 07:36 PM
प्राय: विवाह के समय जन्मांग मिलाने में मंगल दोष को प्रधानता दी जाती है। यह धारणा भी प्रचलित है कि अगर किसी मंगली व्यक्ति का विवाह, किसी अन्य व्यक्ति से जो मंगली न हो, से करा दिया जाए तो उस अमंगली व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। आइए जानते हैं कि मंगल दोष क्या है और इसका क्या निवारण क्या हैं? सामान्यत: किसी जन्मांग में लग्नस्य, चतुर्थ भाव में, सप्रंम भाव, अष्टम भाव तथा द्दादश भाव में बैठा मंगल मांगलिक बनाता है। पर यही सिद्धांत अचूक सिद्धांत नहीं है, इसके कई अपवाद भी हैं जो निम्न हैं :

यदि एक पक्ष के जिन भावों में मंगल के बैठने से मंगल दोष हो, दूसरे पक्ष के उन्हीं भावों में कोई पापग्रह बैठा हो तो मंगल दोष भंग हो जाता है।
यदि एक पक्ष लग्न से मंगली हो तथा दूसरा पक्ष शुक्र अथवा चंद्र से मंगली हो तो, भी मंगल दोष भंग हो जाता है।
मंगल अपने घर में अथवा अपने मित्रों सूर्य, चंद्र, बृहस्पति के घर में मंगल दोष सृजित नहीं करता।
यदि मंगल पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो भी मंगल दोष भंग हो जाता है।
सूर्य के समानांतर अंशों पर रखकर ही मंगल अस्त हो जाता है तथा मंगल दोष भंग हो जाता है।
उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखकर ही मंगल दोष की विवेचना की जानी चाहिए तथा उपयुक्त मिलान किया जाना चाहिए।

guruji
08-08-2011, 07:38 PM
ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मंगल ग्रह दोष से मिलने वाली रोग, पीड़ा और बाधा दूर करने के लिए मंगलवार का व्रत बहुत ही प्रभावकारी माना जाता है। किं तु दैनिक जीवन की आपाधापी में चाहकर भी अनेक लोग धार्मिक उपायों को अपनाने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिए यहां मंगलवार के लिए ऐसे उपाय बताए जा रहे हैं, जिनको आप दिनचर्या के दौरान अपनाकर मंगल दोष शांति कर सकते हैं -
- अगर आपकी कुण्डली में मंगल उच्च का और शुभ हो तो मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में बताशे चढ़ाएं और बहते जल या नदी में बहा दें। मंगल दोष के बुरे असर से बचाव होगा।- घर से काम पर निकलते समय भिखारियों को मीठी रोटी दे दें।
- बड़ या बरगद की जड़ और मिट्टी में मीठा दूध मिलाकर मस्तक पर तिलक लगाएं। इससे मंगल ग्रह की पीड़ा से हुई पेट की बीमारियों से निजात मिलती है। - रेवड़ी, तिल और शक्कर बहते जल में डालने से मंगल दोष से बने अशुभ और मारक योग से बच सकते हैं।- कुंडली के चौथे भाव में मंगल बैठे होने के साथ मंगल दोष मां, सास और दादी को रोगी बना देता है। परिवार में अशांति, दरिद्रता के साथ संतान विवाह में बाधा डालता है। इस दोष निवारण का सरल उपाय है- परिवार के सभी सदस्य कुंए के जल से दातुन करें।- मंगल पीड़ा अग्रि भय पैदा करती है। इसका उपाय है देशी शक्कर छत पर बिखेर दें, आग का भय दूर होता है। - तंत्र उपायों में श्मशान घाट में शहद से भरी एक कटोरी रखकर आने से मंगल ग्रह दोष से पत्नी और संतान पर आए जीवन का संकट टलता है और लंबी उम्र मिलती है।

anita
08-08-2011, 10:00 PM
जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है.


