View Full Version : हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनेता
jai 123
19-09-2011, 06:02 PM
भारतीय सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओ के बारे मैं कुछ जानकारिया
jai 123
19-09-2011, 06:04 PM
आइए शुरुवात करते है देव आनंद से जोकि मेरे पसंदीदा कलाकार है
jai 123
19-09-2011, 06:05 PM
धर्मदेव आनंद, जो की देव आनंद के नाम से प्रसिद्ध है, का जन्म २६ सितम्बर १९२३ में गुरदास पुर (जो अब नारोवाल जिला, पकिस्तान में है) में हुआ। ये भारतीय सिनेमा के बहुत ही सफल कलाकार, निर्देशक और फिल्म निर्माता हैं। उनके पिता किशोरीमल आनंद पेशे से वकील थे। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
jai 123
19-09-2011, 06:06 PM
देव आनंद काम की तलाश में मुंबई आये और उन्होंने मिलट्री सेंसर ऑफिस में १६० रुपये प्रति माह के वेतन पर काम की शुरुआत की! शीघ्र ही उन्हें प्रभात टाकीज़ एक फिल्म हम एक हैं में काम करने का मौका मिला! और पूना में शूटिंग के वक़्त उनकी दोस्ती अपने ज़माने के सुपर स्टार गुरु दत्त से हो गयी! कुछ समय बाद अशोक कुमार के द्वारा उन्हें एक फिल्म में बड़ा ब्रेक मिला! उन्हें बॉम्बे टाकीज़ प्रोडक्शन की फिल्म ज़िद्दी में मुख्य भूमिका प्राप्त हुई, और इस फिल्म में उनकी सहकारा थीं कामिनी कौशल, ये फिल्म १९४८ में रिलीज़ हुई और सफल भी हुई! १९४९ में देव आनंद ने अपनी एक फिल्म कम्पनी बनाई, जिसका नाम नवकेतन रखा गया, इस तरह अब वो फिल्म निर्माता बन गए! देव आनंद साहब ने अपने मित्र गुरुदत्त का डाइरेक्टर के रूप में चयन किया और एक फिल्म का निर्माण किया, जिसका नाम था बाज़ी, ये फिल्म १९५१ में प्रदर्शित हुई और काफी सफ़ल हुई!
jai 123
19-09-2011, 06:08 PM
इसके बाद देव साहब नें कुछ भूमिकाएं निभाई जो कुछ नकरात्मक शेड लिए थीं! जब राज कपूर की आवारा पर्दर्शित हुई, तभी देव आनंद की राही और आंधियां भी प्रदर्शित हुईं! इसके बाद आई टेक्सी ड्राईवर, जो हिट साबित हुई! इस फिल्म में इनके साथ थीं कल्पना कार्तिक, जिन्होंने देव साहब के साथ विवाह किया, और १९५६ में इन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम सुनील आनंद रखा गया!
इसके बाद उनकी कुछ फिल्में आयीं जैसे, मुनीम जी, सी आई डी और पेइंग गेस्ट, उसके बाद तो हर नौजवान उनके स्टाइल का दीवाना हो गया और उनका स्टाइल अपनाने की कोशिश करता! १९५५ में उन्होंने उस ज़माने के एक और सुपर स्टार दिलीप कुमार के साथ काम किया, और फिल्म का नाम था इंसानियत. १९५८ में उनको फिल्म काला पानी के लिए बेहतरीन कलाकार के पुरस्कार से नवाज़ा गया !
jai 123
19-09-2011, 06:09 PM
इसके बाद उनके जीवन में सुरैय्या आईं, जिनके साथ उन्होंने ६ फिल्मो में काम किया! एक बार देव आनंद ने शूटिंग के दौरान सुरैया को पानी में डूबने से बचाया तब से वो उन्हें प्यार करने लगीं, लेकिन सुरैया की दादी धार्मिक कारणों से इनके रिश्ते के खिलाफ थीं! सुरैय्या आजीवन कुंवारी ही रहीं! देव आनंद ने अभी कुछ ही समय पहले स्वीकार किया, की वो उनसे प्यार करते थे, यदि उनकी शादी सुरैया के साथ हो गयी होती तो उनका जीवन शायद कुछ और ही होता!
