View Full Version : रूसी काव्य जगत हिन्दी में
GForce
15-10-2011, 05:29 PM
इस सूत्र में मैं रूसी भाषा की श्रेष्ठ काव्य-कृतियों का हिन्दी भावार्थ क्रमशः प्रस्तुत कर रहा हूं ! यदि मनभावन लगे, तो सराहें और न लगे तो दुत्कारें, किन्तु प्रतिक्रिया अवश्य करें, क्योंकि इसी से अपने कार्य के गुणावगुण का अनुमान होता है तथा आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है ! धन्यवाद !
सर्वप्रथम प्रस्तुत हैं रूस के ज़िला स्मालेंस्क के गांव तिनोफ़्का में 15 जुलाई 1940 को जन्मे प्रसिद्ध कवि अनातोली परपरा की कुछ कविताएं ! रसास्वादन करें !
मां की मीठी आवाज़
घर लौट रहा था दफ़्तर से मैं बेहद थका हुआ
मन भरा हुआ था मेरा कुछ, ज्यों फल पका हुआ
देख रहा था शाम की दुनिया, ख़ूबसूरत हरी-भरी
लोगों के चेहरों पर भी सुन्दर संध्या थी उतरी
तभी लगा यह जैसे कहीं कोई बजा हो सुन्दर साज
याद आ गई मुझे अपनी मां की मीठी आवाज़
घूम रहा था मैं अपनी नन्ही बिटिया के साथ
थामे हुए हाथ में अपने उसका छोटा-सा हाथ
तभी अचानक वह हंसी ज़ोर से, ज्यों गूंजा संगीत
लगे स्मृति से मेरी भी झरे है कोई जलगीत
वही धुन थी, वही स्वर था उसका, वही था अन्दाज़
कानों में बज रही थी मेरे, मां की मीठी आवाज़
कितने वर्षों से साथ लिए हूं मन के भीतर अपने
दिन गुज़रे मां के संग जो थोड़े, वे अब लगते सपने
थका हुआ मां का चेहरा है, जारी है दूसरी लड़ाई
चिन्ता करती मां कभी मेरी, कभी पिता, कभी भाई
तब जर्मन हमले की गिरी थी, हम पर भारी गाज
याद मुझे है आज भी, यारो, मां की मीठी आवाज़
आज सुबह-सवेरे बैठा था मैं अपने घर के छज्जे
जोड़ रहा था धीरे-धीरे कविता के कुछ हिज्जे
चहक रही थीं चिड़िया चीं-चीं, मचा रही थीं शोर
उसी समय गिरजे के घंटों ने ली मद्धम हिलोर
लगी तैरने मन के भीतर, भैया, फिर से आज
वही सुधीरा और सुरीली मां की मीठी आवाज
GForce
15-10-2011, 05:32 PM
अनातोली परपरा की सात छोटी कविताएं
1
हे सुन्दरता
आख़िर
इस धरती पर
छोड़ी नहीं तूने अपनी मस्ती
बदमस्ती वह...
2
रात का पतंगा हूं
अन्धा मैं
तेरी विकट नील आभा से
3
देखो...बर्फ़ वह कपासी
उड़ रही
धरती के संग-साथ
4
पतझड़ में उदास
वह बागीचा
डूबा है आकंठ
बारिश के प्यार में...
5
दुख तो यह है दोस्त !
कि अभिमान होता है पैदा
बुद्धि से पहले...
6
सुनो !
सुन रहे हो तुम
बारिश से डरकर
भाग रहे हैं पेड़...
7
अरे ! यह क्या कह रहे हो
देखो, बुद्धि बड़ख़ूब जानती है
प्यार के बारे में
GForce
15-10-2011, 06:23 PM
रूस के जाने-माने दार्शनिक, चित्रकार और कवि निकोलाई रोरिक का जन्म 9 अक्टूबर 1874 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुआ ! वे लम्बे समय तक भारत में रहे और भारत में ही हिमाचल प्रदेश में कुल्लू के पास 'नगर' नामक कस्बे में 13 दिसंबर 1947 को उनका देहान्त हुआ ! उन्होंने भारत की प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री देविका रानी से विवाह किया था ! यहां प्रस्तुत है उनकी एक प्रख्यात कविता !
तुम्हारी मुस्कराहट
तट पर हम गले मिले और अलग हुए,
सुनहरी लहरों में छिप गई हमारी नाव !
