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View Full Version : व्यंग्य वाण, स्माइल प्लीज ..................................



Alexander the great
22-10-2011, 02:02 PM
दोस्तों पेश है आपकी सेवा में कुछ व्यंग्य

Alexander the great
22-10-2011, 02:04 PM
परलोक में भी रिश्वत के बगैर काम नहीं होता भाई


वे गुजरे तो मन ही मन अच्छा लगा कि चलो एक दिमाग खाने वाला गया। असल में आदमी तभी तक अच्छा लगता है जब तक वह खिलाता रहे। कोई खाने लगे तो बंदा दूसरे दिन ही उसके जाने की कामना करने लगता है। और भगवान ने मेरी सुन ली। पर उनके जाने के बाद पता चला कि वे गए तो गए ,साथ में फ्री वाला सिम भी लेते गए।

कल यमलोक से उनका फोन आ गया- और भाई, क्या हाल हैं? दीवाली की तैयारियां कैसी चल रही हैं? त्योहार की स्कीमें तो बाजार में आ ही गई होंगी! सच कहूं, माइक्रोवेव ओवन खरीदने की तमन्ना दिल में ही रह गई। वे स्कीम में आए कि नहीं। त्योहार के चलते कैसे सजे हैं बाजार? उनकी आवाज पहचानने के लिए मुझे अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ी। उन्होंने पूछा तो कई आशंकाएं सताने लगीं। कहीं यह न पूछें कि उनकी पेंशन का क्या हुआ! ग्रेच्युटी उनकी घरवाली को मिली कि नहीं ! मैंने उनका मन रखने के लिए उनके घर की सारी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली थी, और मजे की बात, बंदा अपने घर की जिम्मेवारी मुझ पर डाल मजे से रुखस्त हो लिया। पर उन्होंने अपने घर की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं पूछा तो मैं डर से उबरा। मैंने खुद को संभालते कहा- ठीक हूं। और आप? क्या चल रहा है ऊपर! हिसाब-किताब हो गया क्या! संवाद जारी रखने की विवशता जो थी। वे बोले- यार, एक मुश्किल है। मैं चौंका- हद है, मुश्किलें मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़तीं तो लोग समय से पहले मुश्किलों से निजात पाने के लिए आत्महत्या क्यों करते हैं? मैं तो सोच रहा था कि जनाब वहां ऊपर अप्सराओं के डांस का मजा ले रहे हो होंगे। पर वे तो...। मैंने पूछा- अब क्या हो गया? वे बोले- यार, कई दिन हो गए लाइन में लगे हुए। इन टांगों की किस्मत में तो जैसे खड़े रहना ही लिखा है। नीचे था तो गैस, बिल, अस्पताल, राशन के डीपू की लाइन में खड़ा रहता था। सोचा था मरने के बाद तो कम से कम लाइनों में खड़े होने से मुक्ति मिलेगी, पर आम आदमी को मरने के बाद भी मुक्ति कहां मेरे दोस्त! उनकी यह बात सुनकर मन को बड़ा धक्का लगा। उन्होंने फिर पूछा- मेरा बैंक अकाउंट अभी बंद तो नहीं किया न? मैंने गुस्साते हुए कहा- उसमें था ही क्या जो उसे बंद करवाने के लिए अर्जी लिखनी पड़ती। वे बोले- यार आप लोगों का अहसान जीते जी तो भुला नहीं पाया, मरने के बाद भी नहीं भुला पाऊंगा। मेरे अकाउंट में कुछ पैसे डाल दो। यहां भी पिछले दरवाजे से ही सब हिसाब हो रहे हैं। सोचा था, मरने के बाद तो चैन मिलेगा पर लगता है मरने के बाद मुश्किलें और बढ़ गई हैं। जो महायात्रा पर खाली हाथ निकले हैं, वे कह रहे हैं कि महीनों से लाइन में ज्यों के त्यों हैं। क्या है न कि चित्रगुप्त के इलाज हेतु अमेरिका जाने पर यमराज के पास अपने शहर से कोई अत्री नाम का हेड क्लर्क डेपुटेशन पर आया है। उसने तो तबाही मचा कर रख दी है। सारे काम पांच बजे के बाद ही कर रहा है। तुम्हारे ही विभाग का बता रहे हैं। उससे जान पहचान हो तो प्लीज... उन्होंने मरने के बाद भी जिस पीड़ा से कहा तो सच कहूं मेरा कलेजा ही नहीं और भी बहुत कुछ मुंह से बाहर आ गया। कुछ देर तक सोचने के बाद मैंने पूरी आत्मीयता से कहा-अच्छा वही, यहां खून पी कर उसका मन नहीं भरा जो अब ...पर वह तो बिना पैसे लिए अपने बाप का काम तक नहीं करता! कब तक है वह वहां पर?

वे और भी उदास होते बोले - राम जाने ! लग रहा है चित्रगुप्त का इलाज लंबा खिंच जाएगा। हो सके तो प्लीज उससे बात कर लो। उसका नंबर देता हूं। अब तो टांगें लाइन में खड़े - खड़े जवाब देने लगी हैं। मैंने दुखी मन से कहा - कोई फायदा नहीं , कहो , आपके बैंक अकाउंट में कितने डालूं ?' वे मृतात्मा बोले - दो चार हजार तो डाल ही दो ! आगे भी पता नहीं कहां - कहां देने पड़ें। मेरा जब पुनर्जन्म होगा तो वादा करता हूं सबसे पहले तुम्हारा ही कर्ज लौटाऊंग ा।

Alexander the great
22-10-2011, 02:06 PM
बेचारा बेईमान लोग बहुत परेशान है


बेचारा बेईमान लोग भोत परेशान है। ससुरा ईमानदार लोग ने वो लोग को भोत परेशान किया है। कोई धरना देने लगा। कोई प्रदर्शन करने लगा। कोई अनशन पर बैठ गया। परेशान बेईमान लोग ने एक मीटिंग बुलाया। मीटिंग एक दारू का अड्डा पर हुआ। दारू का अड्डा पर कायकू? ये बी कोई पूछने जैसा सवाल है? बेईमान लोग का मीटिंग दारू का अड्डे पर नहीं तो क्या राजघाट पर होता? वैसे, राजघाट पर होता तो बी गांधी जी क्या कर लेता?

मीटिंग का मेन मुद्दा था- ईमानदार लोग से कैसे निपटने का! एक जूनियर बेईमान बोला, 'ये ईमानदार लोग का दिमाग खराब है क्या?' दूसरा बोला, 'ईमानदार वोईच होता है, जिसका दिमाग खराब होता है।' तीसरा बोला, 'अगर ईमानदार लोग का दिमाग खराब है, तो दिमाग का इलाज कायकू नहीं करवाता। हमारा दिमाग कायकू खराब करता है?' चौथा बेईमान बोला, 'ईमानदार लोग प्रजातंत्र का राग भोत अलापता है। माना, प्रजातंत्र में सबको अपना राय रखने का हक है, लेकिन लोग अपना राय दूसरा का ऊपर कायकू थोपता है? तुमको ईमानदारी अच्छा लगता है तो तुम्हारा मरजी। हमको कायकू बोलता है - बेईमानी से काम मत करो। हम कबी तुमको बोला - ईमानदारी से काम मत करो?'

Alexander the great
22-10-2011, 02:06 PM
एक बुजुर्ग बेईमान चुपचाप बैठ कर नौजवान लोग का बौखलाहट का मजा ले रहा था। अब तक उसने अपना मुंह नहीं खोला था। मुंह नहीं खोलने का कारण ये था कि अबी तक उसने सिर्फ दो पैग पिया था। दो पैग से बस उसका गला तर होता है। दिमाग तर करने में चार पैग और लगता है। जब दिमाग तर हो गया तो बुजुर्ग बेईमान बोला, 'तुम लोग बेकार बौखला रहा है। दुनिया में बेईमानी उतना ईच पुराना है जितना इन्सान का इतिहास। तुम लोग ने महाभारत तो पढ़ा ईच होएंगा। विद्वान उसको इतिहास बी बोलता है। महाभारत होने का मेन कारण क्या था - बेईमानी ! यानी, बेईमानी नहीं होता तो इतना महान सांस्कृतिक ग्रंथ नहीं लिखा जाता। इसलिए, हम लोग को बेईमानी का विषय से निराश नहीं होना चाहिए।'

एक विद्रोही किस्म का नौजवान तैश में बोला, 'बाबा आदम का जमाने का कहानी सुना कर बहलाओ मत। नया जमाने का बात करो।' बुजुर्ग बेईमान नौजवान बेईमान का बुद्धि पर तरस खा कर मुस्कुराया, 'बालक, नया जमाना पुराना से अलग नहीं होता। केवल समय बदलता है, इन्सान का चरित्र नहीं बदलता। आओ, तुमको आजादी का हकीकत बताता है। जबी देश नया-नया आजाद हुएला था तो इधर समाजवादी अर्थव्यवस्था लागू किया गया। चूंकि अर्थव्यवस्था समाजवादी था, इसलिए वो टाइम पर समाज का साथ बेईमानी किया जाता था। राशन में सड़ा अनाज देकर, अच्छा अनाज ब्लैक में बेच दिया जाता था। अब खुल्ला बाजार का अर्थव्यवस्था है तो खुलेआम बाजारू बेईमानी होता है। जो चीज दो रुपया में खरीदा जा सकता है, उसको दस रुपया में किराया पर लिया जाता है। कालाधन अब काला नहीं रहा। रंगीन मिजाज लोग ने उसको टेक्निकलर बना दिया है। अगर कहीं सतरंगी रुपया दिखे तो समझ जाना कि आसपास कोई स्पेक्ट्रम धुरंधर घूम रहेला है। दुनिया का बेईमान बेफिकिर रहे, हर नया युग अपना साथ नया बेईमानी ले कर आता है।'

जूनियर बेईमान लोग को बेईमानी का विषय के प्रति बेफिकिर करने का बाद, जब सीनियर बेईमान घर पहुंचा तो देखा उसका पत्नी बड़ा जोर से बौखला रहा है, 'आज हमारा घर में रेड हो गया।' 'तो बौखला कायकू रहा है? मेरे को तो दो महीना पहले से पता था कि रेड होने वाला है। इसी कारण तो अपना मीटिंग आज रखा था।' पत्नी को अब बी ये बात हजम नहीं हो रहा था कि इतना बड़ा आदमी का घर में रेड हुआ। लेकिन, अपना पति को बिलकुल शांत देख कर, उसने पत्नीसुलभ भोलापन से पूछा, 'एक बात बताओ, जी। ये ससुरा ईमानदार लोग, ईमानदार कायकू होता है? ईमानदारी से वो लोग को ऐसा क्या फायदा होता है?' बेईमानी का पूरा इतिहास समझने और समझाने वाला सीनियर बेईमान को बी आज तक समझ में नहीं आया है कि ये ससुरा ईमानदार, ईमानदार कायकू होता है!

Alexander the great
22-10-2011, 02:09 PM
केवल हमलोगों में है महंगाई और मंदी से लड़ने का हौसला


अपने यहां न कहीं महंगाई है न मंदी। सब मीडिया द्वारा फैलाया गया भ्रम है। जगजाहिर है, मीडिया के हत्थे जो मुद्दा चढ़ जाए उसकी आफत निश्चित समझिए। लगभग यही हाल प्रगतिशील ज्ञानियों का रहता है। महंगाई और मंदी से उन्हें खासा लगाव है। सच बता रहा हूं, आम आदमी से कहीं अधिक महंगाई से प्रगतिशील ज्ञानी परेशान हैं। मीडिया का कैमरा भी हर वक्त हर कहीं बस महंगाई के साइड इफेक्ट्स ही ढूंढता रहता है। मैं इस बात से परेशान हूं कि क्यों मीडिया और प्रगतिशील ज्ञानी कभी पॉजिटिव नहीं सोचते। मुद्दों के प्रति इत्ता भी इस्टिरियोटाइप नहीं होना चाहिए प्यारे।

यह आम आदमी की अक्लमंदी है कि उसने महंगाई को आदत में शुमार कर लिया है। भला वो भी कब तलक और किस-किस के पास जाकर अपना दुखड़ा रोएगा। यहां जान को वैसे ही क्या कम दिक्कतंे हैं। और फिर महंगाई अब कोई ऐसा खास या गंभीर मुद्दा भी तो नहीं रहा कि उस पर किसी प्रकार की चिंता जाहिर की जाए। अरे प्यारे, हमें तो अपनी सरकार की प्रगतिशील आर्थिक नीतियों का एहसानमंद होना चाहिए कि उसने हमें महंगाई के बीच रहना-हंसना-निभाना सिखाया। खर्चीले स्वभाव से निजात दिलवाई। ऐसी उपयोगी समझदारियां सरकारों के पास अमूमन कम ही होती हैं।

प्यारे, जरा यह भी तो समझने की कोशिश कीजिए कि हम 21 वीं सदी के दूसरे दशक में हैं। इंटरनेट, मोबाइल, आईफोन, फेसबुक, टेबलेट, ट्विटर के युग में हम जी रहे हैं। तमाम तरह की तकनीकी सहूलियतों से लैस हैं। अपने पास हिसाब-किताब करने के लिए कैलक्यूलेटर है और कु छ भी खोजने के लिए गूगल। अनंत इच्छाओं के साथ-साथ बेतरतीब आय भी बढ़ी रही है। आज के समय में 26 और 32 रुपए कमाने वाला भी पांच सौ या हजार के नोट को चुटकियों में स्वाहा करने की क्षमता रखता है। प्यारे, अब तो क्या निम्न और क्या मध्य, हर किसी के पास कोई न कोई गाड़ी जरूर मिल जाएगी। पिछली सदी के समय में इत्ती समृद्धि कहां थी भला, बताइयो।

Alexander the great
22-10-2011, 02:10 PM
अब तुम ही कहो प्यारे अपने यहां कहां महंगाई है और कौन गरीब है! सबके सब किसी न किसी रंग-ढंग के बहाने अमीर ही हैं। और हां यह अक्लमंदी किसी किताबी ज्ञान के कारण नहीं बल्कि बाजार के प्रभाव के कारण है। बाजार ने हम सब को बता-समझा दिया है। लुत्फ देखिए, बाजार ने हमें महंगाई के झंझट और मंदी की महामारी से मुक्त कर ज्यादा उन्मुक्त बना दिया है। आर्थिक खुशहाली के मामले में अब हम अमेरिका से ज्यादा बड़े हो गए हैं। अमेरिका अब हमारे सामने पानी भरता नजर आता है। खुद ही देख लो प्यारे, मंदी के असर में अमेरिका सिर्री हुआ रखा है और हम यहां मजे कर रहे हैं। यह केवल इसलिए है क्योंकि हमें कम में भी एडजस्ट करने की आदत है।

मैं झूठ बकूं तो मुझे काला काग काटे। इस महंगाई के दौर में भी कारें और बाइकें दबाकर बिक रही हैं। सरकार पेट्रोल के दाम बढ़ा - बढ़ाकर परेशान है और आम आदमी है कि उस पर कोई फर्क ही नहीं पड़ता। आज भी रोड पर गाडि़यां उत्ती की उत्ती ही नजर आती हैं। और जब से युवा वर्ग के हाथों में रफ्तार का सामान आया है फिर तो कहना ही क्या। यह वर्ग तो डर के आगे जीत है को अपना लक्ष्य मानकर चलता है।

बात सही भी है कि हम महंगाई और मंदी से क्यों और किसलिए डरें ! हमारा इंडिया बदल चुका है। हम भारत की गरीबी और तंगहाली को बहुत पीछे छोड़ आए हैं। लेकिन यह इत्ती - सी बात न मीडिया के पल्ले पड़ती है न ही प्रगतिशील ज्ञानियों के। इन्हें आम आदमी की आर्थिक सुख - समृद्धि पता नहीं दिखाई क्यों नहीं देती। यहां निम्न और मध्य वर्ग दबाकर सोना - चांदी खरीदने में लगा है और मीडिया व प्रगतिशील ज्ञानी महंगाई और मंदी का मर्सिया पढ़ने - पढ़ाने में लगे हुए हैं। पता नहीं कब हकीकत समझ आएगी इन्हें।

खैर , कोई हो न हो पर मैं अपने देश के आम आदमी की आर्थिक खुशहाली को देख - जानकर बेहद प्रसन्न हूं। अमेरिका और यूरोप अपनी - अपनी आर्थिक मंदियों से बाहर आ सकते हैं , बशर्ते वे हम जैसा होने की कोशिश करें। और साथ ही अपनी - अपनी आर्थिक ऐंठों का त्याग करें। फिर कामयाबी निश्चित समझिए प्या रे।