गुरु जी यहाँ पे मैं आपसे क्षमा चाहती हु पे पीपल के वृक्ष साथ विवाह उचित नहीं माना जा सकता है कयोकि ब्रह्म राक्षस का निवास माना गया है , और भी भूत प्रेत वहा वास करते है और साथ ही देवी देवताओ का भी वास माना जाता है , घट विवाह वर्तमान समय के अनुसार उचित नहीं क्योकि घट विवाह की रीतिया अच्छी नहीं मानी जा सकती है इसके अपेक्षा दो रीतियों से विवाह करना ज्यादा उचित है जैसे की एक धार्मिक रीती से और दूसरा court marriage .
सम्प्तम स्थान में गुरु भी विवाह के लिए अच्छा नहीं माना गया है , ऐसे में ज्यादातर देखा गया है की शादी ३० वर्ष के बाद होती है और गर जल्दी हो भी जाती है तो ज्यादा लम्बे समय साथ नहीं रह पाता है , इसलिए उचित ये ही रहता है की शादी ३० वर्ष के बाद ही की जाये

Ranveer
09-08-2011, 08:17 AM
मेरी जन्म कुंडली में मंगल प्रथम भाव में कर्क राशि का है |
इसका अर्थ है कि एक मंगल दोष से पीड़ित व्यक्ति को -
1.अमांगलिक से शादी नहीं करनी चाहिए |या कोई उपाय नहीं है |
2.उसे कोर्ट में शादी करनी चाहिए |
3.उसे ३० वर्ष के ऊपर के उम्र में शादी करनी चाहिए |

किन्ही सदस्य को कोई जानकारी हो तो इस पर प्रकाश डालें |

Chandrshekhar
09-08-2011, 08:44 AM
मेरी जन्म कुंडली में मंगल प्रथम भाव में कर्क राशि का है |
इसका अर्थ है कि एक मंगल दोष से पीड़ित व्यक्ति को -
1.अमांगलिक से शादी नहीं करनी चाहिए |या कोई उपाय नहीं है |
2.उसे कोर्ट में शादी करनी चाहिए |
3.उसे ३० वर्ष के ऊपर के उम्र में शादी करनी चाहिए |

किन्ही सदस्य को कोई जानकारी हो तो इस पर प्रकाश डालें |

आदरणीय मित्र मंगल के तमाम दोषो को आप इस आसान उपाय से सदा के लिये, दूर कर सकते है, इससे मंगल आपके लिये शुभ भी हो जायेगा
शुक्ल पक्ष के मंगलवार को मंगल की प्रतिमा/चित्र को किसी बाजोट जिस पे न्या लाल कपरा बिछा हो उस पे रखे,खुद भी नये लाल वस्त्र धारण कर ले , अनन्तमूल की जङी (ये आपको किसी भी जङी बूटी की दुकान मैं 2-3 रूपये मैं मिल जायेगी ) को गंगा जल से पवित्र करके रखे चित्र के सामने, अब पंचोपचार पूजन करे , पूजन मैं लाल अरहुल का फुल, तिलक के लिये लाल चन्दन केशर युक्त इस्तेमाल करे ॥ अब उन्हे गुङ का भोग लगाये, १ सिकका अर्पित करे,॥
इसके बाद लाल चन्दन की माला पे ११ माला इस मंत्र का जाप करे

धरणी गर्भ सम्भूतम्

विद्युत कान्ति समप्रभम्

कुमारं शक्ति हस्तं तं

मंगलं प्रणमाम्यहम्।।

फिर धूप दीप से आरती करे, अब अनन्तमूल की जङी को लाल कपरे मैं बांध के धारण करे ॥

सारी पूजन सामग्री को चित्र/मूर्ति के साथ बहते पानी मैं प्र्वाहित कर दे ॥
इसके बाद किसी हनुमान मंदिर मैं जा के हनुमान जी का दर्शन करे, हनुमान चालिशा का जाप करे, मंगल का दोष सदा के लिये समाप्त हो जायेगा, ओर कोशिश करे की हर मंगलवार को गाय को मसूर की दाल ओर गुङ दे ॥ इस उपाय को किसी जानकार के साथ ही करे ॥

