View Full Version : कहानियाँ भूत - प्रेतों की
KHIL@DI_720
04-09-2011, 02:07 AM
नमस्कार दोस्तों ! जिस तरह भगवान के अस्तित्व के बारे में लोगों की एक राय नहीं है ठीक उसी तरह भूत प्रेतों के बारें में भी लोगों का नजरिया अलग अलग है | लेकिन कभी कभी कुछ ऐसी घटनाये घट जाती हैं जो हमें यकीन दिलाती हैं की हमारी तरह उनकी भी अपनी एक दुनिया है | और खासकर वो लोग जो इन घटनाओं के साक्षी होते हैं या जिनके साथ ये होता है , वो न चाहते हुए भी इन बातों पर यकीन करने को मजबूर हो जाते हैं | तो दोस्तों , कुछ ऐसी घटनाएँ जो मैंने देखी/सुनी हैं , मैं उन्हें आप लोगों के साथ बाटना चाहता हूँ | आप लोग भी अगर ऐसी कोई घटना हमारे साथ बाटना चाहें तो आपका स्वागत है | वैसे इनमे से अधिकतर घटनाएँ खुद मेरे साथ घटी हैं या मैं उनका हिस्सा रहा हूँ |
KHIL@DI_720
04-09-2011, 02:08 AM
आप लोग प्रतिक्रिया दें तो सूत्र शुरू किया जाये |
sumii24
04-09-2011, 04:25 AM
जी बिलकुल आपका स्वागत है में स्वेयम भूतो में विश्वास करता हूँ तो उत्सुकता है जानने के लिए शुरे करे में भी कुछ अनभव बाटूंगा
Teach Guru
04-09-2011, 07:49 AM
बहुत ही जबरदस्त सूत्र है मित्र| अच्छा विषय चुना है..........
Mr_perfect
04-09-2011, 11:23 AM
मित्र ऐसा सूत्र पहले से ही है परन्तु अगर आप कहानियाँ पेश करेँगे तो ठीक है
JEETJAWAN
04-09-2011, 04:18 PM
तो मित्र अब किसका इन्*तजार है हो जाओ शुरू...................
KHIL@DI_720
04-09-2011, 07:49 PM
तो चलिए शुरू करते है इन रोमांचक कहानियों का सफ़र | एक छोटी सी बात और की कुछ पात्र और जगहों के नाम काल्पनिक कर दिए गए हैं परन्तु अधिकतर कथानक सत्य पर आधारित है |
KHIL@DI_720
04-09-2011, 07:59 PM
विजय कोल्कता में रहता था | हर साल गर्मी की छुट्टियों में एक महीने के लिए अपने माँ, बाबूजी के साथ गाँव जाता था | उसका गाँव बसा था बिहार के दरभंगा जिले में | गाँव का नाम था हरिपुर | बात २००३-०४ की है | विजय क्लास ७ की परीक्षा देकर गाँव गया था | उसे गाँव में बहुत मजा आ रहा था | खेत , खलिहान , पोखरे , शुद्ध हवा और पानी , बस वहां की बात ही कुछ और थी | उसका दिन भर मस्ती करते बीतता था और शाम को छत पर बैठकर अपनी दादी माँ से कहानियां सुनते | पर उसे साधारण कहानियां नहीं , भूतों की कहानियां पसंद थी | वो हमेशा अपनी दादी से भूतों की कहानियां सुनाने की फरमाइश करता और गाँव में कहाँ कहाँ कौन सी ऐसी बातें हुई हैं , ये भी पूछता |
KHIL@DI_720
04-09-2011, 08:17 PM