Alexander the great
22-10-2011, 02:13 PM
तू है मेरा, नहीं-नहीं मैं नहीं तेरा


यह तू-तू, मैं-मैं नहीं है, हालांकि है उसी तर्ज पर कि संघ-बीजेपी वाले कह रहे हैं कि टीम अन्ना तो समझो हमारी ही है। कांग्रेसी भी कह रहे हैं कि हां-हां, टीम अन्ना तो समझो इन्हीं की है। यह बात वे पहले भी कहते रहे हैं। और अन्ना और उनके साथी इंकार करते रहे हैं कि नहीं-नहीं, हम उनके नहीं हैं। पर जब से वे कांग्रेस को हराने की बात करने लगे हैं, तब से कांग्रेसी यह बात और जोर-शोर से कहने लगे हैं कि हम तो पहले ही कहते थे कि ये उनके हैं। हालांकि संघ-बीजेपी वाले पहले नहीं कहते थे कि वे हमारे हैं, पर अब कहने लगे हैं कि हमारे ही हैं।

लेकिन अन्ना और उनकी टीम वाले कह रहे हैं कि हम किसी के नहीं। हालांकि इश्क-मोहब्बत के मामले में यही कहा जाता है कि किसी का हो जाना ही अच्छा होता है। पर राजनीति में किसी के न होने के बड़े फायदे होते हैं। यूं तो माना भी यही जाता है कि राजनीति वाले किसी के नहीं होते। सिद्घांत भी है कि राजनीति में न कोई स्थायी शत्रु होता है और न ही कोई स्थायी मित्र। जनता की भी हमेशा यही शिकायत होती है कि हम उन्हें नेता बनाते हैं, चुनाव जिताते हैं, पर वे हमारे नहीं होते। लेकिन राजनीति में किसी का न होने के इतने फायदे हैं कि कोई भी लोभ संवरण नहीं कर पाता। क्योंकि वहां निर्दलीय तो पूरी कीमत वसूल लेते हैं और दलों वाले टुकुर-टुकुर देखते रह जाते हैं। हालांकि अन्ना और उनकी टीम को यही शिकायत है कि राजनीति वाले किसी के नहीं होते। पर अब वे खुद भी कह रहे हैं कि हम किसी के नहीं। वे न तो दल हैं और न निर्दल। लगता है कि किसी के न होने के फायदे वे भी समझ गए हैं।

जो भी हो, पर विजयदशमी के अपने परंपरागत संबोधन में भागवतजी ने स्वीकार किया कि अन्ना के आंदोलन में उनके स्वयंसेवकों ने जमकर भाग लिया था और संघ ने ही उन्हें वहां भेजा था। यह संयोग ही रहा होगा कि तभी उधर रालेगन सिद्घि में अन्ना ने घोषणा कर दी कि अगर संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस ने जन लोकपाल बिल पास नहीं करवाया तो वे कांग्रेस को वोट न देने की अपील करेंगे।

Alexander the great
22-10-2011, 02:14 PM
पर हिसार चुनाव के मामले में उन्होंने शीतकालीन सत्र की प्रतीक्षा नहीं की और कांग्रेस को हराने की अपील कर दी। बताते हैं कि कांग्रेस तो वहां पहले ही हार रही थी और यह बात अरविंद केजरीवाल अच्छी तरह जानते थे क्योंकि वे तो वहीं के रहने वाले हैं। सो उन्होंने मौके का फायदा उठाया और अन्ना से अपील करवा दी ताकि पहले से हारी हुई कांग्रेस को हराने की अपील कर और फिर उसे हारा हुआ दिखाकर यह बताया और दिखाया जा सके कि देखो अन्ना की अपील में कितना दम है। वरना शीतकालीन सत्र का इंतजार तो वहां भी किया ही जा सकता था। पर फिर ऐसा मौका कहां मिलता।

खैर जी, इसके बाद तो कांग्रेस ने कहना शुरू कर दिया कि देखो हम न कहते थे कि ये तो संघ के ही लोग हैं, उसी का मुखौटा हैं, उसी के कहने पर और उसी की मदद से अपना आंदोलन चला रहे हैं। अब तो भागवतजी ने खुद ही स्वीकार कर लिया। टीम अन्ना ने फिर दोहराया कि हम किसी के नहीं हैं। हमारा किसी से कोई संबंध नहीं है और भागवतजी को हमारे किए का श्रेय नहीं लेना चाहिए। पर भागवतजी ने जो किया उसी का श्रेय लेते हुए फिर दोहरा दिया कि वे तो मेरी ही बात की पुष्टि कर रहे हैं और फिर अपनी बात की पुष्टि करते हुए उन्होंने कहा कि मैंने जो कहा वह ठीक कहा। उसमें गलत कुछ भी नहीं है।

उधर टीम अन्ना ने कहा कि कांग्रेस को हराने की उनकी अपील से किसी और को फायदा हो रहा है तो उसके लिए हम जिम्मेदार थोड़े ही हैं। पर लोग तो उन्हें बहुत जिम्मेदार मान रहे थे। पर वे हैं कि न किसी के होते हैं और न ही अपने को जिम्मेदार ही मानते हैं।

Mr Gonsalwez
22-10-2011, 02:17 PM
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Mr Gonsalwez
22-10-2011, 02:18 PM
माडर्न विभीषण की शंका का समाधान


चुनाव संग्राम में रावण को वाहनारूढ़ और रघुवीर को बिना रथ देखकर विभीषण के, जिसने हाल ही में रावण की पार्टी से निष्कासित होने के बाद श्रीराम के दल की मेम्बरशिप ग्रहण की थी, मन के भीतर भारी शंका हो आई।

तब उसने अत्यधिक मक्खनबाजी के इरादे से रघुवर के खुले पड़े श्री चरणों में साष्टांग दंडवत करते हुए इस भांति सुमधुर वचन उचारे -तात, आप तो जानते ही हैं कि रावण छल-बलयुक्त और सर्व साधन संपन्न है। यह आज का रावण है। इसके पास नाना मॉडल के रथ हैं। बलेरो हैं। पजेरा हैं। स्कॉर्पियो हैं। सफारी हैं। टोयोटा हैं। और ऐसे ही अनेकानेक वाहन, जो एसी और अतिरिक्त साज-सज्जा से युक्त हैं, वे सब उसके पास हैं। और इधर आपके पास एक खटारा स्कूटर तक नहीं।

रावण वाहन पर सवार होकर चुनाव प्रचार में निकलता है। आप पैदल यात्रा करते हैं। नाथ, आप ऐसे बाहुबली से यह चुनाव समर किस प्रकार जीत पाएंगे? आपके इस संघर्ष को लेकर मेरे मन में अपार संशय व्याप्त है। मैं कंठ से जिह्वा तक अधीर हो रहा हूं। कहीं मेरा सहोदर आपको सचमुच में पराजित ही न कर दे! तब आपकी आज तक अपराजित रहने की छवि को बट्टा लग सकता है।

विभीषण ने पुन: कहा, मेरे मन में यह संदेह इसलिए और भी गहरा हो रहा है, क्योंकि यदि आप पराजित हो गए, तो आगे मेरा क्या होगा? मेरे राजनीतिक करियर को ग्रहण लग जाएगा और लंका का वह सिंहासन, जिसे आपने चुनावोपरांत मुझे सौंपने का वादा किया हुआ है, उस पर रावण का आधिपत्य यथावत बना रह जाएगा।

वह आगे बोलता भया, स्वामी, आपके पास तो प्राण रक्षा का कोई उपाय ही नहीं। और तो और, एक पेयर पद-त्राण तक आपके पास नहीं हैं। अर्थात न तो तन पर बुलेट प्रूफ जैकेट है, न पद-रक्षा के निमित्त वैसी पादुकाएं ही हैं, जैसे सोने और चांदी के जूते रावण के पास हैं। इन जूतों के बल पर ही तो वह राजा बना हुआ है। आप किस भांति उस महाबली और महारथी को परास्त कर पाएंगे?

तब कृपानिधान बोले , मेरे नवप्रिय सखा , माना कि मेरे पास आज वे सब मॉडल्स नहीं हैं , जो इस समय रावण के गैराज में हैं। फिर भी मेरे पास वह वाहन है , जिसके बल पर मैं इस चुनाव - समर में विजय - प्राप्ति का पौरुष रखता हूं। भले ही आज तुम मेरा वह वाहन देख नहीं पा रहे , क्योंकि तुम मेरे दल में नवागत हो। तुमने कुछ ही समय पूर्व मेरे दल की सदस्यता ली है। इसलिए इस गूढ़ रहस्य को समझने में तुमको कुछ काल मेरे निकट सानिध्य में रहना होगा।

मेरा वाहन जनता के शो - रूम में रखा हुआ है। जब तुम चुनाव क्षेत्र में जाओगे , तो सब कुछ स्वयमेव समझ में आ जाएगा। इसलिए आज मैं मात्र व्याख्यान - विधि से तुम्हारे सम्मुख उस वाहन को चित्रांकित करता हूं।

Mr Gonsalwez
22-10-2011, 02:19 PM
सुनो दशानन सहोदर , मेरे पास जो अदृश्य वाहन है , उसकी टंकी में नैतिकता का ईंधन भरा हुआ है। उसकी चेसिस आत्मबल से बनी हुई है। उस वाहन में शौर्य और धैर्य की ह्वील्स लगी हुई हैं। बोनट पर सत्य का बैनर टंगा हुआ है और सम्मुख सदाचार का झंडा फहरा रहा है। मेरे इस वाहन का इंजन बल , विवेक , दम और परोपकार के हॉर्सपावर से युक्त है। इसमें क्षमाशीलता , दयाशीलता और समतामूलक सोच की हेडलाइट्स है। साथ में ड्राइविंग सीट पर ईश्वर की आराधना में सतत डूबा रहने वाला , भजन - पूजन करके ही अपनी ड्यूटी पर आने वाला तिलकधारी वाहन चालक है। भीतर विरक्ति का सीट कवर मढ़ा हुआ है। संतोष का स्पीडोमीटर है। मेरा वाहन दानशीलता के सेंटरलॉक और बुद्धि के पॉवरब्रेक से युक्त है।

विभीषण ! जब तक सर्वजाति और सर्वधर्म की ' इमोबिलाइजर की ' से स्टार्ट होने वाला मेरा यह चुनावी ब्रांड दृढ़ वाहन मेरे पास है , रावण क्या , किसी भी विपक्षी दल की कोई भी ताकत मुझको नहीं हरा सकती है।

श्रीराम के ऐसे मधुर वचन सुनकर विभीषण ने उनके पैर पकड़ लिए। और कहा , हे कृपा और सुख के समूह , आपने आज मुझको जो उपदेश दिया है , उसको मैं आपका चुनावी भाषण मानकर हृदयंगम करता हूं। वैसे आप भी अपने अंतर्मन में यह जानते ही होंगे कि इस प्रकार के आदर्श वाहन के जरिए न तो इस लोकतंत्र में कोई चुनाव जीता गया है , न ही निकट समय में जीता जा पाना संभव है।

Mr Gonsalwez
22-10-2011, 02:21 PM
देखो, धड़ाधड़ अमीर हुए जा रहे हैं लोग

जब से योजना आयोग ने छब्बीस रुपये रोजाना में जिंदगी जीनेवाले ग्रामीणों को अमीर घोषित किया है, तभी से यह हल्ला मचा हुआ था कि छब्बीस रुपये में जीना मुश्किल है। अभी यह हल्ला हो ही रहा था कि तभी गुड़गांव टोल प्लाजा पर एकदम प्रैक्टिकल में यह साबित हो भी गया कि छब्बीस रुपये में जीना चाहे कितना ही मुश्किल हो, पर सत्ताइस रुपये में मरना बड़ा आसान है। इधर जीना सचमुच बड़ा महंगा हो गया है। मुंबई में अब झुणका भाकर भी नहीं मिलता। दिल्ली सरकार को भी हार कर अपनी पंद्रह रुपये वाली थाली बंद ही करनी पड़ी। क्योंकि यह डर रहा होगा कि कहीं अमीरों को सस्ता खाना देने का घोटाला ही न बन जाए।

पर इसका दोष योजना आयोग को नहीं दिया जा सकता। सस्ते में मरने का दोष ज्यादा से ज्यादा कानून और व्यवस्था को दिया जा सकता है और सस्ते में जीने का दोष बेरहम समाज को। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा है कि आयोग से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था और उसने फैक्चुअल पोजीशन बता दी है। सुप्रीम कोर्ट अगर नहीं पूछता तो वे इन सारे फैक्ट्स को अपने पास रखते। किसी को बताते भी नहीं, दिखाते भी नहीं। कोई उन्हें पूछता भी नहीं कि जनाब ये सारे फैक्ट्स आपको कहां से मिले। हिंदुस्तान में वह कौन सा गांव और कौन सी बस्ती है, जहां इतने सस्ते में जिंदगी बसर की जा सकती है। चलिए चल कर वहीं रहते हैं।

पर मोंटेक भाई न किसी गांव जाते हैं और न किसी बस्ती। अर्थशास्त्री बनने के लिए देश के गांवों और बस्तियों में जाना और उनको देखना जरूरी नहीं। वैसे ही जैसे देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए अर्थशास्त्री होना ही काफी है, लोकसभा का चुनाव लड़ना जरूरी नहीं। बड़ा अर्थशास्त्री बनने के लिए तो बस वाशिंगटन और न्यूयार्क जाना ही काफी होता है। जैसे मोंटेक भाई जाते रहते हैं। बताते हैं कि वे पिछले पांच साल में सोलह बार अमेरिका गए। यहां पांच साल तक लोग गांव नहीं जा पाते। जी नहीं, नेताओं की बात नहीं हो रही कि वे सिर्फ पांच साल बाद ही जाते हैं, चुनाव के टाइम पर। रोटी कमाने के लिए शहर आए लोग भी पांच-पांच साल नहीं जा पाते। जुगाड़ ही नहीं हो पाता जाने का। हालांकि पहले लोग होली-दीवाली चले ही जाया करते थे। पर अब नहीं जा पाते।

लेकिन मोंटेक भाई पांच साल में सोलह बार अमेरिका गए। कहीं अमीरी का यह फार्मूला लेने ही तो नहीं जाते थे , जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूछने पर बताया है। भाई जब अमेरिका वाले नीतियां बना सकते हैं , तो यह फार्मूला भी बता सकते हैं कि गांवों में छब्बीस रुपये में और शहरों में बत्तीस रुपये में अमीर होना पक्का है। हालांकि बताते हैं कि खुद मोंटेक भाई की विदेश यात्राओं पर पिछले पांच वर्षों में रोजाना ग्यारह हजार तीन सौ चौवन रुपए खर्च हुए। वे करीब दो करोड़ रुपए खर्च करके पैंतीस बार विदेश यात्रा पर गए। लोगों को चाहे यह लगता हो कि वे मजे कर रहे हैं पर वे जरूर अमीरी के नुस्खे की तलाश में ही दुनिया भर में भटकते रहे होंगे , दर - दर की खाक छानते रहे होंगे।

बताते हैं कि योजना आयोग के सदस्य लाखों वेतन पाते हैं। शायद इसीलिए कि वे यह बता सकें कि अब हम गरीबों का देश नहीं हैं। अब हमारे यहां छब्बीस और बत्तीस रुपये रोजाना में भी लोग अमीरी के मजे ले सकते हैं। गरीबी मिटाने का यह फार्मूला अगर हमारे पहले वाले नेताओं के समय आ जाता तो अब तक तो गरीबी मिट भी चुकी होती। पर उस जमाने में एक तो मोंटेक सिंह नहीं थे और दूसरे तब गरीबी मिटाने के लिए लोग रोटी के साथ कपड़े और मकान की शर्त भी जोड़ देते थे। तब इन तीन चीजों की जरूरत पूरी होने पर ही गरीबी को गुड बाई कहा जा सकता था। पर अब कपड़े और मकान की शर्त हट चुकी है और इसलिए गरीबी हट फटाफट रही है और छब्बीस और बत्तीस रुपये में लोग धड़ाधड़ अमीर हुए जा रहे हैं ।

Mr Gonsalwez
22-10-2011, 02:23 PM
अब उपवास पर नहीं रहा महिलाओं का एकाधिकार


भारतीय महिलाओं के लिए यह बुरी खबर है। अब तक वह व्रत-उपवासों पर अपना एकाधिकार समझती थीं, पर अब यह सब उनके हाथों से छिनता नजर आ रहा है क्योंकि अब देश के अनेक राजनेता भी इस मैदान में कूद पड़े हैं। महिलाएं कभी पति की लंबी उम्र तो कभी परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती रही हैं। यह अलग बात है कि वे बेचारी इसे शो ऑफ नहीं कर पातीं। वे तो बस व्रत रखती हैं और घंटों भूखे रहने के बाद जब व्रत खोलती हैं, तो भी कोई ड्रामा नहीं होता है। हां, घर में जब कोई खुशी की खबर आती है तो वे जरूर इसे अपने व्रतों का रिजल्ट मान लेती हैं।