द्वीप पर हम थे, हमारा पुराना घर था
मन्दिर की चाबी हमारे पास थी
हमारे पास थी अपनी गुफ़ा
अपनी चट्टानें, देवदार और समुद्री चिड़ियां
हमारी अपनी थी दलदल
और हमारे ऊपर तारे भी अपने।
हम छोड़ देंगे द्वीप
निकल जाएंगे अपने ठिकाने की तरफ़
हम लौटेंगे, पर सिर्फ़ रात में।
बन्धुओ कल हम जल्दी उठेंगे
सूर्योदय से पहले
जब चमकीली आभा छाई होती है पूरब में
जब नींद से सिर्फ़ पृथ्वी उठ रही होती है
लोग अभी सो रहे होंगे,
उनकी चिन्ताओं के सीमान्त से बाहर
हम मुक्त होकर जान सकेंगे अपने आप को ।
दूसरे लोगों से निश्चित ही भिन्न होंगे ।
सीमान्त के पास पहुंचने पर
चुप्पी और ख़ामोशी में हम देखेंगे-
मौन बैठा हुआ वह, उत्तर में हमें कुछ कहेगा ।
ओ सुबह, बताओ किसे ले गई थीं तुम अन्धकार में
और किसका स्वागत कर रही है
तुम्हारी मुस्कराहट ?
Amigo.
16-10-2011, 04:28 AM
वाह बंधू आपने तो आते ही कमाल कर दिया . बहुत ही उत्तम रचनाएं हैं .कृपया रेपो स्वीकार करें बंधू.
Mr Gonsalwez
16-10-2011, 02:08 PM
ववाह लगे रहिये जी फ़ोर्स जी
GForce
16-10-2011, 04:15 PM
वाह बंधू आपने तो आते ही कमाल कर दिया . बहुत ही उत्तम रचनाएं हैं .कृपया रेपो स्वीकार करें बंधू.
ववाह लगे रहिये जी फ़ोर्स जी
उत्साह-वर्द्धन के लिए आपका हृदय से आभार !
GForce
16-10-2011, 04:32 PM
पूर्व सोवियत गणराज्य के उक्राइना में 11 जून 1889 को जन्मी अन्ना अख्मातोवा रूस की प्रख्यात कवयित्री हैं ! उनका निधन मॉस्को में 5 मार्च 1966 को हुआ ! नारी समुदाय की वैश्विक पीड़ा उनके काव्य का मूल स्रोत है और उनकी अधिकांश रचनाओं में इसे घनीभूत होते सहज ही देखा जा सकता है ! यहां प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएं !
मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूं, सखी !
धधकते दावानल के बीच
- मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूं, सखी !
तुम्हारी आंखों की ज्योति मन्द पड़ गई है
आंसू भाप बन कर उड़ गए हैं बादल सरीखे
और बालों से झलकने लगा है उम्र का भूरापन !
तुम समझ नहीं पा रही हो चिड़िया का गाना
न तो सितारों की सरगोशियां
और न ही दामिनी की द्युति का दर्प !
जब कोई स्त्री बजा रही हो खंजड़ी
तो मत सुनो और कुछ
और मत डरो कि टूटेगा सन्नाटे का साम्राज्य !
धधकते दावानल के बीच
- मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूं, सखी !
- मुझे दफ़्न करने वालो
बताओ कहां हैं तुम्हारी कुदालें और बेलचे ?
अरे ! तुम्हारे पास तो है फक़त एक बांसुरी
कोई गिला नहीं
कोई इल्जाम आयद नहीं
बहुत दिन हो गए मेरी वाणी को मूक हुए !
आओ, मेरे वस्त्र धारण करो
मेरे डर का खामोशी से दो जवाब
बहने दो बयार जो तुम्हारे बालों को सहलाती हो
बकायन की गंध का मजा लो
तुमने बहुत लम्बे पथरीले रास्ते तय किए
यहां तक पहुंचने की खातिर
और इस आग से उजाले का उत्खनन करने में !
दूसरे के लिए जगह त्यागकर
कोई है जो चला गया है आत्मनिर्वासित
भटकता-अटकता
अब तो जैसे कोई अंधी स्त्री निरख-परख रही हो
अनचीन्हे- संकरे रास्ते के मार्गदर्शक चिन्ह !
और अब भी
उसके हाथों में थमी है खंजड़ी
जो लपटों की तरह लहराने को है बेताब
कभी वह हुआ करती थी श्वेत परचम की मानिन्द
और वह अब भी है प्रकाश स्तम्भ से प्रवाहित
उजाले की ऊर्जस्वित कतार !
धधकते दावानल के बीच
- मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूं, सखी !
जब कोई स्त्री बजा रही हो खंजड़ी
तो मत सुनो और कुछ
और मत डरो कि टूटेगा सन्नाटे का साम्राज्य !
GForce
16-10-2011, 05:01 PM
अन्ना अख्मातोवा की एक और कविता !