विजय के घर में उससे बड़ा एक चचेरा भाई था , राजेश | वो गाँव में अपनी बदमाशी के लिए कुख्यात था | उसके घरवाले उससे बेहद परेशान थे | इसीलिए उसके पिता यानि विजय के बड़े चाचा ने उसे गुरुकुल के हॉस्टल में दाखिला करवा दिया | गुरुकुल स्कूल ४ साल पहले ही खुला था पर अपने पढाई और अनुशासन की वजह से इतना प्रसिद्ध हो गया था की दुसरे गाँव से भी लड़के वहां पढने और हॉस्टल में रहने आते थे | ये गुरुकुल विजय के घर से करीब एक किलोमीटर दूर था | गुरुकुल जाते समय रस्ते में एक पोखरा था जिसका नाम था बौवा पोखर | बौवा पोखर से गुरुकुल करीब ४० फीट दूर था | बौवा पोखर से थोडा पहले सड़क के दूसरी ओर दो आम के बड़े पेड़ एक दुसरे से सटकर खड़े थे जैसे की वो जुड़वाँ हों | विजय ने इस आम के दुगछे के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था | वो जब भी कभी साईकिल लेकर मायापुर घूमने जाता तो घरवाले कहते की शाम होने से पहले उस रस्ते से लौट आना | कई बार उसने लोगों से सुना था की शाम होने पर जो भी उस रास्ते से आता है , उस पर उस दुगछे से कोई ढेले फेंकता है |
Mr_perfect
04-09-2011, 09:29 PM
बढ़िया लिख रिए हो खिलाड़ी जी आगे बढ़ाईए
रेपुटेशन+
KHIL@DI_720
04-09-2011, 10:47 PM
विजय के घर के ठीक सामने वाले घर में एक औरत रहती थी जो गुरुकुल के बच्चों को खाना पहुचने का काम करती थी | उसकी उम्र करीब ४५-५० साल थी | चूँकि उसका मायका रमौली गाँव था इसीलिए लोग उसे रमौली वाली कहते थे | रमौली वाली दोपहर और शाम को गाँव के घरों से उनके बच्चों के लिए खाना लेकर जाती और सबको खिलाकर बर्तन वगैरह लेकर वापस आ जाती | इसके लिए उसे स्कूल से कुछ पैसे मिल जाते और उन घरों से भी कुछ आमदनी हो जाती जिनके बच्चों के लिए वो खाना ले जाती | जो बच्चे हॉस्टल में रहते , उनके घरवाले खास तौर पे उनके लिए अच्छा खाना भेजते क्यूंकि हॉस्टल में खाना नहीं मिलता था |
KHIL@DI_720
04-09-2011, 11:04 PM
तो , जिन दिनों विजय गाँव पर था , उन्ही दिनों की बात है | रोज की तरह एक दिन शाम को रमौली वाली खाना लेकर गुरुकुल गयी | वो अक्सर शाम को ४ बजे ही निकल जाती थी ताकि अँधेरा होने से पहले लौट सके क्यूंकि उसी रास्ते में आम का दुगच्छा पड़ता था | पर उस दिन किसी वजह से उसे लौटने में देर हो गयी | जब अँधेरा हो गया और वो नहीं आई तो उसके पति दसरथ गुरुकुल के लिए निकल पड़ा | उसे लगा की शायद शाम होने की वजह से उसे अकेले आने में डर लग रहा होगा \ बात सही भी थी क्यूंकि रमौली वाली वहां गुरुकुल में घर से अपने पति या बेटे के आने का इंतज़ार कर रही थी | अक्सर जब उसे आने में देर होती तो घर से उसे कोई लेने के लिए जाता | वैसे अगर गुरुकुल से कोई लड़का उसे दुगच्छा से आगे छोड़ जाता तो वो चली आती पर किसी भी छात्र को गुरुकुल से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी |
Teach Guru
06-09-2011, 02:03 PM
बहुत ही जबरदस्त सूत्र है मित्र|
Amigo.
15-09-2011, 09:03 PM
एक अच्छे सूत्र के लिए बधाई.