हमारे राजनेताओं का उपवास करने का तरीका काफी अलग है। शायद महिलाओं को भी उनसे सीखने की जरूरत है कि उपवास कैसे रखा जाता है। उपवास रखने के लिए शो ऑफ बेहद जरूरी है। खामोशी के साथ व्रत रखा तो क्या फायदा। वह उपवास क्या, जिसका कोई शोर न हो। जब तक सबको पता नहीं चल जाता कि आपका उपवास है तो मजा नहीं आता। इसके लिए कुछ दिनों पहले से यह पब्लिसिटी शुरू कर दें कि आप उपवास रखने जा रहे हैं। इसके लिए हर तरह के साधन आज उपलब्ध हैं। जरूरत पड़े तो किसी रिऐलिटी शो में हो आएं। वैसे गुजरात के सीएम नरेंद मोदी ने इस मामले में कुछ नए मापदंड स्थापित किए हैं। उपवास के लिए बड़ा सा स्टेज, एयरकंडिशंड हॉल और भीड़ आवश्यक है। यह लगना चाहिए कि कोई मेला चल रहा है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उपवास स्थल के आसपास खाने-पीने का तगड़ा इंतजाम हो। तभी तो भीड़ जुटेगी। कोशिश होनी चाहिए कि उपवास स्थल पर कुछ सिलेब्रिटिज जरूर आएं। बॉलिवुड के लोग हों तो और अच्छा। यह न भूलें कि जब तक कुछ बड़े लोग आकर आपकी तारीफ नहीं करेंगे तब तक फास्ट थोड़ा अधूरा लगेगा। खैर, ऐसा फास्ट रखने के लिए आपको सुपरफास्ट होना पड़ेगा। ये सबके बस की बात नहीं है। भूखे रहने की प्रैक्टिस के साथ पीआर में भी महारत हासिल करनी होगी। वैसे वह दिन दूर नहीं जब कुछ लोग फास्टिंग की कंसलटेंसी देने लगेंगे।

उपवासों का ट्रेंड इन दिनों कुछ इस कदर चल पड़ा है कि मेरी छोटी बहन ने एक दिन ममी से कहा- अगर आप मुझे अपने फ्रेंड्स के साथ घूमने नहीं जाने दोगी तो मैं भी उपवास पर बैठ जाऊंगी। अगर अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ बिल लाने के लिए उपवास पर बैठ सकते हैं, बाबा रामदेव ब्लैक मनी के मुद्दे पर उपवास कर सकते हैं, तो मैं उपवास क्यों नहीं कर सकती। ये अलग बात है कि उस बेचारी की फास्ट रखने की धमकी का मेरी ममी पर कोई खास असर नहीं पड़ा। वैसे उपवासों का यही ट्रेंड चलता रहा तो आगे हो सकता है कि महिलाएं जुलूस निकालें और अपना यह बुनियादी हक छिनने का पुरजोर विरोध करें। आखिर उनके सीधे-सादे, बरसों से चले आ रहे उपवासों को इतना ग्लैमराइज किया जाना उन्हें बुरा तो लगेगा ही। सोचिए, अगर महिलाएं भी अपने उपवासों को भुनाने में जुट जाएं तो हर घर में एक ड्रामा क्वीन तो जरूर मिल जाएगी।

वैसे जब इतने सारे उपवास सुनने में आ रहे हैं तो हो सकता है आगे चलकर कई और हस्तियां भी उपवास रखने लगें। मुमकिन है, कांग्रेस पार्टी टीम अन्ना के इफेक्ट से बचने के लिए उपवास शुरू कर दे। अन्ना के बैठने से पहले ही वह बैठ जाए। बड़ा ही रोचक होगा वह उपवास कॉम्पिटिशन। लोग उत्सुक होकर तब देखेंगे कि कौन ज्यादा दिन उपवास रखता है। वैसे कुछ नेता टिकट पाने के लिए, तो कुछ सांसद मंत्री पद के लिए फास्ट कर सकते है। फिलहाल मैं भी सोच रही हूं कि किसी और के लिए नहीं बल्कि खुद के लिए ही उपवास शुरू कर दूं। पतली होने के लिए डायटिंग से अच्छा तो उपवास ही है। इससे एक पंथ दो काज हो जाएगा। दुबली भी हो जाऊंगी और फेमस भी।

Paul Saab
22-10-2011, 02:28 PM
वाह वाह मजा आ गया आपके वयंग्य पढ़कर :clap::clap::clap::clap:

Sam_love
22-10-2011, 02:30 PM
एक अच्छे और मजेदार सूत्र के लिए सूत्रधार कप बधाई

BAGULA BHAGAT
22-10-2011, 02:33 PM
या तो दीवाना हँसे या तू जिसे तौफीक दे
वरना इस दुनिया में आके मुस्कुराता कौन है

T J Cooper
22-10-2011, 03:06 PM
एक अच्छे और मजेदार सूत्र के लिए सूत्रधार को धन्यवाद

T J Cooper
22-10-2011, 03:07 PM
एक मेरी तरफ से भी

T J Cooper
22-10-2011, 03:09 PM
जब क्रांति देश में पारदर्शी थाने का शुभारंभ हुआ

इंदर नगर में नए थाने का कामकाज सुबह दस बजे से शुरू हो गया। थाने की विशेषता यह थी कि इसे पूरी तरह से पारदर्शिता के सिद्धांतों पर बनाया गया था। थाने की सारी दीवारें शीशे की बनी हुई थीं, छत शीशे की थी-किसी भी कोने से देखो, सब कुछ आर-पार दिखता था। कोई अफसर मेज पर बैठ कर ऊंघता तो वह बाहर से दिखाई देता, कोई हंसी- ठठ्ठा करता तो भी बाहर से दिखाई देता, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करता तो बाहर से दिखाई देता। सब कुछ दिखता था। इसलिए थाने में चुने हुए जवान और अफसर रखे गए। उनको रिफ्रेशर कोर्स कराया गया- कोई चूक न हो जाए, कोई लापरवाही न हो जाए। जनता बाहर से सब कुछ देख सकती थी। बदनामी हो सकती थी।

उस थाने में फाइलें रखने वाली अलमारियां भी एकदम पारदर्शी थीं। जनता बाहर से स्पष्ट देख सकती थी कि किस केस की फाइल कहां रखी गई है। कोई पुलिस वाला यह नहीं कह सकता था कि केस की फाइल गुम हो गई है। बहानेबाजी संभव नहीं थी।

अफसरों के कमरों में सीसी टीवी कैमरे लगे हुए थे। उनसे जुड़ा हुआ एक बड़ा-सा टीवी स्क्रीन थाने के बाहर लगा हुआ था। जनता बाहर से ही देख सकती थी कि कौन-सा अफसर किस केस में दिलचस्पी ले रहा है। किसने किस फाइल पर क्या टिप्पणी लिखी है। किस अभियुक्त पर कौन-कौन सी धारा लगाने के लिए सबूत जुटाए जा रहे हैं।

पारदर्शिता के कारण थाने पर काम का बोझ भी कम हो गया। अब थाने में कोई पूछताछ करने नहीं आता था। लोग अपना-अपना मामला बाहर से ही देख लेते थे। कोई एमपी-एमएलए से सिफारिश कराने नहीं आता था। वह अफसरों से बाहर ही मिल लेता था। किसी को अंदर आने की जरूरत नहीं थी। इसलिए थाने में पहले की तरह भीड़ नहीं होती थी।

थाने में एक मीटिंग रूम था। वहां सिपाही और अफसर रोजाना मीटिंग करते थे कि आज क्या-क्या कार्रवाई करनी है। कहां छापा मारना है, किसको गिरफ्तार करना है। फलां जगह दबिश देने कौन जाएगा। ढिमका जगह ड्यूटी देने कौन जाएगा। पारदर्शिता के लिहाज से मीटिंग रूम में एक माइक्रोफोन लगा दिया गया था। उसके लाउडस्पीकर थाने के ऊ पर चारों दिशाओं में लगा दिए गए, ताकि लोगों को रोजाना मालूम हो सके कि पुलिस आखिर कर क्या रही है। इसके अलावा सुबह-शाम एक अधिकारी प्रेस को पूरे दिन की कार्रवाई का ऑडियो-विडियो टेप भी जारी कर दिया करता था।

इंदर नगर का वह थाना बहुत जल्दी सारी दुनिया में मशहूर हो गया। आखिर पारदर्शिता के सिद्धांत पर काम करने वाला वह दुनिया का इकलौता थाना था। चर्चा सुन कर उसे देखने के लिए एक दिन बीबीसी वाले आए। उन्होंने स्थानीय लोगों से पूछा, कैसा चल रहा है? लोगों ने बताया बहुत बढि़या।

पुलिस घूस खाती है या नहीं?

जी, कतई नहीं। थाने का सारा काम पारदर्शी है। पुलिस का हर मूव हमें पता रहता है।

तब तो शहर में चोरी-बदमाशी भी बंद हो गई होगी, बीबीसी ने पूछा।

नहीं, बढ़ गई है। यह शहर पारदर्शी नहीं है, सिर्फ थाना ही पारदर्शी बनाया गया है। लोगों ने बताया।

बीबीसी वाले लोगों का जवाब सुन कर चले गए।

कुछ दिन बाद वायस ऑफ अमेरिका वाले आए। जैसा कि अमेरिकियों के काम करने का ढंग होता है, पहले उन्होंने सारा होमवर्क कर लिया। फिर सीधे पुलिस हेड क्वॉर्टर पहुंचे। कमिश्नर से पूछा, आप के पारदर्शी थाने की तो सारी दुनिया में बहुत चर्चा हो रही है। अब अगला एजेंडा क्या है?

अगले चरण में हम पुलिस की वर्दी भी पारदर्शी कर देंगे, कमिश्नर ने कह कर आंखें झुका लीं।

सुना है, विकीलिक्स से परेशान अमेरिकी तब से असमंजस में हैं कि थाने वाली यह स्टोरी रन करें या नहीं।

T J Cooper
22-10-2011, 03:12 PM
आखिर ऊपर वाले ने दे दिया छप्पर फाड़ के


सचमुच , ऊपर वाला जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है। जैसे बीजेपी को अचानक प्रधानमंत्री पद के दो - दो उम्मीदवार दे दिए। कहां तो एक भी नहीं था। लोग पूछते थे , तो नेता लोग बगलें झांकने लगते थे। परंपरा उन्होंने ही डाली थी , पहले अपना उम्मीदवार पेश करने की। कांग्रेस को चुनौती देते थे - अरे , पहले अपना उम्मीदवार तो दिखाओ। लेकिन अब खुद ही नहीं दिखा पा रहे थे। बाद में तो खुद ही कहने भी लगे कि इस बार किसी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं किया जाएगा। तो कहां तो यह स्थिति थी कि दिखाने के लिए , पेश करने के लिए एक उम्मीदवार तक नहीं था और कहां अब दो - दो हैं। चुपड़ी और दो - दो की तरह।

आडवाणीजी वैसे तो खैर , प्रधानमंत्री पद के स्थायी उम्मीदवार हैं। हालांकि लोग मान रहे थे कि इस बार शायद वह अपनी उम्र का ख्याल कर जाएं। पर जब जमाना ही ऐसा हो कि लोग किसी भी चीज का ख्याल न करें , तो आडवाणीजी ही उम्र का ख्याल क्यों करें। फिर अध्यक्ष महोदय ने भी संघ के चिंतन और मंथन के बाद यह घोषणा कर दी थी कि पार्टी इस बार किसी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं करेगी। सो लोगों ने यह पक्का मान लिया था कि शायद आडवाणीजी इस बार उम्मीदवार न हों। आखिर कितनी बार होंगे। पर जब से उन्होंने अन्ना को राजघाट पर दौड़ते देखा होगा , तभी से उनके मन में यह इच्छा बलवती हुई होगी कि चलो एक दौड़ और लगा ली जाए। मन मचल गया होगा। आखिर बुढ़ापे और बचपन में ज्यादा फर्क तो होता नहीं।

पर बात सिर्फ मन मचलने की ही नहीं थी। वो एक क्या कहावत है कि मौका भी था और दस्तूर भी। देश में भ्रष्टाचार विरोधी माहौल बना तो बीजेपी को लगा कि इसकी नैचरल बेनिफिशरी तो वही है। कांग्रेस की सत्ता जाएगी तो सत्ता आकर उसी की झोली में ही तो गिरेगी। बताते हैं कि कुछ सर्वे - वर्वे भी इसी तरह के आए जिनमें बताया गया कि अन्ना के आंदोलन का लाभ बीजेपी को मिलेगा। इसलिए आडवाणीजी ने फौरन दावेदारी पेश कर दी होगी - माहौल ऐसा है कि तुम लोगों से संभलेगा नहीं। इसलिए मुझे ही आगे आना पड़ेगा। वक्त की यही मांग है।

उन्होंने ललकारा होगा - लाओ मेरा रथ लाओ। अब मैं निकलूंगा यात्रा पर , दिग्विजय के लिए। इस पर संघ वालों ने फौरन एतराज किया होगा - वो हम पर तरह - तरह के इलजाम लगा रहे हैं , हमें हमेशा कठघरे में खड़ा करते रहते हैं। हमें आतंकवादी तक बना दिया और आप उन्हीं के लिए यात्रा पर निकलेंगे। उन्होंने समझाया होगा - अरे भाई , मैं दिग्गी राजा की बात नहीं कर रहा। फिर उन्होंने अपनी ललकार को कुछ यूं दुरुस्त किया होगा - मैं निकलूंगा यात्रा पर। भारत विजय के लिए। शंखनाद करो।

अभी पार्टी वाले आडवाणीजी के रथ के अंजर - पंजर ही ढूंढ रहे थे कि ऊपर वाले ने मोदीजी पर मेहरबानी कर दी। लोग समझ रहे थे कि मेहरबानी ऊपर वाली कोर्ट ने की है। पर मोदी ने ट्वीट करके सबको समझाया - गॉड इज ग्रेट। व्याख्याकारों ने फौरन व्याख्या की - अरे देखो - देखो , मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने का रास्ता खुल गया। इस पर मुहर लगा दी अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट ने। उसने कह दिया कि आम चुनाव 2014 में सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच होगा। खैर , आडवाणीजी ने तो मोदीजी को पहले ही महान करार दे दिया था। आखिर तो रथयात्रा गुजरात से ही शुरू करनी है। सुषमाजी ने सत्यमेव जयते का उद्घोष कर डाला। बोलीं - नरेंद्र भाई ने अग्निपरीक्षा पास कर ली है। जेटलीजी शायद ऐसे प्रशंसा नहीं कर पाए होंगे सो जब किसी ने मोदीजी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बारे में पूछा तो उन्होंने कह दिया - वह राष्ट्रीय राजनीति में कब नहीं थे। सो मेहरबानों , कद्रदानों , अब स्थिति यह है कि ऊपर वाले ने जब दिया तो सचमुच छप्पर फाड़ के दिया और अब बीजेपी के पास प्रधानमंत्री के दो - दो उम्मीदवार हैं। अब समस्या यह है कि इन दो - दो उम्मीदवारों का करें क्या ? क्योंकि यह दोनों हाथों में लड्डू होने वाली स्थिति नहीं है।

vidya thakur
23-10-2011, 01:53 PM
हमारे जीवन और लोकतंत्र में टोपी का महत्व


जीवन क्या है? केवल माया और आत्मप्रवंचनाओं का पर्याय है। हम कभी अपने आप को रिश्तों के नाम पर धोखा देते हैं तो कभी दूसरों को अपना उल्लू सीधा करने के लिए उल्लू बनाते हैं। व्रत, उपवास, पूजा- पाठ और तीर्थयात्राएं तक एक पाखण्ड का सिलसिला प्रतीत होने लगी हैं।

ऐसे में एक अदद टोपी है, जिसके भरोसे कलयुग में धर्म की आस टिकी हुई है। टोपी सत्य है। टोपी सदानंद है। टोपी संसार रूपी मझधार में हिचकोले खाती हुई नैया के यात्रियों के लिए एक मजबूत और भरोसेमंद पतवार है।

टोपी सत्य है। शेष सब मिथ्या है। टाई से लेकर बूट तक बीच फैशन में साथ छोड़ जाते हैं। साड़ी या कमीज तो मित्र मांग सकते हैं लेकिन टोपी कोई नहीं मांगता। एक टोपी ही है जो हर हाल में धारक की नश्वर देह को अनश्वर अपनत्व देती है। व्यक्ति कई जोड़ी कपड़े रखता है। लेकिन टोपियां ज्यादा नहीं होतीं।

फैशनपरस्त लोगों की बात अलग है लेकिन आम आदमी के लिए अलमारी में रखी दो या तीन टोपियां ही पर्याप्त होती हैं। एक टोपी को एक ही आदमी अलग-अलग रंग और डिजाइन के कपड़ों पर लंबे समय तक पहन सकता है। इस तरह टोपी समाजवाद का प्रतीक बन जाती है। जूते बहुत कीमती होकर भी पांवों में पहने जाते हैं।

टोपी की कीमत भले ही कम हो लेकिन उसे सिर पर पहना जाता है। इस तरह टोपी सामाजिक जीवन में सर्वहारा वर्ग की ताकत का पर्याय भी है। पैंट, शर्ट, टॉप आदि तो एक-दो बार पहनने के बाद ही इतने गंदे हो जाते हैं कि उन्हें बार-बार धुलवाना पड़ता है। टोपी इस तरह के दिखावे नहीं मांगती। टोपी जीवन में सादगी के संवहन की सबसे बड़ी सीख देती है।