शाम
शॉल के पीछे अपने हाथों को मज़बूती से जकड़ लेती हूं मैं
इतनी ज़र्द क्यों दिख रही हूं आज की शाम
... शायद मैंने ज़्यादा ही पिला दी थी उसे
दुःख और हताशा की कड़वी शराब
कैसे भूल सकती हूं ! -- वह बाहर चला गया था,
दर्द की रेखा में खिंचे हुए थे उसके होंठ
पगलाई सी मैं दौड़ती चली गई थी
सीढ़ियां उतर कर उसके पीछे, सड़क तक
मैं चिल्लाई : "मैं तो मज़ाक कर रही थी, सच्ची !
मुझे ऐसे छोड़कर मत जाओ, मैं मर जाऊंगी" - और
एक भयानक, ठंडी मुस्कान अपने चेहरे पर लाकर
उसने हिदायत दी मुझे : "बाहर हवा में मत खड़ी रहो !"
badboy123455
16-10-2011, 05:02 PM
वाह रुसी कविता वो भी हिंदी में
भाई इस मेहनत के लिए धन्यवाद आपको
GForce
16-10-2011, 05:13 PM
वाह रुसी कविता वो भी हिंदी में
भाई इस मेहनत के लिए धन्यवाद आपको
आपकी सराहना बहुत महत्वपूर्ण है मेरे लिए ! आपका अत्यंत आभार, बन्धु !
Paul Saab
17-10-2011, 01:44 AM
वाह जी फ़ोर्स जी :salut::salut:
GForce
17-10-2011, 05:13 PM
वाह जी फ़ोर्स जी :salut::salut:
आपका अत्यंत आभार बन्धु !
GForce
17-10-2011, 05:25 PM
28 नवम्बर 1880 को सेंट पीटर्सबर्ग में जन्मे अलेक्सान्दर ब्लॉक रूस के प्रतिष्ठित कवि हैं ! उनकी कविताएं अपनी मानवीय दृष्टि और भाव-प्रवणता के कारण न केवल संसारभर की अधिकांश भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं, अपितु सराही भी गई हैं ! अनेक सम्मानों से विभूषित किए गए इस कवि का 10 अगस्त 1921 को निधन हो गया ! आइए, रसास्वादन करें रूसी के इस महत्वपूर्ण कवि की कुछ सर्वकालिक कविताओं का !
रात सड़क लैम्प...
रात
सड़क
लैम्प
कैमिस्ट की दुकान
धुंधली और अर्थहीन रोशनी
और अगर जिओ तुम
एक चौथाई शताब्दी
तब भी सभी कुछ
होगा ऎसा ही
इससे निकलने का
रास्ता नहीं
मर जाओगे
नए सिरे से फिर से शुरू करोगे
और पुराने जैसा
सब कुछ दोहराओगे
रात
सड़क
लैम्प
कैमिस्ट की दुकान !
GForce
17-10-2011, 05:31 PM
सीथियाई/अलेक्सान्दर ब्लॉक
माना तुम हो लाखों
लेकिन हम प्रचंड धारा अटूट हैं
वेग हमारा रोक नहीं पाओगे
हम हैं सीथिआई !
सोचो रक्त एशिया अपना
सामूहिक भूखें वक्र बनाती हैं
अपनी भ्रकुटि को
धीमे-धीमे शब्द तुम्हारे
अपने लिए मात्र घंटे से
चाटुकर गर्हित दासों सा है यूरोप तुम्हारा
मंगोल दलों से जिसे बचाता
पर्वताकार विस्तृत अपार पौरुष अपना
सदियों रोक षड्यंत्रों को
तुमने हिम दरकन सा
सुनी पुकारें अनहोनी अनजान कथा सी
लिस्बन और मसीना की
सदियों स्वन तुम्हारे सीमित थे पूरब तक
लूटा माल, चुराए मोती, छिपा लिया सब
धोका देकर घेरा हमको बन्दूकों से
आ पहुंचा है समय
कयामत ने अपने डैने फैलाए
बहुत कर चुके तुम अपमानित
अब अपनी भ्रकुटि तनती है
घंटा बजा कि हमने तोड़ा
अहं तुम्हारे का दुखदायी घेरा
ढेर लगाया दुर्बल पैस्तमों का
अत: वद्ध जग ठहरो
वरना जो अन्तिम आशा है
उसका अन्त निकट है
लो प्रज्ञा से काम
तुम्हारे चमत्कार अब श्रान्त-क्लान्त हैं
वद्ध ईडिपस
स्फिंक्स खड़ा है अब भी
इसके सम्मुख आओ
पढ़ो दृगों में गूढ़ पहेली !
prince of meerut
17-10-2011, 06:48 PM
GForce जी आपकी कविताओं ने मेरा मन मोह लिया
रेपो स्वीकार करे मेरी तरफ से
T J Cooper
17-10-2011, 06:52 PM
G force जी वाह वाह लगे रहिये
GForce
17-10-2011, 07:49 PM
GForce जी आपकी कविताओं ने मेरा मन मोह लिया
रेपो स्वीकार करे मेरी तरफ से
G force जी वाह वाह लगे रहिये
ये मेरी कविताएं नहीं हैं, बन्धु ! इन सभी के रचनाकार रूसी साहित्यकार हैं, मैंने तो इन्हें केवल आपके आनंद के लिए प्रस्तुत भर किया है ! आपको इन कविताओं ने आनंदित किया, मेरा परिश्रम सार्थक हो गया ! आप सभी का हृदय से आभार !