amar2007
09-08-2011, 12:30 PM
प्रेम विवाह में मंगल दोष पर विचार नहीं किया जाता है . मंगल दोष को दूर करने के लिए पीपल से शादी करना भी अंधविस्वास है और पूरी तरह से निराधार है . इसी तरह से मंगल दोष को दूर करने के लिए बताये गए अन्य कर्मकांड भी निराधार और बकवास है. किसी भी तरह के ग्रहों का विन्यास सुखद वैवाहिक जीवन की गारंटी नहीं दे सकता है . हर तरह के योग में जन्मे व्यक्ति की मृत्यु होती है और इसी तरह हर योग में जन्मी लड़की विधवा और लड़का विधुर हो सकता है . फिर भी अगर किसी को मंगल दोष से भय लगता है तो उसे मंगल सूत्र को अमल में लाना चाहिए . मंगल सूत्र किसी भी ग्रहयोग में जन्में व्यक्ति के लिए लाभकारी है . यहाँ मंगल सूत्र से मेरा अभिप्राय गले में पड़े हार या माला नहीं है . मंगलसूत्र के नाम से जाना जाने वाला हार तो केवल मंगल सूत्र का प्रतीक है और इसका असली मतलब भुला सा दिया गया है . मंगल सूत्र वो सूत्र है जिसका उपदेश भगवान् बुद्ध ने हज़ारों सालों पहले किया था . ये ऐसा सूत्र है जो एक ही परिवार में अलग अलग व्यक्तित्व , उम्र , लिंग, सोच की वजह से पैदा होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए बनाया गया था . क्योंकि बहू ही परिवार की सबसे नयी सदस्य होती है इसलिए सबसे ज्यादा समस्याएँ उसी के सामने आती है इसलिए बहू को ही मंगलसूत्र समझाने के बाद उसके गले में एक हार या माला प्रतीक के रूप पहना /बाँध दिया जाता है जिससे की मंगलसूत्र बार बार उसके जेहन में आता रहे . पर आजकल लोग मतलब भूल से गए हैं और केवल माला ही उनके लिए सबकुछ हो गया है . अगर आपके परिवार में रोज झगड़े हो रहे हैं तो गले में लाखों/ करोड़ों के हार लटकाने से कोई लाभ नहीं . ऐसे ये हार केवल दिखावे की चीज़ बनकर रह जाते हैं . जरूरत है की लोगों को मंगलसूत्र के वास्तविक स्वरुप और मतलब को फिर से बताया /समझाया जाए.

Ranveer
09-08-2011, 09:42 PM
चाँद जी और अमर जी दोनों को हार्दिक धन्यवाद ||
अमर जी ,
क्या कोई भी धागा ,माला ,या हार प्रतीकात्मक रूप से मंगलसूत्र के रूप में पहना या बांधा जा सकता है ??

amar2007
10-08-2011, 01:04 PM
चाँद जी और अमर जी दोनों को हार्दिक धन्यवाद ||
अमर जी ,
क्या कोई भी धागा ,माला ,या हार प्रतीकात्मक रूप से मंगलसूत्र के रूप में पहना या बांधा जा सकता है ??

हाँ, बिलकुल!

MALLIKA
13-08-2011, 05:37 PM
जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है.


गुरु जी यहाँ पे मैं आपसे क्षमा चाहती हु पे पीपल के वृक्ष साथ विवाह उचित नहीं माना जा सकता है कयोकि ब्रह्म राक्षस का निवास माना गया है , और भी भूत प्रेत वहा वास करते है और साथ ही देवी देवताओ का भी वास माना जाता है , घट विवाह वर्तमान समय के अनुसार उचित नहीं क्योकि घट विवाह की रीतिया अच्छी नहीं मानी जा सकती है इसके अपेक्षा दो रीतियों से विवाह करना ज्यादा उचित है जैसे की एक धार्मिक रीती से और दूसरा court marriage .
सम्प्तम स्थान में गुरु भी विवाह के लिए अच्छा नहीं माना गया है , ऐसे में ज्यादातर देखा गया है की शादी ३० वर्ष के बाद होती है और गर जल्दी हो भी जाती है तो ज्यादा लम्बे समय साथ नहीं रह पाता है , इसलिए उचित ये ही रहता है की शादी ३० वर्ष के बाद ही की जाये




गुरु जी छमा करे घट विवाह में पीपल से विवाह का शास्त्रों में कही भी उल्लेख नहीं है !
घट विवाह में केले के पेड़ से विवाह का उल्लेख है !
क्यूंकि केले के पेड़ को श्री हरी विष्णु का रूप समझ कर उस पेड़ के साथ कन्या का विवाह कर दिया जाता है !
मान्यता ये है की जिस कन्या का विवाह श्री हरी विष्णु के साथ हो जाये वो स्वयं लक्ष्मी का रूप हो जाती है !
जो स्वयं हर तरह से गृहस्त जीवन के लिए उपयुक्त हो जाती है !
शस्त्रों में घट विवाह का उल्लेख इसी तरह वर्णित है !
जो मांगलिक दोष से निजात दिलाता है !