देह पर धारण किए जाने वाले शेष सभी कपड़े बार-बार धुलाई किए जाने पर विवश करते हैं। लेकिन टोपी ऐसा नहीं करती। कपड़ों को धोने के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होती है। हमारे जीवन में बहुत सारा पानी तो इसीलिए नालियों में बहा दिया जाता है क्योंकि उस पानी से कपड़ों की धुलाई हो चुकी होती है।

यह जानते हुए भी कि पानी का बचाया जाना बहुत कीमती है, हम कपड़ों को धोने के लिये मजबूर हैं। केवल टोपी ही है जो हमें जीवन में मितव्ययी होने का संदेश देती है और पानी को बचाए रखने के पवित्र अनुष्ठान में अपना रचनात्मक योगदान करती है।

बाजार में अलग-अलग नस्लों और डिजायनों की टोपियां उपलब्ध हैं। हालांकि महात्मा गांधी ने अपने जीवन के अंतिम सालों में टोपी पहननी बंद कर दी थी, लेकिन उनके द्वारा पहनी जाने वाली एक खास किस्म की टोपी उन्हीं के नाम से मशहूर हुई।

इस टोपी को धोती- कुर्ते वालों ने ही नहीं, कुर्ते-पायजामे वालों और अचकन वालों तक ने पहना। कुछ लोग तो इसी टोपी के सहारे जीवन में इतने ऊंचे चढ़ गए कि जिस आम आदमी ने उन्हें सिर पर बैठाया, उसी आम आदमी को वो पांवों की जूती समझने लगे।

लेकिन यह भी दिलचस्प है कि ऐसे टोपी वालों को चुनौती देने के लिए भी टोपी पहननी पड़ती है। पिछले दिनों पूरे देश में कई लोगों को टोपी पहने नारे लगाते देखा गया। इसमें नौजवान भी अच्छी-खासी संख्या में थे। दरअसल, यह खूबी तो केवल टोपी में ही पाई जाती है कि कोई उसे अपने माथे पर धारण करे फिर भी वह अकिंचन ही बनी रहती है।

आप किसी दोस्त या रिश्तेदार को माथे चढ़ाकर देखो, आपको पता चल जाएगा कि टोपी होना हरेक के बूते की बात नहीं है।

टोपी देह के 'टॉप' पर रहती है, इसलिए उसका नाम टोपी हुआ या उसका नाम टोपी है, इसलिए उसे देह के टॉप पर धारण किया जाता है- यह कुछ लोगों के लिए शोध का विषय हो सकता है। शोध का विषय तो यह भी हो सकता है कि कुछ लोग सारा जीवन दूसरों की टोपियां उछालने में क्यों लगे रहते हैं? यदि अपनों के बीच कोई सीधा-सादा आदमी फंस जाए तो सारे मिलकर उस आदमी को टोपी पहनाने में क्यों लग जाते हैं, यह भी रिसर्च का विषय है।

vidya thakur
23-10-2011, 01:54 PM
देखो, फांसी की फांस फंसी ऐसी कि..


फांसी की फांस अक्सर ऐसी फंस जाती है जी, कि कई बार तो सरकारों और राजनीतिक पार्टियों तक का सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इससे तो यही लगता है कि बंदा अगर खुद फांसी लगा ले, तो शायद वही सबसे आसान होता हो। वरना फांसी की राह में मुश्किलें हजार हैं। अदालतें अगर सजा सुना भी दें तो फिर सरकारें हैं, दया याचिकाएं हैं। शायद जल्लाद मिलना भी मुश्किल हो। हालांकि खुद फांसी लगा लेना भी सचमुच ही आसान होता होगा, यह हमें क्या पता? और जो यह बता सकते हैं कि कितना मुश्किल होता है, वो बताने के लिए रहते नहीं। लेकिन यह तय है कि खुद फांसी लगा लेने वालों की तादाद, उनसे हमेशा ही ज्यादा रही है, जिन्हें सजा के तौर पर फांसी दी जाती है और जिसके लिए मस्जिट्रेटों और जल्लादों की जरूरत पड़ती है।

खैर, पिछले दिनों बिट्टाजी की याचना सुनकर भी यही लगा कि शायद खुद फांसी लगा लेना सबसे आसान होता हो। बताते हैं कि जब भुल्लर को मिली फांसी की सजा का अकालियों ने विरोध किया, तो बिट्टाजी ने दुखी होकर बड़े ही कातर स्वर में कहा- उसे फांसी नहीं दे सकते तो मुझे मरने दो। कहते हैं कि बिट्टाजी ही भुल्लर का निशाना थे। हालांकि वह बच गए थे और दूसरे कई लोग मारे गए थे। बिट्टाजी इतने कातर कभी नहीं दिखते। अक्सर तो वह दहाड़ते नजर आते हैं। आतंकवाद विरोधी मोर्चा चलाते हैं और हमेशा देशभक्ति में सराबोर रहते हैं। कांग्रेसियों ने उनसे मुंह मोड़ लिया सो मजबूरी में देशभक्ति कोई बुरी बात नहीं है।

पर बिट्टाजी इतने कातर कभी नहीं दिखाई दिए। वह हमेशा देशद्रोहियों और आतंकवादियों को फांसी पर चढ़ाए जाने की मांग करते रहते हैं। कभी जंतर-मंतर पर और कभी इंडिया गेट पर। उनके सुर में सुर सिर्फ बीजेपी वाले ही मिलाते हैं। बीजेपी वाले तो कई बार नकली दवाइयां बनाने वालों और बलात्कारियों को भी फांसी दिए जाने की मांग करते पाए जाते हैं। पर दिक्कत यह है कि फांसी देने के सबसे आसान तरीके लैंप पोस्ट पर लटका देने को ******* ने काफी बदनाम कर दिया। रही-सही कसर खाप पंचायत वालों ने पूरी कर दी।

बीजेपी वालों की यह लिस्ट चाहे कितनी ही लंबी होती हो, पर उसमें भी प्राथमिकताएं होती हैं और आतंकवादियों तथा देशद्रोहियों के नाम इसमें सबसे ऊपर होते हैं कि कसाब को फांसी दो, अफजल गुरु को फांसी दो। भुल्लर के बारे में उनकी क्या राय है, पता नहीं। फांस वहां भी लगी होगी। आखिर तो वे पंजाब में अकालियों के साथ सरकार चला रहे हैं और अकाली भुल्लर को फांसी दिए जाने के खिलाफ हैं। इधर तमिलनाडु वाले राजीव गांधी के हत्यारों को सजा दिए जाने के खिलाफ हो गए। वाइको तो हमेशा ही रहे हैं। बल्कि वह कुछ-कुछ बिट्टाजी के प्रतिरूप हैं। बिट्टाजी जहां हर आतंकवादी को फांसी चढ़ाए जाने के पक्ष में हैं, वहीं बताते हैं कि वाइको, लिट्टेवालों को बचाने के पक्ष में रहते हैं। फिर डीएमके वाले भी उन्हें बचाने के पक्ष में ही हैं, हालांकि वे कांग्रेस के सहयोगी भी हैं। पर अब वे कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगा रहे हैं। कहीं राजीवजी के हत्यारों की फांसी बहाना ही तो नहीं हैं।

कहीं असली दर्द कानिमोझी तथा राजा वाला तो नहीं है। अब तो बताते हैं कि अम्मा जयललिता भी उन्हें बचाए जाने के ही पक्ष में हैं। पहले नहीं थी। इस पर सुब्रहमण्यम स्वामी ने नाराज होते हुए कहा कि वे शेरनी से चूहा हो गई हैं। विधानसभा ने प्रस्ताव पारित कर दिया है। इससे यह तय हो गया है कि तमिलनाडु की पूरी राजनीति उन्हें बचाने के पक्ष में हैं। इस मामले में लगता है कि वहां कोई विपक्ष नहीं है। लेकिन अब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कह दिया है कि वह अगर विधानसभा से अफजल गुरु को माफी देने का प्रस्ताव पास करवा देते तो क्या होता...। इससे बीजेपी भड़क गई है। यानी फांस और फंस गई। इसीलिए तो हम कह रहे हैं कि शायद खुद को फांसी लगाना ही सबसे आसान होता हो, जहां राजनीति कहीं आड़े नहीं आती।

vidya thakur
23-10-2011, 01:55 PM
कितने ऊपर हैं आखिर ये ऊपर वाले

उस दिन मैं अपने एक रिश्तेदार के साथ उसका मोबाइल चोरी चले जाने की रिपोर्ट लिखाने गया तो लाख मिन्नतों के बावजूद थानेदार ने इतने 'मामूली अपराध' की रिपोर्ट लिखने से इंकार कर दिया। मैंने ज्यादा जिद की तो एक सिपाही ने कोने में ले जाकर बताया कि थानेदार साहब इस मामले में कुछ नहीं कर सकते क्योंकि ऊपर वालों ने ऐसे ही आदेश दे रखे हैं। मैंने ऊपर की ओर देखा। वहां एक पंखा अपनी मरियल चाल से घूमता हुआ साबित कर रहा था कि हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं। हेड कांस्टेबल के सिर के ऊपर दीवार पर महात्मा गांधी की तस्वीर लगी थी और मुझे विश्वास था कि कम से कम गांधी जी तो ऐसा कोई आदेश नहीं दे सकते। मुझे इधर-उधर झांकता देखकर संतरी ने पूछ लिया, 'क्या देखना चाहते हो?'

'जी, मैं जानना चाहता हूं कि क्या छत पर भी किसी अधिकारी का कमरा बना हुआ है? मैं दरअसल ऊपर वालों से पूछना चाहता हूं कि वो किसी भी चोरी को मामूली चोरी कैसे बता सकते हैं?' मैं विनम्रता से बोला। इसके अलावा मैं कर भी क्या सकता था? अभी इस देश में लोकतंत्र के इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि मेरे जैसा एक मामूली लेखक थाने में घुसकर विनम्रता के अतिरिक्त किसी दूसरे अंदाज में बात कर ले। खैर, मेरी बात सुनकर पुलिस वाला जोर से हंस दिया। बोला -' केवल ऊपर की मंजिल पर बैठ जाने से कोई ऊपर वाला नहीं हो जाता। ऊपर वाला होने के लिए ऊंची कुर्सी पर बैठना पड़ता है।'

अब मेरे सामने दूसरी समस्या खड़ी हो गई। अभी तक तो मैं यही जानना चाहता था कि ऊपर वाला आदमी हम जैसे आम आदमियों से कितना ऊपर होता है? लेकिन अब यह जानने की भी इच्छा होने लगी कि ऊपर वाला आदमी जिस ऊंची कुर्सी पर बैठता है, वह आखिर कितनी ऊंची होती है? ऊंची कुर्सी यदि सचमुच ही बहुत ऊंची होती है तो ऊपर वाला आदमी उस पर बैठने के लिए नीचे से ऊपर चढ़ता है या पहले और ऊपर पहुंचता है और फिर कुर्सी पर कूदता है? यदि वो कुर्सी पर बैठने के लिए ऊपर की तरफ चढ़ता है तो ऊंची कुर्सी तक पहुंचने के लिए क्या करता है? किसी सीढ़ी का इस्तेमाल करता है या नीचे वाली कुर्सियों पर बैठे लोगों के कंधों का इस्तेमाल करता है? उसकी कुर्सी इतनी ऊंची है तो फिर मेज कितनी ऊंची होती होगी? मुझे अब समझ में आया कि क्यों इस देश के अधिकांश सरकारी महकमों में ऊपर वाली की मेज से फाइल को संबंधित व्यक्ति तक पहुंचने में जरूरत से ज्यादा समय लग जाता है। सीधी सी बात है साहब, ऊंची कुर्सी पर बैठकर, ऊंची मेज पर रखी फाइलों को निबटाना कोई आसान काम नहीं होता।

लोकतंत्र में हम जैसे लोगों के लिए ऊपर वाले लोग हमेशा तिलिस्म और जिज्ञासा का विषय हुआ करते हैं। उस दिन पड़ोस वाले शर्मा जी मिले। मिलते ही बोले - ' ऊपर वाले की कृपा से गांव में गैया ने बछड़े को जन्म दिया है। ' मैंने उन्हें बधाई दी। दो दिन बाद उन्हीं शर्मा जी ने बताया कि उनका पालतू कुत्ता मर गया है। अफसोस जताते हुए वह बोले - ' सब ऊपर वाले की मर्जी है। ' मैं अवाक् रह गया। यह कैसा ऊपर वाला है जो कभी जीवन दे रहा है तो कभी जान ले रहा है। मैंने उनके घर की तरफ देखा। ऊपर वाली मंजिल पर एक किरायेदार रहा करता था। मुझे शुरू से लगता था कि आदमी गड़बड़ है। मैंने शर्मा जी को बिना मांगे ही सुझाव दे डाला कि ऊपर वाला इतनी ही मनमानी करने पर आमादा है तो वो उससे मकान खाली क्यों नहीं करा लेते ? शर्मा जी नाराज हो गए। न जाने क्यों उन्हें लगा कि मैं उनकी भावनाओं की खिल्ली उड़ा रहा हूं। मैंने घर आकर श्रीमती जी को सारा वाकया बताया तो उन्होंने मुझे तसल्ली देते हुए कहा , ' आप क्यों दुखी होते हो जी ? मान लो कि ऊपर वाले की यही मर्जी थी। ' मैं भन्ना गया। मेरे और शर्मा जी के बीच पनपी गलतफहमी के बीच में यह कौन सा ऊपर वाला आ गया ?

vidya thakur
23-10-2011, 01:56 PM
कहीं भ्रष्टाचार सचमुच समाप्त न हो जाए


समय-समय पर अलग-अलग हवा चलती है। आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ हवा चल पड़ी है। जिसे देखो, वही करप्शन के पीछे हाथ धोकर पड़ गया है। शहर के कुछ कमिशनखोर डॉक्टरों ने संकल्प लिया है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेंगे। उधर वकील कह रहे हैं कि वे सचाई और ईमानदारी से कार्य करेंगे। भगवान जाने कि वे वकालत करने जा रहे हैं या पुरोहिताई। कल तो और भी मजेदार वाकया हुआ, रसद और पंजीयन विभाग के बाबुओं ने तय किया कि अब से वे एक पैसा घूस नहीं देंगे। बाद में बातचीत करने पर पता चला कि वे भी भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं। घूस लेने वाले को घूस देना पड़े तो अंतरात्मा को बहुत कष्ट होता है। इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम में वे भी जुड़ गए हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि करप्शन लोकल लेवल पर चलता रहे तो कोई बात नहीं। लेकिन उसका कलमाड़ी और राजा संस्करण घातक है अर्थात् मेगा एडिशन बंद होना चाहिए। उससे तो लाखों करोड़ों की हानि होती है।

कल एक रिटायर्ड अधिकारी जी मिल गए। मैं उनका भव्य अतीत जानता था। नौ सौ चूहे खाय बिल्ली हज को चली वाला हाल है उनका। कहने लगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चली हवा से उनके दिल का बोझ काफी हल्का हो गया है। शायद अब समाज में थोड़ी इज्जत बन सके। मैंने कहा - क्या फर्क पड़ता है भाई साहब? आपने अपनी काली कमाई से पहले भी समाज के चंदे की खूब रसीदें कटाई हैं। जाने कितनों के हाथ पीले कराए हैं, जाने कितनों का मोतियाबिंद हटवाया है। समाज का दिया चंदा तो पारस मणि के समान है, जिसके स्पर्श से समस्त काली कमाई सोने की तरह पवित्र और पुण्य हो जाती है। वे हंसे और ही-ही करते हुए रवाना हो गए। जिधर देखिए लोग भ्रष्टाचार के पीछे लट्ठ लेकर पड़े हैं। एक चौराहे पर शहर के नामी-गिरामी बिल्डर और माफिया सरगना की फोटो लगी है और लिखा है कि भ्रष्टाचार भारत छोड़ो। आज भ्रष्ट पुलिस अधिकारी से लेकर, कामचोर शिक्षक नेता और मिलावटी व्यापारियों से लेकर शोषक निजी स्कूल संचालक तक भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में सक्रिय हैं।