१९६५ में उनकी पहली रंगीन फिल्म प्रदर्शित हुई, जिसका नाम था गाइड, ये एक मशहूर लेखक आर के नारायण के अपन्यास पर आधारित थी, जिसका निर्माण उनके छोटे भाई विजय आनंद ने किया था, इस फिल्म में देव आनंद के साथ थीं वहीदा रहमान! ये फिल्म देव साहब ही बेहतरीन फिल्मों में से एक है, जिसके बारे में कहा जाता है की अब दुबारा गाइड कभी नहीं बन सकती, ऐसी फिल्म सिर्फ एक बार ही बनती है!
jai 123
19-09-2011, 06:11 PM
उसके बाद उन्होंने विजय आनंद के साथ मिल कर एक और फिल्म का निर्माण किया, जिसका नाम था ज्वेल थीफ, इसमें उनके साथ थीं, वैजयंती माला, तनूजा, अंजू महिन्द्रू और हेलेन! इसके बाद उनकी अगली फिल्म थी जॉनी मेरा नाम, जो उस समय सफलतम फिल्मों में से एक थी!
१९७० में बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म आई प्रेम पुजारी, जो सफल नहीं हुई, लेकिन अगले ही वर्ष उनके द्वारा निर्देशित फिल्म हरे राम हरे कृष्णा ने सफलता का स्वाद चखा इस फिल्म में उनकी खोज ज़ीनत अमान ने "जेनिस" नाम की लड़की का किरदार निभाया, जो माता पिता के तनाव से तंग आ कर हिप्पियों के समूह में शामिल हो जाती है!
इसी वर्ष उनकी एक और फिल्म तेरे मेरे सपने पर्दर्शित हुई, जिसमें उनके साथ थीं मुमताज़, ये फिल्म ए.जे क्रोनिन के उपन्यास The Citadel पर आधारित थी, इस फिल्म को उनके भाई विजय आनंद द्वारा निर्देशित किया गया था! ज़ीनत अमान के बाद उनकी नयी खोज थी टीना मुनीम, जिनके साथ उन्होंने १९७८ में फिल्म देस परदेस का निर्माण किया, ये भी उनकी एक सफल फिल्म थी!
jai 123
19-09-2011, 06:11 PM
१९७७ में उन्होंने एक राजनितिक दल नेशनल पार्टी ऑफ़ इंडिया का निर्माण किया, जो की तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी के खिलाफ था ! लेकिन ये राजनितिक दल ज्यादा समय तक नहीं रहा!
jai 123
19-09-2011, 06:13 PM
अपने जीवन के 80 से भी ज्यादा वसंत देख चुके देव आनंद आज भी उसी जोशो खरोश के साथ फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं और अपनी ही निर्मित फिल्म हमदोनों को रंगीन करने में व्यस्त है।
jai 123
20-09-2011, 03:12 PM
देव आनंद अपने समकालीन अभिनेताओ से कही आगे है जो आज भी मुख य भूमिका मैं आ रहे है अपनी एक नयी फी ल्म के साथ जिसका नाम है चार्जशीट
jai 123
20-09-2011, 03:23 PM
http://www.youtube.com/watch?v=SG-IVQ9cT-Y
Teach Guru
22-09-2011, 12:34 AM
अति उतम मित्र बहुत बढ़िया है मनोरंजन से भरपूर, लगे रहो........