GForce
18-10-2011, 05:31 PM
पेत्रोग्राद में 28 नवम्बर 1915 को जन्मे कोंस्तान्तिन सीमानोव गद्य और पद्य दोनों विधाओं में समान महारत रखते थे ! सुदीर्घ काल तक सैन्य सेवा करने के कारण उनका अधिकतर रचना-कर्म इसी से सम्बंधित है ! उनका मानवीय दृष्टिकोण उन्हें रूसी साहित्य के वरिष्ठ रचनाकारों की पंक्ति में अग्रिम स्थान प्रदान करता है ! यही कारण है कि उनकी रचनाओं पर आठ फिल्मों का निर्माण हुआ ! इनमें 'कोई फौजी बन कर पैदा नहीं होता' सर्वाधिक सराही गई कृति है ! उनका निधन 28 अगस्त1979 को हुआ ! यहां प्रस्तुत है उनकी एक कविता !
इंतज़ार करो मैं लौटूंगा
इंतज़ार करो मैं लौटूंगा
इंतज़ार करो तुम मेरा
इंतज़ार करो पीली बारिश में
जब दुख का हो डेरा
इंतज़ार करो जब गर्मी हो तेज़
जब बर्फ़ गिरे भारी
इक-दूजे को जब भूलें सब
ग़म ही ग़म हो तारी
जब ख़त आने भी बंद हो जाएं
और थकें सब लोग
इंतज़ार करो तब तुम मेरा
महसूस करो वियोग
इंतज़ार करो मैं लौटूंगा
जब सब भूलेंगे मुझको
उस घड़ी मैं लौटूंगा मेरी जां
जब कहेंगे-भूलो उसको
जब बच्चे ये विश्वास करेंगे
और मां कहेगी-वो नहीं रहा
जब दोस्त कहेंगे-थक चुके हम तो
अब वो आएगा कहां
फिर खिड़की के बैठ किनारे
सब मुझको याद करेंगे
और याद कर-करके मुझको
सब अपना जाम भरेंगे
तुम तब भी मत घबराना
न पीना जाम तुम मेरा
इंतज़ार करो मैं लौटूंगा
इंतज़ार करो तुम मेरा
जब लौटूंगा दे मौत को धोखा
सब दंग रह जाएंगे
कैसे मैं ज़िंदा लौट आया आख़िर
बस ये समझ न पाएंगे
तेरे कारण ही लौटा मैं
तूने मुझे बचाया है
बस तू और मैं यह जानेंगे
तूने मुझे जिलाया है
बस तेरे कारण ही ज़िंदा मैं
बस तूने दिया मौत को फेरा
बस तूने सोचा था लौटेगा
बस इंतज़ार किया तूने ही मेरा !
Ranveer
18-10-2011, 05:40 PM
रात सड़क लैम्प...
रात
सड़क
लैम्प
कैमिस्ट की दुकान
धुंधली और अर्थहीन रोशनी
और अगर जिओ तुम
एक चौथाई शताब्दी
तब भी सभी कुछ
होगा ऎसा ही
इससे निकलने का
रास्ता नहीं
मर जाओगे
नए सिरे से फिर से शुरू करोगे
और पुराने जैसा
सब कुछ दोहराओगे
रात
सड़क
लैम्प
कैमिस्ट की दुकान !
बेहतरीन ...लाजवाब ...बेमिसाल !!!
बहुत सुंदर और गहरी कविता प्रस्तुत की है आपने ।
GForce
19-10-2011, 03:29 PM
बेहतरीन ...लाजवाब ...बेमिसाल !!!
बहुत सुंदर और गहरी कविता प्रस्तुत की है आपने ।
इस प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार, बन्धु ! यह कविता मुझे भी बहुत प्रिय है और इसलिए आश्चर्यचकित भी करती है कि इसमें भारतीय, विशेषकर हिन्दू संस्कृति की पुनर्जन्म अवधारणा के संकेत मिलते हैं ! एक क्रिश्चियन कवि का यह वैचारिक अवदान चौंकाता तो है ही, उसके अध्ययन का विस्तृत रूप भी उद्घाटित करता है ! धन्यवाद !
sushilnkt
19-10-2011, 03:39 PM
बहुत ही उत्तम रचनाएं हैं .
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