अजीब तो लगता है पर इसमें मैं क्या कह सकता हूं। पूरे देश में ऐसी ही बयार चल रही है। इसका असर श्रीमती जी पर भी है। ज्यादा टोका-टाकी करने पर वह मायके जाने की धमकी देने लगती हैं। करप्शन मिटाने की सनक में उन्होंने दूधवाले से पंगा ले लिया। उसे हड़का दिया कि दूध में पानी बहुत मिला रहे हो, सही दूध लाओ वरना तुम्हारी शिकायत कर दूंगी। अगले दिन से दूधवाले ने आना ही छोड़ दिया। अब मैं सुबह-सुबह उठ कर भैंसों के तबेले तक का मार्च करता हूं। पत्नी जी ने तो कॉलोनी के सफाई कर्मचारी को जा धमकाया कि वो नियमित सफाई किया करे तथा कामचोरी न करे। नतीजे में वो मोहल्ले भर का कचरा मेरे घर के आगे इकट्ठा करने लगा है और काम अलग छोड़ दिया है। अब मेरे घर का प्रवेशद्वार देश की व्यवस्था की तरह सड़ रहा है। और मैं एक अदद जन लोकपाल बिल के इंतजार में बैठा हूं कि बिल पास हो जाने दो फिर एक-एक को देख लूंगा। सारा करप्शन मिटा डालूंगा। ड्रोन विमान की तरह भ्रष्टाचारियों को चुन-चुन कर मारूंगा।

सोचता हूं कि यदि देश से सारा करप्शन मिट गया तो हमारे रिटायर्ड नौकरशाह और न्यायमूर्ति क्या करेंगे। इन आयोग वगैरहों का क्या होगा। सुविधाभोगी कैसे पिछले दरवाजे से आगे जाएंगे। वंचित तो विनायक हो जाएगा। मुझे तो डर है कि देश कहीं फिर सोने की चिड़िया न बन जाए। विदेशी आक्रमणकारियों की जीभ कहीं फिर न लपलपाने लगे। न बाबा हम तो भले अपने ही हाल में। हमें क्या मतलब इस अभियान से। हम क्यों भिड़ें , हम तो पसर जाएं यही अच्छा है । बिछ जाएं तो और भी अच्छा है सुखद भविष्य के लिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने के खतरे हजार हैं प्यारे।

vidya thakur
23-10-2011, 01:57 PM
काश! हैरी पॉटर हमारे देश का नेता होता


सरकार देश का सब समस्या हल करना चाहता है। लेकिन उसका पास जादू का छड़ी नहीं है। जादू का छड़ी होता तो सब समस्या फटाफट हल हो जाता। समस्या का फटाफट हल होना अच्छा होता है। समस्या हल नहीं होता तो लोग आंदोलन करता है। धरना, भूख-हड़ताल वगैरा करता है। उससे देश में अविश्वास पैदा होता है। आंदोलनकारी सरकार को भरोसेमंद नहीं मानता। सरकार आंदोलनकारी लोग को ब्लैकमेलर मानता है। इस सब का कारण बस एक है - सरकार का पास जादू का छड़ी नहीं है।

जो लोग ने हैरी पॉटर का फिलिम देखा है, वो लोग जानता है कि जादू का छड़ी में कितना दम होता है। और, जादू का छड़ी हैरी पॉटर का पास तो है, सरकार का पास नहीं है। काश, हैरी पॉटर हमारा देश का नेता होता। तब, सरकार ये तो नहीं बोल पाता कि उसका पास जादू का छड़ी नहीं है। आप देख लेना, जिस दिन जादू का छड़ी मिल जाएंगा, उस दिन देश का सब समस्या हल हो जाएंगा। छड़ी लेकर सरकार संसद का छत पर जाएंगा और छड़ी हिला कर बोलेंगा - 'हीं, क्लीं, फट्, स्वाहा - 'भ्रष्टाचार समाप्तम् !' छड़ी से रोशनी का एक जोरदार चमक निकलेंगा। अक्खा देश का आंख चुंधिया जाएंगा। जो लोग रिश्वत ले रहा होएंगा, वो रिश्वत नहीं लेंगा। जिसने ले लिया होएंगा, वो वापस कर देंगा। 'टू-जी घोटाला' का जीरो-घोटाला हो जाएंगा। 'कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला' में से वेल्थ गायब हो जाएंगा। सब घोटाला करने वाला शरीफ हो जाएंगा। वो लोग का चेहरा शराफत से ऐसा चमकने लगेंगा, जैसे अभी-अभी फ़ेशियल करवा कर आया होवे।

सरकार को जादू का छड़ी मिल जाएंगा तो आंध्र और विदर्भ का किसान लोग आत्महत्या करना बंद कर देंगा। इधर सरकार छड़ी हिलाएंगा, उधर किसान लोग का आत्महत्या करना बंद हो जाएंगा। कारण, सरकार का छड़ी हिलाते ईच, किसान लोग को खाने को जहर और लटकने को रस्सी मिलना बंद हो जाएंगा। जादू का छड़ी हिलाने के बाद किसान भूख से भले ईच मर जावे, आत्महत्या करके नहीं मरेंगा। सरकार को जादू का छड़ी मिल गया तो देश से आतंकवाद का खतरा मिट जाएंगा। इधर सरकार छड़ी घुमाएंगा, उधर इंटेलिजेंस वाला लोग वाकई इंटेलिजेंट हो जाएंगा। आतंकवादी लोग का बम का बारूद बुरादा में बदल जाएंगा। आतंकवादी लोग का बंदूक से लेमनचूस का गोली निकलेंगा। लोग वो गोली चूस कर बहुत खुश होएंगा। उस गोली का जैसा स्वाद दुनिया का किसी गोली में नहीं होएंगा।

आज दुनिया का जो हालत है , उसको देख कर लगता है दुनिया का तमाम सरकार को जादू का छड़ी का जरूरत है। अमेरिका का पास होता तो डॉलर का हालत इतना पतला नहीं होता। पाकिस्तान का पास होता तो पाकिस्तानी आतंकवादी पाकिस्तान में बम नहीं फोड़ता। ईजिप्ट , लीबिया , सीरिया का पास होता तो उधर का लोग अपना डिक्टेटर को अपना पिता का बराबर मानता। पर कोई क्या करे , किसी का पास जादू का छड़ी है ईच नहीं। ये जादू का छड़ी बड़ा बदतमीज किसिम का छड़ी लगता है। अक्खा दुनिया परेशान है , पर मिलता ईच नहीं। अरे ओ छड़ी , मिलता कायकू नहीं। अगर संसार का समस्या हल हो जाएंगा , तो तेरे बाप का क्या जाएंगा ?

सरकार बोलता है उसका पास जादू का छड़ी नहीं है। पता नहीं किसका पास है ? जिसने भी छिपा कर रखा है , वह बड़ा बेशरम आदमी है। देशद्रोही है। दुष्ट है। पापी है। अरे ओ महानुभाव , जिसका पास बी जादू का छड़ी है , कृपया सरकार को दे दो। सरकार उसको संभाल कर इस्तेमाल करेंगा और देश का समस्या हल करके आपका छड़ी आपको लौटा देंगा। जब तक आप सरकार को जादू का छड़ी नहीं देंगा , सरकार देश का समस्या हल नहीं कर पाएंगा। इसलिए , जिसने बी जादू का छड़ी छिपाया है , उससे हाथ जोड़ कर निवेदन है कि छड़ी सरकार को दे दो। प्लीज ! प्लीज !! प्लीज !!!

दुनिया में जादू का सबसे बड़ा छड़ी होता है - ईमानदारी। इस छड़ी का स्पेशैलिटी ये है कि जिसका पास ये होता है , उसका खोता नहीं और जिसका पास नहीं होता , उसको मिलता नहीं।

Alexander the great
23-10-2011, 01:59 PM
आप सभी के सहयोग के लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद.

Alexander the great
23-10-2011, 02:01 PM
प्रभु जी, मेरा मन चाहे घोटाला


खरबूजों को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। इन दिनों अपने देश में घोटालों का मॉनसून आया हुआ है। मेरा मन भी ऐसी बरसात में भीगने को आतुर हो रहा है। यह घोटालोन्मुखी होने लग गया है।

इसको बस एक अवसर की तलाश है। मिलते ही घोटाले करने पर आमादा है। और हो भी क्यों न? जहां पर बस्ती के सारे ही कुओं में भ्रष्टाचार की भंग घुली हुई है और देश की अधिकांश आबादी इन कुओं का ही पानी पी रही है, ऐसे प्यासे मौसम में मैं अपने हलक तक तर न करूं, यह कहां की अक्लमंदी होगी? कवि यों ही तो नहीं कह गए: मन पछतइहै अवसर बीते।

कितना देखूं-सुनूं? देखते-देखते आंखें पथरा गईं। सुन-सुनकर कान पक गए। चतुर्दिक घोटालों का कोलाहल है। अखबार उठाता हूं। घोटालों की खबरें पढ़ता हूं। टीवी चैनल्स को ताकता हूं। घोटालों के जीवित चित्र नजर आते हैं। दम घुटने लग रहा है।

मुझे बराबर संत कवियों की वाणी याद आ रही है। उनकी कही बातों के नए-नए अर्थ खुल रहे हैं। बाबा कबीर मुझ जैसे निपट निरंध के लिए ही लिख गए होंगे: जल बिच मीन पियासी, मोहे लखि-लखि आवे हांसी।

हंसने की बात तो है ही। आज जो ईमान का पल्लू थामे हुए हैं, वे हंसी के पात्र हो गए हैं। किसी भी घोटाले की रस्सी के आगे का सिरा पकड़ो या पीछे की दिशा में बढ़ो, हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली दशा मिलती है। कांग्रेस की गरदन में पड़ी हुई रस्सी को पकड़ो, तो इसका पिछला सिरा बीजेपी के आंगन की अरगनी से बंधा मिलता है।

राष्ट्रीय दलों की कीलों पर फंसी हुई डोरें क्षेत्रीय पार्टियों के पांवों में लिपटी निकलती हैं। ऐसी उलझनपूर्ण परिस्थिति में एक ही उपचार समझ में आता है: मन रे, तू काहे को धीर धरे? घोटालों के इतने अवसर, तू भी क्यों न करे?

घोटाले के घोटक (अश्व) पर सवारी करने को मेरी तबियत कुनमुना रही है। लंबी रेस के घोड़ों को देखकर टट्टू का भी मन होता है कि वह भी दौड़े, चाहे टांगे टूट जाएं। मेरा भी हो रहा है। लीडरानेवतन देश की नाव डुबाने में लगे हैं। नौकरशाह उस नाव में पत्थर भर रहे हैं।

हर छोटे-बड़े सुविधाभोगी की आंख में मोतियाबिंद है। ईमानदारी के चश्मे का शीशा फूटा हुआ है। मैं भी कब तक अपने सिद्धांतों की दो पुख्ता आंखों के सहारे धुंधले दृश्य देखता रहूंगा? घोटालामय वातावरण है। खुलासे हो रहे हैं। बड़ी अदालत के निदेर्श आ रहे हैं। जांचें हो रही हैं। छापे पड़ रहे हैं। संयुक्त जांच समितियों की रिपोर्टों को लेकर रस्साकशी हो रही है।

इन घोटालों के प्रेम-पाश में बंधकर कितनी मुन्नियां बदनाम हो लीं। कितने मुन्ने बदनाम हो रहे हैं। सरेआम दबंगई के दिन हैं। नंगई का नर्तन प्रगति पर है। तभी तो कह रहा हूं, मेरा मन भी इन दिनों घोटालोन्मुखी है। चुलबुल पांडे जैसा चुलबुला रहा है। मैं भी कम से कम एक घोटाला कर गुजरूं, तो इस व्याकुल मन को चैन आए।

अत्यंत दिलफरेब मौसम है। मेरे भीतर भी एक तुक्कड़ कवि बैठा है। घोटालों पर कविता लिखना चाहता है। घोटाला का कोई सार्थक तुक नहीं मिल पा रहा है उसको। घोटाला के साथ छोटा-ला, बड़ा-ला तो चलने से रहे। क्योंकि हरेक 'लॉ' से ऊपर का कानून लागू होता है इन घोटालों पर।

तो कवि क्या करे? घोटाला का तुक किससे जोड़े? घोटालों पर महाकाव्य रचने वाले घुटे लोगों ने संवेदनाओं का गला घोंट रखा है। मेरी सदिच्छा है। एक घोटाला कर ही मरूं। रातोंरात सुप्रसिद्धि पा लूं। आज के समय में जेल जाना भी तो सुप्रसिद्धि की ही श्रेणी में आता है। कलम से अधिक ख्याति कमाई में है। यह माटी का तन माटी में मिल जाना है।

धरती पर धन ही बचा रहेगा। मन बारंबार चीत्कार कर रहा है: उठो धरा के अमर सपूतो, घोटालों पर बलि-बलि जाओ। तो आज से कलम बंद। घोटालेबाजी चालू। नन्ही-मुन्नी भी कर ली, तो इहलोक तो सुधर ही जाएगा। विदेश के बैंकों में खाते होंगे। कृपया आप सब भी करिए। न कर सकें, तो कम से कम मेरा मार्गदर्शन और सहयोग ही करिए।

Raman46
23-10-2011, 03:28 PM
प्रभु जी, मेरा मन चाहे घोटाला


खरबूजों को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। इन दिनों अपने देश में घोटालों का मॉनसून आया हुआ है। मेरा मन भी ऐसी बरसात में भीगने को आतुर हो रहा है। यह घोटालोन्मुखी होने लग गया है।

इसको बस एक अवसर की तलाश है। मिलते ही घोटाले करने पर आमादा है। और हो भी क्यों न? जहां पर बस्ती के सारे ही कुओं में भ्रष्टाचार की भंग घुली हुई है और देश की अधिकांश आबादी इन कुओं का ही पानी पी रही है, ऐसे प्यासे मौसम में मैं अपने हलक तक तर न करूं, यह कहां की अक्लमंदी होगी? कवि यों ही तो नहीं कह गए: मन पछतइहै अवसर बीते।

कितना देखूं-सुनूं? देखते-देखते आंखें पथरा गईं। सुन-सुनकर कान पक गए। चतुर्दिक घोटालों का कोलाहल है। अखबार उठाता हूं। घोटालों की खबरें पढ़ता हूं। टीवी चैनल्स को ताकता हूं। घोटालों के जीवित चित्र नजर आते हैं। दम घुटने लग रहा है।

मुझे बराबर संत कवियों की वाणी याद आ रही है। उनकी कही बातों के नए-नए अर्थ खुल रहे हैं। बाबा कबीर मुझ जैसे निपट निरंध के लिए ही लिख गए होंगे: जल बिच मीन पियासी, मोहे लखि-लखि आवे हांसी।

हंसने की बात तो है ही। आज जो ईमान का पल्लू थामे हुए हैं, वे हंसी के पात्र हो गए हैं। किसी भी घोटाले की रस्सी के आगे का सिरा पकड़ो या पीछे की दिशा में बढ़ो, हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली दशा मिलती है। कांग्रेस की गरदन में पड़ी हुई रस्सी को पकड़ो, तो इसका पिछला सिरा बीजेपी के आंगन की अरगनी से बंधा मिलता है।

राष्ट्रीय दलों की कीलों पर फंसी हुई डोरें क्षेत्रीय पार्टियों के पांवों में लिपटी निकलती हैं। ऐसी उलझनपूर्ण परिस्थिति में एक ही उपचार समझ में आता है: मन रे, तू काहे को धीर धरे? घोटालों के इतने अवसर, तू भी क्यों न करे?

घोटाले के घोटक (अश्व) पर सवारी करने को मेरी तबियत कुनमुना रही है। लंबी रेस के घोड़ों को देखकर टट्टू का भी मन होता है कि वह भी दौड़े, चाहे टांगे टूट जाएं। मेरा भी हो रहा है। लीडरानेवतन देश की नाव डुबाने में लगे हैं। नौकरशाह उस नाव में पत्थर भर रहे हैं।

हर छोटे-बड़े सुविधाभोगी की आंख में मोतियाबिंद है। ईमानदारी के चश्मे का शीशा फूटा हुआ है। मैं भी कब तक अपने सिद्धांतों की दो पुख्ता आंखों के सहारे धुंधले दृश्य देखता रहूंगा? घोटालामय वातावरण है। खुलासे हो रहे हैं। बड़ी अदालत के निदेर्श आ रहे हैं। जांचें हो रही हैं। छापे पड़ रहे हैं। संयुक्त जांच समितियों की रिपोर्टों को लेकर रस्साकशी हो रही है।

इन घोटालों के प्रेम-पाश में बंधकर कितनी मुन्नियां बदनाम हो लीं। कितने मुन्ने बदनाम हो रहे हैं। सरेआम दबंगई के दिन हैं। नंगई का नर्तन प्रगति पर है। तभी तो कह रहा हूं, मेरा मन भी इन दिनों घोटालोन्मुखी है। चुलबुल पांडे जैसा चुलबुला रहा है। मैं भी कम से कम एक घोटाला कर गुजरूं, तो इस व्याकुल मन को चैन आए।

अत्यंत दिलफरेब मौसम है। मेरे भीतर भी एक तुक्कड़ कवि बैठा है। घोटालों पर कविता लिखना चाहता है। घोटाला का कोई सार्थक तुक नहीं मिल पा रहा है उसको। घोटाला के साथ छोटा-ला, बड़ा-ला तो चलने से रहे। क्योंकि हरेक 'लॉ' से ऊपर का कानून लागू होता है इन घोटालों पर।

तो कवि क्या करे? घोटाला का तुक किससे जोड़े? घोटालों पर महाकाव्य रचने वाले घुटे लोगों ने संवेदनाओं का गला घोंट रखा है। मेरी सदिच्छा है। एक घोटाला कर ही मरूं। रातोंरात सुप्रसिद्धि पा लूं। आज के समय में जेल जाना भी तो सुप्रसिद्धि की ही श्रेणी में आता है। कलम से अधिक ख्याति कमाई में है। यह माटी का तन माटी में मिल जाना है।

धरती पर धन ही बचा रहेगा। मन बारंबार चीत्कार कर रहा है: उठो धरा के अमर सपूतो, घोटालों पर बलि-बलि जाओ। तो आज से कलम बंद। घोटालेबाजी चालू। नन्ही-मुन्नी भी कर ली, तो इहलोक तो सुधर ही जाएगा। विदेश के बैंकों में खाते होंगे। कृपया आप सब भी करिए। न कर सकें, तो कम से कम मेरा मार्गदर्शन और सहयोग ही करिए।



घोटाला नही होगी तो सरकार कैसे चलेगी यार / विपक्ष को भी तो कुछ बोलने की मौका तो मिलना चाहिए की नही

Alexander the great
23-10-2011, 04:06 PM
घोटाला नही होगी तो सरकार कैसे चलेगी यार / विपक्ष को भी तो कुछ बोलने की मौका तो मिलना चाहिए की नहीबात तो आपकी सही है रमण भाई.