jai 123
22-09-2011, 07:35 PM
तो दोस्तों अब बारी है हमारे अगले सदाबहार हीरो की जिसने अपनी सवाद अदायगी से सुब का दिल जीत लिया
jai 123
22-09-2011, 07:37 PM
राजकुमार
संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राजकुमार का नाम फिल्मजगत की आकाशगंगा में ऐसे धुव्रतारे की तरह है उनके बेमिसाल अभिनय से सुसज्जित फिल्मों की रोशनी से बॉलीवुड हमेशा जगमगाता रहेगा।
राजकुमार का जन्म पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रांत में आठ अक्तूबर 1926 को एक मध्यम वर्गीय कश्मीरी बाह्मण परिवार में हुआ था। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजकुमार मुंबई के माहिम पुलिस स्टेशन में बतौर सब इंस्पेक्टर काम करने लगे। राजकुमार मुंबई के जिस थाने मे कार्यरत थे वहां अक्सर फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक बार पुलिस स्टेशन में फिल्म निर्माता कुछ जरूरी काम के लिए आए हुए थे और वह राजकुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने राजकुमार को यह सलाह दी कि अगर आप फिल्म अभिनेता बनने की ओर कदम रखे तो उसमे काफी सफल हो सकते है। राजकुमार को फिल्म निर्माता की बात काफी अच्छी लगी। इसके कुछ समय बाद राजकुमार ने अपनी नौकरी छोड़ दी और फिल्मों में बतौर अभिनेता बनने की ओर अपना रूख कर लिया। वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म रंगीली मे सबसे पहले बतौर अभिनेता राजकुमार को काम करने का मौका मिला। वर्ष 1952 से वर्ष 1957 तक राजकुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फिल्म रंगीली के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने अनमोल सहारा- 1952, अवसर- 1953, घमंड- 1955, नीलमणि- 1957, कृष्ण सुदामा- 1957 जैसी कई फिल्मों र्मे अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।
jai 123
22-09-2011, 07:37 PM
वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया में राजकुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि यह फिल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी फिर भी राजकुमार अपनी छोटी सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली और फिल्म की सफलता के बाद राजकुमार बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। वर्ष 1959 में प्रदर्शित फिल्म पैगाम में उनके सामने हिन्दी फिल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन राजकुमार ने यहां भी अपनी सशक्त भूमिका के जरिये दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। इसके बाद राजकुमार दिल अपना और प्रीत पराई-1960, घराना- 1961, गोदान- 1963, दिल एक मंदिर- 1964, दूज का चांद- 1964 जैसी फिल्मों मे मिली कामयाबी के जरिये राज कुमार दर्शको के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुंच गये जहां वह फिल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राजकुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1965 बी.आर .चोपड़ा की फिल्म वक्त में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से अपनी ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। फिल्म वक्त में राजकुमार का बोला गया एक संवाद चिनाय सेठ जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते या फिर चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज नहीं हाथ कट जाये तो खून निकल आता है दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। फिल्म वक्त की कामयाबी से राज कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। ऐसी स्थिति जब किसी अभिनेता के सामने आती है तो वह मनमानी करने लगता है और फ्रेम दर फे्रम छा जाने की उसकी प्रवृति बढ़ती जाती है और जल्द ही वह किसी खास इमेज में भी बंध जाता है। लेकिन राज कुमार कभी भी किसी खास इमेज में नही बंधे इसलिये अपनी इन फिल्मो की कामयाबी के बाद भी उन्होंने हमराज- 1967, नीलकमल- 1968, मेरे हूजूर- 1968, हीर रांझा- 1970 और पाकीजा- 1971 में रूमानी भूमिका भी स्वीकार की जो उनके फिल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी बावजूद इसके राजकुमार यहां भी दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।
jai 123
22-09-2011, 07:38 PM