jai 123
18-09-2011, 09:13 AM
राजस्थान के जोधपुर शहर तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में पानी की अनेक बावड़ियां हैं, जिन्हें या तो राजा-महाराजाओं ने बनवाया था, या पिफर उनकी महारानियों ने। पानी की अनेकानेक ऐसी बावडि यों में से एक ऐसी भी बावडी है, जिसे भूतों ने बनवाया था। इसे भूत बावडी के नाम से जाना जाता है। जोधपुर से नब्बे कित्त् मीत्त् दूर पीपड -मेहता सिटी राजमार्ग की बीच बसा है रठासी' नामक ऐतिहासिक गांव। मारवाड का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जोधपुर में राजपूतों की चम्पावत' शाखा विभाजित हुई, तो उन्होंने ÷कापरडा' गांव को अपना निवास स्थान बनाया था लेकिन यहां बसने वाले युवा कुंआरों ने गांव के किसी सि( ट्टषि की बगीची उजाड ने के साथ-साथ उसकी साधना में भी विध्न डाला था, तब ट्टषि ने कुपित होकर उन कुंआरों को शाप दे दिया था कि इस गांव में उनके वंशज पनप नहीं सकेंगे। बाद में यहां के कुंआरों ने शाप के भय से कापरडा गांव को छोड दिया तथा वे जिस गांव में जाकर बसे, वह आज रणसी गांव' के नाम से प्रसि( है। रणसी गांव में भूतों के सहयोग से बनी पानी की विशाल बावडी तथा ठाकुर जयसिंह का महल इतना चर्चित है कि आज भी लोग बहुत दूर-दूर से उन्हें देखने आते हैं। रहस्यमयी बावडी के संबंध में कहा जाता है कि ठाकुर जयसिंह घोडे पर सवार होकर जोधपुर से रणसी गांव की ओर अपने सेवकों के साथ वहां के प्रसि( मेला गिणगोरियों, को देखने निकले। राह में सेवकों के घोडे कापफी आगे निकल गये और ठाकुर जयसिंह पीछे छूट गए। राजा का घोडा कापफी थक चुका था। तथा उसे प्यास भी लगी थी। रास्ते में एक तालाब को देखकर ठाकुर जयसिंह ने अपने घोड़े को रोका और नीचे उतरकर घोडे को पानी पिलाने के लिए उस तालाब के पास पहुंचे। उस समय आधी रात बीत चुकी थी। घोडा पानी पीने के लिए ज्यों ही आगे बढा, जयसिंह को तालाब के किनारे एक आकृति दिखाई दी। वह आकृति तुरंत ही आदमी के रूप में बदल गई। ठाकुर साहब को बहुत आश्चर्य हुआ। उस आदमी ने कहा मैं भूत हूं। किसी शाप के कारण इस तालाब को छू नहीं सकता। मुझे भी जोर से प्यास लगी है, पानी पिलाइये।' ठाकुर जयसिंह ने निर्भीकता पूर्वक उस आत्मा को पानी पिला दिया। ठाकुर की निर्भीकता एवं दयालुता को देखकर भूत ने उनकी अधीनता स्वीकारते हुए कहा आप जो भी आदेश देंगे, उसे मैं पूरा करूंगा।'
ठाकुर जयसिंह ने कहा मेरे लिए एक गढ , महल तथा पानी की बावडी के साथ-साथ एक सुन्दर-सा शहर तुम्हें बनाना होगा। भूत ने कहां' मुझे आप का आदेश स्वीकार है, किन्तु मैं यह कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं करूंगा। आप दिन भर जो भी निर्माण कराएंगे, वह रात में सौ गुना अधिक बढ़ जाया करेगा किन्तु आप इस रहस्य को किसी को नहीं बताएंगे।
जिस दिन भी यह भेद खुल जाएगा, उसी दिन मेरा काम खत्म हो जाएगा।' संवत्* १६०० में निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। अगले ही दिन से महल एवं बावडी की इमारतें बनने लगीं। पूरे गांव में कौतुहल छा गया। रात में पत्थर ठोकने की रहस्यमय आवाजें आने लगीं, दिन-प्रतिदिन निर्माण कार्य त्वरित गति से आगे बढ ता गया। एक दिन जब जयसिंह की ठकुरानी साहिबा ने महल व बावडी के विस्तार का रहस्य पूछा तो ठाकुर ने उन्हें भी बताने से सापफ-सापफ इन्कार कर दिया। इस पर ठकुरानी रूठ गयी और अनशन शुरू कर दिया। कई दिनों तक अनशन करने के कारण ठकुरानी की दशा बिगड ने लगी। ठकुरानी को मरणासन्न देखकर ठाकुर ने उसे सारा रहस्य बता दिया। ठाकुर के ऐसा करते ही उसी
रात से सारा निर्माण कार्य रूक गया। इसके परिणामस्वरूप सात मंजिला महल केवल दो मंजिला ही बना रह गया और पानी की बावडी का अंतिम हिस्सा ;दीवारद्ध भी अधूरी ही रह गई जो आज भी ज्यों का त्यों ही है। लाल पत्थरों से बना कलात्मक घडाईदार महल का मेहराब एवं गवाक्ष लोगों को आकर्षित करते हैं। बावडी की गहराई दो सौ पुफट से अधिक है। इसमें नक्काशीदार चौदह खम्भे हैं तथा अन्दर जाने के लिए १७४ सीढि यां हैं। सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि बाबडी में बडे-बडे पत्थर लॉक तकनीक' से लगाये गये हैं, जो अधरझूल होने पर भी गिरते नहीं हैं।
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