Amigo.
23-10-2011, 07:09 PM
:clap::clap::clap::clap:

Paul Saab
24-10-2011, 03:12 PM
देखो, फांसी की फांस फंसी ऐसी कि..


फांसी की फांस अक्सर ऐसी फंस जाती है जी, कि कई बार तो सरकारों और राजनीतिक पार्टियों तक का सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इससे तो यही लगता है कि बंदा अगर खुद फांसी लगा ले, तो शायद वही सबसे आसान होता हो। वरना फांसी की राह में मुश्किलें हजार हैं। अदालतें अगर सजा सुना भी दें तो फिर सरकारें हैं, दया याचिकाएं हैं। शायद जल्लाद मिलना भी मुश्किल हो। हालांकि खुद फांसी लगा लेना भी सचमुच ही आसान होता होगा, यह हमें क्या पता? और जो यह बता सकते हैं कि कितना मुश्किल होता है, वो बताने के लिए रहते नहीं। लेकिन यह तय है कि खुद फांसी लगा लेने वालों की तादाद, उनसे हमेशा ही ज्यादा रही है, जिन्हें सजा के तौर पर फांसी दी जाती है और जिसके लिए मस्जिट्रेटों और जल्लादों की जरूरत पड़ती है।

खैर, पिछले दिनों बिट्टाजी की याचना सुनकर भी यही लगा कि शायद खुद फांसी लगा लेना सबसे आसान होता हो। बताते हैं कि जब भुल्लर को मिली फांसी की सजा का अकालियों ने विरोध किया, तो बिट्टाजी ने दुखी होकर बड़े ही कातर स्वर में कहा- उसे फांसी नहीं दे सकते तो मुझे मरने दो। कहते हैं कि बिट्टाजी ही भुल्लर का निशाना थे। हालांकि वह बच गए थे और दूसरे कई लोग मारे गए थे। बिट्टाजी इतने कातर कभी नहीं दिखते। अक्सर तो वह दहाड़ते नजर आते हैं। आतंकवाद विरोधी मोर्चा चलाते हैं और हमेशा देशभक्ति में सराबोर रहते हैं। कांग्रेसियों ने उनसे मुंह मोड़ लिया सो मजबूरी में देशभक्ति कोई बुरी बात नहीं है।

पर बिट्टाजी इतने कातर कभी नहीं दिखाई दिए। वह हमेशा देशद्रोहियों और आतंकवादियों को फांसी पर चढ़ाए जाने की मांग करते रहते हैं। कभी जंतर-मंतर पर और कभी इंडिया गेट पर। उनके सुर में सुर सिर्फ बीजेपी वाले ही मिलाते हैं। बीजेपी वाले तो कई बार नकली दवाइयां बनाने वालों और बलात्कारियों को भी फांसी दिए जाने की मांग करते पाए जाते हैं। पर दिक्कत यह है कि फांसी देने के सबसे आसान तरीके लैंप पोस्ट पर लटका देने को ******* ने काफी बदनाम कर दिया। रही-सही कसर खाप पंचायत वालों ने पूरी कर दी।

बीजेपी वालों की यह लिस्ट चाहे कितनी ही लंबी होती हो, पर उसमें भी प्राथमिकताएं होती हैं और आतंकवादियों तथा देशद्रोहियों के नाम इसमें सबसे ऊपर होते हैं कि कसाब को फांसी दो, अफजल गुरु को फांसी दो। भुल्लर के बारे में उनकी क्या राय है, पता नहीं। फांस वहां भी लगी होगी। आखिर तो वे पंजाब में अकालियों के साथ सरकार चला रहे हैं और अकाली भुल्लर को फांसी दिए जाने के खिलाफ हैं। इधर तमिलनाडु वाले राजीव गांधी के हत्यारों को सजा दिए जाने के खिलाफ हो गए। वाइको तो हमेशा ही रहे हैं। बल्कि वह कुछ-कुछ बिट्टाजी के प्रतिरूप हैं। बिट्टाजी जहां हर आतंकवादी को फांसी चढ़ाए जाने के पक्ष में हैं, वहीं बताते हैं कि वाइको, लिट्टेवालों को बचाने के पक्ष में रहते हैं। फिर डीएमके वाले भी उन्हें बचाने के पक्ष में ही हैं, हालांकि वे कांग्रेस के सहयोगी भी हैं। पर अब वे कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगा रहे हैं। कहीं राजीवजी के हत्यारों की फांसी बहाना ही तो नहीं हैं।

कहीं असली दर्द कानिमोझी तथा राजा वाला तो नहीं है। अब तो बताते हैं कि अम्मा जयललिता भी उन्हें बचाए जाने के ही पक्ष में हैं। पहले नहीं थी। इस पर सुब्रहमण्यम स्वामी ने नाराज होते हुए कहा कि वे शेरनी से चूहा हो गई हैं। विधानसभा ने प्रस्ताव पारित कर दिया है। इससे यह तय हो गया है कि तमिलनाडु की पूरी राजनीति उन्हें बचाने के पक्ष में हैं। इस मामले में लगता है कि वहां कोई विपक्ष नहीं है। लेकिन अब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कह दिया है कि वह अगर विधानसभा से अफजल गुरु को माफी देने का प्रस्ताव पास करवा देते तो क्या होता...। इससे बीजेपी भड़क गई है। यानी फांस और फंस गई। इसीलिए तो हम कह रहे हैं कि शायद खुद को फांसी लगाना ही सबसे आसान होता हो, जहां राजनीति कहीं आड़े नहीं आती।majaa aa gayaa vidyaa jee

Sam_love
24-10-2011, 03:16 PM
ढाई हजार साल पहले रंगोली स्त्रियों की संकेत भाषा थी


दीवाली के दिन ज्यादातर घरों में रंगोली बनाई जाती है - फूलों और धार्मिक प्रतीकों से सजी हुई। या फिर लक्ष्मी पीठ , लक्ष्मी चौकी और उनके पग चिह्न। ऐसा माना जाता है कि इन प्रतीकों से घर में लक्ष्मी का आगमन होता है।

रंगोली संस्कृत का शब्द है , जिसका अर्थ है रंगों के जरिए भावों को अभिव्यक्त करना। उसे अल्पना भी कहते हैं। यह शब्द भी संस्कृत के आलेपन शब्द से बना है , जिसका अर्थ है लीपना , लेपन करना। रंगोली या अल्पना बनाने की यह प्रथा अलग - अलग नामों सेलगभग पूरे भारत में प्रचलित है।

यह कला विभिन्न क्षेत्रों में अलग - अलग नामों से प्रचलित है , जैसे उत्तर प्रदेश में चौक पूरना , राजस्थान में मांडना , बिहार में ऐपन , बंगाल में अल्पना , महाराष्ट्र में रंगोली , कर्नाटक में रंगवल्ली , तमिलनाडु में कोल्लम , उत्तराखंड में ऐपण , लिखथाप या थापा , आंध्र प्रदेश में मुग्गु या मुग्गुलु , हिमाचल प्रदेश में एपण और केरल में कोलम। इनसे कई मिथक भी जुड़े हैं।

तमिलनाडु में यह मिथक प्रचलित है कि मारकाड़ी के महीने में देवी आंडाल ने भगवान तिरुमाल से विवाह की विनती की। लंबी साधना के बाद वो भगवान तिरुमाल में विलीन हो गईं। इसलिए इस महीने में अविवाहित लड़कियां सूर्योदय से पहले उठ कर भगवान तिरुमाल के स्वागत के लिए रंगोली सजाती हैं।

रंगोली को आज हम सिर्फ एक तरह की लोक कला समझते हैं , पर पुराने जमाने में यह दरअसल संवाद की एक भाषा थी। महाराष्ट्र के दक्षिणी हिस्से से गुजरात की सीमा तक वरली जाति के आदिवासियों का निवास है। वे अलिखित भाषा बोलते हैं , जिसमें संस्कृत , मराठी और गुजराती शब्दों का समावेश है। लेकिन वे आज भी अपने संदेशों का आदान - प्रदान वरली चित्रों और कलाकृतियों के माध्यम से करते हैं। यह भी रंगोली का ही एक रूप है।

यशोधरा डालमिया की किताब द पेंटेड वर्ल्ड ऑफ द वरलीज के अनुसार वरली के परंपरागत रेखाचित्रों का इतिहास लगभग 2500- 3000 ईसा पूर्व का है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में भी अल्पना के चिह्न मिलते हैं। लेकिन कुछ पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि यह कला दसवीं शताब्दी से लोकप्रिय हुई।

पहले रंगोली का विकास असल में घरों में रहने वाली स्त्रियों ने हीकिया। उनके लिए इनके प्रतीक दैवी आपदा से मुक्ति और प्रेत बाधा दूर करने के लिए होते थे। ये संकेत घर की दीवारों से लेकर गंडे - ताबीज तक में भी बनाए जाते थे। बाद में हर स्त्री इसे अपने घर में शांति , सुरक्षा और अच्छी खेती की कामना के लिए बनाने लगी।

कुछ क्षेत्रों में यह एक ग्राफिक वर्णमाला की तरह विकसित हुई , जिनमें त्रिकोण , आयत और वृत्त या अर्धवृत्त का प्रयोग अधिक होता था। आयत और त्रिकोण प्रकृति प्रेम और उससे तादात्म्य दर्शाते हैं। घेरा सूर्य और चंद्रमा को प्रकट करता है। त्रिकोण पर्वत , पेड़ और मनुष्य को दर्शाते हैं। आयत विभिन्न तरह के तर्क और मनुष्य की खोज की जानकारी देता है। इसके अलावा वह पवित्र शांति का प्रतीक भी है। हर आध्यात्मिक चित्र के मूल में आयत अवश्य होता है।

त्रिकोण आकृतियों में ढले आदमी और जानवर , रेखाओं में चित्रित हाथ - पांव तथा ज्यामितिक तरह के बिंदु और रेखाओं से बने इन चित्रों को स्त्रियां घरों पर मिट्टी की दीवार पर बनाती थीं। इन्हीं के माध्यम से वे अपने आसपास के आदमी , प्राणी और पेड़ - पौधों की सारी गतिविधियां प्रदर्शित करती थीं। उनकी रंगोली अलग - अलग घटनाएं दर्शाती थीं। परिवार में कितने सदस्य हैं ? क्या कोई बीमार है , खेतीबाड़ी चल रही है या नहीं , यह सब जानकारी रंगोली से मिल जाती थी। हर रोज नई रंगोली बनती थी और उसका नया रेखांकन नई बात कहता था। जब दूसरी लिपियों का विकास नहीं हुआ था , तब इनके माध्यम से कथाएं भी सुनाई जाती थीं।

यदि इसका परंपरागत रूप देखें तो हर जगह इस कला की संवाहक हमेशा स्त्री ही रही है। वह अपने मन के भाव , चिंताएं , देव स्तुति या बुरी नजर से बचने के लिए टोटके आदि इन रंगों और रेखाओं के माध्यम से प्रकट करती रही हैं। जैसे पंडित मंत्रों के जरिए आवाहन करते हैं , वही काम स्त्रियां रंगोली के जरिए करती थीं। दक्षिण भारत की विभिन्न संस्कृतियों में आज भी बुरी आत्माओं से बचने के लिए घर के दरवाजे पर सुबह - सुबह रंगोली बनाई जाती है।

Sam_love
24-10-2011, 03:20 PM
एक मुर्गा हुआ सड़क के आर-पार


कई लोग जेब्रा क्रॉसिंग से सड़क पार करने के लिए खड़े थे। ट्रैफिक लाइटें गुल थीं। चौराहे पर बेचारा एक सिपाही सैकड़ों गाडि़यों को मैनेज कर रहा था। हम लोग काफी देर से इंतजार कर रहे थे, लेकिन गाडि़यां थीं कि घोटालों की तरह एक के बाद एक नमूदार हो रही थीं। खड़े-खड़े मैं सोचने लगा कि आखिर इसे जेब्रा क्रॉसिंग क्यों कहते हैं, मैंने तो आज तक किसी जेब्रा को यहां से सड़क क्रॉस करते नहीं देखा। इतने में जाने कहां से एक हट्टा-कट्टा मुर्गा आया और गाडि़यों से बचता-बचाता सड़क पार कर गया। उसे बचाने के लिए कई गाडि़यों को ब्रेक लगानी पड़ी। कुछ तो आपस में टकरा भी गईं।

मुर्गे की इस हरकत से मैं परेशान हो गया। भारत में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो कानून को जेब में रखकर चलते हैं, आज पहली बार किसी मुर्गे को कानून को ठेंगा दिखाते देखा। इस देश का क्या होगा यारो? मैं सीधे डॉ. मनमोहन सिंह के यहां पहुंचा और मुर्गे की करतूत पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। वह बोले, 'उस मुर्गे की कोई मजबूरी रही होगी, काका। कल कैबिनेट की मीटिंग के बाद ही इस बारे में सरकार का रुख बता पाऊंगा।' फिर मैं कुछ और जानी-मानी हस्तियों से मिला। किसने क्या कहा, पढ़ते जाइए।

राहुल गांधी: मुझे लगता है कि वो मुर्गा जिस जगह रहता था, उस पर किसी ने कब्जा कर लिया है। सरकार से मैं सिफारिश करूंगा कि मुर्गे को उसकी जगह वापस दिलाई जाए। और हां, मुआवजा भी मिलना चाहिए।

नितिन गडकरी: मुर्गे ने जो भी किया, वह अनैतिक तो है, लेकिन गैरकानूनी नहीं। मुर्गे की नीयत में कोई खोट नजर नहीं आती। अगर हमारी पार्टी चाहेगी, तो उसकी जगह हम उसी की पसंद का मुर्गा ले आएंगे।

प्रणव मुखर्जी: आपका मतलब चिकन? इधर मैं देख रहा हूं कि महंगाई को रोने वाले लोग चिकन कुछ ज्यादा ही खाने लगे हैं। अगला बजट बनाते समय इस बात को ध्यान में रखा जाएगा।

सुषमा स्वराज : इसी बात पर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को इस्तीफा दे देना चाहिए। सरकार ने अगर ऐसे मुर्गों के खिलाफ जल्द ही कोई कार्रवाई नहीं की तो हमारी पार्टी राजघाट पर धरना देगी और मुझे एक बार फिर वहां डांस करना पड़ेगा।

बाबा रामदेव : उस मुर्गे को पागलखाने भेज देना चाहिए। चाहें तो उसे मेरे आश्रम में भी छोड़ सकते हैं। योगासनों और मेरी दवाइयों से कुछ ही दिनों में वह आदमी बन जाएगा।

अन्ना हजारे : वह मुर्गा शायद नहीं जानता कि देश में लोकशाही है और लोकशाही में मेरी मर्जी के खिलाफ कुछ भी हिल नहीं सकता। सरकार यदि ऐसे मुर्गों को लोकपाल के दायरे में नहीं लाई, तो मुझे एक और अनशन करना पड़ेगा।

दिन भर का थका मांदा मैं रात को फौजा के ढाबे में पहुंचा और बैठते ही बोला , ' बटर चिकन और गर्मागर्म पराठे। ' फौजा बोला , ' बाऊ जी , आज दाल - रोटी से ही गुजारा करो। ' मेरा सवालिया चेहरा देखकर कहने लगा , ' आप तो जानते ही हो कि अपने घर के पिछवाड़े में मैंने छोटा - सा पोल्ट्री फार्म खोल रखा है। मुर्गे - मुर्गियों पर निगरानी रखने के लिए मैंने एक दबंग मुर्गा रखा हुआ था। दूध में भिगोए चने उसे खिलाता था। खा - खाकर वह तगड़ा हो रहा था। इधर कुछ रोज से वह दिन भर एक मुर्गी को देखकर कुटकुट करता रहता था। कभी - कभी सिर हिलाकर इशारे भी करता। जब बांग देता तो लगता था जैसे ' शीला की जवानी ' गा रहा हो।