कमाल अमरोही फिल्म पाकीजा पूरी तरह से मीना कुमारी पर केन्द्रित फिल्म थी बावजूद इसके राजकुमार ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। फिल्म पाकीजा में राजकुमार का बोला गया एक संवाद आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं इन्हें जमीन पर मत उतारियेगा मैले हो जायेगें इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोग गाहे बगाहे राजकुमार की आवाज की नकल करने लगे। वर्ष 1978 में प्रदर्शित फिल्म कर्मयोगी में राजकुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले इस फिल्म में उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए राजकुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म बुलंदी में वह चरित्र भूमिका निभाने से भी नही हिचके और इस फिल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का मन मोहे रखा। इसके बाद राजकुमार ने कुदरत- 1981, धर्मकांटा- 1982, शरारा- 1984, राजतिलक- 1984, एक नयी पहेली- 1984, मरते दम तक- 1987, सूर्या- 1989, जंगबाज- 1989, पुलिस पब्लिक- 1990 जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के जरिये दर्शको के दिल पर राज किया। वर्ष 1991 में प्रदर्शित फिल्म सौदागर में राज कुमार के अभिनय के नये आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित फिल्म सौदागर र्मे दिलीप कुमार और राज कुमार वर्ष 1959 में प्रदर्शित पैगाम के बाद दूसरी बार आमने सामने थे। फिल्म में दिलीप कुमार और राजकुमार जैसे अभिनय की दुनिया के दोनो महारथी का टकराव देखने लायक था। फिल्म सौदागर में राजकुमार का बोला एक संवाद दुनिया जानती है कि राजेश्वर सिंह जब दोस्ती निभाता है तो अफसाने बन जाते हैं मगर दुश्मनी करता है तो इतिहास लिखे जाते है आज भी सिने प्रेमियों के दिमाग में गूंजता रहता है। नब्बे के दशक में राजकुमार ने फिल्मों मे काम करना काफी कम कर दिया। इस दौरान राजकुमार की तिरंगा- 1992, पुलिस और मुजरिम इंसानियत के देवता- 1993, बेताज बादशाह- 1994, जवाब- 1995, गॉड और गन जैसी फिल्में प्रदर्शित हुई। नितांत अकेले रहने वाले राजकुमार ने शायद यह महसूस कर लिया था कि मौत उनके काफी करीब है इसीलिए अपने पुत्र पुरू राजकुमार को उन्होने अपने पास बुला लिया और कहा देखो मौत और जिंदगी इंसान का निजी मामला होता है। मेरी मौत के बारे में मेरे मित्र चेतन आनंद के अलावा और किसी को नहीं बताना। मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही फिल्म उद्योग को सूचित करना।
अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राजकुमार 3 जुलाई 1996 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।
jai 123
22-09-2011, 07:41 PM
http://www.youtube.com/watch?v=RsxmPvo5-y4
jai 123
24-09-2011, 12:57 PM
अब आप बताइए आप किस अभिनेता के बारे मे जानना चाहेगे कौन होगा हमारा अगला सितारा
sushilnkt
24-09-2011, 01:04 PM
जानी .... नाम हे सत्यवादी दुबे और काम हे चोरो के ..
ये सितारे तेरे कंदों पर अच्छे नहीं लगते हे ...
वो कसम याद कर जब तुने ये वर्दी पहने से पहले खाई थी
sushilnkt
24-09-2011, 01:08 PM
अब ये तो हम को भी पता हे
आप गुंडों का तो चित्रण करने से रहे
sushilnkt
24-09-2011, 01:10 PM
इस हीरो ने रेखा के साथ अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। लेखन में भी यह महारत रखता है।
सामान्यतः विवादों में उलझते रहने के बावजूद भी इसे दिल का साफ माना जाता है। दोस्तों की मदद को हमेशा तत्पर रहता है। इसके जीजा भी कुछ फिल्मों में हीरो रहने के बाद अब फिल्म निर्माता के रूप में काम कर रहे हैं।
क्या आप जानते हैं इस सितारे का नाम?
jai 123
24-09-2011, 02:05 PM
शुसिल जी आप की अनमोल टिपण्णी के लिए धन्यवाद
आप किस अभीनेता की बात कर रहे है वही जिसने "बीवी हो तो एसी " मैं रेखा के साथ और फारुक शेख के साथ अपने अभिनय करियर की सुरुवात की और
इसको पहली सफलता "मेने प्यार किया" से मिली
अब तो आप समझ गए होगे
jai 123
24-09-2011, 02:11 PM
ये लीजिए ............
sushilnkt
24-09-2011, 03:04 PM
अब चोपाल पर चले आप की बात सही हे
jai 123
24-09-2011, 04:46 PM
तो दोस्तों आपने अब तक दो अभिनेतायो के बारे मैं जाना की किस प्रकार उन्होंने अपने करियर की शुरुवात की और एक अलग ही मुकाम हासिल किया अब बारी है एक एसे अभिनेता की जिन्होने अपनी आवाज़ और खलनायकी के दम पर वो मुकाम हासिल किया और
फिल्मो मैं मुख्य भूमिका निभाने वाले अभीनेतायो पर भी भारी पड़े
jai 123
24-09-2011, 04:48 PM
प्राण
हिन्दी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता प्राण का जिक्र आते ही आंखों के सामने एक ऐसा भावप्रवण चेहरा आ जाता है. अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है कि उसके बिना यह किरदार अर्थहीन हो जाता. हिन्दी फिल्मों के एक लोकप्रिय खलनायक और शानदार चरित्र अभिनेता प्राण की संवाद अदायगी की विशिष्ट शैली आज भी लोग नहीं भूले हैं.