कल मैंने उसे डांट दिया कि अगर तुमने ये सब बंद नहीं किया तो मैं तुम्हें भून डालूंगा। उस वक्त तो वह दुबक गया , मगर रात को ड्रामा कर गया। बटर चिकन के लिए पल रहे सारे मुर्गों को उसने भगा दिया और उसी मुर्गी के साथ गायब हो गया। जाते - जाते किचन में रखा बटर भी चट कर गया। क्या जमाना आ गया , बाऊ जी। यह तो सुना था कि फलाना आदमी फलाने को मुर्गा बना गया , लेकिन पहली बार देखा कि एक मुर्गा मेरे जैसे आदमी को मुर्गा बना गया।

vidya thakur
24-10-2011, 03:27 PM
4]कोई नेता कानून का लपेटे में कायकू नहीं आता

हिंदुस्तान का जनता अकसर एक शिकायत करता है - नेता अपना ऊपर कोई कानून लागू नहीं होने देता। ये ब़ड़ा नासमझी भरा शिकायत है। वास्तव में तो जनता को शिकायत नहीं, संतोष होना मांगता है कि नेता कानून के लपेटे में नहीं आता। कानून से बचना कोई आसान काम नहीं है। उससे बचने का वास्ते बड़ा अक्कल लगता है। नेता कानून के लपेटे में नहीं आता, इससे सिद्ध होता है कि नेता लोग कितना बुद्धिमान होता है। जो लोग शिकायत करता है, क्या वो ये चाहता है कि देश का नेता मूर्ख होवे? नेता लोग का ऊपर कानून लागू नहीं होता, उसका सबसे बड़ा कारण ये है कि कानून खुद नेता बनाता है। और, ऐसा कानून तो कोई निपट मूर्ख ईच बनाएंगा, जिसका लपेटे में वो खुद आ जावे। बहुत सा लोग मानता है कि बेईमान नेता देश का दुश्मन होता है। लेकिन, क्या जनता ने वो कहावत नहीं सुना बेवकूफ दोस्त से अक्लमंद दुश्मन बेहतर होता है। अक्लमंद आदमी हर काम सोच-समझ कर करता है। नेता बी बेईमानी बहुत सोच-समझ कर करता है। इसी कारण तो कानून का लपेटे में नहीं आता।

नेता कानून के लपेटे में कायकू नहीं आता? उसका एक बड़ा कारण ये है कि वो सिद्धांत का पालन करता है। और, उसका प्रिय सिद्धांत है - हलवाई सिद्धांत। जी हां, हलवाई और नेता में एक बड़ा समानता होता है। दोनों का मेन काम है बनाना। हलवाई मिठाई बनाता है, नेता कानून बनाता है। अबी, सब लोग जानता है कि हलवाई जो मिठाई बनाता है, वो अपना खाने का वास्ते नहीं बनाता। जब हलवाई अपना बनाया मिठाई का स्वाद खुद नहीं चखता, तो अपना बनाया कानून का स्वाद नेता खुद कायकू चखे? हलवाई अपना मिठाई ग्राहक का वास्ते बनाता है, नेता भी कानून जनता का वास्ते बनाता है। क्या इसका मतलब ये है कि जनता, नेता का ग्राहक होता है? जनता ग्राहक होवे या न होवे, नेता दुकानदार होता है। इस देश का सबसे बड़ा दुकानदार नेता लोग ईच है। (नोट - एक बात साफ करना जरूरी है। इधर हलवाई सिद्धांत का बात करके सिरफ दुकानदारी का बात बोला गया है, हलवाई लोग को बेईमान नहीं बोला गया है)।

नेता का बनाया कानून नेता पर लागू नहीं होता, उसका एक कारण कुदरत बी है। इंसान कितना बी बड़ा कायकू न हो जावे, वो कुदरत का नियम का विरुद्ध नहीं जा सकता। कुदरत का नियम है कि इंसान अपना बेटा तो पैदा कर सकता है, अपना बाप पैदा नहीं कर सकता। जब कुदरत ने यह नियम बना दिया है, तो नेता उसका खिलाफ कायकू जावे? वो ऐसा कानून कायकू बनावे जो उसका ईच बाप बन जावे! जो कुदरत का नियम का विरुद्ध जाता है उसका सर्वनाश हो जाता है। नेता अपना सर्वनाश करने का वास्ते थोड़े ईच कानून बनाता है।

कानून नेता पर लागू नहीं होता उसका एक कारण बड़ा आध्यात्मिक है। हिंदुस्तान एक धर्मप्रधान देश है। लेकिन, आजादी का चौंसठ साल बाद बी देश का जनता ने डेमोक्रेसी का धर्म को नहीं समझा। डेमोक्रेसी में नेता का स्थान वो ईच है जो धर्म में भगवान का है। आसमान में बैठ कर भगवान जो कानून बनाता है, वो संसार पर लागू होता है। संसद में बैठ कर नेता जो कानून बनाता है वो देश पर लागू होता है। क्या भगवान का बनाया कानून भगवान पर लागू होता है? तो फिर नेता का बनाया कानून नेता पर कैसे लागू हो सकता है?

जनता का एक शिकायत तो बिलकुल ही गलत है कि नेता कानून को अपना नजदीक बी नहीं पहुंचने देता। जी नहीं, कानून नेता तक पहुंचता है। जरूर पहुंचता है। बिलकुल उसी तरह पहुंचता है जैसे इंसान भगवान तक पहुंचता है। जब कोई इंसान मर जाता है तो लोग बोलता है कि भगवान ने उसको अपना पास बुला लिया। जैसे इंसान भगवान का पास पहुंचता है, उसी तरह कानून बी नेता का पास पहुंचता है। जब कानून में कोई जान नहीं रहता, तो नेता उसको अपना पास आ जाने देता है। [/SIZE]

Paul Saab
24-10-2011, 03:29 PM
बाढ़ के लिए बेकरार हो गए हैं नेताजी


नेताजी का चुनावी क्षेत्र लगभग हर साल बाढ़ से प्रभावित रहता है। पिछले चुनाव में बाढ़ के माध्यम से ही नेताजी ने भूतपूर्व नेता को कोस- कोस कर पहले अपने पक्ष में माहौल बनाया फिर इसी बाढ़ के पानी के सहारे चुनावी नैया पार की थी। यह क्षेत्र इस साल भी बाढ़ की आशंकाओं से गले तक भरा हुआ था। बारिश के बादल देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग काम कर रहे थे। कहीं वे बरस कर घटिया सड़क की पोल खोल रहे थे तो कहीं किसी श्रृंगार रस के कवि के हृदय में मिलन गीत रचने का माहौल बना रहे थे। इस क्षेत्र के लोग लंगोट पहने झोपडि़यों के बाहर उबड़ -खाबड़ जमीन पर बैठे चिंता में डूबे जा रहे थे। इन्हें नेताजी के द्वारा चुनाव के समय दिए गए आश्वासनों का ही सहारा था।

और जैसा कि होता है कि अंधों में एक काना राजा पैदा हो जाता है। सो यहां भी एक काने राजा ने सुझाया कि इससे पहले कि हम बाढ़ में सच्ची-मुच्ची में गले-गले तक डूब जाएं, हमें नेताजी की शरण में चलना चाहिए। हमें उन्हें जनता के साथ किए गए वादे याद दिलाने चाहिए। हक की लड़ाई लड़नी चाहिए। आखिर हमने ही उन्हें चुना है। इसी क्षेत्र के कारण उन्हें बाढ़ मंत्री का प्रभार भी दिया गया है। इस भाषण रूपी डोज से निराश बैठे उन लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई और वे 'साथी हाथ बढ़ाना' गाते हुए नेताजी से मिलने कमर कसकर राजधानी की तरफ कूच कर गए। राजधानी पहुंचकर नेताजी के बंगले के बाहर कडे़ सुरक्षा इंतजाम को देखकर उनके तेवर वहीं ठंडे पड़ गए। गेट पर बैठे दरबान ने उन्हें बाहर ही रोक दिया। बाद में भगवान को सवा रुपये की मनौती और दरबान को खैनी चढ़ाने से जैसे- तैसे बात बनी और वे नेताजी के पीए के कक्ष तक पहुंचने में सफल हो पाए। पीए ने इंटरकॉम पर नेताजी से पूछा कि कुछ फालतू लोग आपसे मिलने की जिद कर रहे है। कहिए तो व्यस्तता का बहाना बना दूं। पर पीए के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब नेताजी ने कृष्ण की भूमिका निभाते हुए बाहर आकर सुदामाओं को गले लगा लिया।

नेताजी भावुक स्वर में बोले, मैं आप लोगों को ही याद कर रहा था। मौसम विभाग कहता है कि इस बार भी शानदार बाढ़ की उम्मीद है। मैं भी चाहता हूं कि आपकी शानदार मदद करूं। पर खेद का विषय है कि इधर बाढ़ की संभावना सामने है और उधर हेलिकॉप्टर बिगडे़ पड़े हैं। कैसी मजबूरी है। अब मैं बाढ़ का जायजा कैसे लूंगा। राहत राशि का आकलन कैसे करूंगा। परंतु आप को क्या कमी है। हेलिकॉप्टर सुधरवा क्यों नहीं लेते - जानकार कुछ ज्यादा ही तेज चल रहा था। तुम नहीं समझोगे -नेताजी ने उसे औकात बताते हुए कहा- ओछी राजनीति ने इस देश को बर्बाद कर दिया है। हेलिकॉप्टर सुधारने या नए खरीदने की फाइल रुपया मंत्री ने रोक रखी है। पर सरकार तो आपकी ही है, जानकार ने दुबारा धृष्टता की। यह गहरी राजनीति है, नेताजी ने आंसू बहाते हुए कहा-दरअसल हमारी मिली-जुली सरकार है। रुपया मंत्री की पार्टी के ज्यादा लोग जीते थे। इसलिए उन्हें यह प्रभार मिला है। दूसरा कारण यह है कि अपने क्षेत्र के जिन नेता को हराकर मैं जीता था, वह इन रुपया मंत्री का खास आदमी है। यह दोनों एक ही गुट के हैं। इसलिए दोनों मिलकर साजिश रच रहे है कि मैं बाढ़ का जायजा हेलिकॉप्टर से न ले सकूं। पर हम सभी को संकट की इस अभूतपूर्व घड़ी में एक रहना है। हम उन्हें बेनकाब करने के लिए प्रदर्शन करेंगे। आप में से कुछ भूख हड़ताल पर बैठ जाएं। बाकी कार्यक्रम पीए साहब समझा देंगे। मैं सामने नहीं आऊंगा पर पीछे से सब संभाल लूंगा। अगले दिन प्रदर्शन शुरू हो गया। कुछ लोग भूख हड़ताल पर बैठ गए। उनकी प्रमुख मांग के अनेक बैनर लगे थे उस पर पेंटर की गलती से लिखा था- बाढ़ का जायका (जायजा) लेने के लिए खराब पड़े हेलिकॉप्टर तुरंत दुरुस्त किए जाएं।

Paul Saab
24-10-2011, 03:31 PM
सोचो, अगर बीजेपी में न होते



सोचो, गर बीजेपी में न होते येदयुरप्पाजी तो क्या होता। यह मत सोचो कि वे न होते तो बीजेपी यह दक्षिणी द्वार खोल पाती या नहीं। क्योंकि असली जोर तो रेड्डी बंधु ही लग रहे थे, इसलिए हो सकता है यह द्वार अनंतकुमारजी ही खोल देते। पर वे हाथ मलते ही रह गए। आज तक मल रहे हैं। हालांकि वैसे नहीं मलते, जैसे आडवाणीजी मलते हैं -आदतन। पर आडवाणीजी वैसे भी मल रहे हों, तो क्या कहा जा सकता है, जैसे अनंतकुमार मलते रह गए।

यह भी मत सोचो कि वे न होते तो देवगौड़ा परिवार से मिलकर सरकार चलाने की सौदेबाजी कौन करता। क्योंकि वैसी सौदेबाजी तो बीजेपी ने यूपी में मायावती के साथ भी की थी। बीजेपी इसमें काफी एक्सपर्ट है और इस मामले में किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं है। हां, यह अलग बात है कि अगर येदयुरप्पाजी की बजाय कोई और होता तो क्या देवगौड़ा परिवार के साथ इसी तरह की लव-हेट रिलेशनशिप होती। हो सकता है प्यार ही प्यार होता। हो सकता है नफरत ही नफरत होती।

पर सोचो, गर येदुदप्पाजी न होते तो पार्टी ए. राजा, अशोक चव्हाण और कलमाड़ी का मुकाबला कैसे कर पाती। घोटालों के मामले में पार्टी अपने को सरकार के बराबर कैसे खड़ा कर पाती। पार्टी सर झुका के खड़ी रहती कि घोटाले तो हमारी सरकार में भी बहुत हुए थे -तहलका टाइप, पर आपका मुकाबला नहीं कर सकेंगे। येदयुरप्पाजी ने पार्टी को सिर ऊंचा करने लायक बना दिया। यह कहने लायक बना दिया कि अगर राजा ने पौने दो लाख करोड़ का घोटाला किया है, तो येदयुरप्पाजी ने भी कम से कम पौने एक लाख करोड़ का घोटाला तो किया ही होगा। फिर यह तो सिर्फ एक राज्य में उन्होंने कर दिखाया। अगर तुम्हारी तरह पूरा देश हाथ में होता तो बाबा रामदेवजी भी उस तरह हिसाब नहीं लगा पाते, जैसे आजकल वे कालेधन का लगाते हैं -चार सौ लाख करोड़। इतनी क्षमता, इतनी कुव्वत और इतना माद्दा है उनमें कि इस तरह के तमाम आंकड़े छोटे पड़ जाते।

सोचो , गर येदयुरप्पाजी न होते तो घोटालों के इस दौर में पार्टी पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाती। उसे प्राचीन और गुजरे जमाने की चीज मान लिया जाता। कंपीटिशन के ऐसे कठिन दौर में येदयुरप्पाजी ने पार्टी को प्रासंगिक बनाए रखा है। उसे रेस में खड़ा रखा है। उसे पिछड़ने से बचाए रखा है। पार्टी को इस स्थिति में रखा है कि अपने प्रतिद्वंद्वी के समक्ष वह यह दावा कर सकती है कि तुम्हारे पास राजा और कलमाड़ी हैं , तो हमारे पास येदयुरप्पाजी हैं। पार्टी के लिए इस मामले में वे सवा लाख के बराबर अकेले साबित हुए हैं। सबने देखा है कि कैसे अकेले दम उन्होंने सबका मुकाबला किया है और फिर भी मैदान में डटे रहे हैं। पार्टी बहुत बार दबाव में आई। कई बार उसके पांव उखड़े। कई बार उसका हौसला पस्त हुआ। हताशा आई , कई बार उसने समर्पण करने की सोची। पर येदयुरप्पाजी का हौसला हमेशा बुलंद ही रहा। और वे डटे रहे।


सोचो , गर येदयुरप्पाजी न होते तो रेड्डी बंधु इतने मजबूत होते कि राज्यों की सीमाएं निर्धारित करने लगते। वे न होते तो दुनिया इससे अनजान ही रह जाती कि कर्नाटक में इतनी खनिज संपदा दबी पड़ी है। गर वे न होते तो उसे लूटने की इतनी खुली छूट नेताओं और उनके परिवारी जनों को कैसे मिलती। सोचो गर येदयुरप्पाजी न होते तो शांताकुमारजी पार्टी के बारे में यह कैसे कह पाते कि बीजेपी बेटे - बेटियों की पार्टी बनकर रह गई है। वे अपनी सबसे भरोसेमंद शोभा करंदलाजे को मंत्री पद से हटाकर आंसू बहा सकते हैं। पार्टी में एक वही तो हैं , मोदीजी जिनकी हिमायत में खड़े हो जाते हैं। यह उन्हीं की हैसियत है कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भी अपना वारिस पूरे ठसके से खुलेआम घोषित किया। अब सदानंद उनके वारिस बन पाते हैं या नहीं , यह तो वक्त बताएगा , लेकिन अगर हो गए तो ऐसे सफल होनेवाले तो वे अकेले ही होंगे। कल्याणसिंह भी कुसुम राय को सिर्फ संासद ही बनवा पाए थे।


सोचो , गर येदयुरप्पाजी न होते तो पार्टी का दूसरा कोई नेता संकट की ऐसी घड़ी में , जो कई - कई बार आई , ऐसे डटा रहता। येदयुरप्पाजी आसानी से गालिब को दोहरा सकते हैं कि मुश्किल मुझ पर पड़ी इतनी कि आसां हो गई। उन पर इतने संकट आए कि अब कोई भी संकट , संकट जैसा लगता ही नहीं। पार्टी का कोई और नेता होता तो क्या वह इतने संकट झेल पाता। सोचो , गर येदयुरप्पाजी नहीं होते तो रेड्डी बंधु किसी को मुख्यमंत्री पद पर ऐसे टिकने देते। वे रोज संकट पैदा करते। हालांकि आज भी करते हैं , पर फिर उन संकटों को टालना भी उन्हीं को पड़ता है।