jai 123
24-09-2011, 04:50 PM
प्रख्यात फिल्म समीक्षक अनिरूद्ध शर्मा कहते हैं ‘‘प्राण की शुरूआती फिल्में देखें या बाद की फिल्में, उनकी अदाकारी में दोहराव कहीं नजर नहीं आता. उनके मुंह से निकलने वाले संवाद दर्शक को गहरे तक प्रभावित करते हैं. भूमिका चाहे मामूली लुटेरे की हो या किसी बड़े गिरोह के मुखिया की हो या फिर कोई लाचार पिता हो, प्राण ने सभी के साथ न्याय किया है.’’
jai 123
24-09-2011, 04:51 PM
फिल्म आलोचक मनस्विनी देशपांडे कहती हैं कि वर्ष 1956 में फिल्म हलाकू मुख्य भूमिका निभाने वाले प्राण ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में राका डाकू बने और अपनी आंखों से केवल क्ररता जाहिर की. लेकिन 1973 में ‘जंजीर’ फिल्म में अमिताभ बच्चन के मित्र शेरखान के रूप में उन्होंने अपनी आंखों से ही दोस्ती का भरपूर संदेश दिया.
वह कहती हैं ‘‘उनकी संवाद अदायगी की विशिष्ट शैली लोग अभी तक नहीं भूले हैं. कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जिनमें नायक पर खलनायक प्राण भारी पड़ गए. चरित्र भूमिकाओं में भी उन्होंने अमिट छाप छोड़ी है.’’
शर्मा कहते हैं कि प्राण ने कभी अभिनय का प्रशिक्षण नहीं लिया. वह उस दौर के कलाकार हैं जब अभिनय प्रशिक्षण केंद्रों का देश में नामोनिशान नहीं था. लेकिन उन्हें अभिनय की चलती फिरती पाठशाला कहा जा सकता है.
jai 123
24-09-2011, 04:51 PM
पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में 12 फरवरी 1920 को जन्मे प्राण का पूरा नाम प्राण कृष्ण सकिंद है. पिता की तबादले वाली नौकरी के चलते प्राण कई शहरों में रहे. लाहौर में गणित विषय के मेधावी छात्र रहे प्राण की अभिनय यात्रा 1940 में पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ से शुरू हुई. यह फिल्म उस साल की सुपरहिट फिल्म रही. इसके बाद प्राण ने ‘चौधरी’ और फिर ‘खजांची’ में काम किया.
जल्द ही प्राण लाहौर फिल्म उद्योग में खलनायक के तौर पर स्थापित हो गए. यह वह दौर था जब फिल्म जगत में अजित, के एन सिंह जैसे खलनायक मौजूद थे.
jai 123
24-09-2011, 04:52 PM
प्राण 1942 में बनी ‘खानदान’ में नायक बन कर आए और नायिका थीं नूरजहां. 1947 में भारत आजाद हुआ और विभाजित भी. प्राण लाहौर से मुंबई आ गए. यहां करीब एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘जिद्दी’ मिली. अभिनय का सफर फिर चलने लगा.
पत्थर के सनम, तुमसा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, कर्ज, अंधा कानून, पाप की दुनिया, मृत्युदाता करीब 350 से अधिक फिल्मों में अभिनय के अलग अलग रंग बिखेरने वाले प्राण कई सामाजिक संगठनों से जुड़े हैं और उनकी अपनी एक फुटबॉल टीम ‘‘बॉम्बे डायनेमस फुटबॉल क्लब’’ भी है.
हिंदी सिनेमा को उनके योगदान के लिए 2001 में उन्हें भारत सरकार के पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया.
jai 123
24-09-2011, 05:03 PM
http://www.youtube.com/watch?v=41BvFdWJ5aQ&feature=relmfu
rajeshgarg
25-09-2011, 12:12 AM
bahut hi achha hai maza aa gaya
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