अपनों को घर से निकालने का इतना अच्छा तमाशा और कौन कर पाता। सत्य परीक्षण जैसे तमाशे करने की हिम्मत भी किसी और में कैसे आती। वे किसानों पर गोली चलवा कर आंसू बहा सकते हैं ।

Alexander the great
02-11-2011, 01:40 PM
दिग्विजय सिंह को चमचा रत्न मिलना चाहिए


कॉंग्रेस के भोँपू नेता श्री दिग्विजय सिंह ने लगता है कि पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं का बोझ अपने सिर ले लिया है | वो हालाँकि हैं तो कांग्रेस के महासचिव , मगर वो हमेशा पार्टी के प्रवक्ता के रूप में ही कार्य करते हुए दिखाई देते हैं | या तो वो उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की भद्द पिटने से इतने ज़्यादा व्यथित हैं , या फिर मध्य प्रदेश की कुर्सी 10 वर्षों से नही मिल पाने के कारण चिड़चिड़े हो गये हैं कि उन्हें हर आदमी में अपना और अपनी पार्टी का दुश्मन ही दिखाई देता है | पहले बाबा रामदेव को धोखेबाज़ और फ्रॉड कहा , फिर वो श्री अन्ना हज़ारे जी के खिलाफ अनाप शनाप बकने लगे | लेकिन दिग्विजय सिंह अगर माइक लगाकर भी चिल्लाना शुरू कर दें तब भी इस देश की जनता उनका विश्वास नही करने वाली , क्योंकि हर कोई जानता है कि कांग्रेस के लोगों और मंत्री ने सरकार में रहते हुए क्या क्या गुल खिलाए हैं | फिर भी दिग्विजय सिंह की तारीफ़ करनी चाहिए कि इतना होने के बाद , जहाँ कॉंग्रेस्सी अपना चेहरा बचाए हुए घूम रहे हैं , वो अनाप शनाप बक कर पार्टी के जिंदा होने का सबूत दे रहे हैं | दिग्विजय सिंह तो सर्व प्रिय श्री श्री रवि शंकर जी के खिलाफ भी आरोप लगाने से बिल्कुल नही चूक रहे | दिग्विजय सिंह अर.एस.एस के खिलाफ तो हाथ मुँह धोकर पड़े हुए हैं | लेकिन उन्हें ये नही पता कि उनसे पहले जाने कितने आए और जाने कितने चले गये मगर अर.एस.एस वही का वहीं है , बल्कि और उसका विस्तार हुआ है | दिग्विजय जैसे जाने कितने चने बेचने लग जाते हैं | अगर दिग्विजय सिंह को अपनी नेतागिरी पर या पार्टी पर इतना ही भरोसा है तो उत्तर प्रदेश के चुनाव उसका परिणाम देंगे | अगर उन्हें अपनी औकात देखनी है तो एक बार उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़कर देख लें | लेकिन फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा की जब पूरी की पूरी कांग्रेस घोटाले करने के बाद मुँह छुपाकर जी रही है , दिग्विजय सिंह ने अपनी नेता और मेडम को खुश करने का कोई बहाना नही छोड़ा | उन्हें मालूम है कि उन्हें भारत रत्न तो मिलने वाला है नही ( उनसे पहले शायद राहुल गाँधी को भारत रत्ना मिल जाए ) तो फिर क्यों ना चमचा रत्न ही मिल जाए | मैं सरकार से प्रार्थना करता हूँ कि कांग्रेस पार्टी के इस होनहार , भॉम्पू नेता को अति शीघ्र चमचा रत्न प्रदान करे |

Alexander the great
02-11-2011, 01:43 PM
सब से ईमानदार हैं हमारे मनमोहन ........ ?


यदि मैने कभी भ्रस्टाचार किया हो तो मैं किसी भी जाँच के लिए तैयार हूँ.......... (मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री)

प्रधानमंत्री के द्वारा संसद में बोले गये ये शब्द उनकी ईमानदारी का ब्यान करते हैं........

दोस्तो आज आप भी दिल की बात सोचने को मजबूर होंगे ........

बड़े घोटाले जब भी आए है वो कांग्रेस सरकार के राज में ही आए है| क्योंकि आज़ाद भारत पर कुल मिलाकर कांग्रेस ने ही राज किया है बहुत कम हिस्सा दूसरी पार्टियों के हिस्से में आया है| इसलिए मेवा चखने का मोका उनको कम मिला है| जितना मिला था उतने में ही उन्होने सरसों के तेल और प्याज के लिए रुला दिया था| लेकिन आज जो आँसू बहे जा रहे है इनके आगे वो आँसू कुछ भी नही थे|

पूर्व प्रधान मंत्री श्री पी. वी. नरसिमाह राव के बारे में सब जानते है, उन्हें पता है की जब राव साहब ने पद ग्रहण किया था तो दो लोगों के सहारे शपथ ग्रहण करने पहुँचे थे (किसी को यकीन ही नही था कि ये 6 महीने भी पकड़ पाएगें), लेकिन कुर्सी ऐसी पकड़ी की पूरा कार्यकाल निकाल दिया (कुर्सी की ताक़त ने उनकी जिंदगी के 10-15 साल भी बढ़ा दिए)| जिन्होने भी उनकी सेहत को देख कर उनका नाम नॉमिनेट किया था वो भी हैरान रहे होंगे और अकेले में अपने को ही कोस रहे होंगे की काश इसका नाम नॉमिनेट ना किया होता| क्योंकि राव के बाद बहुत से ऐसे नाम थे जो प्रधानमंत्री की दौड़ में थे| अपना रास्ता साफ ना देख कर उन्होनें मुद्दों की दुहाई देकर अलग अलग पार्टी बना ली|

श्री पी. वी. नरसिंहा राव अक्सर चुप रहते थे (अटल जी उनको मोनीबाबा कहते थे) और उनके ही कार्यकाल में उस समय के सबसे बड़े घोटाले हुए थे और "उस कार्यकाल में वित्तमंत्री मनमोहन सिंह जी थे|"

आज मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री है ये भी अक्सर चुप ही रहते है और इनके कार्यकाल में भी एक के बाद एक बड़े से बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं| जैसे कोई ओलम्पिक की रेस चल रही हो की कौन कितना बड़ा घोटाला करेगा? दोस्तों नोट फॉर वोट के केस में फ़सें अमर सिंह ने किसकी सरकार बचाने के लिए ये काम किया था ...... जीतने भी मंत्रियों ने घोटाले किए हैं वो किसके नेतरत्व में किए हैं ..........

कोई भी काम मिलजुल कर ही अंजाम तक पहुँचता है, यदि किसी को पता है की कहीं चोरी हो रही है और वो उसे छुपाता है तो वो भी उतना ही भागीदार होता है जितना चोरी करने वाला| यदि बेटा कत्ल करता है तो पुलिस बाप को पकड़ कर ले जाती है चाहे उसने (बाप) अपनी जिंदगी में कभी मच्छर भी ना मारा हो|

प्रधान मंत्री जी माना की आप जितना ईमानदार प्रधानमंत्री भारत को आज के दिन नहीं मिल सकता| किंतु सिर्फ़ अपनी ईमानदारी का राग अलाप कर अपनी सेना के कारनामों को नही छुपा सकते| आप अपनी ईमानदारी का आईना दिखा कर जनता से सच्चाई को छुपा नही सकेंगे| सेना की हार या जीत का सेहरा सेनापति के सिर ही सजता है| यदि आप अपनी कुशलता और दूरदर्शिता का परिचय देते तो आज अन्ना यूथ आइकान ना बनते| घुटनो तक पानी हो तो किसी को फ़र्क नही पड़ता किंतु आप के नेतरत्व मे तो पानी सिर से भी बहुत उपर निकल गया| तभी तो जनता को सड़कों पर आना पड़ा| किसी काम को करने के लिए जादू की छड़ी की नही द्रढ इच्छा शक्ति की ज़रूरत होती है, आपके हाव भाव इसे न���ी दिखाते| आपके कृषि मंत्री ने सुप्रीम कोर्ट दवारा गोदामों में सड़ रहे अनाज को ग़रीबों में बाँट देने की सलाह को दरकिनार कर दिया था, और आ�� ने वहाँ भी चुप्पी साध रखी थी क्योंकि आपको कुर्सी जाने का ख़तरा था, माफ़ करना जनाब आपको जनता से ज़्यादा प्यारी है ऐसा जनता जान चुकी है|

ईमानदारी तो पूर्व प्रधानमंत्री पूजनीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने दिखाई थी जब वो रेल मंत्री थे और रेल दुर्घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था| दोस्तों क्या इतना साहस आज के नेताओं में है .............

Alexander the great
02-11-2011, 01:47 PM
अन्ना के अनशन की धमकी या करोड़पति बनने का नया तरीका?


अन्ना जी एक बार फिर अनशन की धमकी के समाचार के साथ सुर्खियों में वापस आ चुके हैं. क्या वाकई उन्हें इस बार अनशन की जरूरत हैं? या वह अपनी टीम के घटोलों को बचाने की चेष्ठा कर रहे हैं? कहने को तो वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे हैं परन्तु अपनी टीम को बचाने का क्या यही नया रास्ता हैं?

यह भारतीय सरकार देश के हित के लिए क्या कर रही हैं यह तो विश्व में सब देशों को भी पता हैं. भारतीय नागरिक तो असहाय हैं. परन्तु अन्ना की धमकी तो पाकिस्तान जैसे भारत को धमकी देता हैं उससे कम नहीं दिखती. जब पूरे विश्व को मनमोहन सिंह जैसे भारत के कठपुतले प्रधानमंत्री के कार्य की जानकारी हैं तो अन्ना जी हमेशा उनको चिट्टी क्यों लिखतें हैं? जब प्रधानमंत्री देश व अपने मंत्रियों को नहीं संभाल सकते तो अन्ना जी के लोकपाल बिल का क्या करेंगे? जनता का ध्यान अपनी दिशा में करके अपनी टीम को बचाने का नया तरीका अजमाने के सामान हैं. उनकी अन्ना जी की स्थिति अब हास्यप्रद हो चुकी हैं. उन्हें अपनी टीम को संभालना सीखना चाइए जो उन्हें कठपुतली की तरह इस्तेमाल करने लग चुकी हैं. उनकी टीम सत्ता का खेल दिखाकर और अन्ना जी का नाम लेकर इस आन्दोलन को आगे बढ़ा रही हैं. जबकि यह आन्दोलन रास्ते में भटका हुआ हैं.

यह बात सही हैं अनशन करने से धन की उन्नति चंदे के माध्यम से होगी इसके साथ करोड़पति बनने का नया तरीका भी यही हैं. अन्ना जी के पहली बार अनशन से 1.3 करोड़ रुपए का दान मिला था , दूसरे अनशन का हिसाब तक़रीबन 2.5 करोड़ के बराबर हैं. तीसरी बार अनशन करने से इससे ज्यादा दान मिलने की उमीद हैं. इसके साथ लोगों का ध्यान लोकपाल बिल की तरफ लगाकर उनको मुर्ख बनाने का तरीका है. लोकपाल बिल में वह अपनी NGOs आदि को लाने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि उनका मानना है उनकी टीम एक दम भ्रष्ट मुक्त हैं. आने वाले दिनों में देखना होगा उनकी टीम और उनके लोकपाल बिल का क्या होता हैं. यह बात स्पष्ट हैं संसद के अगले सदन में लोकपाल बिल नहीं आएगा, जब उस पर मतदान प्रक्रिया होगी तो सभी पार्टियों में इसपर मतभेद रहेगा.

Alexander the great
02-11-2011, 01:49 PM
7 बिलियन - 7 अरब - 700 करोड़


31 अक्टूबर 2011 को दुनिया का आबादी 7 बिलियन यानी 700 करोड़ हो गया। इधर आबादी का मतलब इन्सान लोग का आबादी से है। बाकी जानवर लोग का आबादी लगातार घट रहा है। इतना सारा युद्ध , विश्वयुद्ध अउर आतंकवादी लोग का कोशिश बी इन्सान का आबादी को घटा नहीं पाया। ये दो चीज का कमाल है - इन्सान का बुद्धि अउर उसका प्रजनन क्षमता ! वैसे , दूसरा बहुत सा जीव कहीं जास्ती बच्चा पैदा करता है , लेकिन , जिंदा इन्सान का जास्ती रहता है।

इन्सान लोग का आबादी इतना जास्ती बढ़ने का वास्ते कुदरत का एक नियम जिम्मेदार है - सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट। सभी जानवर को फिट बनाने का वास्ते कुदरत ने अलग - अलग गुण दिया। हिरन को स्पीड दिया , शेर को दांत दिया , अउर इन्सान को दिमाग दिया। इन्सान ने देखा कि वो न तो हिरन से तेज भाग सकता है , अउर न शेर से पंजा लड़ा सकता है। तो उसने दिमाग से काम लिया। इन्सान ने बंदूक ईजाद कर लिया। बस , इन्सान जिंदा रहने लगा अउर बाकी जानवर मरने लगा।

वैसे , इन्सान है बड़ा मजेदार जीव। अपना सब हरकत का जिम्मेदारी वो ईश्वर का सिर डाल देता है। आप किसी को पूछ कर देखो - ' भई , आपका इधर इतना बच्चा कैसे पैदा हो जाता है ?' तो अक्सर जवाब मिलता है , ' अपुन क्या करे , ऊपरवाला दे देता है। ' ये ऊपरवाला बी अजीब है। शायद टोकरे में बच्चा भर कर दुनिया का ऊपर फेरी लगाता रहता है , ' ले लो , बच्चा ले लो। पड़ोसी का घर में चार है , तुम छह ले लो। '

इधर एक सवाल पैदा होता है , जब ऊपर वाला हर सेकंड में एक बच्चा देता है , तो दूसरा काम का वास्ते टाइम किधर से निकालता है ? शायद दूसरा काम करने का वास्ते उसको टाइम मिलता ईच नहीं है। ये ईच कारण दुनिया का हालत ऐसा हो गया है।

आस्थावान लोग मानता है कि देने वाला तो बस ऊपरवाला है। जो बी देता है , वो ईच देता है। वो बच्चा देता है। धरम ईमान देता है। धन - दउलत देता है। सबको कुछ न कुछ देता है। उसका देने से कोई बचता नहीं। लेकिन , ऊपर वाला सबको सब कुछ नहीं देता। एक को एक चीज देता है , तो दूसरे को दूसरा। किसी को बच्चा जास्ती देता है , तो किसी को दउलत जास्ती देता है। लेकिन , जिधर आबादी जास्ती देता है , उधर रोटी कायकू कम देता है ? जिधर रोटी जास्ती देता है , उधर बच्चा कम कायकू देता है ? क्या है कि ऊपर वाला देने में संतुलन बना कर रखता है। सब कुछ एक को दे देंगा , तो दूसरा को क्या देंगा ? उसे तो पूरा कायनात का खयाल रखना है। इस कारण , अगर आपको रोटी जास्ती चाहिए तो बच्चा कम लो। जमीन जास्ती चाहिए तो आबादी कम लो। सुविधा जास्ती चाहिए तो परिवार छोटा रखो।

वैसे अस्सल में , ऊपरवाला बच्चा नहीं देता। बच्चा पैदा करने का ताकत देता है ! साथ में , वो खोपड़ी में दिमाग बी देता है। पर , लोग बच्चा पैदा करने का ताकत तो डट कर इस्तेमाल करता है , दिमाग का इस्तेमाल नहीं करता। बच्चा पाल सकता नहीं , पर पैदा कर लेता है। अक्कल का खिड़की खोल कर ये नहीं देखता कि ऊपरवाला आंख बंद करके बच्चा नहीं देता। वरना ये बताओ कि कुंवारा लोग को बच्चा कायकू नहीं देता ?

जितना बच्चा वो एशिया या अफ्रीका में देता है , उतना यूरोप या अमेरिका में कायकू नहीं देता ? भाई साहब , देनेवाला तो तबी देता है , जबी लेनेवाला लेता है। ऊपरवाला अक्कल का दुश्मन नहीं है !

यह लेख पढ़ने में आपको करीब पांच मिनट तो लगा होएंगा। मालूम है , ये बीच में क्या हो गया ? एक सेकंड में एक का दर से तीन सउ बच्चा अउर पैदा हो गया। गउर से सुनेंगा तो आपको बच्चा लोग का रोना साफ सुनाई देंगा। जरा सोचो कि ये बच्चा रो कायकू रहा है ? वो बोल रहा है - अरे इन्सान लोग , अगर तुम अब भी नहीं संभला तो एक दिन ऐसा आएंगा जब अक्खा दुनिया रोएंगा , अउर सुनने वाला कोई नहीं होएंगा।